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नरसिंहम समिति रिपोर्ट-II, 1998
NARASIMHAM COMMITTEE-II & LIQUIDITY ADJUSTMENT FACILITY

नरसिंहम समिति रिपोर्ट-II, 1998

बैंकिंग क्षेत्र सुधार, गैर-निष्पादित परिसंपत्तियाँ, पूंजी पर्याप्तता और तरलता प्रबंधन

नरसिंहम समिति-II का महत्व

भारत में 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद बैंकिंग क्षेत्र में अनेक परिवर्तन किए गए। इन सुधारों की प्रगति की समीक्षा करने और बैंकिंग व्यवस्था को अधिक मजबूत, प्रतिस्पर्धी तथा अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाने के लिए एम. नरसिंहम की अध्यक्षता में बैंकिंग क्षेत्र सुधार समिति गठित की गई।

इस समिति ने 1998 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसे सामान्यतः नरसिंहम समिति रिपोर्ट-II या दूसरी नरसिंहम समिति कहा जाता है।

इसका मुख्य उद्देश्य बैंकिंग प्रणाली की वित्तीय मजबूती, परिसंपत्ति गुणवत्ता, पूंजी पर्याप्तता, जोखिम प्रबंधन, परिचालन स्वायत्तता और संस्थागत दक्षता में सुधार करना था।

01

नरसिंहम समिति-I और II में अंतर

समिति वर्ष मुख्य फोकस
नरसिंहम समिति-I 1991 वित्तीय प्रणाली के मूलभूत सुधार, SLR-CRR में कमी, प्राथमिकता क्षेत्र नीति की समीक्षा, प्रतिस्पर्धा और बैंकिंग उदारीकरण
नरसिंहम समिति-II 1998 बैंकिंग प्रणाली को मजबूत करना, पूंजी पर्याप्तता, NPA, जोखिम प्रबंधन, बैंक संरचना, स्वायत्तता और विवेकपूर्ण मानदंड

🎯 सबसे जरूरी अंतर

1991 = बैंकिंग सुधारों की शुरुआत और संरचनात्मक उदारीकरण
1998 = बैंकिंग प्रणाली को और मजबूत तथा सुरक्षित बनाना

02

SLR और CRR संबंधी भ्रम

पुरानी सामान्य अध्ययन पुस्तकों में नरसिंहम समिति-II के अंतर्गत SLR को 25% और CRR को कम करने की सिफारिश लिखी मिलती है।

लेकिन यह सिफारिश मूल रूप से नरसिंहम समिति-I, 1991 से संबंधित थी।

पहली समिति ने उच्च वैधानिक तरलता अनुपात और नकद आरक्षित अनुपात को कम करने की वकालत की थी ताकि बैंकों के अधिक संसाधन उत्पादक ऋण के लिए उपलब्ध हो सकें।

इसलिए SLR को 25% तक लाने और CRR में पर्याप्त कमी की मूल सिफारिश को नरसिंहम समिति-II की विशिष्ट सिफारिश के रूप में याद नहीं करना चाहिए।

⚠️ परीक्षा-सावधानी

SLR और CRR में बड़ी संरचनात्मक कमी → मुख्यतः नरसिंहम समिति-I, 1991

03

प्राथमिकता क्षेत्र ऋण संबंधी सिफारिश

नरसिंहम समिति-I ने निर्देशित ऋण व्यवस्था को चरणबद्ध रूप से कम करने और प्राथमिकता क्षेत्र की परिभाषा को मुख्यतः कमजोर तथा जरूरतमंद वर्गों तक सीमित करने की बात कही थी।

पहली समिति ने पुनर्परिभाषित प्राथमिकता क्षेत्र के लिए कुल बैंक ऋण का लगभग 10% लक्ष्य सुझाया था, लेकिन यह सिफारिश स्वीकार नहीं की गई।

नरसिंहम समिति-II ने 1998 में इस विषय की पुनः समीक्षा की। उसने माना कि छोटे और सीमांत किसानों, छोटे व्यवसायों तथा अत्यंत छोटे उद्योगों को संस्थागत ऋण की विशेष आवश्यकता है।

