आजाद हिंद फौज
मोहन सिंह से नेताजी सुभाषचंद्र बोस तक — संगठन, युद्ध, अस्थायी सरकार और लाल किला मुकदमा
आजाद हिंद फौज का महत्व
आजाद हिंद फौज भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की वह सैन्य शक्ति थी जिसने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष का प्रयास किया। इसकी पहली संगठित संरचना कैप्टन मोहन सिंह के नेतृत्व में बनी, बाद में रासबिहारी बोस ने इसे राजनीतिक आधार दिया और अंततः नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने इसका पुनर्गठन करके इसे भारतीय स्वतंत्रता के लिए एक व्यापक सैन्य और राजनीतिक आंदोलन में बदल दिया।
आजाद हिंद फौज की प्रारंभिक पृष्ठभूमि
मलाया से पहली आजाद हिंद फौज तक
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान मलाया और दक्षिण-पूर्व एशिया में ब्रिटिश सेनाओं की पराजय के समय भारतीय सैनिक बड़ी संख्या में जापानी सेना के युद्धबंदी बने।
ब्रिटिश भारतीय सेना के अधिकारी कैप्टन मोहन सिंह ने 1941 के अंतिम चरण में मलाया में भारतीय युद्धबंदियों की सहायता से ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक भारतीय सैन्य बल बनाने की योजना पर काम शुरू किया।
इसलिए 1941 को आजाद हिंद फौज की पृष्ठभूमि या विचार की शुरुआत से जोड़ा जा सकता है, लेकिन पहली आजाद हिंद फौज का वास्तविक संगठन 1942 में हुआ।
सिंगापुर के पतन के बाद हजारों भारतीय युद्धबंदी उपलब्ध हुए और कैप्टन मोहन सिंह ने इन्हीं सैनिकों को संगठित करके पहली भारतीय राष्ट्रीय सेना अर्थात आजाद हिंद फौज तैयार की।
🔎 तिथि का अंतर याद रखें
1941 — मोहन सिंह द्वारा मलाया में भारतीय सेना बनाने की पृष्ठभूमि।
1942 — पहली आजाद हिंद फौज का संगठन।
रासबिहारी बोस की भूमिका
भारतीय स्वतंत्रता लीग और सैन्य संगठन
जापान में लंबे समय से निर्वासित जीवन बिता रहे क्रांतिकारी रासबिहारी बोस ने दक्षिण-पूर्व एशिया में रहने वाले भारतीयों को स्वतंत्रता आंदोलन के लिए संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मार्च 1942 में टोक्यो में भारतीय प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन हुआ, जिसमें भारत की स्वतंत्रता के लिए एक संगठित राजनीतिक और सैन्य आंदोलन विकसित करने की दिशा में निर्णय लिए गए।
इसके बाद जून 1942 में बैंकॉक सम्मेलन में भारतीय स्वतंत्रता लीग को संगठित रूप दिया गया और रासबिहारी बोस इसके प्रमुख नेता बने। कैप्टन मोहन सिंह की आजाद हिंद फौज को भी इस व्यापक स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ा गया।
🎯 नामों का क्रम
कैप्टन मोहन सिंह — पहली आजाद हिंद फौज
रासबिहारी बोस — भारतीय स्वतंत्रता लीग और आजाद हिंद आंदोलन का राजनीतिक संगठन
पहली आजाद हिंद फौज का संकट
मोहन सिंह और जापानी अधिकारियों में मतभेद
कैप्टन मोहन सिंह चाहते थे कि आजाद हिंद फौज एक स्वतंत्र भारतीय सेना की तरह कार्य करे और जापानी सेना के अधीन केवल एक सहायक सेना बनकर न रहे।
जापानी अधिकारियों के साथ नियंत्रण और स्वतंत्रता के प्रश्न पर उनके मतभेद बढ़ गए। परिणामस्वरूप 1942 के अंत तक पहली आजाद हिंद फौज की गतिविधियाँ लगभग ठप हो गईं और मोहन सिंह को जापानी अधिकारियों ने हिरासत में ले लिया।
