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द्वितीय सविनय अवज्ञा आंदोलन (1932–1934)
SECOND PHASE OF CIVIL DISOBEDIENCE

द्वितीय सविनय अवज्ञा आंदोलन

1932–1934 — पुनः आरंभ, दमन, गिरफ्तारी और आंदोलन का अंत

सविनय अवज्ञा आंदोलन का दूसरा चरण

गांधी–इरविन समझौते के बाद महात्मा गांधी द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने लंदन गए, लेकिन सम्मेलन से भारतीय राजनीतिक समस्या का कोई संतोषजनक समाधान नहीं निकला। गांधीजी के भारत लौटने तक ब्रिटिश सरकार ने दमनकारी नीति अपना ली थी। कांग्रेस और सरकार के बीच समझौते का वातावरण समाप्त होने लगा और जनवरी 1932 में सविनय अवज्ञा आंदोलन फिर से शुरू हुआ। यह आंदोलन विभिन्न रूपों में 1934 तक चला।

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द्वितीय गोलमेज सम्मेलन से गांधीजी की वापसी

समझौते से पुनः संघर्ष की ओर

महात्मा गांधी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने लंदन गए थे। सम्मेलन से कोई ऐसा राजनीतिक समझौता नहीं हो सका जो कांग्रेस की प्रमुख मांगों को पूरा कर सके।

गांधीजी 28 दिसंबर 1931 को भारत लौटे। इस समय तक लॉर्ड इरविन का कार्यकाल समाप्त हो चुका था और लॉर्ड विलिंगडन भारत के वायसराय बन चुके थे।

भारत लौटने के बाद गांधीजी ने उत्पन्न राजनीतिक संकट पर चर्चा करने के लिए वायसराय लॉर्ड विलिंगडन से मिलने का प्रयास किया, लेकिन वायसराय ने गांधीजी के साथ उस प्रकार की बातचीत स्वीकार नहीं की जैसी लॉर्ड इरविन के समय हुई थी।

ब्रिटिश सरकार ने समझौते की नीति के स्थान पर कांग्रेस और उसके आंदोलनों के प्रति अधिक कठोर और दमनकारी नीति अपनाई। इससे कांग्रेस और सरकार के बीच टकराव फिर बढ़ गया।

🎯 महत्वपूर्ण तथ्य

1931 में गांधीजी की वापसी के समय वायसराय लॉर्ड विलिंगडन थे। उन्हें लॉर्ड वेलिंगटन नहीं समझना चाहिए।

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आंदोलन पुनः शुरू करने का निर्णय

गांधी–इरविन समझौते का व्यावहारिक अंत

ब्रिटिश सरकार की दमनकारी कार्रवाइयों तथा कांग्रेस नेताओं की गिरफ्तारियों के कारण गांधी–इरविन समझौते से बनी राजनीतिक सहमति लगभग समाप्त हो गई। कांग्रेस कार्यसमिति ने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध सविनय अवज्ञा आंदोलन पुनः शुरू करने का निर्णय लिया।

1 जनवरी 1932 को कांग्रेस कार्यसमिति ने सविनय अवज्ञा से संबंधित प्रस्ताव स्वीकार किया। इसके बाद जनवरी 1932 से आंदोलन का दूसरा चरण तेजी से शुरू हुआ।

इस चरण में भी ब्रिटिश शासन का शांतिपूर्ण प्रतिरोध, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, धरना, राष्ट्रीय ध्वज फहराना तथा कानूनों की अहिंसक अवज्ञा जैसे कार्यक्रम जारी रहे।

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नेहरू और गफ्फार खान की गिरफ्तारी

गांधीजी की गिरफ्तारी से पहले ही कार्रवाई

द्वितीय सविनय अवज्ञा आंदोलन के आरंभ से पहले ही ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेताओं के विरुद्ध कार्रवाई शुरू कर दी थी।

जवाहरलाल नेहरू को 26 दिसंबर 1931 को गिरफ्तार कर लिया गया था। इसलिए यह कहना सही नहीं है कि उन्हें 4 जनवरी 1932 को गांधीजी के साथ गिरफ्तार किया गया था।

खान अब्दुल गफ्फार खान को भी दिसंबर 1931 के अंतिम दिनों में हिरासत में ले लिया गया था। उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में उनके नेतृत्व वाला खुदाई खिदमतगार आंदोलन ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अहिंसक संघर्ष का प्रमुख केंद्र था।

इन गिरफ्तारियों ने गांधीजी के भारत लौटने के समय ही यह स्पष्ट कर दिया था कि नई ब्रिटिश सरकार कांग्रेस के प्रति कठोर नीति अपनाने जा रही है।

📌 तिथियों का अंतर याद रखें

26 दिसंबर 1931 — जवाहरलाल नेहरू गिरफ्तार

27 दिसंबर 1931 — खान अब्दुल गफ्फार खान हिरासत में

4 जनवरी 1932 — महात्मा गांधी गिरफ्तार

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4 जनवरी 1932 — गांधीजी की गिरफ्तारी