समिति-II ने प्राथमिकता क्षेत्र के भीतर कमजोर वर्गों के लिए प्रचलित 10% उप-लक्ष्य को जारी रखने का समर्थन किया।

इसलिए “समिति-II ने पूरे प्राथमिकता क्षेत्र के ऋण लक्ष्य को 10% करने की सिफारिश की” कहना सही नहीं है।

04

गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों में कमी

नरसिंहम समिति-II ने बैंकों की गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों की उच्च मात्रा को बैंकिंग प्रणाली की गंभीर कमजोरी माना।

समिति ने ऋण स्वीकृति, ऋण निगरानी और वसूली व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दिया ताकि खराब ऋणों का निर्माण कम हो।

समिति ने परिसंपत्तियों की सही पहचान, आय की मान्यता और खराब ऋणों के विरुद्ध पर्याप्त प्रावधान की व्यवस्था मजबूत करने की सिफारिश की।

इसका व्यापक उद्देश्य बैंकों की वास्तविक वित्तीय स्थिति को अधिक पारदर्शी बनाना और उनकी परिसंपत्ति गुणवत्ता में सुधार करना था।

🎯 मुख्य शब्द

बेहतर ऋण जाँच NPA की शीघ्र पहचान पर्याप्त प्रावधान बेहतर वसूली
05

परिसंपत्ति वर्गीकरण को कठोर बनाना

समिति-II ने बैंक ऋणों के वर्गीकरण और खराब परिसंपत्तियों की पहचान के नियमों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अधिक निकट लाने पर जोर दिया।

विशेष रूप से किसी परिसंपत्ति को अवमानक से संदिग्ध परिसंपत्ति की श्रेणी में ले जाने की अवधि को कम करने की सिफारिश की गई।

इसके बाद भारतीय रिजर्व बैंक ने आय की मान्यता, परिसंपत्ति वर्गीकरण और प्रावधान संबंधी विवेकपूर्ण मानदंडों को चरणबद्ध तरीके से अधिक कठोर बनाया।

06

पूंजी पर्याप्तता में वृद्धि

नरसिंहम समिति-II ने बैंकों की पूंजी स्थिति मजबूत करने के लिए पूंजी से जोखिम-भारित परिसंपत्ति अनुपात को बढ़ाने की सिफारिश की।

इसके आधार पर भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों के लिए न्यूनतम पूंजी पर्याप्तता अनुपात को 9% तक बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए।

इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि बैंक अपने द्वारा लिए गए जोखिमों के मुकाबले पर्याप्त पूंजी बनाए रखें और संभावित घाटे को सहन कर सकें।

🎯 उच्च महत्व

नरसिंहम समिति-II → मजबूत पूंजी आधार → पूंजी पर्याप्तता अनुपात 9%

07

सरकारी प्रतिभूतियों पर जोखिम

समिति ने यह माना कि सरकारी और अन्य अनुमोदित प्रतिभूतियों की कीमतों में भी बाजार परिवर्तन के कारण जोखिम हो सकता है।

इसलिए ऐसी प्रतिभूतियों के बाजार जोखिम को पूंजी पर्याप्तता की गणना में उचित रूप से शामिल करने की सिफारिश की गई।

इसके बाद भारतीय रिजर्व बैंक ने सरकारी और अनुमोदित प्रतिभूतियों के बाजार जोखिम के लिए जोखिम भार लागू करने की दिशा में कदम उठाए।

08

बैंक विलय और बैंकिंग संरचना

नरसिंहम समिति-II ने भारतीय बैंकिंग प्रणाली में कम लेकिन अधिक मजबूत और प्रतिस्पर्धी बैंक विकसित करने का समर्थन किया।

समिति ने मजबूत बैंकों के बीच विलय के माध्यम से बड़ी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी बैंकिंग संस्थाएँ बनाने की संभावना पर जोर दिया।

लेकिन समिति का उद्देश्य केवल कमजोर बैंक को मजबूत बैंक में मिलाना नहीं था। कमजोर बैंक को केवल इस कारण मजबूत बैंक में मिलाना कि उसे बचाया जा सके, मजबूत बैंक को भी कमजोर कर सकता है।

