बंगाल का विभाजन
(1905)
बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन
1905 का बंगाल विभाजन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास की एक निर्णायक घटना थी। तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन ने विशाल बंगाल प्रांत को प्रशासनिक सुविधा के नाम पर विभाजित किया, लेकिन भारतीय राष्ट्रवादियों ने इसे बंगाली राष्ट्रीय एकता को कमजोर करने और हिंदू-मुस्लिम समुदायों के बीच विभाजन बढ़ाने की ब्रिटिश नीति के रूप में देखा।
बंगाल विभाजन के विरोध ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा दी। इसके परिणामस्वरूप स्वदेशी, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और आत्मनिर्भरता जैसे विचार व्यापक जन-आंदोलन के रूप में सामने आए।
बंगाल विभाजन की पृष्ठभूमि
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में बंगाल ब्रिटिश भारत के सबसे बड़े प्रशासनिक प्रांतों में था। इसके अंतर्गत बंगाल के साथ बिहार और उड़ीसा के बड़े क्षेत्र भी आते थे।
ब्रिटिश सरकार का तर्क था कि इतने विशाल क्षेत्र और बड़ी जनसंख्या का प्रशासन एक ही प्रांतीय सरकार द्वारा प्रभावी रूप से चलाना कठिन था।
लॉर्ड कर्जन ने इसी प्रशासनिक तर्क के आधार पर बंगाल के पुनर्गठन की योजना को आगे बढ़ाया।
भारतीय राष्ट्रवादियों का मानना था कि वास्तविक उद्देश्य बंगाल में तेजी से बढ़ रही राष्ट्रवादी चेतना को कमजोर करना और बंगाली भाषी जनता की राजनीतिक एकता को तोड़ना था।
विभाजन की योजना
बंगाल के प्रशासनिक पुनर्गठन की योजना अचानक 1905 में नहीं बनी थी। इसके संबंध में ब्रिटिश प्रशासन के भीतर पहले से विचार-विमर्श चल रहा था और 1903 से विभाजन की प्रस्तावित योजना सार्वजनिक चर्चा का विषय बनने लगी थी।
दिसंबर 1903 में प्रस्तावित क्षेत्रीय पुनर्गठन के विवरण सामने आने के बाद बंगाल में इसके विरुद्ध विरोध बढ़ने लगा।
इसलिए “3 दिसंबर 1903 को ब्रिटिश संसद में अंतिम बंगाल विभाजन प्रस्ताव रखा गया” लिखना बहुत निश्चित और भ्रामक होगा। सही रूप में इसे 1903 में बंगाल के पुनर्गठन की योजना सार्वजनिक होने से जोड़ना अधिक उचित है।
भ्रम से बचें
1903 — बंगाल विभाजन की प्रस्तावित योजना सार्वजनिक चर्चा में आई।
1905 — अंतिम निर्णय और क्रियान्वयन।
विभाजन की घोषणा और क्रियान्वयन
जुलाई 1905 ई. में बंगाल विभाजन के अंतिम निर्णय की घोषणा की गई। सामान्य परीक्षा-सामग्री में इसके लिए 20 जुलाई 1905 की तिथि दी जाती है।
लेकिन बंगाल का वास्तविक प्रशासनिक विभाजन 16 अक्टूबर 1905 ई. से प्रभावी हुआ।
इसलिए 20 जुलाई और 16 अक्टूबर दोनों तिथियों को अलग-अलग समझना चाहिए—जुलाई में निर्णय की घोषणा और 16 अक्टूबर को विभाजन का क्रियान्वयन।
परीक्षा के लिए
बंगाल विभाजन — लॉर्ड कर्जन — घोषणा जुलाई 1905 — लागू 16 अक्टूबर 1905।
विभाजन के बाद बंगाल की व्यवस्था
बंगाल विभाजन के बाद एक नया प्रांत पूर्वी बंगाल एवं असम बनाया गया। इसकी राजधानी ढाका निर्धारित की गई।
पूर्वी बंगाल एवं असम में मुख्यतः बंगाल के पूर्वी जिले और असम सम्मिलित किए गए।
दूसरा प्रांत बंगाल कहलाया, जिसमें पश्चिमी बंगाल के साथ बिहार और उड़ीसा के क्षेत्र भी सम्मिलित थे और इसका प्रशासनिक केंद्र कलकत्ता रहा।
इस विभाजन से पूर्वी प्रांत में मुस्लिम आबादी बहुसंख्यक थी, जबकि पश्चिमी बंगाल वाले प्रांत की सामाजिक और भाषाई संरचना अलग थी।
भारतीयों ने विभाजन का विरोध क्यों किया?
