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राजा राममोहन राय एवं ब्रह्म समाज से जुड़े सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन

राजा राममोहन राय एवं ब्रह्म समाज से जुड़े सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन

उन्नीसवीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक सुधार

उन्नीसवीं शताब्दी में भारतीय समाज में धार्मिक रूढ़ियों, सामाजिक कुरीतियों, शिक्षा की समस्याओं और स्त्रियों की स्थिति को लेकर अनेक सुधार आंदोलन सामने आए। इन आंदोलनों में राजा राममोहन राय और ब्रह्म समाज का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।

राजा राममोहन राय ने एकेश्वरवाद, आधुनिक शिक्षा, धार्मिक सहिष्णुता, स्त्री अधिकार, सती प्रथा के विरोध और प्रेस की स्वतंत्रता जैसे विषयों पर सक्रिय भूमिका निभाई। उनके बाद देवेंद्रनाथ टैगोर, केशवचंद्र सेन और अन्य सुधारकों ने ब्रह्म समाज तथा उससे जुड़े अनेक आंदोलनों को आगे बढ़ाया।

01

राजा राममोहन राय

राजा राममोहन राय को आधुनिक भारतीय सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक नेताओं में गिना जाता है। उन्हें सामान्यतः भारतीय पुनर्जागरण का जनक कहा जाता है।

उनका जन्म 22 मई 1772 ई. को बंगाल के हुगली जिले के राधानगर गाँव में हुआ था।

उन्होंने संस्कृत, फारसी, अरबी और बाद में अंग्रेजी सहित अनेक भाषाओं का अध्ययन किया। इस कारण वे भारतीय धार्मिक परंपराओं के साथ इस्लामी और यूरोपीय बौद्धिक विचारों से भी परिचित हुए।

परीक्षा के लिए

राजा राममोहन राय — भारतीय पुनर्जागरण का जनक — जन्म 22 मई 1772 — राधानगर, हुगली।

02

एकेश्वरवाद और तुहफत-उल-मुवाहिदीन

राजा राममोहन राय एकेश्वरवाद के समर्थक थे। वे ईश्वर को एक मानते थे और मूर्तिपूजा तथा अत्यधिक कर्मकांड की आलोचना करते थे।

उन्होंने फारसी भाषा में तुहफत-उल-मुवाहिदीन नामक ग्रंथ लिखा, जिसका अर्थ लगभग एकेश्वरवादियों को उपहार है।

इस रचना की तिथि के बारे में पुराने स्रोतों में अंतर मिलता है, लेकिन इसे सामान्यतः 1803–1804 ई. के आसपास की प्रारंभिक रचना माना जाता है। इसलिए इसे निश्चित रूप से 1809 ई. की रचना लिखना सुरक्षित नहीं है।

महत्वपूर्ण

तुहफत-उल-मुवाहिदीन = एकेश्वरवाद संबंधी प्रारंभिक रचना।

03

आत्मीय सभा

राजा राममोहन राय ने अपने धार्मिक और सामाजिक विचारों पर चर्चा के लिए आत्मीय सभा की स्थापना की।

इसकी स्थापना सामान्यतः 1815 ई. से जोड़ी जाती है। आत्मीय सभा में एकेश्वरवाद, सामाजिक सुधार, धार्मिक रूढ़ियों और तर्कसंगत चिंतन पर चर्चा की जाती थी।

यह संस्था आगे चलकर ब्रह्म सभा और ब्रह्म समाज के निर्माण की बौद्धिक पृष्ठभूमि बनी।

04

वेदांत और आधुनिक धार्मिक चिंतन

राजा राममोहन राय ने उपनिषदों और वेदांत के एकेश्वरवादी विचारों को विशेष महत्व दिया। उन्होंने कई उपनिषदों का बंगाली और अंग्रेजी में अनुवाद तथा व्याख्या की।

उनके प्रयासों से वेदांत के एकेश्वरवादी स्वरूप को आधुनिक सामाजिक और धार्मिक सुधार के साथ जोड़ा गया।

पुरानी पुस्तकों में कभी-कभी उनकी गतिविधियों को वेदांत सोसाइटी के नाम से भी उल्लेखित किया जाता है, लेकिन उनकी अधिक स्पष्ट संस्थागत पहचान आत्मीय सभा, ब्रह्म सभा और बाद के ब्रह्म समाज से जुड़ी है।

05

आधुनिक शिक्षा और हिंदू कॉलेज

राजा राममोहन राय आधुनिक पाश्चात्य शिक्षा, विज्ञान और तर्कपूर्ण अध्ययन के समर्थक थे।

कोलकाता में 1817 ई. में हिंदू कॉलेज की स्थापना हुई। इसके निर्माण में डेविड हेयर, राजा राममोहन राय और कलकत्ता के कई शिक्षित तथा संपन्न भारतीयों का समर्थन और योगदान महत्वपूर्ण था।

