असहयोग आंदोलन
(1920–22)
असहयोग आंदोलन
असहयोग आंदोलन महात्मा गांधी के नेतृत्व में चलाया गया पहला व्यापक अखिल भारतीय जन आंदोलन था। इसकी पृष्ठभूमि में रॉलेट एक्ट, जलियांवाला बाग हत्याकांड, पंजाब में ब्रिटिश दमन तथा खिलाफत का प्रश्न प्रमुख थे।
गांधीजी का विचार था कि ब्रिटिश शासन भारतीयों के सहयोग के कारण ही भारत में बना हुआ है। यदि भारतीय शांतिपूर्ण और अहिंसक तरीके से सरकार के साथ सहयोग करना बंद कर दें, तो ब्रिटिश शासन की नींव कमजोर की जा सकती है।
आंदोलन की पृष्ठभूमि
प्रथम विश्व युद्ध के बाद भारत में राजनीतिक और आर्थिक असंतोष तेजी से बढ़ा। युद्ध के दौरान भारतीयों ने ब्रिटिश सरकार का सहयोग किया था, लेकिन युद्ध समाप्त होने के बाद अपेक्षित राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं हुए।
1919 के रॉलेट एक्ट ने भारतीयों में व्यापक असंतोष पैदा किया। इसके बाद 13 अप्रैल 1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड और पंजाब में हुए दमन ने ब्रिटिश शासन के प्रति भारतीयों के विश्वास को गंभीर रूप से प्रभावित किया।
इसी समय खिलाफत का प्रश्न भी सामने आया। गांधीजी ने खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया और हिंदू-मुस्लिम एकता के आधार पर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक व्यापक आंदोलन चलाने की दिशा में कदम बढ़ाया।
आंदोलन के प्रमुख कारण
रॉलेट एक्ट + जलियांवाला बाग हत्याकांड + पंजाब में दमन + खिलाफत का प्रश्न + स्वराज की माँग → असहयोग आंदोलन।
1 अगस्त 1920 — आंदोलन का आरंभ
महात्मा गांधी ने 1 अगस्त 1920 को ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध असहयोग आंदोलन की शुरुआत की।
संयोग से इसी दिन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के महान नेता बाल गंगाधर तिलक की मृत्यु हो गई।
तिलक की मृत्यु से राष्ट्रीय आंदोलन को बड़ा आघात पहुँचा। इसके बाद राष्ट्रीय राजनीति में महात्मा गांधी का नेतृत्व और अधिक प्रभावशाली होता गया।
तिथि याद रखें
1 अगस्त 1920 → असहयोग आंदोलन का आरंभ + बाल गंगाधर तिलक की मृत्यु।
कलकत्ता का विशेष अधिवेशन
सितंबर 1920 में कलकत्ता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का विशेष अधिवेशन आयोजित किया गया। इसकी अध्यक्षता लाला लाजपत राय ने की।
इस विशेष अधिवेशन में महात्मा गांधी ने स्वयं असहयोग का प्रस्ताव प्रस्तुत किया और कांग्रेस ने असहयोग की नीति को स्वीकार कर लिया।
इस प्रस्ताव के माध्यम से खिलाफत और पंजाब के अन्याय के प्रश्नों को स्वराज की माँग के साथ जोड़ते हुए ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध अहिंसक असहयोग की नीति अपनाने का निर्णय लिया गया।
कलकत्ता विशेष अधिवेशन
सितंबर 1920 → कलकत्ता → अध्यक्ष लाला लाजपत राय → असहयोग प्रस्ताव महात्मा गांधी द्वारा प्रस्तुत।
नागपुर अधिवेशन
दिसंबर 1920 में नागपुर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन आयोजित हुआ। इसकी अध्यक्षता सी. विजयराघवाचारियर ने की।
नागपुर अधिवेशन में सी. आर. दास ने असहयोग आंदोलन से संबंधित प्रस्ताव प्रस्तुत किया और कांग्रेस ने असहयोग आंदोलन के कार्यक्रम को अंतिम रूप से स्वीकार कर लिया।
इस अधिवेशन में कांग्रेस के संगठन में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए। कांग्रेस का लक्ष्य संवैधानिक साधनों से स्वशासन प्राप्त करने की पुरानी दिशा से आगे बढ़ाकर शांतिपूर्ण और वैध साधनों द्वारा स्वराज प्राप्त करना बनाया गया।
कांग्रेस की सदस्यता को व्यापक बनाने के लिए सदस्यता शुल्क घटाकर चार आना कर दिया गया। कांग्रेस को अधिक जनाधारित संगठन बनाने की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम था।
