भारत के उच्च न्यायालय
स्थापना, न्यायाधीश, नियुक्ति, क्षेत्राधिकार, रिट और संवैधानिक स्वतंत्रता
उच्च न्यायालय
भारतीय न्यायपालिका में उच्च न्यायालय राज्य अथवा उसके क्षेत्राधिकार में आने वाले राज्यों और संघ राज्यक्षेत्रों के स्तर पर सर्वोच्च न्यायिक संस्था है।
उच्च न्यायालयों से संबंधित मुख्य संवैधानिक प्रावधान संविधान के भाग 6 में अनुच्छेद 214 से 231 तक दिए गए हैं।
उच्च न्यायालय अधीनस्थ न्यायालयों के निर्णयों पर अपील सुनते हैं, संवैधानिक एवं विधिक अधिकारों की रक्षा करते हैं, रिट जारी करते हैं और अपने क्षेत्राधिकार में आने वाले अधीनस्थ न्यायालयों तथा अधिकरणों पर संवैधानिक पर्यवेक्षण रखते हैं।
प्रत्येक राज्य के लिए उच्च न्यायालय
अनुच्छेद 214
संविधान के अनुच्छेद 214 के अनुसार प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय होगा।
इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक राज्य के लिए आवश्यक रूप से अलग भवन और अलग उच्च न्यायालय ही होना चाहिए।
संविधान संसद को दो या अधिक राज्यों अथवा राज्यों और संघ राज्यक्षेत्रों के लिए साझा उच्च न्यायालय स्थापित करने की अनुमति देता है।
साझा उच्च न्यायालय
अनुच्छेद 231
संविधान के अनुच्छेद 231 के अंतर्गत संसद दो या अधिक राज्यों अथवा दो या अधिक राज्यों और किसी संघ राज्यक्षेत्र के लिए साझा उच्च न्यायालय स्थापित कर सकती है।
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय पंजाब और हरियाणा राज्यों तथा चंडीगढ़ संघ राज्यक्षेत्र के लिए साझा उच्च न्यायालय है।
यह उच्च न्यायालय चंडीगढ़ में स्थित है।
इसी प्रकार जम्मू-कश्मीर और लद्दाख दो संघ राज्यक्षेत्रों के लिए जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय साझा उच्च न्यायालय के रूप में कार्य करता है।
🎯 परीक्षा तथ्य
अनुच्छेद 231 — साझा उच्च न्यायालय।
अभिलेख न्यायालय
अनुच्छेद 215
प्रत्येक उच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 215 के अंतर्गत अभिलेख न्यायालय है।
इसके निर्णय और न्यायिक अभिलेख स्थायी प्रमाणिक अभिलेख के रूप में मान्य होते हैं।
उच्च न्यायालय को अपनी अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति भी प्राप्त है।
🎯 अनुच्छेद 215
उच्च न्यायालय = अभिलेख न्यायालय + अपनी अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति।
उच्च न्यायालय की संरचना
अनुच्छेद 216
प्रत्येक उच्च न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश तथा राष्ट्रपति द्वारा समय-समय पर आवश्यक समझी गई संख्या में अन्य न्यायाधीश होते हैं।
उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की संख्या सभी राज्यों के लिए समान नहीं होती।
मामलों की संख्या, न्यायिक कार्यभार तथा प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुसार अलग-अलग उच्च न्यायालयों की स्वीकृत न्यायाधीश संख्या अलग हो सकती है।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति
अनुच्छेद 217
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश तथा संबंधित राज्य के राज्यपाल से परामर्श करता है।
मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त किसी अन्य उच्च न्यायालय न्यायाधीश की नियुक्ति में संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से भी परामर्श किया जाता है।