इसके बाद ऐसे नेता की आवश्यकता महसूस हुई जो आजाद हिंद फौज को पुनर्गठित कर सके। यह भूमिका आगे सुभाषचंद्र बोस ने निभाई।
सुभाषचंद्र बोस और फ्री इंडिया लीजन
जर्मनी में गठित अलग सैन्य इकाई
भारत से निकलने के बाद सुभाषचंद्र बोस जर्मनी पहुँचे। वहाँ उन्होंने जर्मन सेना के कब्जे में आए भारतीय युद्धबंदियों को संगठित करके एक सैन्य इकाई बनाई, जिसे सामान्यतः फ्री इंडिया लीजन या भारतीय सेना के नाम से जाना गया।
यह सैन्य इकाई आजाद हिंद फौज से अलग थी। इसका गठन यूरोप में हुआ था, जबकि आजाद हिंद फौज का मुख्य संगठन दक्षिण-पूर्व एशिया में हुआ।
फ्री इंडिया लीजन में लगभग 3,000 भारतीय युद्धबंदी शामिल हुए। इसलिए इसे 10,000 सैनिकों वाली आजाद हिंद फौज कहना सही नहीं है।
🔎 सबसे जरूरी अंतर
फ्री इंडिया लीजन — जर्मनी — सुभाषचंद्र बोस — लगभग 3,000 सैनिक।
आजाद हिंद फौज — दक्षिण-पूर्व एशिया — मोहन सिंह, बाद में सुभाषचंद्र बोस।
सुभाषचंद्र बोस का दक्षिण-पूर्व एशिया आगमन
1943 — आजाद हिंद आंदोलन का नया चरण
1943 में सुभाषचंद्र बोस जर्मनी से एक अत्यंत जोखिमपूर्ण पनडुब्बी यात्रा के माध्यम से जापान नियंत्रित दक्षिण-पूर्व एशिया पहुँचे।
इसके बाद वे सिंगापुर पहुँचे, जहाँ रासबिहारी बोस ने भारतीय स्वतंत्रता लीग के नेतृत्व की जिम्मेदारी उन्हें सौंप दी।
4 जुलाई 1943 को सुभाषचंद्र बोस ने भारतीय स्वतंत्रता लीग का नेतृत्व संभाला और इसके बाद आजाद हिंद फौज का व्यापक पुनर्गठन किया।
आजाद हिंद फौज का पुनर्गठन
नेताजी के नेतृत्व में नई सैन्य शक्ति
सुभाषचंद्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिंद फौज का पुनर्गठन किया गया और इसे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाली सैन्य शक्ति के रूप में तैयार किया गया।
बोस ने आजाद हिंद फौज में अनुशासन, राष्ट्रीय एकता और धर्मनिरपेक्ष भावना पर विशेष बल दिया।
आजाद हिंद फौज में गांधी ब्रिगेड, नेहरू ब्रिगेड, आजाद ब्रिगेड और सुभाष ब्रिगेड जैसी सैन्य इकाइयाँ बनाई गईं।
सुभाषचंद्र बोस ने “दिल्ली चलो” को आजाद हिंद फौज का प्रमुख युद्धघोष बनाया। इसका लक्ष्य भारत में प्रवेश करके दिल्ली तक पहुँचना और ब्रिटिश शासन को समाप्त करना था।
रानी झाँसी रेजिमेंट
महिलाओं की सैन्य इकाई
आजाद हिंद फौज की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक महिलाओं की स्वतंत्र सैन्य इकाई रानी झाँसी रेजिमेंट की स्थापना थी।
इसका नाम 1857 की वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के सम्मान में रखा गया था।
इस रेजिमेंट का नेतृत्व डॉ. लक्ष्मी स्वामीनाथन ने किया, जो आगे चलकर कैप्टन लक्ष्मी सहगल के नाम से प्रसिद्ध हुईं।
🎯 महत्वपूर्ण जोड़ी
रानी झाँसी रेजिमेंट — कैप्टन लक्ष्मी सहगल।
आजाद हिंद की अस्थायी सरकार
21 अक्टूबर 1943 — सिंगापुर
21 अक्टूबर 1943 को सुभाषचंद्र बोस ने सिंगापुर में स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार की स्थापना की घोषणा की। इसे आजाद हिंद सरकार कहा गया।
सुभाषचंद्र बोस इस सरकार के राष्ट्राध्यक्ष, प्रधानमंत्री तथा युद्ध और विदेश मामलों के मंत्री बने।
आजाद हिंद सरकार को जापान सहित कई देशों और धुरी शक्तियों से जुड़े राज्यों ने मान्यता प्रदान की।