प्रांतीय कांग्रेस समितियों के पुनर्गठन में भाषायी आधार को महत्व दिया गया और संगठन को गाँव तथा स्थानीय स्तर तक फैलाने का प्रयास किया गया।
कलकत्ता और नागपुर में अंतर
कलकत्ता विशेष अधिवेशन, सितंबर 1920 → अध्यक्ष लाला लाजपत राय → गांधीजी ने असहयोग प्रस्ताव प्रस्तुत किया।
नागपुर अधिवेशन, दिसंबर 1920 → अध्यक्ष सी. विजयराघवाचारियर → सी. आर. दास ने प्रस्ताव प्रस्तुत किया → असहयोग कार्यक्रम को अंतिम स्वीकृति।
गांधीजी द्वारा उपाधियों और पदकों की वापसी
असहयोग की नीति के अंतर्गत गांधीजी ने ब्रिटिश सरकार से प्राप्त सम्मान और पदक वापस कर दिए।
गांधीजी ने केसर-ए-हिंद पदक सहित बोअर युद्ध पदक और ज़ुलु युद्ध पदक वापस कर दिए।
गांधीजी को केसर-ए-हिंद पदक दक्षिण अफ्रीका में उनकी मानवीय सेवाओं के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रदान किया गया था।
इस कदम का उद्देश्य यह प्रदर्शित करना था कि जब ब्रिटिश सरकार भारतीय जनता के साथ अन्याय कर रही है, तब उसके द्वारा दिए गए सम्मान स्वीकार करना उचित नहीं है।
नाम में भ्रम न करें
इसे “जुलूस युद्ध पदक” नहीं, बल्कि “ज़ुलु युद्ध पदक” लिखना है।
जमनालाल बजाज का योगदान
असहयोग आंदोलन के दौरान अनेक भारतीयों ने ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रदान की गई उपाधियाँ और सम्मान वापस कर दिए।
प्रसिद्ध उद्योगपति और गांधीजी के सहयोगी जमनालाल बजाज ने ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रदान की गई राय बहादुर की उपाधि त्याग दी।
उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन और गांधीवादी कार्यक्रमों को आर्थिक तथा संगठनात्मक सहयोग भी दिया।
असहयोग आंदोलन का कार्यक्रम
असहयोग आंदोलन का मूल आधार अहिंसा और ब्रिटिश संस्थाओं के साथ असहयोग था।
सरकार द्वारा प्रदान की गई उपाधियों और सम्मान का त्याग आंदोलन का महत्वपूर्ण कार्यक्रम था।
सरकारी तथा सरकार से सहायता प्राप्त विद्यालयों और महाविद्यालयों का बहिष्कार करने का आह्वान किया गया।
वकीलों से ब्रिटिश न्यायालयों का बहिष्कार करने और लोगों से आपसी विवादों को वैकल्पिक पंचायती व्यवस्था के माध्यम से हल करने की अपील की गई।
विदेशी वस्तुओं और विशेष रूप से विदेशी कपड़ों के बहिष्कार तथा स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग पर बल दिया गया।
चरखा और खादी को स्वदेशी तथा आत्मनिर्भरता के प्रतीक के रूप में प्रोत्साहित किया गया।
राष्ट्रीय शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए भारतीयों द्वारा संचालित शिक्षण संस्थाओं की स्थापना और विकास पर जोर दिया गया।
शिक्षण संस्थाओं और न्यायालयों का बहिष्कार
असहयोग आंदोलन के दौरान अनेक विद्यार्थियों ने सरकारी शिक्षण संस्थाओं का बहिष्कार किया। इसके विकल्प के रूप में राष्ट्रीय शिक्षा संस्थानों को बढ़ावा दिया गया।
इस दौर में काशी विद्यापीठ, गुजरात विद्यापीठ, बिहार विद्यापीठ और जामिया मिल्लिया इस्लामिया जैसे राष्ट्रीय शिक्षण संस्थानों का विकास हुआ।
चित्तरंजन दास, मोतीलाल नेहरू, राजेंद्र प्रसाद, वल्लभभाई पटेल और सी. राजगोपालाचारी जैसे प्रमुख वकीलों ने अपनी वकालत छोड़कर राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई।
विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार
विदेशी वस्तुओं, विशेष रूप से विदेशी कपड़ों का बहिष्कार, असहयोग आंदोलन का अत्यंत लोकप्रिय कार्यक्रम बना।
कई स्थानों पर विदेशी वस्त्रों को एकत्र करके उनकी सार्वजनिक रूप से होली जलाई गई। इसके साथ ही खादी और स्वदेशी वस्त्रों के उपयोग को बढ़ावा दिया गया।