व्यवहार में न्यायाधीशों की नियुक्ति सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विकसित कॉलेजियम व्यवस्था तथा लागू संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार की जाती है।
⚠️ नियुक्ति का अंतर
मुख्य न्यायाधीश — भारत के मुख्य न्यायाधीश + राज्यपाल से परामर्श।
अन्य न्यायाधीश — इनके साथ संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से भी परामर्श।
न्यायाधीश बनने की योग्यता
अनुच्छेद 217
उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए व्यक्ति भारत का नागरिक होना चाहिए।
इसके अतिरिक्त उसने भारत के राज्यक्षेत्र में कम से कम 10 वर्ष तक न्यायिक पद धारण किया हो,
अथवा
वह किसी उच्च न्यायालय या दो या अधिक उच्च न्यायालयों में लगातार कम से कम 10 वर्ष तक अधिवक्ता रहा हो।
🎯 योग्यता
भारतीय नागरिक + 10 वर्ष न्यायिक पद अथवा 10 वर्ष उच्च न्यायालय अधिवक्ता।
सेवानिवृत्ति और त्यागपत्र
62 वर्ष
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति की आयु 62 वर्ष है।
उच्च न्यायालय का न्यायाधीश अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति को संबोधित करके दे सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति आयु 65 वर्ष होती है, जबकि उच्च न्यायालय के लिए 62 वर्ष है।
📗 आयु का अंतर
उच्च न्यायालय — 62 वर्ष।
सर्वोच्च न्यायालय — 65 वर्ष।
न्यायाधीश को पद से हटाना
अनुच्छेद 217 और 218
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को सामान्य सरकारी कर्मचारी की तरह पद से नहीं हटाया जा सकता।
उसे सिद्ध दुर्व्यवहार अथवा अक्षमता के आधार पर ही संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार हटाया जा सकता है।
इसके लिए संसद के प्रत्येक सदन में प्रस्ताव को उस सदन की कुल सदस्य-संख्या के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत का समर्थन प्राप्त होना चाहिए।
दोनों सदनों द्वारा उसी सत्र में ऐसा अभिभाषण राष्ट्रपति को प्रस्तुत किए जाने के बाद राष्ट्रपति न्यायाधीश को पद से हटाने का आदेश जारी करता है।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान है।
⚠️ परीक्षा-सावधानी
इसे सामान्य भाषा में कई पुस्तकें “महाभियोग” कह देती हैं, लेकिन संविधान न्यायाधीश के संदर्भ में हटाने की प्रक्रिया निर्धारित करता है। राष्ट्रपति अकेले न्यायाधीश को नहीं हटा सकता।
रिट जारी करने की शक्ति
अनुच्छेद 226
संविधान का अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालय को अत्यंत व्यापक रिट अधिकारिता प्रदान करता है।
उच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए रिट जारी कर सकता है।
इसके साथ वह किसी अन्य प्रयोजन के लिए भी संविधान में निर्धारित आदेश, निर्देश या रिट जारी कर सकता है।
यही कारण है कि अनुच्छेद 226 की रिट अधिकारिता का क्षेत्र अनुच्छेद 32 की तुलना में विषयगत रूप से अधिक व्यापक माना जाता है।
⚠️ बहुत महत्वपूर्ण सुधार
यह कहना अधूरा है कि उच्च न्यायालय केवल “मौलिक और अन्य संवैधानिक अधिकारों” के लिए रिट देता है। सही शब्द हैं—मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन तथा किसी अन्य प्रयोजन के लिए।
उच्च न्यायालय की पाँच रिट
अनुच्छेद 226
| रिट | हिंदी नाम | मुख्य उद्देश्य |
|---|---|---|
| हेबियस कॉर्पस | बंदी प्रत्यक्षीकरण | अवैध निरोध से व्यक्ति को मुक्त कराने के लिए। |
