क्रिप्स प्रस्ताव
1942 — द्वितीय विश्व युद्ध के बीच भारत के लिए ब्रिटिश संवैधानिक प्रस्ताव
क्रिप्स मिशन की पृष्ठभूमि
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान एशिया में जापान की तेजी से बढ़ती सैन्य शक्ति ने ब्रिटेन के लिए भारत का सामरिक महत्व बहुत बढ़ा दिया था। जापान के युद्ध में प्रवेश करने और दक्षिण-पूर्व एशिया में ब्रिटिश ठिकानों पर विजय प्राप्त करने के बाद भारत पर जापानी आक्रमण का खतरा भी बढ़ गया। ऐसी स्थिति में ब्रिटिश सरकार भारतीय राजनीतिक दलों, विशेषकर कांग्रेस, का युद्ध में सक्रिय सहयोग प्राप्त करना चाहती थी। इसी उद्देश्य से 1942 में क्रिप्स मिशन भारत भेजा गया।
क्रिप्स मिशन की घोषणा
मार्च 1942
ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने मार्च 1942 में ब्रिटिश सरकार के वरिष्ठ सदस्य सर स्टैफर्ड क्रिप्स को भारत भेजने की घोषणा की।
क्रिप्स मिशन भेजने का उद्देश्य भारतीय राजनीतिक नेताओं के सामने ब्रिटिश सरकार के नए संवैधानिक प्रस्ताव रखना और द्वितीय विश्व युद्ध में भारत का व्यापक राजनीतिक सहयोग प्राप्त करना था।
सर स्टैफर्ड क्रिप्स 22 मार्च 1942 को दिल्ली पहुँचे। इसके बाद उन्होंने कांग्रेस, मुस्लिम लीग तथा अन्य राजनीतिक दलों और नेताओं से बातचीत शुरू की।
🎯 नाम सही याद रखें
क्रिप्स मिशन के प्रमुख — सर स्टैफर्ड क्रिप्स।
क्रिप्स मिशन क्यों भेजा गया?
द्वितीय विश्व युद्ध और जापानी खतरा
दिसंबर 1941 में जापान के द्वितीय विश्व युद्ध में प्रवेश करने के बाद एशिया की राजनीतिक और सैन्य स्थिति तेजी से बदल गई।
जापानी सेना ने दक्षिण-पूर्व एशिया में तेजी से सफलता प्राप्त की और सिंगापुर तथा बर्मा की दिशा में ब्रिटिश शक्ति को गंभीर चुनौती दी। इससे भारत पर जापानी आक्रमण का खतरा बढ़ गया।
ब्रिटेन पर अमेरिका और चीन जैसे मित्र देशों की ओर से भी भारत में राजनीतिक गतिरोध दूर करने का दबाव था।
इन परिस्थितियों में ब्रिटिश सरकार भारतीय नेताओं को कुछ संवैधानिक आश्वासन देकर युद्ध में उनका सहयोग प्राप्त करना चाहती थी।
युद्ध के बाद डोमिनियन दर्जा
क्रिप्स प्रस्ताव का प्रमुख प्रावधान
क्रिप्स प्रस्ताव में कहा गया कि द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद भारत के लिए एक नया भारतीय संघ स्थापित किया जाएगा, जिसे डोमिनियन का दर्जा प्राप्त होगा।
इस भावी भारतीय संघ को ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के अन्य डोमिनियनों के समान संवैधानिक स्थिति प्राप्त होने की बात कही गई।
इस प्रकार ब्रिटिश सरकार तत्काल सत्ता हस्तांतरण के बजाय युद्ध समाप्त होने के बाद भारत की नई संवैधानिक व्यवस्था लागू करना चाहती थी।
🎯 सबसे महत्वपूर्ण
क्रिप्स प्रस्ताव — युद्ध के बाद भारत को डोमिनियन दर्जा देने का प्रस्ताव।
संविधान-निर्माण निकाय
भारतीय संविधान के निर्माण की व्यवस्था
क्रिप्स प्रस्ताव में युद्ध समाप्त होने के बाद भारत का नया संविधान तैयार करने के लिए एक संविधान-निर्माण निकाय गठित करने की व्यवस्था थी।