हिंदू कॉलेज को केवल राजा राममोहन राय और डेविड हेयर द्वारा अकेले स्थापित संस्था कहना पूर्ण रूप से सही नहीं है, क्योंकि इसके पीछे कई भारतीय और यूरोपीय समर्थकों का संयुक्त प्रयास था।

यह संस्था आगे चलकर आधुनिक उच्च शिक्षा के महत्वपूर्ण केंद्रों में से एक बनी।

06

वेदांत कॉलेज

राजा राममोहन राय ने आधुनिक और भारतीय शिक्षा के समन्वय पर बल दिया।

उन्होंने 1825 ई. में वेदांत कॉलेज की स्थापना की। यहाँ भारतीय दर्शन और वेदांत के साथ आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के अध्ययन को महत्व दिया गया।

07

ब्रह्म सभा की स्थापना

राजा राममोहन राय ने 20 अगस्त 1828 ई. को कोलकाता में ब्रह्म सभा की स्थापना की।

यह संस्था आगे चलकर ब्रह्म समाज के नाम से प्रसिद्ध हुई।

ब्रह्म समाज ने एकेश्वरवाद, मूर्तिपूजा-विरोध, जातिगत भेदभाव के विरोध, सामाजिक सुधार और तर्कपूर्ण धार्मिक चिंतन पर बल दिया।

याद रखें

20 अगस्त 1828 — ब्रह्म सभा — राजा राममोहन राय।

08

सती प्रथा के विरुद्ध संघर्ष

राजा राममोहन राय ने सती प्रथा का कड़ा विरोध किया। उन्होंने लेखों, याचिकाओं और सार्वजनिक बहसों के माध्यम से यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि सती हिंदू धर्म का अनिवार्य धार्मिक कर्तव्य नहीं था।

गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिंक ने 1829 ई. में बंगाल प्रेसीडेंसी में सती प्रथा को अवैध घोषित कर दिया।

इस सुधार के पीछे प्रशासनिक निर्णय के साथ राजा राममोहन राय जैसे भारतीय सुधारकों के लंबे सामाजिक अभियान का भी महत्वपूर्ण योगदान था।

परीक्षा के लिए

1829 — सती प्रथा निषेध — लॉर्ड विलियम बेंटिंक — राजा राममोहन राय का समर्थन।

09

पत्रकारिता और प्रेस की स्वतंत्रता

राजा राममोहन राय ने पत्रकारिता को सामाजिक और राजनीतिक सुधार का महत्वपूर्ण माध्यम बनाया।

उन्होंने बंगाली भाषा में संवाद कौमुदी नामक समाचार-पत्र का प्रकाशन किया। इसके माध्यम से सामाजिक सुधार, शिक्षा और सार्वजनिक मुद्दों पर विचार प्रस्तुत किए जाते थे।

उन्होंने फारसी भाषा में मिरात-उल-अखबार भी प्रकाशित किया।

राजा राममोहन राय प्रेस की स्वतंत्रता के समर्थक थे और प्रेस पर सरकारी प्रतिबंधों का विरोध करते थे।

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प्रिसेप्ट्स ऑफ जीसस

राजा राममोहन राय ने ईसाई धर्म के नैतिक उपदेशों का अध्ययन भी किया और प्रिसेप्ट्स ऑफ जीसस नामक रचना प्रकाशित की।

इसमें उन्होंने ईसा मसीह की नैतिक शिक्षाओं की प्रशंसा की, लेकिन चमत्कार और धार्मिक रूढ़ियों की आलोचनात्मक दृष्टि से समीक्षा की।

इस कारण उनके विचारों पर ईसाई मिशनरियों के साथ भी धार्मिक बहस हुई।

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राजा की उपाधि और इंग्लैंड यात्रा

मुगल सम्राट अकबर द्वितीय ने राममोहन राय को राजा की उपाधि प्रदान की।

अकबर द्वितीय ने उन्हें अपने हितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए इंग्लैंड भेजा।

राममोहन राय इंग्लैंड में भारतीय हितों, प्रशासनिक प्रश्नों और सामाजिक सुधारों से जुड़े विषयों पर सक्रिय रहे।

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राजा राममोहन राय की मृत्यु

राजा राममोहन राय की मृत्यु 27 सितंबर 1833 ई. को इंग्लैंड के ब्रिस्टल में हुई।

उनका अंतिम संस्कार और समाधि भी ब्रिस्टल में ही हुई।

परीक्षा के लिए

27 सितंबर 1833 — ब्रिस्टल — राजा राममोहन राय की मृत्यु।

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देवेंद्रनाथ टैगोर

राजा राममोहन राय की मृत्यु के बाद ब्रह्म समाज कुछ समय के लिए कमजोर पड़ा, लेकिन बाद में देवेंद्रनाथ टैगोर के नेतृत्व में उसे नई ऊर्जा मिली।