| मैंडमस | परमादेश | सार्वजनिक प्राधिकारी को उसके विधिक कर्तव्य के पालन का आदेश। |
| प्रोहिबिशन | प्रतिषेध | अधीनस्थ न्यायालय या अधिकरण को अधिकार-क्षेत्र से बाहर की कार्यवाही आगे बढ़ाने से रोकना। |
| सर्टियोरारी | उत्प्रेषण | अधीनस्थ न्यायालय या अधिकरण के अधिकार-क्षेत्र संबंधी दोषपूर्ण आदेश या कार्यवाही को निरस्त करना। |
| क्वो वारंटो | अधिकार-पृच्छा | यह जाँचना कि व्यक्ति किसी सार्वजनिक पद को किस अधिकार से धारण कर रहा है। |
अनुच्छेद 32 और 226 में अंतर
सर्वोच्च न्यायालय बनाम उच्च न्यायालय
| आधार | अनुच्छेद 32 | अनुच्छेद 226 |
|---|---|---|
| न्यायालय | सर्वोच्च न्यायालय | उच्च न्यायालय |
| मुख्य उद्देश्य | मौलिक अधिकारों का प्रवर्तन | मौलिक अधिकारों का प्रवर्तन तथा अन्य प्रयोजन |
| स्वरूप | स्वयं एक मौलिक अधिकार | उच्च न्यायालय की संवैधानिक शक्ति |
| रिट | पाँच प्रमुख रिट | पाँच प्रमुख रिट |
पर्यवेक्षण की शक्ति
अनुच्छेद 227
संविधान के अनुच्छेद 227 के अनुसार उच्च न्यायालय को अपने क्षेत्राधिकार में आने वाले न्यायालयों और अधिकरणों पर अधीक्षण की शक्ति प्राप्त है।
उच्च न्यायालय अधीनस्थ न्यायपालिका की न्यायिक और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर संवैधानिक निगरानी रख सकता है।
हालाँकि यह शक्ति सशस्त्र बलों से संबंधित कानून के तहत गठित न्यायालयों और अधिकरणों तक उसी प्रकार विस्तृत नहीं होती।
अपीलीय क्षेत्राधिकार
दीवानी और आपराधिक अपीलें
उच्च न्यायालय अपने क्षेत्राधिकार में आने वाले अधीनस्थ न्यायालयों से आने वाली दीवानी और आपराधिक अपीलों की सुनवाई करता है।
जिला न्यायालय और सत्र न्यायालय सहित अधीनस्थ न्यायपालिका के अनेक निर्णयों के विरुद्ध कानून में निर्धारित परिस्थितियों में उच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है।
इस अपीलीय अधिकारिता का विस्तृत क्षेत्र संबंधित संविधान, दीवानी और आपराधिक प्रक्रिया तथा अन्य कानूनों द्वारा निर्धारित होता है।
मूल क्षेत्राधिकार
सीधे उच्च न्यायालय में कार्यवाही
कुछ मामलों में कार्यवाही सीधे उच्च न्यायालय के समक्ष प्रारंभ हो सकती है।
रिट अधिकारिता इसका सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक उदाहरण है।
कुछ उच्च न्यायालयों को उनके चार्टर, कानूनों तथा विशेष विधियों के आधार पर अन्य प्रकार की मूल अधिकारिता भी प्राप्त है।
सलाहकार क्षेत्राधिकार का भ्रम
राज्यपाल और उच्च न्यायालय
भारतीय संविधान में सर्वोच्च न्यायालय के लिए अनुच्छेद 143 के अंतर्गत राष्ट्रपति से प्राप्त संदर्भ पर सलाह देने का विशेष प्रावधान है।
उच्च न्यायालय के लिए ऐसा कोई समान सामान्य संवैधानिक प्रावधान नहीं है जिसके तहत राज्यपाल किसी भी कानूनी प्रश्न पर उच्च न्यायालय से औपचारिक सलाह माँग सके।
इसलिए “राज्यपाल कानूनी मामले पर उच्च न्यायालय से सलाह लेता है” को उच्च न्यायालय की सामान्य संवैधानिक अधिकारिता के रूप में याद नहीं करना चाहिए।
⚠️ सीधा प्रश्न
सलाहकार क्षेत्राधिकार — सर्वोच्च न्यायालय — अनुच्छेद 143।
उच्च न्यायालय के लिए ऐसा समान सामान्य संवैधानिक प्रावधान नहीं।
उच्च न्यायालय की स्वतंत्रता
संवैधानिक सुरक्षा
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को कार्यपालिका के सामान्य विवेक से हटाया नहीं जा सकता। हटाने के लिए कठोर संसदीय प्रक्रिया निर्धारित है।