ब्रिटिश भारतीय प्रांतों के प्रतिनिधियों का चुनाव प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा किया जाना था, जबकि देशी रियासतों के प्रतिनिधियों को उनके शासकों द्वारा नामित किया जाना था।
इस प्रकार संविधान निर्माण में ब्रिटिश भारतीय प्रांतों के साथ देशी रियासतों को भी भाग लेने की व्यवस्था दी गई थी।
📗 परीक्षा के लिए
प्रांतों के प्रतिनिधि — प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा चुने जाने थे।
रियासतों के प्रतिनिधि — रियासतों के शासकों द्वारा नामित किए जाने थे।
प्रांतों को संघ से बाहर रहने का अधिकार
क्रिप्स प्रस्ताव का विवादास्पद प्रावधान
क्रिप्स प्रस्ताव का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विवादास्पद प्रावधान यह था कि ब्रिटिश भारत का कोई प्रांत नए संविधान को स्वीकार न करने पर भावी भारतीय संघ से बाहर रह सकता था।
ऐसे प्रांत को अपनी वर्तमान संवैधानिक स्थिति बनाए रखने और बाद में अपनी अलग संवैधानिक व्यवस्था स्थापित करने का अवसर दिया जाना था।
कांग्रेस ने इस प्रावधान का विरोध किया क्योंकि इससे भारत की राजनीतिक एकता कमजोर होने और देश के विभाजन का मार्ग खुलने की आशंका थी।
🎯 बहुत महत्वपूर्ण प्रावधान
प्रांतों को प्रस्तावित भारतीय संघ से बाहर रहने का विकल्प दिया गया था।
देशी रियासतों की स्थिति
संघ में शामिल होने का प्रश्न
देशी रियासतों को भी प्रस्तावित भारतीय संघ में शामिल होने का अवसर दिया गया था।
रियासतों के प्रतिनिधि सीधे जनता द्वारा निर्वाचित नहीं होने थे, बल्कि उनके शासकों द्वारा नामित किए जाने थे।
इस व्यवस्था की लोकतांत्रिक दृष्टि से आलोचना हुई क्योंकि रियासतों की जनता को अपने प्रतिनिधि चुनने का प्रत्यक्ष अधिकार नहीं मिलता था।
युद्धकाल में रक्षा व्यवस्था
ब्रिटिश नियंत्रण बना रहता
क्रिप्स प्रस्ताव का सबसे बड़ा व्यावहारिक विवाद युद्ध के दौरान सत्ता के वास्तविक हस्तांतरण से संबंधित था।
प्रस्ताव के अनुसार युद्ध समाप्त होने तक भारत की रक्षा का नियंत्रण ब्रिटिश सरकार के हाथों में बना रहता।
कांग्रेस तत्काल एक वास्तविक उत्तरदायी राष्ट्रीय सरकार चाहती थी और रक्षा सहित शासन की वास्तविक शक्ति भारतीयों को सौंपे जाने की माँग कर रही थी।
इसी कारण युद्ध के बाद स्वतंत्रता संबंधी आश्वासन कांग्रेस को पर्याप्त नहीं लगा।
गांधीजी की प्रतिक्रिया
भविष्य के आश्वासन की आलोचना
महात्मा गांधी क्रिप्स प्रस्ताव से संतुष्ट नहीं थे क्योंकि इसमें भारत को तत्काल वास्तविक सत्ता देने के बजाय युद्ध समाप्त होने के बाद संवैधानिक परिवर्तन का आश्वासन दिया गया था।
गांधीजी से क्रिप्स प्रस्ताव के संबंध में प्रसिद्ध कथन जुड़ा है कि यह “डूबते हुए बैंक पर भविष्य की तारीख का चेक” जैसा था।
इस कथन का आशय यह था कि ब्रिटिश सरकार तत्काल स्वतंत्रता या सत्ता हस्तांतरण करने के बजाय भविष्य के लिए ऐसा आश्वासन दे रही थी जिसकी वास्तविकता और क्रियान्वयन निश्चित नहीं था।
🎯 परीक्षा में प्रचलित कथन
क्रिप्स प्रस्ताव — “भविष्य की तारीख का चेक” — महात्मा गांधी।
कांग्रेस ने प्रस्ताव क्यों अस्वीकार किया?