रवीन्द्रनाथ टैगोर विदेशी वस्त्रों को जलाने के तरीके से सहमत नहीं थे। उन्होंने उपयोगी वस्तुओं को नष्ट करने की इस प्रवृत्ति की आलोचना की और इसे “निष्ठुर बर्बादी” के रूप में देखा।
टैगोर स्वदेशी और राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता के विरोधी नहीं थे; उनकी आपत्ति मुख्यतः उपयोगी वस्तुओं को नष्ट करने और आंदोलन के कुछ तरीकों को लेकर थी।
परीक्षा में ध्यान रखें
रवीन्द्रनाथ टैगोर → विदेशी वस्त्रों को जलाने की आलोचना → “निष्ठुर बर्बादी” से संबंधित प्रसिद्ध परीक्षा-तथ्य।
प्रिंस ऑफ वेल्स का बहिष्कार
नवंबर 1921 में प्रिंस ऑफ वेल्स भारत आया। असहयोग आंदोलन के समर्थकों ने उसके भारत आगमन का व्यापक बहिष्कार किया।
उसके स्वागत के सरकारी कार्यक्रमों से दूर रहने के साथ अनेक स्थानों पर हड़तालें और विरोध प्रदर्शन आयोजित किए गए।
इस बहिष्कार ने स्पष्ट किया कि असहयोग आंदोलन ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक व्यापक जन आंदोलन का रूप ले चुका था।
आंदोलन का व्यापक प्रसार
असहयोग आंदोलन ने राष्ट्रीय आंदोलन को शिक्षित मध्यवर्ग की सीमाओं से निकालकर किसानों, विद्यार्थियों, व्यापारियों, श्रमिकों और अन्य सामाजिक वर्गों तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
देश के अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय समस्याएँ भी असहयोग आंदोलन के साथ जुड़ गईं। इससे राष्ट्रीय आंदोलन का सामाजिक आधार पहले की तुलना में बहुत व्यापक हो गया।
गांधीजी के नेतृत्व में अहिंसा, सत्याग्रह, खादी और स्वदेशी राष्ट्रीय राजनीति के प्रमुख प्रतीक बन गए।
चौरी-चौरा की घटना
5 फरवरी 1922 को संयुक्त प्रांत के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच संघर्ष हुआ।
पुलिस की कार्रवाई से उत्तेजित भीड़ ने चौरी-चौरा पुलिस थाने को आग लगा दी। इस घटना में 22 पुलिसकर्मियों की मृत्यु हुई।
गांधीजी का आंदोलन पूरी तरह अहिंसा पर आधारित था। चौरी-चौरा की हिंसक घटना से उन्हें लगा कि आंदोलन को अहिंसक अनुशासन में बनाए रखने के लिए जनता अभी पर्याप्त रूप से तैयार नहीं है।
सबसे महत्वपूर्ण तिथि
5 फरवरी 1922 → चौरी-चौरा की घटना → गोरखपुर जिला।
असहयोग आंदोलन की वापसी
चौरी-चौरा की हिंसक घटना के बाद गांधीजी ने असहयोग आंदोलन को वापस लेने का निर्णय किया।
12 फरवरी 1922 को असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया गया।
आंदोलन वापस लेने के गांधीजी के निर्णय से कांग्रेस के अनेक नेता सहमत नहीं थे। उनका मानना था कि जब आंदोलन अपने व्यापक चरण में था, तब उसे अचानक रोकना उचित नहीं था।
इसके बावजूद गांधीजी ने अहिंसा के सिद्धांत को आंदोलन की सफलता से भी अधिक महत्वपूर्ण माना और हिंसा के बाद आंदोलन जारी रखने से इनकार कर दिया।
क्रम याद रखें
5 फरवरी 1922 → चौरी-चौरा की घटना → 12 फरवरी 1922 → असहयोग आंदोलन स्थगित।
गांधीजी की गिरफ्तारी
असहयोग आंदोलन स्थगित होने के कुछ समय बाद ब्रिटिश सरकार ने मार्च 1922 में महात्मा गांधी को गिरफ्तार कर लिया।
उन पर राजद्रोह से संबंधित आरोपों में मुकदमा चलाया गया और उन्हें छह वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई।
हालाँकि स्वास्थ्य संबंधी कारणों से उन्हें पूरी सजा काटने से पहले 1924 में रिहा कर दिया गया।
असहयोग आंदोलन का महत्व
असहयोग आंदोलन तत्काल स्वराज प्राप्त करने में सफल नहीं हुआ, लेकिन इसने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के स्वरूप को मूल रूप से बदल दिया।
कांग्रेस अब केवल सीमित शिक्षित वर्ग की राजनीतिक संस्था नहीं रही, बल्कि उसका संपर्क व्यापक जनसमुदाय से स्थापित हुआ।