न्यायाधीशों का वेतन और सेवा-शर्तें कानून द्वारा निर्धारित होती हैं तथा नियुक्ति के बाद उनकी सेवा-शर्तों में उनके लिए प्रतिकूल परिवर्तन पर संवैधानिक सुरक्षा उपलब्ध है।
न्यायिक कार्य के निर्वहन में न्यायपालिका कार्यपालिका से स्वतंत्र रहती है।
न्यायालयों के प्रशासन और न्यायिक अधिकारियों पर उच्च न्यायालय को महत्वपूर्ण संवैधानिक नियंत्रण प्रदान किया गया है।
न्यायाधीश के विरुद्ध आपराधिक मामला
गलत सामान्यीकरण से बचें
संविधान में ऐसा कोई सामान्य नियम नहीं है कि राष्ट्रपति की अनुमति के बिना उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के विरुद्ध कोई भी आपराधिक मामला दर्ज ही नहीं किया जा सकता।
न्यायाधीशों को उनके न्यायिक कर्तव्यों के विधिपूर्वक निर्वहन से संबंधित कार्यों के लिए कानून द्वारा आवश्यक संरक्षण प्राप्त है।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता और किसी न्यायाधीश के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही से संबंधित प्रश्न अलग संवैधानिक, वैधानिक और न्यायिक सिद्धांतों से नियंत्रित होते हैं।
⚠️ नोट्स में न लिखें
“राष्ट्रपति की अनुमति के बिना न्यायाधीश पर कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं हो सकता” एक सामान्य संवैधानिक नियम के रूप में गलत है।
भारत में उच्च न्यायालयों की संख्या
वर्तमान स्थिति
भारत में वर्तमान में कुल 25 उच्च न्यायालय हैं।
कुछ उच्च न्यायालयों का अधिकार-क्षेत्र एक से अधिक राज्यों अथवा संघ राज्यक्षेत्रों तक विस्तृत है।
🎯 वर्तमान संख्या
भारत में उच्च न्यायालय — 25।
भारत का सबसे पुराना उच्च न्यायालय
कलकत्ता उच्च न्यायालय, 1862
भारत के वर्तमान उच्च न्यायालयों में कलकत्ता उच्च न्यायालय सबसे पुराना माना जाता है।
इसकी स्थापना 1862 में हुई।
उसी वर्ष बंबई और मद्रास उच्च न्यायालय भी स्थापित हुए, लेकिन कलकत्ता उच्च न्यायालय की स्थापना उनसे पहले प्रभावी हुई थी।
🎯 परीक्षा तथ्य
सबसे पुराना उच्च न्यायालय — कलकत्ता — 1862।
न्यायाधीश क्षमता की दृष्टि से बड़ा उच्च न्यायालय
इलाहाबाद उच्च न्यायालय
इलाहाबाद उच्च न्यायालय भारत के सबसे बड़े उच्च न्यायालयों में है और स्वीकृत न्यायाधीश क्षमता की दृष्टि से सबसे बड़ा उच्च न्यायालय माना जाता है।
इसकी प्रधान पीठ प्रयागराज में तथा खंडपीठ लखनऊ में है।
नवीन उच्च न्यायालय
2019 का पुनर्गठन
1 जनवरी 2019 से तत्कालीन साझा आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना उच्च न्यायालय के स्थान पर तेलंगाना उच्च न्यायालय और आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय अलग-अलग कार्य करने लगे।
आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय की प्रधान पीठ अमरावती में है।
परीक्षा पुस्तकों में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय को प्रायः भारत के नवीनतम स्थापित उच्च न्यायालयों में और सामान्यतः नवीनतम उच्च न्यायालय के रूप में लिखा जाता है।
2019 के जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन के बाद जम्मू-कश्मीर के पुराने उच्च न्यायालय को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख दोनों संघ राज्यक्षेत्रों के साझा उच्च न्यायालय के रूप में पुनर्गठित/नामित किया गया।
संघ राज्यक्षेत्र और उच्च न्यायालय
कौन किस उच्च न्यायालय के अधीन?