भारतीय राष्ट्रवादियों ने ब्रिटिश सरकार के प्रशासनिक सुविधा वाले तर्क को स्वीकार नहीं किया।
उनका मानना था कि बंगाल उस समय भारतीय राष्ट्रवाद का सबसे सक्रिय केंद्र था और ब्रिटिश सरकार बंगाली भाषी जनता तथा विकसित हो रहे राष्ट्रवादी आंदोलन को विभाजित करना चाहती थी।
राष्ट्रीय नेताओं ने विभाजन को ब्रिटिश शासन की “फूट डालो और शासन करो” नीति से जोड़कर देखा।
यद्यपि विभाजन के प्रति बंगाल के सभी सामाजिक और धार्मिक वर्गों की प्रतिक्रिया समान नहीं थी, लेकिन इसके विरोध से भारतीय राष्ट्रवाद को व्यापक जन-आधार मिला।
7 अगस्त 1905 — ऐतिहासिक टाउन हॉल सभा
7 अगस्त 1905 ई. को कलकत्ता के टाउन हॉल में बंगाल विभाजन के विरोध में एक ऐतिहासिक सार्वजनिक सभा आयोजित की गई।
इस सभा में स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग और ब्रिटिश वस्तुओं के बहिष्कार को आंदोलन के महत्वपूर्ण साधन के रूप में स्वीकार किया गया।
इसी घटना को सामान्यतः स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन के संगठित आरंभ की प्रमुख तिथि माना जाता है।
इसके बाद बंगाल के विभिन्न क्षेत्रों में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार, स्वदेशी उत्पादों के उपयोग और राष्ट्रीय शिक्षा के समर्थन का अभियान तेजी से फैल गया।
याद रखें
7 अगस्त 1905 — कलकत्ता टाउन हॉल — स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन की निर्णायक शुरुआत।
16 अक्टूबर 1905 — राष्ट्रीय शोक और प्रतिरोध
16 अक्टूबर 1905 को बंगाल विभाजन लागू हुआ। बंगाल के राष्ट्रवादियों ने इस दिन को शोक दिवस के रूप में मनाया।
लोगों ने उपवास रखा, जुलूस निकाले और बंगाली एकता के प्रतीक के रूप में विभिन्न सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित किए।
रवींद्रनाथ टैगोर ने इस दौर में सामाजिक एकता पर विशेष बल दिया और राखी बंधन जैसे प्रतीकात्मक कार्यक्रमों के माध्यम से बंगाल की जनता को एकता का संदेश दिया।
इस दिन का विरोध केवल प्रशासनिक परिवर्तन के विरुद्ध प्रतिक्रिया नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रवादी राजनीतिक चेतना का व्यापक सार्वजनिक प्रदर्शन बन गया।
स्वदेशी आंदोलन
बंगाल विभाजन के विरोध से विकसित स्वदेशी आंदोलन का मूल उद्देश्य भारतीयों को देश में बनी वस्तुओं का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित करना था।
स्वदेशी का अर्थ केवल भारतीय वस्तुओं को खरीदना नहीं था। इसके पीछे भारतीय उद्योगों, हस्तशिल्प, राष्ट्रीय शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता को विकसित करने की व्यापक भावना थी।
राष्ट्रीय नेताओं ने भारतीयों से विदेशी कपड़े और अन्य ब्रिटिश वस्तुओं के स्थान पर देश में निर्मित उत्पादों का प्रयोग करने का आह्वान किया।
इस आंदोलन ने आर्थिक राष्ट्रवाद को सामान्य जनता के दैनिक जीवन से जोड़ दिया।
विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार
स्वदेशी आंदोलन के साथ विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का कार्यक्रम भी चलाया गया।
विदेशी कपड़ों की सार्वजनिक होली जलाई गई और दुकानों के सामने शांतिपूर्ण प्रदर्शन किए गए ताकि लोग ब्रिटिश वस्तुओं की खरीद से बचें।
बहिष्कार का उद्देश्य ब्रिटिश आर्थिक हितों पर दबाव डालना और भारतीय उद्योगों के लिए बाजार तैयार करना था।