ब्रिटिश सरकार की व्यापक दमन नीति

4 जनवरी 1932 को महात्मा गांधी को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें यरवदा जेल भेज दिया गया। सरदार वल्लभभाई पटेल सहित कांग्रेस के अनेक प्रमुख नेताओं को भी ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार किया।

ब्रिटिश सरकार का उद्देश्य आंदोलन शुरू होते ही उसके नेतृत्व और संगठनात्मक शक्ति को कमजोर करना था। इसके लिए देशभर में कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं की व्यापक गिरफ्तारियाँ की गईं।

कांग्रेस तथा उससे जुड़े अनेक संगठनों के विरुद्ध कठोर अध्यादेश जारी किए गए और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को गैर-कानूनी संस्था घोषित कर उसकी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया गया। कांग्रेस कार्यालयों और संपत्तियों पर भी सरकारी कार्रवाई हुई।

नेताओं की गिरफ्तारी के बावजूद आंदोलन तुरंत समाप्त नहीं हुआ। देश के अनेक क्षेत्रों में जनता ने धरनों, बहिष्कार, नमक सत्याग्रह, राष्ट्रीय ध्वज फहराने और अन्य अहिंसक तरीकों से आंदोलन जारी रखा।

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सरकारी दमन और जन-प्रतिरोध

आंदोलन को दबाने का व्यापक प्रयास

लॉर्ड विलिंगडन की सरकार ने 1932 के आंदोलन को दबाने के लिए पहले चरण की तुलना में अधिक कठोर दमनात्मक उपाय अपनाए। बड़ी संख्या में सत्याग्रहियों को गिरफ्तार किया गया और सार्वजनिक सभाओं तथा राजनीतिक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाए गए।

कांग्रेस के कार्यालय सील किए गए, उसकी संपत्तियों को जब्त किया गया और कई क्षेत्रों में विशेष अध्यादेशों के माध्यम से प्रशासन को व्यापक अधिकार दिए गए।

इसके बावजूद महिलाओं, विद्यार्थियों, किसानों और स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने आंदोलन में भाग लिया। विदेशी कपड़ों और ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार, शराब की दुकानों पर शांतिपूर्ण धरना तथा राष्ट्रीय दिवसों का आयोजन जारी रहा।

उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में खुदाई खिदमतगारों ने भी अहिंसक प्रतिरोध जारी रखा। इस संगठन के सदस्यों को उनकी लाल पोशाक के कारण लाल कुर्ती के नाम से भी जाना जाता था।

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सांप्रदायिक निर्णय और पूना समझौता

1932 का समानांतर महत्वपूर्ण घटनाक्रम

सविनय अवज्ञा आंदोलन के इसी दूसरे चरण के दौरान ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्ज़े मैकडोनाल्ड ने 17 अगस्त 1932 को सांप्रदायिक निर्णय की घोषणा की। इसमें दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था प्रस्तावित की गई।

महात्मा गांधी ने दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन का विरोध किया और यरवदा जेल में 20 सितंबर 1932 से आमरण अनशन शुरू किया।

इसके बाद डॉ. भीमराव आंबेडकर तथा अन्य नेताओं के साथ समझौते की प्रक्रिया चली और 24 सितंबर 1932 को पूना समझौता हुआ। इसमें पृथक निर्वाचन के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन व्यवस्था के अंतर्गत दलित वर्गों के लिए अधिक आरक्षित सीटों की व्यवस्था स्वीकार की गई।

पूना समझौता द्वितीय सविनय अवज्ञा आंदोलन की प्रत्यक्ष मांग नहीं था, लेकिन 1932 की राजनीतिक घटनाओं को क्रम से समझने के लिए इसका विशेष महत्व है।

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1933 में आंदोलन का बदलता स्वरूप

सामूहिक आंदोलन से व्यक्तिगत सत्याग्रह की ओर

लगातार सरकारी दमन, व्यापक गिरफ्तारियों और संगठनात्मक कठिनाइयों के कारण 1932 के बाद सविनय अवज्ञा आंदोलन की तीव्रता धीरे-धीरे कम होने लगी।

मई 1933 में गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को कुछ समय के लिए स्थगित किया। इस अवधि में उनका ध्यान अस्पृश्यता उन्मूलन और हरिजन उत्थान की ओर अधिक केंद्रित होने लगा।

बाद में आंदोलन को व्यापक जन-आंदोलन के रूप में जारी रखने के बजाय व्यक्तिगत सत्याग्रह के सीमित रूप में आगे बढ़ाने की नीति अपनाई गई। गांधीजी ने जुलाई 1933 के अंत में स्वयं व्यक्तिगत सत्याग्रह करने की घोषणा की।

1 अगस्त 1933 को गांधीजी को पुनः गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद आंदोलन का व्यापक जनाधार पहले की तुलना में काफी कमजोर होता गया।

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1934 में आंदोलन का अंत

सविनय अवज्ञा आंदोलन की समाप्ति

1933–34 तक आते-आते सविनय अवज्ञा आंदोलन की सक्रियता बहुत कम हो गई थी। लगातार गिरफ्तारियों और सरकारी दमन के कारण संगठन कमजोर हुआ और व्यापक जन-आंदोलन को उसी स्तर पर जारी रखना कठिन हो गया।