| संघ राज्यक्षेत्र | उच्च न्यायालय |
|---|---|
| दिल्ली | दिल्ली उच्च न्यायालय |
| जम्मू और कश्मीर | जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय |
| लद्दाख | जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय |
| चंडीगढ़ | पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय |
| पुडुचेरी | मद्रास उच्च न्यायालय |
| लक्षद्वीप | केरल उच्च न्यायालय |
| अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह | कलकत्ता उच्च न्यायालय |
| दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव | बंबई उच्च न्यायालय |
⚠️ महत्वपूर्ण सुधार
“दिल्ली एकमात्र केंद्रशासित प्रदेश है जिसका अपना उच्च न्यायालय है” आज की व्यवस्था का पूरा चित्र नहीं देता। दिल्ली का स्वतंत्र दिल्ली उच्च न्यायालय है, जबकि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के लिए साझा उच्च न्यायालय है।
प्रमुख उच्च न्यायालय और क्षेत्राधिकार
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण उदाहरण
| उच्च न्यायालय | मुख्य क्षेत्राधिकार |
|---|---|
| पंजाब एवं हरियाणा | पंजाब + हरियाणा + चंडीगढ़ |
| गुवाहाटी | असम + नागालैंड + मिजोरम + अरुणाचल प्रदेश |
| बंबई | महाराष्ट्र + गोवा + दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव |
| कलकत्ता | पश्चिम बंगाल + अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह |
| मद्रास | तमिलनाडु + पुडुचेरी |
| केरल | केरल + लक्षद्वीप |
| जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख | जम्मू-कश्मीर + लद्दाख |
उच्च न्यायालय से संबंधित प्रमुख अनुच्छेद
एक नज़र में
| अनुच्छेद | विषय |
|---|---|
| 214 | राज्यों के लिए उच्च न्यायालय। |
| 215 | उच्च न्यायालय अभिलेख न्यायालय होगा। |
| 216 | उच्च न्यायालय की संरचना। |
| 217 | न्यायाधीश की नियुक्ति और पद की शर्तें। |
| 218 | सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश हटाने संबंधी कुछ प्रावधानों का उच्च न्यायालय पर प्रयोग। |
| 219 | उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की शपथ। |
| 220 | स्थायी न्यायाधीश रहने के बाद वकालत से संबंधित प्रतिबंध। |
| 221 | न्यायाधीशों के वेतन आदि। |
| 222 | एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में न्यायाधीश का स्थानांतरण। |
| 223 | कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति। |
| 224 | अतिरिक्त और कार्यकारी न्यायाधीश। |
| 224-क | सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को उच्च न्यायालय में बैठने के लिए बुलाना। |
| 225 | विद्यमान उच्च न्यायालयों का क्षेत्राधिकार। |
| 226 | रिट जारी करने की शक्ति। |
| 227 | अधीनस्थ न्यायालयों और अधिकरणों पर अधीक्षण। |
| 229 | उच्च न्यायालय के अधिकारी, कर्मचारी और व्यय। |
| 230 | संघ राज्यक्षेत्रों तक उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार का विस्तार या अपवर्जन। |
| 231 | दो या अधिक राज्यों के लिए साझा उच्च न्यायालय। |
महत्वपूर्ण भ्रम और सही तथ्य
एक बार में अंतिम सुधार
अधूरा: प्रत्येक राज्य का अपना अलग उच्च न्यायालय होता है।
सही: अनुच्छेद 214 प्रत्येक राज्य के लिए उच्च न्यायालय की व्यवस्था करता है, लेकिन अनुच्छेद 231 के तहत साझा उच्च न्यायालय संभव है।
अधूरा: न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति मुख्य न्यायाधीश और राज्यपाल की सलाह से करता है।
सही: अन्य उच्च न्यायालय न्यायाधीश की नियुक्ति में संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से भी परामर्श होता है।