इस प्रकार पहली बार आर्थिक व्यवहार को बड़े पैमाने पर राजनीतिक विरोध के साधन के रूप में प्रयोग किया गया।
राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन
स्वदेशी आंदोलन के दौरान ब्रिटिश नियंत्रित शिक्षा के विकल्प के रूप में राष्ट्रीय शिक्षा की अवधारणा को बढ़ावा मिला।
राष्ट्रीय नेताओं का उद्देश्य ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित करना था जो भारतीय आवश्यकताओं, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना के अनुकूल हो।
बंगाल में अनेक राष्ट्रीय विद्यालय और शिक्षण संस्थाएँ स्थापित की गईं और आगे राष्ट्रीय शिक्षा परिषद जैसी संस्थाओं का विकास हुआ।
राष्ट्रीय शिक्षा ने स्वदेशी आंदोलन को केवल आर्थिक बहिष्कार तक सीमित न रखकर एक व्यापक सांस्कृतिक और बौद्धिक आंदोलन का स्वरूप दिया।
1905 का बनारस कांग्रेस अधिवेशन
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 1905 का बनारस अधिवेशन गोपालकृष्ण गोखले की अध्यक्षता में आयोजित हुआ।
इस समय बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन राष्ट्रीय राजनीति के प्रमुख प्रश्न बन चुके थे।
कांग्रेस ने बंगाल में चल रहे स्वदेशी आंदोलन का समर्थन किया। विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार को लेकर उदारवादी और उग्रवादी नेताओं के बीच इसकी सीमा और प्रयोग को लेकर मतभेद भी दिखाई दिए।
इसलिए “1905 के बनारस अधिवेशन में पूरे भारत के लिए स्वदेशी और बहिष्कार दोनों को समान रूप से अंतिम कांग्रेस नीति बना दिया गया” लिखना अधिक सरल होगा। राष्ट्रीय स्तर पर चार प्रमुख कार्यक्रमों को स्पष्ट रूप से स्वीकार करने वाला निर्णायक अधिवेशन 1906 का कलकत्ता अधिवेशन था।
रवींद्रनाथ टैगोर और अमार सोनार बांग्ला
बंगाल विभाजन विरोधी आंदोलन के समय रवींद्रनाथ टैगोर ने बंगाल की सांस्कृतिक और सामाजिक एकता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उन्होंने इसी आंदोलन के वातावरण में प्रसिद्ध गीत “अमार सोनार बांग्ला” की रचना की।
यह गीत बंगाल की धरती, संस्कृति और मातृभूमि के प्रति प्रेम को व्यक्त करता है तथा स्वदेशी आंदोलन के दौरान अत्यंत लोकप्रिय हुआ।
आगे इसी गीत के प्रारंभिक अंश को स्वतंत्र बांग्लादेश ने अपने राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया।
परीक्षा के लिए
अमार सोनार बांग्ला — रवींद्रनाथ टैगोर — बंगाल विभाजन विरोधी आंदोलन से संबंधित — वर्तमान बांग्लादेश का राष्ट्रगान।
स्वदेशी आंदोलन के प्रमुख नेता
बंगाल में सुरेंद्रनाथ बनर्जी, बिपिनचंद्र पाल, अरविंद घोष, अश्विनी कुमार दत्त और अन्य राष्ट्रवादी नेताओं ने स्वदेशी आंदोलन के प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
बंगाल से बाहर भी बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और अन्य नेताओं ने स्वदेशी एवं बहिष्कार की राजनीति का समर्थन किया।
इसी दौर में लाल-बाल-पाल की राष्ट्रवादी त्रयी विशेष रूप से प्रसिद्ध हुई—लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और बिपिनचंद्र पाल।
इन नेताओं ने आंदोलन को केवल याचिकाओं और प्रस्तावों तक सीमित रखने के बजाय जनता की सक्रिय भागीदारी और आत्मनिर्भरता से जोड़ने पर बल दिया।
1906 का कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 1906 का कलकत्ता अधिवेशन राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास का महत्वपूर्ण अधिवेशन था।