गांधीजी ने 1934 में सविनय अवज्ञा आंदोलन को वापस लेने का निर्णय किया। मई 1934 तक आंदोलन का संगठित सामूहिक चरण समाप्त हो गया।

18 मई 1934 को गांधीजी ने सामूहिक सत्याग्रह वापस लिया। इसके साथ 1930 में प्रारंभ हुए सविनय अवज्ञा आंदोलन के दीर्घ चरण का अंत माना जाता है।

इसके बाद कांग्रेस ने केवल आंदोलन की राजनीति पर निर्भर रहने के बजाय संवैधानिक राजनीति और आगामी चुनावों में भागीदारी की दिशा में भी कदम बढ़ाए।

📗 महत्वपूर्ण तथ्य

सविनय अवज्ञा आंदोलन का व्यापक काल — 1930 से 1934। इसका दूसरा चरण गांधी–इरविन समझौते के टूटने के बाद जनवरी 1932 में प्रारंभ हुआ और 1934 में समाप्त हुआ।

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महत्वपूर्ण घटनाक्रम

तिथियों को क्रम से याद करें

तिथि घटना मुख्य तथ्य
26 दिसंबर 1931 जवाहरलाल नेहरू की गिरफ्तारी गांधीजी के भारत लौटने से पहले गिरफ्तार।
27 दिसंबर 1931 खान अब्दुल गफ्फार खान हिरासत में उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत के प्रमुख अहिंसक नेता।
28 दिसंबर 1931 गांधीजी भारत लौटे द्वितीय गोलमेज सम्मेलन से वापसी।
1 जनवरी 1932 कांग्रेस कार्यसमिति का निर्णय सविनय अवज्ञा पुनः आरंभ करने की दिशा।
4 जनवरी 1932 गांधीजी गिरफ्तार यरवदा जेल भेजे गए; कांग्रेस पर व्यापक दमन।
17 अगस्त 1932 सांप्रदायिक निर्णय रैम्ज़े मैकडोनाल्ड द्वारा घोषणा।
20 सितंबर 1932 गांधीजी का अनशन पृथक निर्वाचन के विरोध में।
24 सितंबर 1932 पूना समझौता गांधी और आंबेडकर से जुड़ा महत्वपूर्ण समझौता।
मई 1933 आंदोलन अस्थायी रूप से स्थगित बाद में सीमित व्यक्तिगत सत्याग्रह की ओर परिवर्तन।
18 मई 1934 सामूहिक सत्याग्रह वापस सविनय अवज्ञा आंदोलन के अंतिम चरण का अंत।
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क्रम से याद करें

1931 से 1934 तक

🧠 घटनाक्रम

द्वितीय गोलमेज सम्मेलन गांधीजी भारत लौटे विलिंगडन की कठोर नीति नेताओं की गिरफ्तारी 4 जनवरी 1932 गांधी गिरफ्तार कांग्रेस पर प्रतिबंध व्यक्तिगत सत्याग्रह 1934 आंदोलन समाप्त

⚡ अंतिम पुनरावृत्ति

द्वितीय सविनय अवज्ञा आंदोलन का प्रमुख चरण 1932–1934 में चला।

गांधीजी द्वितीय गोलमेज सम्मेलन से 28 दिसंबर 1931 को भारत लौटे।

उस समय भारत के वायसराय लॉर्ड विलिंगडन थे, जिन्होंने कांग्रेस के प्रति कठोर नीति अपनाई।

गांधीजी ने वायसराय से बातचीत का प्रयास किया, लेकिन उन्हें अपेक्षित वार्ता का अवसर नहीं मिला।

जवाहरलाल नेहरू 26 दिसंबर 1931 को और खान अब्दुल गफ्फार खान 27 दिसंबर 1931 को हिरासत में लिए जा चुके थे।

4 जनवरी 1932 को गांधीजी को गिरफ्तार कर यरवदा जेल भेजा गया।

कांग्रेस को गैर-कानूनी घोषित कर उसकी गतिविधियों, कार्यालयों और संगठन पर व्यापक सरकारी कार्रवाई की गई।

नेताओं की गिरफ्तारी के बावजूद विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार, धरनों, सत्याग्रह और राष्ट्रीय ध्वज फहराने जैसी गतिविधियाँ जारी रहीं।

17 अगस्त 1932 को सांप्रदायिक निर्णय घोषित हुआ और इसके विरोध से संबंधित घटनाक्रम के बाद 24 सितंबर 1932 को पूना समझौता हुआ।

1933 में आंदोलन की तीव्रता कम हुई और सामूहिक आंदोलन के स्थान पर सीमित व्यक्तिगत सत्याग्रह की ओर बदलाव आया।

18 मई 1934 को गांधीजी ने सामूहिक सत्याग्रह वापस लिया और सविनय अवज्ञा आंदोलन का यह चरण समाप्त हो गया।

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