देवेंद्रनाथ टैगोर ने उपनिषदों और वेदांत पर आधारित धार्मिक चिंतन को महत्व दिया और ब्रह्म समाज की धार्मिक पहचान को व्यवस्थित रूप दिया।

वे रवींद्रनाथ टैगोर के पिता थे।

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तत्त्वबोधिनी सभा

तत्त्वबोधिनी सभा की स्थापना 1839 ई. में देवेंद्रनाथ टैगोर के नेतृत्व में हुई।

यह सभा राजा राममोहन राय के एकेश्वरवादी और सुधारवादी विचारों से प्रभावित थी।

इस संस्था का उद्देश्य उपनिषदों, वेदांत, नैतिक जीवन और तर्कपूर्ण धार्मिक अध्ययन को बढ़ावा देना था।

बाद में तत्त्वबोधिनी सभा और ब्रह्म समाज के बीच घनिष्ठ संबंध स्थापित हो गया।

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केशवचंद्र सेन

केशवचंद्र सेन उन्नीसवीं शताब्दी के प्रमुख ब्रह्म समाज सुधारकों में से एक थे।

वे ब्रह्म समाज में युवा और अधिक सक्रिय सामाजिक सुधारवादी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते थे।

उन्होंने स्त्री शिक्षा, विधवा विवाह, अंतरजातीय विवाह और सामाजिक समानता जैसे विषयों पर जोर दिया।

16

1866 में ब्रह्म समाज का विभाजन

देवेंद्रनाथ टैगोर और केशवचंद्र सेन के बीच धार्मिक और सामाजिक दृष्टिकोण को लेकर मतभेद बढ़ गए।

1866 ई. में ब्रह्म समाज दो प्रमुख भागों में विभाजित हो गया।

देवेंद्रनाथ टैगोर के नेतृत्व वाली पुरानी शाखा को आदि ब्रह्म समाज कहा गया।

केशवचंद्र सेन के नेतृत्व वाली नई शाखा को भारतवर्षीय ब्रह्म समाज अथवा भारत का ब्रह्म समाज कहा गया।

याद रखने का क्रम

आदि ब्रह्म समाज — देवेंद्रनाथ टैगोर भारतवर्षीय ब्रह्म समाज — केशवचंद्र सेन
17

साधारण ब्रह्म समाज

ब्रह्म समाज में आगे भी मतभेद जारी रहे। 1878 ई. में केशवचंद्र सेन की नीतियों से असंतुष्ट सुधारकों ने साधारण ब्रह्म समाज की स्थापना की।

इसके प्रमुख नेताओं में आनंदमोहन बोस, शिवनाथ शास्त्री और द्वारकानाथ गांगुली शामिल थे।

साधारण ब्रह्म समाज ने लोकतांत्रिक संगठन, सामाजिक सुधार और आधुनिक शिक्षा पर विशेष बल दिया।

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वेद समाज

दक्षिण भारत में ब्रह्म समाज के विचारों से प्रभावित होकर वेद समाज का विकास हुआ।

इसकी स्थापना सामान्यतः 1864 ई. में मद्रास में केशवचंद्र सेन के प्रभाव से जोड़ी जाती है।

< strong>के. श्रीधरालु नायडू ने वेद समाज को संगठित और विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

वेद समाज ने एकेश्वरवाद, सामाजिक सुधार, जातिगत भेदभाव के विरोध और आधुनिक धार्मिक चिंतन को बढ़ावा दिया।

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देव समाज

देव समाज की स्थापना 1887 ई. में शिव नारायण अग्निहोत्री ने की।

शिव नारायण अग्निहोत्री इससे पहले ब्रह्म समाज से जुड़े प्रमुख कार्यकर्ताओं में शामिल थे और लगभग 1886 ई. तक ब्रह्म समाज से उनका संबंध रहा।

बाद में उन्होंने स्वतंत्र धार्मिक और सामाजिक सुधार आंदोलन के रूप में देव समाज की स्थापना की।

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धर्म सभा

धर्म सभा की स्थापना 1830 ई. में राधाकांत देव के नेतृत्व में हुई।

यह संस्था उस समय के रूढ़िवादी हिंदू वर्ग के हितों और पारंपरिक धार्मिक प्रथाओं की रक्षा के लिए बनाई गई थी।

धर्म सभा ने विशेष रूप से 1829 में सती प्रथा पर लगाए गए प्रतिबंध का विरोध किया।

इसलिए धर्म सभा को केवल ब्रह्म समाज-विरोधी संगठन कहना पर्याप्त नहीं है; इसका मुख्य उद्देश्य रूढ़िवादी सामाजिक-धार्मिक परंपराओं की रक्षा करना था।

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प्रमुख संस्थाएँ — एक नजर में