तत्काल सत्ता हस्तांतरण का अभाव
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने क्रिप्स प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि प्रस्ताव में तत्काल पूर्ण उत्तरदायी राष्ट्रीय सरकार की स्थापना की व्यवस्था नहीं थी।
युद्धकाल में रक्षा विभाग पर ब्रिटिश नियंत्रण बना रहना कांग्रेस के लिए विशेष रूप से अस्वीकार्य था।
कांग्रेस ने प्रांतों को भावी भारतीय संघ से बाहर रहने का अधिकार दिए जाने का भी विरोध किया, क्योंकि इससे भारत के विखंडन का खतरा उत्पन्न होता था।
इसके अतिरिक्त संविधान-निर्माण की वास्तविक प्रक्रिया युद्ध समाप्त होने के बाद शुरू होनी थी, जबकि कांग्रेस तत्काल राजनीतिक सत्ता चाहती थी।
मुस्लिम लीग ने क्यों अस्वीकार किया?
पाकिस्तान की स्पष्ट स्वीकृति नहीं
मुस्लिम लीग ने भी क्रिप्स प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।
मुस्लिम लीग 1940 के लाहौर प्रस्ताव के बाद अलग मुस्लिम राजनीतिक व्यवस्था की माँग को आगे बढ़ा रही थी।
क्रिप्स प्रस्ताव में पाकिस्तान के स्वतंत्र राज्य की स्पष्ट माँग स्वीकार नहीं की गई थी और न ही मुस्लिम लीग को अलग संविधान सभा का स्पष्ट अधिकार दिया गया था।
इसलिए कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने अलग-अलग कारणों से क्रिप्स प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया।
🔎 अंतर याद रखें
कांग्रेस का विरोध — तत्काल सत्ता हस्तांतरण नहीं + प्रांतों को अलग होने का विकल्प।
मुस्लिम लीग का विरोध — पाकिस्तान की माँग स्पष्ट रूप से स्वीकार नहीं की गई।
क्रिप्स मिशन की विफलता
अप्रैल 1942
क्रिप्स ने भारतीय नेताओं के साथ कई दौर की बातचीत की, लेकिन ब्रिटिश सरकार और भारतीय राजनीतिक दलों के बीच सत्ता के तत्काल हस्तांतरण तथा रक्षा विभाग के नियंत्रण जैसे मुद्दों पर समझौता नहीं हो सका।
कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों द्वारा प्रस्ताव स्वीकार न किए जाने के कारण क्रिप्स मिशन विफल हो गया।
वार्ताएँ विफल होने के बाद 11 अप्रैल 1942 को क्रिप्स ने मिशन की असफलता की घोषणा की और भारत से वापस लौट गए।
🎯 तिथि याद रखें
11 अप्रैल 1942 — क्रिप्स मिशन की वार्ता विफल हुई और मिशन समाप्त हो गया।
भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठभूमि
क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद
क्रिप्स मिशन की विफलता से कांग्रेस और ब्रिटिश सरकार के बीच अविश्वास और अधिक बढ़ गया।
भारतीय नेताओं को यह स्पष्ट होता गया कि ब्रिटिश सरकार युद्ध के दौरान भारत को तत्काल वास्तविक राजनीतिक सत्ता देने के लिए तैयार नहीं थी।
इसी राजनीतिक निराशा और युद्धकालीन परिस्थितियों ने आगे चलकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अगस्त प्रस्ताव और क्रिप्स प्रस्ताव
दोनों में अंतर
| अगस्त प्रस्ताव — 1940 | क्रिप्स प्रस्ताव — 1942 |
|---|---|