इसलिए बैंक विलय को व्यावसायिक सामर्थ्य, वित्तीय स्थिति और दीर्घकालीन दक्षता के आधार पर किया जाना चाहिए।

⚠️ महत्वपूर्ण सुधार

“छोटे और कमजोर बैंक को मजबूत बैंक में मिला देना” समिति की सिफारिश का पूरा अर्थ नहीं है। जोर मजबूत और व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य बैंकिंग इकाइयों के निर्माण पर था।

09

बैंकों की स्वायत्तता

समिति ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को अधिक परिचालन और व्यावसायिक स्वायत्तता देने की सिफारिश की।

बैंकों के दैनिक व्यावसायिक निर्णयों में अनावश्यक सरकारी हस्तक्षेप कम करने और बैंक प्रबंधन को अधिक जिम्मेदार बनाने पर जोर दिया गया।

इसका उद्देश्य बैंकों को व्यावसायिक सिद्धांतों पर निर्णय लेने और प्रतिस्पर्धी वातावरण में अधिक दक्षता से काम करने में सक्षम बनाना था।

10

मानव संसाधन एवं प्रौद्योगिकी

समिति ने बैंक कर्मचारियों और प्रबंधन की कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए मानव संसाधन नीतियों में सुधार पर जोर दिया।

योग्यता आधारित नियुक्ति, प्रशिक्षण, जिम्मेदारी और आधुनिक प्रबंधन पद्धतियों को बैंकिंग क्षेत्र में अधिक महत्व देने की आवश्यकता बताई गई।

बैंकिंग कार्यों में आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी और कम्प्यूटरीकरण को बढ़ावा देना भी बैंकिंग दक्षता बढ़ाने की व्यापक सुधार प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा था।

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ऋण जोखिम प्रबंधन

समिति ने बड़े ऋणों में जोखिम के अत्यधिक केंद्रीकरण को कम करने की आवश्यकता बताई।

किसी एक बड़े उधारकर्ता या व्यावसायिक समूह को अत्यधिक ऋण देने से बैंक के लिए जोखिम बढ़ सकता है।

इसलिए बड़े ऋण जोखिमों के लिए स्पष्ट और विवेकपूर्ण सीमाएँ निर्धारित करने तथा बेहतर जोखिम प्रबंधन प्रणाली विकसित करने की सिफारिश की गई।

12

पूंजी खाता परिवर्तनीयता — भ्रम

कुछ सामान्य अध्ययन पुस्तकों में रुपये की पूर्ण पूंजी खाता परिवर्तनीयता को नरसिंहम समिति-II की प्रमुख सिफारिश के रूप में लिखा जाता है।

लेकिन पूंजी खाता परिवर्तनीयता की विस्तृत रूपरेखा के साथ सबसे प्रमुख रूप से एस. एस. तारापोर समिति का नाम जुड़ा है, जिसकी रिपोर्ट 1997 में आई थी।

नरसिंहम समिति-II ने भारतीय बैंकिंग प्रणाली को अधिक मजबूत और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्षम बनाने पर जोर दिया, लेकिन “पूर्ण पूंजी खाता परिवर्तनीयता” को इसकी मुख्य स्वतंत्र सिफारिश के रूप में याद करना परीक्षा में भ्रम पैदा कर सकता है।

🎯 सही जोड़ी

पूंजी खाता परिवर्तनीयता → तारापोर समिति

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तरलता समायोजन सुविधा

तरलता समायोजन सुविधा भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति और तरलता प्रबंधन व्यवस्था का महत्वपूर्ण साधन है।

नरसिंहम समिति-II ने रिजर्व बैंक द्वारा मुद्रा बाजार में अल्पकालीन तरलता उपलब्ध कराने और अतिरिक्त तरलता सोखने के लिए ऐसी व्यवस्था विकसित करने की सिफारिश की थी।

इसके बाद भारतीय रिजर्व बैंक ने अप्रैल 1999 में अंतरिम तरलता समायोजन सुविधा शुरू की।