सुभाषचंद्र बोस आजाद हिंद फौज के सर्वोच्च नेतृत्व में थे और स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार तथा सेना दोनों को भारत की स्वतंत्रता के लक्ष्य से जोड़कर आगे बढ़ाया।
🎯 तिथि याद रखें
21 अक्टूबर 1943 — सिंगापुर — आजाद हिंद की अस्थायी सरकार।
“दिल्ली चलो” और “तुम मुझे खून दो…”
नेताजी के प्रसिद्ध आह्वान
सुभाषचंद्र बोस का प्रसिद्ध युद्धघोष “दिल्ली चलो” आजाद हिंद फौज के अभियान का प्रतीक बन गया।
इसी प्रकार उनका प्रसिद्ध आह्वान “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा” भारतीयों से स्वतंत्रता के लिए सर्वोच्च बलिदान की माँग का प्रतीक बन गया।
इन दोनों नारों को एक ही दिन या केवल 21 अक्टूबर 1943 की घटना मानना उचित नहीं है। “दिल्ली चलो” आजाद हिंद फौज के 1943 के अभियान से प्रमुख रूप से जुड़ा था, जबकि “तुम मुझे खून दो…” का प्रसिद्ध आह्वान 1944 में दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीयों से समर्थन माँगते समय विशेष रूप से सामने आया।
🔎 भ्रम न रखें
“दिल्ली चलो” और “तुम मुझे खून दो…” नेताजी के प्रसिद्ध नारे हैं, लेकिन दोनों को 21 अक्टूबर 1943 को एक ही अवसर पर दिया गया न मानें।
अंडमान और निकोबार द्वीप
शहीद और स्वराज
द्वितीय विश्व युद्ध में अंडमान और निकोबार द्वीप जापान के नियंत्रण में आ गए थे। जापान ने इन द्वीपों का प्रशासन प्रतीकात्मक रूप से आजाद हिंद सरकार को सौंपने की घोषणा की।
सुभाषचंद्र बोस ने 30 दिसंबर 1943 को पोर्ट ब्लेयर में तिरंगा फहराया।
उन्होंने अंडमान को “शहीद” और निकोबार को “स्वराज” नाम दिया।
🎯 याद रखें
30 दिसंबर 1943 — पोर्ट ब्लेयर — नेताजी द्वारा तिरंगा।
भारत की ओर सैन्य अभियान
1944 — भारत की सीमा तक आजाद हिंद फौज
1944 में आजाद हिंद फौज ने जापानी सेना के साथ मिलकर बर्मा की ओर से भारत पर सैन्य अभियान शुरू किया।
आजाद हिंद फौज के सैनिक भारत की सीमा पार करके मणिपुर क्षेत्र तक पहुँचे। अप्रैल 1944 में मोइरांग में आजाद हिंद फौज का ध्वज फहराया गया।
इम्फाल और कोहिमा अभियान के दौरान आजाद हिंद फौज और जापानी सेनाओं को कठोर प्रतिरोध, खराब मौसम, बीमारी तथा खाद्य और सैन्य आपूर्ति की भारी कमी का सामना करना पड़ा।
जापानी सेना के पीछे हटने के साथ आजाद हिंद फौज को भी पीछे हटना पड़ा।
गांधीजी को “राष्ट्रपिता” संबोधन
आजाद हिंद रेडियो — 1944
1944 में आजाद हिंद रेडियो के एक प्रसारण में सुभाषचंद्र बोस ने महात्मा गांधी को “राष्ट्रपिता” कहकर संबोधित किया और भारत की स्वतंत्रता के लिए चल रहे अपने संघर्ष के लिए उनका आशीर्वाद माँगा।
भारत सरकार के डाक विभाग तथा अन्य सरकारी अभिलेखों में यह प्रसिद्ध प्रसारण 6 जुलाई 1944 का बताया गया है।
इसे सामान्यतः वह प्रसिद्ध अवसर माना जाता है जब नेताजी ने सार्वजनिक रूप से गांधीजी के लिए “राष्ट्रपिता” संबोधन का प्रयोग किया।
🔎 तिथि संबंधी ध्यान
कुछ सरकारी वेब स्रोतों में इस प्रसारण की तिथि और प्रसारण-स्थान अलग रूप में भी दर्ज हैं, लेकिन परीक्षा-साहित्य और कई आधिकारिक स्मारक स्रोतों में 6 जुलाई 1944 सबसे अधिक प्रचलित है।
क्या “राष्ट्रपिता” आधिकारिक उपाधि है?