| लॉर्ड लिनलिथगो द्वारा घोषणा | सर स्टैफर्ड क्रिप्स भारत आए |
| डोमिनियन दर्जा भावी संवैधानिक उद्देश्य के रूप में दोहराया गया | युद्ध के बाद नए भारतीय संघ को डोमिनियन दर्जा देने का ठोस संवैधानिक प्रस्ताव |
| युद्ध के बाद भारतीयों की भागीदारी से संविधान निर्माण की बात | संविधान-निर्माण निकाय गठित करने की अधिक स्पष्ट योजना |
| अल्पसंख्यकों की सहमति को विशेष महत्व | प्रांतों को नए भारतीय संघ से बाहर रहने का विकल्प |
| कांग्रेस ने अस्वीकार किया | कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने अस्वीकार किया |
महत्वपूर्ण तिथियाँ
एक नज़र में
| तिथि / वर्ष | घटना |
|---|---|
| मार्च 1942 | ब्रिटिश सरकार द्वारा क्रिप्स मिशन भारत भेजने की घोषणा |
| 22 मार्च 1942 | सर स्टैफर्ड क्रिप्स दिल्ली पहुँचे |
| मार्च-अप्रैल 1942 | भारतीय राजनीतिक नेताओं से वार्ता |
| 11 अप्रैल 1942 | वार्ता विफल; क्रिप्स मिशन समाप्त |
| अगस्त 1942 | भारत छोड़ो आंदोलन |
त्वरित पुनरावृत्ति
पूरा घटनाक्रम क्रम से
🧠 क्रम याद रखें
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति
1942 में ब्रिटिश सरकार ने सर स्टैफर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में क्रिप्स मिशन भारत भेजा।
क्रिप्स मिशन का मुख्य उद्देश्य द्वितीय विश्व युद्ध में भारतीय राजनीतिक सहयोग प्राप्त करना और भारत के भावी संवैधानिक स्वरूप के संबंध में प्रस्ताव प्रस्तुत करना था।
सर स्टैफर्ड क्रिप्स 22 मार्च 1942 को दिल्ली पहुँचे।
क्रिप्स प्रस्ताव में युद्ध के बाद भारत में नया भारतीय संघ स्थापित कर उसे डोमिनियन दर्जा देने का प्रस्ताव था।
भारत का नया संविधान बनाने के लिए संविधान-निर्माण निकाय गठित करने की व्यवस्था थी।
ब्रिटिश भारतीय प्रांतों के प्रतिनिधि प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा चुने जाने थे, जबकि देशी रियासतों के प्रतिनिधि उनके शासकों द्वारा नामित किए जाने थे।
किसी प्रांत को नए भारतीय संघ में शामिल न होने का विकल्प दिया गया था। यह प्रस्ताव का सबसे विवादास्पद प्रावधानों में से एक था।
युद्ध समाप्त होने तक भारत की रक्षा ब्रिटिश नियंत्रण में रहने वाली थी।
गांधीजी से क्रिप्स प्रस्ताव के लिए “भविष्य की तारीख का चेक” वाला प्रसिद्ध कथन जुड़ा है।
कांग्रेस ने तत्काल सत्ता हस्तांतरण न होने और प्रांतों को संघ से बाहर रहने का विकल्प दिए जाने सहित कई कारणों से प्रस्ताव अस्वीकार किया।
मुस्लिम लीग ने भी प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया, क्योंकि इसमें उसकी पाकिस्तान की माँग को स्पष्ट रूप से स्वीकार नहीं किया गया था।
11 अप्रैल 1942 को क्रिप्स मिशन की वार्ता विफल हो गई और मिशन समाप्त हो गया।
क्रिप्स मिशन की विफलता ने आगे भारत छोड़ो आंदोलन, 1942 की पृष्ठभूमि तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।