पूर्ण विकसित तरलता समायोजन सुविधा का पहला चरण जून 2000 से लागू किया गया।

🎯 परीक्षा तथ्य

नरसिंहम समिति-II 1999 — अंतरिम सुविधा 2000 — पूर्ण सुविधा
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रेपो के माध्यम से तरलता देना

रेपो व्यवस्था के अंतर्गत भारतीय रिजर्व बैंक पात्र बैंकों और अन्य पात्र प्रतिभागियों को सरकारी या अनुमोदित प्रतिभूतियों के बदले अल्पकालीन तरलता उपलब्ध करा सकता है।

इस व्यवस्था में लागू नीति रेपो दर मौद्रिक नीति की महत्वपूर्ण ब्याज दर होती है।

यदि बैंकिंग प्रणाली में नकदी की कमी हो, तो रिजर्व बैंक रेपो तथा अन्य तरलता साधनों के माध्यम से आवश्यक धन उपलब्ध करा सकता है।

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अतिरिक्त तरलता का अवशोषण

पारंपरिक तरलता समायोजन व्यवस्था में अतिरिक्त तरलता को अवशोषित करने के लिए रिवर्स रेपो का व्यापक उपयोग किया जाता था।

इसलिए पुरानी पुस्तकों में तरलता समायोजन सुविधा को रेपो + रिवर्स रेपो के रूप में समझाया जाता है।

हालाँकि अप्रैल 2022 से भारतीय रिजर्व बैंक ने स्थायी जमा सुविधा को तरलता समायोजन गलियारे की निचली सीमा बनाया है।

निश्चित दर रिवर्स रेपो अभी भी भारतीय रिजर्व बैंक के तरलता प्रबंधन साधनों में बना हुआ है, लेकिन अब यह गलियारे की मुख्य निचली सीमा नहीं है।

⚠️ वर्तमान व्यवस्था

पुराना सरल रूप: रेपो + रिवर्स रेपो
वर्तमान गलियारा: स्थायी जमा सुविधा — नीति रेपो दर — सीमांत स्थायी सुविधा

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तरलता समायोजन सुविधा के उद्देश्य

इस सुविधा का मुख्य उद्देश्य बैंकिंग प्रणाली में अल्पकालीन तरलता की कमी और अधिकता को नियंत्रित करना है।

यह मुद्रा बाजार की अल्पकालीन ब्याज दरों को मौद्रिक नीति के संकेतों के अनुरूप रखने में सहायता करती है।

बैंकिंग प्रणाली में नकदी की कमी होने पर रिजर्व बैंक तरलता प्रदान कर सकता है और अतिरिक्त नकदी होने पर उसे अवशोषित कर सकता है।

इस प्रकार यह मुद्रा बाजार की स्थिरता और मौद्रिक नीति के प्रभावी संचालन में सहायता करती है।

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महत्वपूर्ण भ्रम और सही तथ्य

भ्रम: SLR को 25% और CRR को 10% तक लाना नरसिंहम समिति-II की मुख्य सिफारिश थी।
सही: SLR और CRR में बड़ी संरचनात्मक कमी की मूल सिफारिश मुख्यतः नरसिंहम समिति-I, 1991 से संबंधित थी।

भ्रम: समिति-II ने पूरे प्राथमिकता क्षेत्र ऋण को 10% तक सीमित करने को कहा।
सही: 10% तक पुनर्परिभाषित प्राथमिकता क्षेत्र का प्रस्ताव पहली समिति से जुड़ा था। दूसरी समिति ने कमजोर वर्गों के प्रचलित 10% उप-लक्ष्य को जारी रखने का समर्थन किया।

भ्रम: समिति ने कमजोर बैंकों को मजबूत बैंकों में मिलाने की सीधी सिफारिश की।
सही: जोर मजबूत और व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य बैंकिंग संस्थाओं के निर्माण पर था; कमजोर बैंक का विलय मजबूत बैंक को कमजोर नहीं करना चाहिए।

भ्रम: पूर्ण पूंजी खाता परिवर्तनीयता नरसिंहम समिति-II की सबसे प्रमुख सिफारिश थी।
सही: पूंजी खाता परिवर्तनीयता की प्रमुख समिति तारापोर समिति है।

