ईसाई धर्म
ईसा मसीह, बाइबल, प्रेरित, त्रित्व एवं ईसाई परंपराएँ
ईसा मसीह
जन्म और परिवार
ईसाई धर्म का केंद्र ईसा मसीह या यीशु का जीवन और उनकी शिक्षाएँ हैं।
ईसाई धर्म का प्रमुख धर्मग्रंथ बाइबल है।
ईसाई परंपरा के अनुसार यीशु का जन्म बेथलेहम में हुआ।
उनकी माता का नाम मरियम और सांसारिक अभिभावक का नाम यूसुफ था।
यीशु के जन्म की स्मृति में क्रिसमस मनाया जाता है। 25 दिसंबर पारंपरिक धार्मिक तिथि है।
यीशु का प्रारंभिक जीवन और शिष्य
धार्मिक सेवा
ईसाई ग्रंथों में यीशु और उनके परिवार का संबंध बढ़ई के कार्य से मिलता है।
उनकी सार्वजनिक धार्मिक सेवा लगभग 30 वर्ष की आयु के आसपास आरंभ होने की परंपरा है।
प्रारंभिक प्रमुख शिष्यों में अन्द्रियास और शमौन पतरस के नाम मिलते हैं।
यीशु के बारह प्रमुख शिष्य प्रेरित कहलाए।
यीशु का क्रूस पर चढ़ाया जाना
पोंतियुस पिलातुस का काल
यीशु को रोमन शासन के समय यहूदिया के रोमन राज्यपाल पोंतियुस पिलातुस के शासनकाल में क्रूस पर चढ़ाया गया।
इस घटना की तिथि सामान्यतः लगभग 30 या 33 ईस्वी के आसपास मानी जाती है।
क्रॉस या क्रूस ईसाई धर्म का सबसे प्रसिद्ध धार्मिक प्रतीक है।
ईसाई त्रित्व
पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा
मुख्यधारा ईसाई धर्म में त्रित्व की धारणा महत्वपूर्ण है।
इसमें ईश्वर पिता, ईश्वर पुत्र और पवित्र आत्मा को एक ईश्वर के तीन व्यक्तित्वों के रूप में समझा जाता है।
बाइबल मुख्य रूप से पुराना नियम और नया नियम दो भागों में विभाजित है।
गोथिक स्थापत्य
12वीं शताब्दी का यूरोप
गोथिक स्थापत्य शैली का विकास 12वीं शताब्दी में फ्रांस में हुआ।
इस शैली की प्रमुख विशेषताएँ ऊँचे भवन, नुकीले मेहराब, रिब-वॉल्ट, उड़ते हुए आधार-स्तंभ और बड़े रंगीन काँच के झरोखे थे।
सेंट-डेनिस प्रारंभिक गोथिक स्थापत्य का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
नोट्रे-डाम दे पेरिस गोथिक गिरजाघर स्थापत्य के सबसे प्रसिद्ध उदाहरणों में है।
यीशु के जन्म का ऐतिहासिक काल
ईसा पूर्व और ईस्वी
परंपरागत ईसाई कालगणना यीशु के जन्म को आधार मानकर ईसा पूर्व और ईस्वी की काल-व्यवस्था से जुड़ी है।
आधुनिक इतिहासकार सामान्यतः यीशु के वास्तविक जन्म को लगभग 6 से 4 ईसा पूर्व के बीच रखते हैं।
इस अंतर का कारण बाद में तैयार की गई ईसाई कालगणना में हुई ऐतिहासिक गणना-संबंधी असंगति है।
परीक्षा बिंदु
25 दिसंबर यीशु के जन्म की पारंपरिक धार्मिक तिथि है; यह निश्चित ऐतिहासिक जन्मतिथि नहीं मानी जाती।
यीशु की प्रमुख शिक्षाएँ
प्रेम, क्षमा और करुणा
यीशु की शिक्षाओं में ईश्वर-प्रेम और मानव-प्रेम को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।
उन्होंने प्रेम, क्षमा, दया, करुणा, विनम्रता और जरूरतमंदों की सहायता पर विशेष बल दिया।
यीशु की शिक्षाओं में शत्रुओं के प्रति भी प्रेम और क्षमा की भावना रखने का आदर्श मिलता है।
ईसाई धार्मिक परंपरा में ईश्वर का राज्य यीशु की शिक्षाओं का महत्वपूर्ण विषय है।
यीशु का बपतिस्मा
यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला
ईसाई परंपरा के अनुसार यीशु का बपतिस्मा यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले ने किया।
यह घटना यरदन नदी से संबंधित मानी जाती है।
यीशु के सार्वजनिक धार्मिक जीवन के प्रारंभ से इस घटना का विशेष संबंध माना जाता है।
बपतिस्मा ईसाई धर्म का महत्वपूर्ण धार्मिक संस्कार है।
बारह प्रेरित
यीशु के प्रमुख शिष्य
ईसाई परंपरा में यीशु के बारह प्रमुख शिष्य विशेष स्थान रखते हैं। इन्हें प्रेरित या अपोस्टल कहा जाता है।
इनमें पतरस, अन्द्रियास, याकूब, यूहन्ना और मत्ती जैसे नाम विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।
पतरस प्रारंभिक ईसाई समुदाय के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों में माने जाते हैं।
यीशु की मृत्यु के बाद प्रेरितों और अन्य अनुयायियों ने ईसाई संदेश के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अंतिम भोज
यीशु और उनके शिष्य
ईसाई परंपरा में यीशु द्वारा क्रूस पर चढ़ाए जाने से पहले अपने शिष्यों के साथ किए गए अंतिम भोजन को अंतिम भोज कहा जाता है।
ईसाई धार्मिक परंपरा में रोटी और दाखरस से संबंधित इस प्रसंग का विशेष धार्मिक महत्व है।
यह घटना ईसाई यूखरिस्त या प्रभुभोज की धार्मिक परंपरा से निकटता से जुड़ी है।
गुड फ्राइडे और ईस्टर
क्रूस और पुनरुत्थान
यीशु के क्रूस पर चढ़ाए जाने की स्मृति में गुड फ्राइडे मनाया जाता है।
ईसाई धर्म में यीशु के मृतकों में से पुनर्जीवित होने की धार्मिक मान्यता को पुनरुत्थान कहा जाता है।
यीशु के पुनरुत्थान की स्मृति में ईस्टर मनाया जाता है।
ईस्टर ईसाई धर्म के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक पर्वों में से एक है।
याद रखें
क्रिसमस — यीशु के जन्म की स्मृति।
गुड फ्राइडे — क्रूस पर चढ़ाए जाने की स्मृति।
ईस्टर — पुनरुत्थान की स्मृति।
बाइबल
ईसाई धर्म का प्रमुख धर्मग्रंथ
बाइबल ईसाई धर्म का प्रमुख पवित्र धर्मग्रंथ है।
ईसाई बाइबल मुख्यतः पुराना नियम और नया नियम में विभाजित है।
पुराना नियम ईसाई धर्म के उदय से पहले की यहूदी धार्मिक परंपराओं और ग्रंथों से संबंधित है।
नया नियम यीशु मसीह, प्रारंभिक ईसाई समुदाय और प्रेरितों से संबंधित ग्रंथों का संग्रह है।
चार सुसमाचार
मत्ती, मरकुस, लूका और यूहन्ना
नए नियम के प्रारंभिक चार प्रमुख ग्रंथ सुसमाचार कहलाते हैं।
चार सुसमाचार हैं — मत्ती, मरकुस, लूका और यूहन्ना।
इनमें यीशु के जीवन, उनकी शिक्षाओं, धार्मिक कार्यों, मृत्यु और पुनरुत्थान की परंपराओं का वर्णन मिलता है।
मत्ती, मरकुस और लूका को सामान्यतः समदर्शी सुसमाचार कहा जाता है, क्योंकि इनके विवरणों में अनेक समानताएँ हैं।
बहुत महत्वपूर्ण
चार सुसमाचार — मत्ती, मरकुस, लूका और यूहन्ना।
पौलुस और ईसाई धर्म का प्रसार
प्रारंभिक ईसाई समुदाय
पौलुस प्रारंभिक ईसाई धर्म के प्रसार से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों में से एक थे।
वे यीशु के मूल बारह प्रेरितों में शामिल नहीं थे, लेकिन बाद में ईसाई धर्म के प्रमुख प्रचारक बने।