इस आंदोलन ने भारतीयों में राजनीतिक जागरूकता, स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और ब्रिटिश शासन के प्रति असहयोग की भावना को मजबूत किया।
महात्मा गांधी भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के निर्विवाद प्रमुख नेताओं में स्थापित हुए और राष्ट्रीय संघर्ष में जन आंदोलन तथा अहिंसक सत्याग्रह की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई।
महत्वपूर्ण तिथियाँ
| तिथि / वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1 अगस्त 1920 | गांधीजी द्वारा असहयोग आंदोलन का आरंभ; इसी दिन बाल गंगाधर तिलक की मृत्यु |
| सितंबर 1920 | कलकत्ता विशेष अधिवेशन; अध्यक्ष लाला लाजपत राय; गांधीजी द्वारा असहयोग प्रस्ताव प्रस्तुत |
| दिसंबर 1920 | नागपुर अधिवेशन; अध्यक्ष सी. विजयराघवाचारियर; असहयोग कार्यक्रम को अंतिम स्वीकृति |
| नवंबर 1921 | प्रिंस ऑफ वेल्स के भारत आगमन का बहिष्कार |
| 5 फरवरी 1922 | चौरी-चौरा की घटना |
| 12 फरवरी 1922 | गांधीजी द्वारा असहयोग आंदोलन स्थगित |
| मार्च 1922 | गांधीजी की गिरफ्तारी और बाद में छह वर्ष के कारावास की सजा |
परीक्षा में भ्रमित करने वाले तथ्य
असहयोग आंदोलन का आरंभ → 1 अगस्त 1920।
इसी दिन बाल गंगाधर तिलक की मृत्यु हुई।
कलकत्ता विशेष अधिवेशन → सितंबर 1920 → अध्यक्ष लाला लाजपत राय → गांधीजी ने प्रस्ताव प्रस्तुत किया।
नागपुर अधिवेशन → दिसंबर 1920 → अध्यक्ष सी. विजयराघवाचारियर → सी. आर. दास ने प्रस्ताव प्रस्तुत किया।
गांधीजी ने केसर-ए-हिंद, बोअर युद्ध पदक और ज़ुलु युद्ध पदक वापस किए।
जमनालाल बजाज → राय बहादुर की उपाधि का त्याग।
रवीन्द्रनाथ टैगोर → विदेशी कपड़ों को जलाने के तरीके की आलोचना।
5 फरवरी 1922 → चौरी-चौरा की घटना।
12 फरवरी 1922 → गांधीजी द्वारा असहयोग आंदोलन स्थगित।
असहयोग आंदोलन वापस लेने का प्रमुख कारण चौरी-चौरा की हिंसक घटना थी।
अंतिम त्वरित पुनरावृत्ति
असहयोग आंदोलन 1920 से 1922 तक चला और महात्मा गांधी के नेतृत्व में पहला व्यापक अखिल भारतीय जन आंदोलन बना।
इसकी प्रमुख पृष्ठभूमि रॉलेट एक्ट, जलियांवाला बाग हत्याकांड, पंजाब में ब्रिटिश दमन और खिलाफत का प्रश्न थी।
गांधीजी ने 1 अगस्त 1920 को असहयोग आंदोलन शुरू किया। इसी दिन बाल गंगाधर तिलक की मृत्यु हुई।
सितंबर 1920 के कलकत्ता विशेष अधिवेशन की अध्यक्षता लाला लाजपत राय ने की और गांधीजी ने असहयोग प्रस्ताव प्रस्तुत किया।
दिसंबर 1920 के नागपुर अधिवेशन की अध्यक्षता सी. विजयराघवाचारियर ने की तथा सी. आर. दास ने असहयोग से संबंधित प्रस्ताव प्रस्तुत किया। यहाँ आंदोलन के कार्यक्रम को अंतिम स्वीकृति मिली।
गांधीजी ने ब्रिटिश सरकार से प्राप्त केसर-ए-हिंद, बोअर युद्ध पदक और ज़ुलु युद्ध पदक वापस किए, जबकि जमनालाल बजाज ने राय बहादुर की उपाधि त्याग दी।
आंदोलन में सरकारी शिक्षण संस्थाओं और न्यायालयों का बहिष्कार, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, स्वदेशी का प्रचार तथा खादी और चरखे को बढ़ावा देना प्रमुख कार्यक्रम थे।
विदेशी वस्त्रों को जलाने के तरीके की रवीन्द्रनाथ टैगोर ने आलोचना की थी।
5 फरवरी 1922 को चौरी-चौरा में हिंसा हुई और पुलिस थाना जला दिया गया, जिसमें 22 पुलिसकर्मियों की मृत्यु हुई।
अहिंसा के सिद्धांत के कारण गांधीजी ने 12 फरवरी 1922 को असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया।
मुख्य क्रम याद रखें — 1 अगस्त 1920 आंदोलन आरंभ → सितंबर 1920 कलकत्ता विशेष अधिवेशन → दिसंबर 1920 नागपुर अधिवेशन → 1921 प्रिंस ऑफ वेल्स का बहिष्कार → 5 फरवरी 1922 चौरी-चौरा → 12 फरवरी 1922 आंदोलन स्थगित।