इसकी अध्यक्षता दादाभाई नौरोजी ने की।
इस अधिवेशन में स्वराज, स्वदेशी, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा राष्ट्रीय आंदोलन के चार महत्वपूर्ण कार्यक्रमों के रूप में सामने आए।
दादाभाई नौरोजी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में भारत के लिए स्वराज की मांग को स्पष्ट राजनीतिक लक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया।
याद रखें
1906 — कलकत्ता — दादाभाई नौरोजी — स्वराज + स्वदेशी + बहिष्कार + राष्ट्रीय शिक्षा।
“स्वराज” शब्द से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य
1906 के कलकत्ता अधिवेशन में दादाभाई नौरोजी ने स्वराज को कांग्रेस के राजनीतिक लक्ष्य के रूप में प्रमुखता से प्रस्तुत किया।
इसका यह अर्थ नहीं है कि भारत में “स्वराज” शब्द का पहली बार प्रयोग दादाभाई नौरोजी ने किया था।
स्वराज की धारणा और शब्द का प्रयोग उनसे पहले भारतीय राजनीतिक और सामाजिक चिंतन में मौजूद था। प्रतियोगी परीक्षा सामग्री में स्वामी दयानंद सरस्वती को “स्वराज” शब्द के शुरुआती महत्वपूर्ण प्रयोग से जोड़ा जाता है।
आगे बाल गंगाधर तिलक ने स्वराज को लोकप्रिय राजनीतिक नारे और जन-आंदोलन की मांग के रूप में अत्यंत प्रभावशाली बनाया।
भ्रम से बचें
दयानंद सरस्वती → स्वराज शब्द के प्रारंभिक प्रयोग से जुड़े।
दादाभाई नौरोजी → 1906 कांग्रेस में स्वराज को स्पष्ट राष्ट्रीय राजनीतिक लक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया।
बाल गंगाधर तिलक → स्वराज को जनप्रिय राजनीतिक नारे के रूप में व्यापक बनाया।
स्वदेशी आंदोलन का आर्थिक प्रभाव
स्वदेशी आंदोलन ने भारतीय उद्योगों और स्वदेशी उद्यमों को प्रोत्साहन दिया।
भारतीयों ने कपड़ा, साबुन, माचिस, बैंक, बीमा तथा अन्य क्षेत्रों में स्वदेशी संस्थानों और व्यवसायों को समर्थन देना शुरू किया।
विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार से भारतीय उत्पादों के प्रति मांग बढ़ी और आर्थिक आत्मनिर्भरता को राष्ट्रवाद से जोड़ा गया।
स्वदेशी आंदोलन ने यह विचार मजबूत किया कि राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ आर्थिक स्वतंत्रता भी आवश्यक है।
स्वदेशी आंदोलन का राजनीतिक महत्व
बंगाल विभाजन विरोधी आंदोलन ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की राजनीतिक पद्धति में बड़ा परिवर्तन किया।
1885 से विकसित प्रारंभिक कांग्रेस राजनीति मुख्यतः याचिका, प्रस्ताव और संवैधानिक सुधारों तक सीमित थी, लेकिन स्वदेशी आंदोलन में जनता की प्रत्यक्ष भागीदारी बढ़ी।
बहिष्कार, स्वदेशी, राष्ट्रीय शिक्षा और सार्वजनिक आंदोलन जैसे नए राजनीतिक साधन विकसित हुए।
विद्यार्थियों, महिलाओं, व्यापारियों और शहरी मध्यवर्ग के अनेक समूहों ने आंदोलन में भाग लिया।
इस आंदोलन ने आगे उग्र राष्ट्रवाद, क्रांतिकारी गतिविधियों और व्यापक जन-आधारित राष्ट्रीय आंदोलन के विकास के लिए आधार तैयार किया।
उदारवादी और उग्रवादी मतभेद
स्वदेशी आंदोलन के दौरान कांग्रेस के उदारवादी और उग्रवादी नेताओं के बीच राजनीतिक कार्यक्रम और संघर्ष की पद्धति को लेकर मतभेद बढ़ गए।
उदारवादी नेता स्वदेशी को स्वीकार करते थे, लेकिन व्यापक बहिष्कार और अधिक उग्र जन-संघर्ष को लेकर सावधानी बरतना चाहते थे।
उग्रवादी नेता स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और निष्क्रिय प्रतिरोध जैसे साधनों को अधिक व्यापक रूप से लागू करना चाहते थे।