पौलुस ने रोमन साम्राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में ईसाई धर्म के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
नए नियम में पौलुस से संबंधित अनेक पत्र संकलित हैं।
रोमन साम्राज्य और ईसाई धर्म
उत्पीड़न से राजकीय संरक्षण तक
प्रारंभिक ईसाई धर्म का विकास रोमन साम्राज्य के भीतर हुआ।
प्रारंभिक शताब्दियों में कुछ रोमन शासकों के समय ईसाइयों को उत्पीड़न का सामना करना पड़ा।
चौथी शताब्दी में रोमन सम्राट कॉन्स्टैन्टाइन के समय ईसाई धर्म की स्थिति में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया।
313 ईस्वी के मिलान के आदेश से रोमन साम्राज्य में ईसाइयों सहित धार्मिक समूहों को धार्मिक सहिष्णुता प्राप्त हुई।
नाइसिया की धर्मसभा
325 ईस्वी
325 ईस्वी में सम्राट कॉन्स्टैन्टाइन के समय नाइसिया की प्रथम धर्मसभा आयोजित हुई।
यह प्रारंभिक ईसाई धर्म के सिद्धांतों और धार्मिक विवादों के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण सभा थी।
इस सभा से नाइसिन विश्वास-विधान की प्रारंभिक परंपरा जुड़ी है।
ईसाई धर्म की प्रमुख शाखाएँ
कैथोलिक, ऑर्थोडॉक्स और प्रोटेस्टेंट
| प्रमुख परंपरा | संक्षिप्त परिचय |
|---|---|
| रोमन कैथोलिक | रोम और पोप के धार्मिक नेतृत्व से संबंधित प्रमुख ईसाई परंपरा |
| पूर्वी ऑर्थोडॉक्स | पूर्वी यूरोप और पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्रों की प्रमुख प्राचीन ईसाई परंपरा |
| प्रोटेस्टेंट | 16वीं शताब्दी के धर्म-सुधार आंदोलन से विकसित अनेक ईसाई परंपराओं का व्यापक समूह |
1054 का महान विभाजन
पूर्वी और पश्चिमी चर्च
ईसाई इतिहास में 1054 ईस्वी का महान विभाजन अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी।
इस ऐतिहासिक प्रक्रिया के परिणामस्वरूप पश्चिमी रोमन कैथोलिक और पूर्वी ऑर्थोडॉक्स चर्चों के बीच स्थायी संस्थागत विभाजन गहरा हुआ।
यह विभाजन धार्मिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और चर्चीय मतभेदों की लंबी प्रक्रिया का परिणाम था।
प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधार
मार्टिन लूथर
16वीं शताब्दी में यूरोप में प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधार आंदोलन का विकास हुआ।
इस आंदोलन से जुड़े सबसे प्रसिद्ध प्रारंभिक व्यक्तित्वों में मार्टिन लूथर थे।
1517 ईस्वी में लूथर द्वारा प्रस्तुत 95 सिद्धांत धर्म-सुधार आंदोलन के इतिहास में विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।
आगे चलकर यूरोप में लूथरन, कैल्विनवादी, एंग्लिकन और अनेक अन्य प्रोटेस्टेंट परंपराएँ विकसित हुईं।
ईसाई धर्म के प्रमुख प्रतीक
एक नजर में
| प्रतीक | महत्व |
|---|---|
| क्रॉस / क्रूस | यीशु के क्रूस पर चढ़ाए जाने से संबंधित प्रमुख प्रतीक |
| मछली | प्रारंभिक ईसाई समुदाय में प्रयुक्त प्रसिद्ध प्रतीक |
| कबूतर | ईसाई कला में पवित्र आत्मा से संबंधित प्रतीक |
| रोटी और दाखरस | अंतिम भोज और यूखरिस्त से संबंधित |
ईसाई उपासना स्थल
चर्च और गिरजाघर