सरकारी अभिलेख की स्थिति
महात्मा गांधी को पूरे भारत में सम्मानपूर्वक राष्ट्रपिता कहा जाता है।
भारत सरकार के उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार महात्मा गांधी को “राष्ट्रपिता” की उपाधि प्रदान करने संबंधी कोई औपचारिक सरकारी अधिसूचना या आधिकारिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।
2012 में सूचना के अधिकार से जुड़े प्रश्न के बाद भी यही तथ्य व्यापक रूप से सामने आया कि भारत सरकार द्वारा इस उपाधि को किसी औपचारिक अधिसूचना से प्रदान नहीं किया गया था।
इसका अर्थ यह नहीं है कि “राष्ट्रपिता” संबोधन गलत है; यह महात्मा गांधी के लिए व्यापक रूप से प्रयुक्त सम्मानसूचक संबोधन है, लेकिन यह औपचारिक संवैधानिक या सरकारी उपाधि नहीं है।
आजाद हिंद फौज की पराजय
1945 — द्वितीय विश्व युद्ध का अंतिम चरण
1944 के बाद जापान की सैन्य स्थिति लगातार कमजोर होने लगी और मित्र राष्ट्रों ने बर्मा क्षेत्र में बढ़त बनानी शुरू कर दी।
आजाद हिंद फौज जापानी सैन्य आपूर्ति पर काफी निर्भर थी। जापान की पराजय के साथ हथियार, भोजन और अन्य आवश्यक संसाधनों की आपूर्ति टूट गई।
1945 में जापान के आत्मसमर्पण के बाद आजाद हिंद फौज की सैन्य गतिविधियाँ समाप्त हो गईं और बड़ी संख्या में उसके सैनिक तथा अधिकारी ब्रिटिश सेनाओं के हाथों बंदी बना लिए गए।
लाल किला मुकदमा
5 नवंबर 1945 से पहला प्रसिद्ध मुकदमा
ब्रिटिश सरकार ने आजाद हिंद फौज के गिरफ्तार अधिकारियों पर सैन्य न्यायालय में मुकदमे चलाने का निर्णय किया। सबसे प्रसिद्ध पहला मुकदमा 5 नवंबर 1945 को दिल्ली के लाल किले में शुरू हुआ।
इस मुकदमे में आजाद हिंद फौज के तीन अधिकारियों — शाहनवाज खान, प्रेम कुमार सहगल और गुरबख्श सिंह ढिल्लों — को अभियुक्त बनाया गया।
तीनों अलग-अलग धार्मिक समुदायों से थे — शाहनवाज खान मुस्लिम, प्रेम सहगल हिंदू और गुरबख्श सिंह ढिल्लों सिख थे। इससे उनके समर्थन में पूरे देश में सांप्रदायिक सीमाओं से ऊपर उठकर व्यापक जनभावना विकसित हुई।
🔎 नाम बिल्कुल सही याद रखें
शाहनवाज खान + प्रेम कुमार सहगल + गुरबख्श सिंह ढिल्लों
आजाद हिंद फौज का बचाव पक्ष
भुलाभाई देसाई के नेतृत्व में कानूनी लड़ाई
कांग्रेस ने आजाद हिंद फौज के अधिकारियों के बचाव के लिए एक प्रतिष्ठित कानूनी दल तैयार किया।
बचाव पक्ष में भुलाभाई देसाई ने मुख्य वकील के रूप में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस रक्षा दल से तेज बहादुर सप्रू, कैलाशनाथ काटजू, जवाहरलाल नेहरू और आसफ अली जैसे प्रसिद्ध विधिवेत्ता और नेता जुड़े थे।
जवाहरलाल नेहरू ने कई वर्षों बाद पुनः वकील का चोगा पहनकर आजाद हिंद फौज के अधिकारियों की रक्षा में भाग लिया।
अरुणा आसफ अली इस मुकदमे की बचाव पक्ष की वकील नहीं थीं। यहाँ अक्सर उनके नाम को उनके पति और प्रसिद्ध वकील आसफ अली से मिला दिया जाता है।
🎯 वकीलों में भ्रम न रखें
भुलाभाई देसाई — प्रमुख बचाव वकील