अधूरा: अनुच्छेद 226 केवल मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर लागू होता है।
सही: उच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन तथा किसी अन्य प्रयोजन के लिए रिट जारी कर सकता है।
गलत: राज्यपाल उच्च न्यायालय से किसी कानूनी प्रश्न पर संवैधानिक सलाह माँग सकता है।
सही: उच्च न्यायालय के लिए सर्वोच्च न्यायालय के अनुच्छेद 143 जैसा सामान्य सलाहकार क्षेत्राधिकार नहीं है।
गलत: राष्ट्रपति की अनुमति के बिना उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पर कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं हो सकता।
सही: ऐसा कोई सार्वभौमिक संवैधानिक नियम नहीं है।
अधूरा: न्यायाधीश को संसद महाभियोग लगाकर हटाती है।
सही: संसद के दोनों सदनों में निर्धारित विशेष बहुमत से अभिभाषण पारित होने के बाद राष्ट्रपति हटाने का आदेश देता है।
गलत: दिल्ली ही एकमात्र संघ राज्यक्षेत्र है जिसका उच्च न्यायालय है।
सही: दिल्ली का स्वतंत्र उच्च न्यायालय है; जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के लिए साझा उच्च न्यायालय भी है।
अधूरा: उच्च न्यायालय केवल राज्यों के लिए सर्वोच्च न्यायालय है।
सही: कई उच्च न्यायालयों का क्षेत्राधिकार संघ राज्यक्षेत्रों तथा कुछ मामलों में एक से अधिक राज्यों तक भी विस्तृत है।
अधूरा: अनुच्छेद 227 में हर प्रकार के अधिकरण पर बिना अपवाद निगरानी है।
सही: सशस्त्र बलों से संबंधित कानून के तहत गठित न्यायालयों/अधिकरणों के लिए संविधान अपवाद रखता है।
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति
भाग 6 — अनुच्छेद 214 से 231 — उच्च न्यायालय।
214 — प्रत्येक राज्य के लिए उच्च न्यायालय।
215 — अभिलेख न्यायालय और अवमानना दंड शक्ति।
216 — मुख्य न्यायाधीश + अन्य न्यायाधीश।
217 — न्यायाधीशों की नियुक्ति और सेवा-शर्तें।
नियुक्ति — राष्ट्रपति।
योग्यता — भारतीय नागरिक + 10 वर्ष न्यायिक पद अथवा 10 वर्ष उच्च न्यायालय में अधिवक्ता।
सेवानिवृत्ति आयु — 62 वर्ष।
त्यागपत्र — राष्ट्रपति को।
हटाने का आधार — सिद्ध दुर्व्यवहार या अक्षमता।
हटाने की प्रक्रिया — संसद के दोनों सदनों का विशेष बहुमत + राष्ट्रपति का आदेश।
226 — रिट — मौलिक अधिकार + किसी अन्य प्रयोजन के लिए।
227 — अधीनस्थ न्यायालयों और अधिकरणों पर पर्यवेक्षण।
231 — साझा उच्च न्यायालय।
पाँच रिट — बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण, अधिकार-पृच्छा।
अनुच्छेद 226 का विषयगत क्षेत्र अनुच्छेद 32 से व्यापक है।
उच्च न्यायालय के लिए अनुच्छेद 143 जैसा सामान्य सलाहकार क्षेत्राधिकार नहीं।
भारत में वर्तमान उच्च न्यायालय — 25।
सबसे पुराना उच्च न्यायालय — कलकत्ता — 1862।
स्वीकृत न्यायाधीश क्षमता की दृष्टि से सबसे बड़ा — इलाहाबाद उच्च न्यायालय।
2019 — आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के अलग उच्च न्यायालय।
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय — पंजाब + हरियाणा + चंडीगढ़।
जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय — जम्मू-कश्मीर + लद्दाख।
दिल्ली — स्वतंत्र दिल्ली उच्च न्यायालय।
पुडुचेरी — मद्रास उच्च न्यायालय।
लक्षद्वीप — केरल उच्च न्यायालय।
अंडमान-निकोबार — कलकत्ता उच्च न्यायालय।
दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव — बंबई उच्च न्यायालय।
सबसे छोटा क्रम — 214 उच्च न्यायालय → 215 अभिलेख → 216 संरचना → 217 नियुक्ति → 218 हटाना → 226 रिट → 227 पर्यवेक्षण → 231 साझा उच्च न्यायालय।