ईसाइयों के सामूहिक उपासना स्थल को सामान्यतः चर्च या गिरजाघर कहा जाता है।
बड़े और विशेष महत्व वाले कुछ चर्च कैथेड्रल कहलाते हैं, जो सामान्यतः किसी बिशप के मुख्य चर्च होते हैं।
ईसाई धार्मिक परंपराओं में प्रार्थना, बाइबल-पाठ, भजन और विभिन्न संस्कारों का विशेष महत्व है।
भारत में ईसाई धर्म
प्राचीन परंपरा और यूरोपीय संपर्क
भारत में ईसाई धर्म की एक प्राचीन परंपरा विशेष रूप से केरल के सेंट थॉमस ईसाइयों से जुड़ी है।
ईसाई परंपरा के अनुसार प्रेरित सेंट थॉमस पहली शताब्दी ईस्वी में भारत आए थे। इस परंपरा की ऐतिहासिक व्याख्या पर विद्वानों में चर्चा रही है।
15वीं–16वीं शताब्दी से पुर्तगाली और अन्य यूरोपीय शक्तियों के आगमन के बाद भारत में रोमन कैथोलिक मिशनरी गतिविधियाँ बढ़ीं।
सेंट फ्रांसिस जेवियर 16वीं शताब्दी में भारत में कार्य करने वाले प्रसिद्ध ईसाई मिशनरियों में थे।
प्रमुख ईसाई तीर्थ और धार्मिक केंद्र
महत्वपूर्ण स्थान
| स्थान | महत्व |
|---|---|
| बेथलेहम | ईसाई परंपरा में यीशु का जन्मस्थान |
| यरूशलम | यीशु के अंतिम जीवन-प्रसंग, क्रूस और पुनरुत्थान की परंपराओं से संबंधित |
| नासरत | यीशु के प्रारंभिक जीवन से संबंधित प्रमुख नगर |
| वेटिकन सिटी | रोमन कैथोलिक चर्च का प्रमुख धार्मिक केंद्र |
| रोम | प्रारंभिक ईसाई इतिहास और कैथोलिक परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र |
ईसाई धर्म — अंतिम परीक्षा पुनरावृत्ति
ईसाई धर्म का केंद्र — ईसा मसीह/यीशु का जीवन और शिक्षाएँ।
जन्मस्थान — बेथलेहम।
माता — मरियम।
सांसारिक अभिभावक — यूसुफ।
जन्म की स्मृति — क्रिसमस।
क्रिसमस की पारंपरिक तिथि — 25 दिसंबर।
यीशु का बपतिस्मा — यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले से संबंधित।
बपतिस्मा का प्रमुख स्थान — यरदन नदी।
यीशु के प्रमुख शिष्य — 12 प्रेरित।
प्रारंभिक प्रमुख शिष्य — अन्द्रियास और शमौन पतरस।
क्रूस पर चढ़ाया जाना — पोंतियुस पिलातुस के समय।
सामान्य ऐतिहासिक तिथि — लगभग 30 या 33 ईस्वी।
मुख्य धार्मिक प्रतीक — क्रॉस/क्रूस।
गुड फ्राइडे — क्रूस पर चढ़ाए जाने की स्मृति।
ईस्टर — पुनरुत्थान की स्मृति।
पवित्र ग्रंथ — बाइबल।
बाइबल के दो मुख्य भाग — पुराना नियम और नया नियम।
चार सुसमाचार — मत्ती, मरकुस, लूका और यूहन्ना।
त्रित्व — पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा।
प्रारंभिक ईसाई प्रचारक — पौलुस।
नाइसिया की प्रथम धर्मसभा — 325 ईस्वी।
1054 — पूर्वी और पश्चिमी चर्च का महान विभाजन।
प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधार का प्रमुख नाम — मार्टिन लूथर।
1517 — मार्टिन लूथर के 95 सिद्धांत।
तीन व्यापक प्रमुख परंपराएँ — कैथोलिक, ऑर्थोडॉक्स और प्रोटेस्टेंट।
गोथिक स्थापत्य का प्रारंभिक विकास — 12वीं शताब्दी का फ्रांस।
सेंट-डेनिस — प्रारंभिक गोथिक स्थापत्य का महत्वपूर्ण उदाहरण।
नोट्रे-डाम दे पेरिस — प्रसिद्ध गोथिक गिरजाघर।
भारत की प्राचीन ईसाई परंपरा — सेंट थॉमस ईसाइयों से संबंधित।
16वीं शताब्दी का प्रसिद्ध मिशनरी — सेंट फ्रांसिस जेवियर।