आसफ अली — बचाव दल से जुड़े
अरुणा आसफ अली — बचाव वकील नहीं
मुकदमे का फैसला
मृत्युदंड नहीं — आजीवन निर्वासन की सजा
लाल किला मुकदमे में तीनों अधिकारियों को ब्रिटिश सम्राट के विरुद्ध युद्ध छेड़ने के आरोप में दोषी माना गया।
उन्हें फाँसी की सजा नहीं दी गई थी। तीनों को मुख्य रूप से आजीवन देश-निकाला अथवा आजीवन निर्वासन की सजा दी गई और सेना से बर्खास्त करने का आदेश हुआ।
पूरे भारत में आजाद हिंद फौज के समर्थन में जबरदस्त आंदोलन और विरोध प्रदर्शन हुए। भारतीय सैनिकों के भीतर भी INA के प्रति सहानुभूति बढ़ रही थी।
ऐसी परिस्थितियों में ब्रिटिश भारतीय सेना के कमांडर-इन-चीफ फील्ड मार्शल क्लॉड ऑकिनलेक ने सजा को लागू न करने का निर्णय लिया। तीनों अधिकारियों को रिहा कर दिया गया, हालांकि उन्हें सेना से बर्खास्त कर दिया गया।
🔎 सबसे महत्वपूर्ण सुधार
फाँसी की सजा → गलत।
आजीवन निर्वासन/देश-निकाला की सजा → सही।
सजा हटाने में निर्णायक सैन्य अधिकार कमांडर-इन-चीफ ऑकिनलेक का था; केवल वायसराय वेवेल द्वारा “फाँसी माफ” करना सही वर्णन नहीं है।
लाल किला मुकदमे का प्रभाव
आजाद हिंद फौज से राष्ट्रीय जनभावना तक
आजाद हिंद फौज के मुकदमों ने पूरे भारत में विशाल जनसमर्थन पैदा किया। कांग्रेस, मुस्लिम लीग तथा विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं के लोगों में INA सैनिकों के प्रति व्यापक सहानुभूति दिखाई दी।
देशभर में छात्रों, मजदूरों और आम जनता ने मुकदमों के विरोध में प्रदर्शन किए।
आजाद हिंद फौज के प्रति बढ़ती सहानुभूति का प्रभाव ब्रिटिश भारतीय सशस्त्र बलों के भारतीय सैनिकों पर भी पड़ा और ब्रिटिश सरकार को भारतीय सेना की भविष्य की निष्ठा को लेकर चिंता होने लगी।
इस कारण आजाद हिंद फौज के मुकदमों को ब्रिटिश शासन के अंतिम वर्षों की महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाओं में गिना जाता है।
महत्वपूर्ण व्यक्तित्व
एक नज़र में
| व्यक्ति | मुख्य भूमिका |
|---|---|
| कैप्टन मोहन सिंह | 1942 में पहली आजाद हिंद फौज के निर्माण के प्रमुख नेता |
| रासबिहारी बोस | भारतीय स्वतंत्रता लीग का संगठन और INA को राजनीतिक आधार |
| सुभाषचंद्र बोस | 1943 से आजाद हिंद फौज का पुनर्गठन और सर्वोच्च नेतृत्व |
| कैप्टन लक्ष्मी सहगल | रानी झाँसी रेजिमेंट की प्रमुख |
| शाहनवाज खान | लाल किला मुकदमे के तीन प्रमुख INA अधिकारियों में एक |
| प्रेम कुमार सहगल | लाल किला मुकदमे के अभियुक्त INA अधिकारी |
| गुरबख्श सिंह ढिल्लों | लाल किला मुकदमे के अभियुक्त INA अधिकारी |
| भुलाभाई देसाई | INA अधिकारियों के प्रमुख बचाव वकील |
महत्वपूर्ण तिथियाँ
क्रम से याद करें
| वर्ष / तिथि | घटना |
|---|---|
| 1941 | मलाया में मोहन सिंह द्वारा भारतीय सैन्य संगठन की प्रारंभिक पृष्ठभूमि |
| 1942 | पहली आजाद हिंद फौज का संगठन |
| मार्च 1942 | टोक्यो सम्मेलन; रासबिहारी बोस की महत्वपूर्ण भूमिका |