इन मतभेदों ने अंततः 1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस के उदारवादी और उग्रवादी विभाजन का रूप लिया।
बंगाल विभाजन की समाप्ति
लगातार जन-विरोध और स्वदेशी आंदोलन के राजनीतिक प्रभाव के बीच ब्रिटिश सरकार ने अंततः बंगाल के 1905 वाले विभाजन को समाप्त करने का निर्णय लिया।
1911 ई. में ब्रिटिश सरकार ने बंगाल विभाजन को रद्द करने की घोषणा की और बंगाल को पुनर्गठित किया।
इसी पुनर्गठन में बिहार और उड़ीसा को बंगाल से अलग करके नया प्रशासनिक प्रांत बनाने की दिशा अपनाई गई।
1911 में ब्रिटिश भारत की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने की घोषणा भी की गई।
परीक्षा के लिए
1905 — बंगाल विभाजन।
1911 — बंगाल विभाजन रद्द।
1911 — राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने की घोषणा।
महत्वपूर्ण तिथियाँ
| तिथि / वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1903 | बंगाल के पुनर्गठन की प्रस्तावित योजना सार्वजनिक चर्चा में आई |
| जुलाई 1905 | बंगाल विभाजन के अंतिम निर्णय की घोषणा |
| 7 अगस्त 1905 | कलकत्ता टाउन हॉल की ऐतिहासिक सभा; स्वदेशी-बहिष्कार का संगठित आह्वान |
| 16 अक्टूबर 1905 | बंगाल विभाजन लागू |
| 1905 | बनारस कांग्रेस अधिवेशन — गोपालकृष्ण गोखले |
| 1905 | रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा अमार सोनार बांग्ला की रचना स्वदेशी वातावरण से जुड़ी |
| 1906 | कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन — दादाभाई नौरोजी |
| 1907 | सूरत अधिवेशन — उदारवादी और उग्रवादी विभाजन |
| 1911 | 1905 का बंगाल विभाजन रद्द |
परीक्षा में भ्रमित करने वाले तथ्य
बंगाल विभाजन — 1905 — लॉर्ड कर्जन।
विभाजन का निर्णय जुलाई 1905 में घोषित हुआ, जबकि 16 अक्टूबर 1905 से यह लागू हुआ।
नया पूर्वी बंगाल एवं असम प्रांत बनाया गया जिसकी राजधानी ढाका थी।
दूसरे बंगाल प्रांत में पश्चिमी बंगाल के साथ बिहार और उड़ीसा के क्षेत्र सम्मिलित थे और इसका केंद्र कलकत्ता रहा।
7 अगस्त 1905 — कलकत्ता टाउन हॉल स्वदेशी-बहिष्कार आंदोलन से संबंधित अत्यंत महत्वपूर्ण तिथि है।
16 अक्टूबर 1905 बंगाल विभाजन लागू होने की तिथि थी और इसे विरोध में शोक दिवस के रूप में मनाया गया।
1905 बनारस अधिवेशन — गोपालकृष्ण गोखले और स्वदेशी आंदोलन के समर्थन से संबंधित है।
स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और स्वराज को राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट कार्यक्रम के रूप में स्थापित करने वाला महत्वपूर्ण कांग्रेस अधिवेशन 1906 का कलकत्ता अधिवेशन था।
1906 कलकत्ता अधिवेशन — दादाभाई नौरोजी।
दादाभाई नौरोजी ने स्वराज शब्द का पहली बार आविष्कार या प्रयोग नहीं किया था; उन्होंने 1906 में स्वराज को कांग्रेस के राजनीतिक लक्ष्य के रूप में प्रमुखता दी।
प्रतियोगी परीक्षा सामग्री में स्वामी दयानंद सरस्वती को स्वराज शब्द के शुरुआती महत्वपूर्ण प्रयोग से जोड़ा जाता है।
अमार सोनार बांग्ला — रवींद्रनाथ टैगोर — स्वदेशी/बंगाल विभाजन विरोधी वातावरण — बांग्लादेश का राष्ट्रगान।
1911 ई. में 1905 का बंगाल विभाजन रद्द कर दिया गया।
एक नजर में
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| विभाजन कराने वाला वायसराय | लॉर्ड कर्जन |
| वर्ष | 1905 ई. |
| घोषणा | जुलाई 1905 |