भ्रम: तरलता समायोजन सुविधा केवल रेपो और रिवर्स रेपो से ही बनी है।
सही: ऐतिहासिक रूप से रेपो-रिवर्स रेपो प्रमुख थे; वर्तमान गलियारे में स्थायी जमा सुविधा निचली सीमा, रेपो मध्य दर और सीमांत स्थायी सुविधा ऊपरी सीमा है।

भ्रम: तरलता समायोजन सुविधा 1998 में ही पूरी तरह लागू हो गई थी।
सही: अंतरिम सुविधा अप्रैल 1999 में और पूर्ण व्यवस्था का पहला चरण जून 2000 में शुरू हुआ।

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नरसिंहम समिति-II — एक नज़र में

क्षेत्र मुख्य विचार
NPA खराब ऋण कम करना, शीघ्र पहचान और पर्याप्त प्रावधान
पूंजी पर्याप्तता बैंकों का पूंजी आधार मजबूत करना
जोखिम प्रबंधन बाजार एवं ऋण जोखिम के लिए कठोर मानदंड
बैंक विलय मजबूत एवं प्रतिस्पर्धी बैंकिंग संस्थाओं का निर्माण
स्वायत्तता बैंकों को अधिक परिचालन स्वतंत्रता
मानव संसाधन व्यावसायिक प्रबंधन और दक्षता में सुधार
तरलता तरलता समायोजन सुविधा विकसित करना
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त्वरित पुनरावृत्ति

⚡ याद रखने का क्रम

1991 — नरसिंहम-I 1998 — नरसिंहम-II
NPA में कमी पूंजी पर्याप्तता जोखिम प्रबंधन
मजबूत बैंक स्वायत्तता प्रौद्योगिकी
1999 — अंतरिम LAF 2000 — पूर्ण LAF

⚡ अंतिम पुनरावृत्ति बिंदु

नरसिंहम समिति रिपोर्ट-II — 1998 — अध्यक्ष एम. नरसिंहम

इसका उद्देश्य भारतीय बैंकिंग व्यवस्था को अधिक मजबूत, प्रतिस्पर्धी, पारदर्शी और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाना था।

SLR और CRR में बड़ी कमी की मूल सिफारिश मुख्यतः नरसिंहम समिति-I, 1991 से संबंधित है।

पूरे प्राथमिकता क्षेत्र को 10% तक सीमित करने का प्रस्ताव भी मुख्यतः पहली समिति से जुड़ा था।

समिति-II ने प्राथमिकता क्षेत्र के भीतर कमजोर वर्गों के प्रचलित 10% उप-लक्ष्य को जारी रखने का समर्थन किया।

समिति-II ने NPA कम करने, ऋण वसूली सुधारने और परिसंपत्ति गुणवत्ता मजबूत करने पर जोर दिया।

बैंकों के लिए पूंजी पर्याप्तता मानदंड को मजबूत करने और न्यूनतम अनुपात को 9% तक बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए गए।

समिति ने बैंकिंग जोखिमों की बेहतर पहचान, परिसंपत्ति वर्गीकरण और पर्याप्त प्रावधान पर जोर दिया।

बैंक विलय का उद्देश्य मजबूत, सक्षम और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी बैंक बनाना था।

समिति ने बैंकों को अधिक परिचालन स्वायत्तता, बेहतर मानव संसाधन व्यवस्था और आधुनिक तकनीक अपनाने पर जोर दिया।

पूंजी खाता परिवर्तनीयता से प्रमुख रूप से तारापोर समिति जुड़ी है।

नरसिंहम समिति-II की सिफारिश से तरलता समायोजन सुविधा के विकास को बढ़ावा मिला।

अप्रैल 1999 — अंतरिम तरलता समायोजन सुविधा

जून 2000 — पूर्ण तरलता समायोजन सुविधा का पहला चरण

ऐतिहासिक रूप से इस सुविधा में रेपो और रिवर्स रेपो प्रमुख साधन थे।

अप्रैल 2022 से स्थायी जमा सुविधा तरलता समायोजन गलियारे की निचली सीमा है, जबकि नीति रेपो दर मध्य में और सीमांत स्थायी सुविधा ऊपरी सीमा पर रहती है।

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