संस्था वर्ष प्रमुख व्यक्ति मुख्य उद्देश्य
आत्मीय सभा 1815 राजा राममोहन राय धार्मिक और सामाजिक सुधार
ब्रह्म सभा 1828 राजा राममोहन राय एकेश्वरवाद और सुधार
धर्म सभा 1830 राधाकांत देव रूढ़िवादी धार्मिक परंपराओं की रक्षा
तत्त्वबोधिनी सभा 1839 देवेंद्रनाथ टैगोर वेदांत और सुधारवादी चिंतन
वेद समाज 1864 केशवचंद्र सेन के प्रभाव से; श्रीधरालु नायडू दक्षिण भारत में सामाजिक-धार्मिक सुधार
आदि ब्रह्म समाज 1866 देवेंद्रनाथ टैगोर पुरानी ब्रह्म समाज शाखा
भारतवर्षीय ब्रह्म समाज 1866 केशवचंद्र सेन अधिक सक्रिय सामाजिक सुधार
साधारण ब्रह्म समाज 1878 आनंदमोहन बोस आदि लोकतांत्रिक और सामाजिक सुधार
देव समाज 1887 शिव नारायण अग्निहोत्री स्वतंत्र धार्मिक-सामाजिक सुधार
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परीक्षा में भ्रमित करने वाले तथ्य

राममोहन राय का जन्म — 22 मई 1772 — राधानगर, हुगली।

तुहफत-उल-मुवाहिदीन को निश्चित रूप से 1809 की रचना न मानें; इसे सामान्यतः लगभग 1803–1804 से जोड़ा जाता है।

आत्मीय सभा — 1815 और ब्रह्म सभा — 1828 अलग संस्थाएँ थीं।

ब्रह्म सभा आगे चलकर ब्रह्म समाज के नाम से प्रसिद्ध हुई।

हिंदू कॉलेज कई भारतीय और यूरोपीय समर्थकों के संयुक्त प्रयास का परिणाम था; इसे केवल राममोहन राय और डेविड हेयर की संस्था न समझें।

सती प्रथा निषेध — 1829 — लॉर्ड विलियम बेंटिंक।

आदि ब्रह्म समाज — देवेंद्रनाथ टैगोर और भारतवर्षीय ब्रह्म समाज — केशवचंद्र सेन

धर्म सभा ने सती-निषेध का विरोध किया और रूढ़िवादी परंपराओं की रक्षा की।

वेद समाज — मद्रास, जबकि देव समाज — शिव नारायण अग्निहोत्री से संबंधित है।

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महत्वपूर्ण तिथियाँ

वर्ष घटना
1772 राजा राममोहन राय का जन्म
लगभग 1803–1804 तुहफत-उल-मुवाहिदीन
1815 आत्मीय सभा
1817 हिंदू कॉलेज
1825 वेदांत कॉलेज
20 अगस्त 1828 ब्रह्म सभा की स्थापना
1829 सती प्रथा निषेध
1830 धर्म सभा
27 सितंबर 1833 राजा राममोहन राय की ब्रिस्टल में मृत्यु
1839 तत्त्वबोधिनी सभा
1864 वेद समाज
1866 ब्रह्म समाज का विभाजन
1878 साधारण ब्रह्म समाज
1887 देव समाज

अंतिम त्वरित पुनरावृत्ति

राजा राममोहन राय — भारतीय पुनर्जागरण का जनक — जन्म 22 मई 1772, राधानगर।

तुहफत-उल-मुवाहिदीन — एकेश्वरवाद पर आधारित प्रारंभिक रचना।

1815 — आत्मीय सभा

1817 — हिंदू कॉलेज — आधुनिक शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र।

1825 — वेदांत कॉलेज

20 अगस्त 1828 — ब्रह्म सभा — आगे ब्रह्म समाज।

1829 — सती प्रथा निषेध — लॉर्ड विलियम बेंटिंक; राममोहन राय का सक्रिय समर्थन।

संवाद कौमुदी — बंगाली समाचार-पत्र।

मिरात-उल-अखबार — फारसी समाचार-पत्र।

अकबर द्वितीय ने राममोहन राय को राजा की उपाधि दी।

27 सितंबर 1833 — ब्रिस्टल में राममोहन राय की मृत्यु।

1839 — तत्त्वबोधिनी सभा — देवेंद्रनाथ टैगोर।

1866 — ब्रह्म समाज का विभाजन।

आदि ब्रह्म समाज — देवेंद्रनाथ टैगोर।

भारतवर्षीय ब्रह्म समाज — केशवचंद्र सेन।

1864 — वेद समाज — मद्रास।

1878 — साधारण ब्रह्म समाज।

1887 — देव समाज — शिव नारायण अग्निहोत्री।

1830 — धर्म सभा — राधाकांत देव — सती निषेध का विरोध।

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