| 4 जुलाई 1943 | सुभाषचंद्र बोस ने भारतीय स्वतंत्रता लीग का नेतृत्व संभाला |
| 21 अक्टूबर 1943 | आजाद हिंद की अस्थायी सरकार की स्थापना |
| 30 दिसंबर 1943 | पोर्ट ब्लेयर में नेताजी ने तिरंगा फहराया |
| अप्रैल 1944 | मोइरांग में INA का ध्वज फहराया गया |
| 6 जुलाई 1944 | नेताजी द्वारा गांधीजी को “राष्ट्रपिता” संबोधित करने वाला प्रसिद्ध रेडियो प्रसारण |
| 5 नवंबर 1945 | लाल किले में पहला प्रसिद्ध INA मुकदमा शुरू |
| जनवरी 1946 | शाहनवाज, सहगल और ढिल्लों की सजा लागू नहीं की गई और उन्हें रिहा किया गया |
त्वरित पुनरावृत्ति
पूरा क्रम एक साथ
🧠 क्रम याद रखें
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति
कैप्टन मोहन सिंह ने मलाया में भारतीय युद्धबंदियों को संगठित करके आजाद हिंद फौज की नींव रखी; इसकी पहली संगठित सेना 1942 में अस्तित्व में आई।
रासबिहारी बोस ने 1942 में भारतीय स्वतंत्रता लीग और आजाद हिंद आंदोलन को संगठित करने में प्रमुख भूमिका निभाई।
जर्मनी में सुभाषचंद्र बोस द्वारा भारतीय युद्धबंदियों से बनाया गया फ्री इंडिया लीजन आजाद हिंद फौज से अलग इकाई थी और इसमें लगभग 3,000 सैनिक शामिल हुए।
4 जुलाई 1943 को सुभाषचंद्र बोस ने भारतीय स्वतंत्रता लीग का नेतृत्व संभाला और आजाद हिंद फौज का पुनर्गठन किया।
21 अक्टूबर 1943 को सुभाषचंद्र बोस ने सिंगापुर में आजाद हिंद की अस्थायी सरकार की स्थापना की।
रानी झाँसी रेजिमेंट का नेतृत्व कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने किया।
नेताजी का प्रसिद्ध युद्धघोष “दिल्ली चलो” था। “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा” भी उनका प्रसिद्ध स्वतंत्रता आह्वान था।
30 दिसंबर 1943 को नेताजी ने पोर्ट ब्लेयर में तिरंगा फहराया और अंडमान तथा निकोबार को क्रमशः शहीद और स्वराज नाम दिया।
1944 में आजाद हिंद फौज भारत की सीमा तक पहुँची और मणिपुर के मोइरांग में INA का ध्वज फहराया गया।
6 जुलाई 1944 के प्रसिद्ध आजाद हिंद रेडियो प्रसारण में नेताजी ने गांधीजी को “राष्ट्रपिता” कहकर संबोधित किया।
महात्मा गांधी के लिए “राष्ट्रपिता” सम्मान व्यापक रूप से प्रयोग होता है, लेकिन इस उपाधि को प्रदान करने वाली कोई औपचारिक सरकारी अधिसूचना उपलब्ध नहीं है।
लाल किला मुकदमे के तीन प्रमुख अधिकारी थे — शाहनवाज खान, प्रेम कुमार सहगल और गुरबख्श सिंह ढिल्लों।
INA के बचाव पक्ष का प्रमुख नेतृत्व भुलाभाई देसाई ने किया। तेज बहादुर सप्रू, कैलाशनाथ काटजू, जवाहरलाल नेहरू और आसफ अली भी रक्षा पक्ष से जुड़े थे।
अरुणा आसफ अली बचाव पक्ष की वकील नहीं थीं; यहाँ सही नाम आसफ अली है।
तीनों INA अधिकारियों को फाँसी नहीं, बल्कि आजीवन निर्वासन की सजा दी गई थी। बढ़ते जनदबाव और सेना के भीतर सहानुभूति को देखते हुए कमांडर-इन-चीफ क्लॉड ऑकिनलेक ने सजा लागू नहीं होने दी और तीनों रिहा कर दिए गए।