| विभाजन लागू | 16 अक्टूबर 1905 |
| पूर्वी प्रांत | पूर्वी बंगाल एवं असम |
| पूर्वी प्रांत की राजधानी | ढाका |
| पश्चिमी प्रांत का केंद्र | कलकत्ता |
| स्वदेशी आंदोलन की महत्वपूर्ण तिथि | 7 अगस्त 1905 |
| स्थान | कलकत्ता टाउन हॉल |
| 1905 कांग्रेस अधिवेशन | बनारस — गोपालकृष्ण गोखले |
| 1906 कांग्रेस अधिवेशन | कलकत्ता — दादाभाई नौरोजी |
| चार प्रमुख कार्यक्रम | स्वराज, स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा |
| अमार सोनार बांग्ला | रवींद्रनाथ टैगोर |
| वर्तमान स्थिति | बांग्लादेश का राष्ट्रगान |
| विभाजन रद्द | 1911 ई. |
अंतिम त्वरित पुनरावृत्ति
लॉर्ड कर्जन के शासनकाल में 1905 ई. में बंगाल का विभाजन किया गया।
बंगाल के पुनर्गठन की योजना 1903 से सार्वजनिक चर्चा में आने लगी थी।
जुलाई 1905 में विभाजन के अंतिम निर्णय की घोषणा हुई।
16 अक्टूबर 1905 से बंगाल का विभाजन प्रभावी हुआ।
विभाजन के बाद पूर्वी बंगाल एवं असम नामक प्रांत बनाया गया जिसकी राजधानी ढाका थी।
दूसरे बंगाल प्रांत में पश्चिमी बंगाल के साथ बिहार और उड़ीसा के क्षेत्र सम्मिलित थे तथा इसका प्रशासनिक केंद्र कलकत्ता था।
भारतीय राष्ट्रवादियों ने विभाजन को ब्रिटिश शासन की फूट डालो और शासन करो नीति के रूप में देखा।
7 अगस्त 1905 को कलकत्ता के टाउन हॉल में ऐतिहासिक सभा आयोजित हुई और स्वदेशी तथा विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का संगठित अभियान आगे बढ़ा।
16 अक्टूबर 1905 को विभाजन लागू होने के दिन व्यापक विरोध और शोक कार्यक्रम आयोजित किए गए।
रवींद्रनाथ टैगोर ने बंगाल की सामाजिक एकता को मजबूत करने के लिए राखी बंधन जैसे प्रतीकात्मक कार्यक्रमों को प्रोत्साहित किया।
स्वदेशी आंदोलन में देशी वस्तुओं का प्रयोग, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता पर बल दिया गया।
1905 के बनारस कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता गोपालकृष्ण गोखले ने की और स्वदेशी आंदोलन को समर्थन मिला।
बंगाल विभाजन विरोधी वातावरण में रवींद्रनाथ टैगोर ने अमार सोनार बांग्ला की रचना की, जिसका प्रारंभिक अंश आगे बांग्लादेश का राष्ट्रगान बना।
1906 का कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता में हुआ।
इस अधिवेशन में स्वराज, स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा राष्ट्रीय आंदोलन के प्रमुख कार्यक्रम बने।
दादाभाई नौरोजी ने स्वराज को कांग्रेस के राजनीतिक लक्ष्य के रूप में प्रमुखता से प्रस्तुत किया।
स्वराज शब्द का प्रयोग दादाभाई नौरोजी से पहले भी मिलता है; प्रतियोगी परीक्षा सामग्री में स्वामी दयानंद सरस्वती को इसके शुरुआती महत्वपूर्ण प्रयोग से जोड़ा जाता है।
आगे बाल गंगाधर तिलक ने स्वराज को अत्यंत लोकप्रिय राष्ट्रवादी राजनीतिक मांग बनाया।
स्वदेशी आंदोलन ने भारतीय उद्योग, राष्ट्रीय शिक्षा, आर्थिक राष्ट्रवाद और जन-भागीदारी को बढ़ावा दिया।
इसी आंदोलन के दौरान कांग्रेस के उदारवादी और उग्रवादी नेताओं के बीच मतभेद बढ़े, जो 1907 के सूरत अधिवेशन में विभाजन में बदल गए।
1911 ई. में 1905 के बंगाल विभाजन को रद्द कर दिया गया।
परीक्षा के लिए मुख्य क्रम है — 1903 प्रस्तावित पुनर्गठन → जुलाई 1905 घोषणा → 7 अगस्त स्वदेशी सभा → 16 अक्टूबर विभाजन लागू → 1906 कलकत्ता अधिवेशन → 1907 सूरत विभाजन → 1911 बंगाल विभाजन रद्द।