ब्रिटिश काल में शिक्षा का विकास
भारत में आधुनिक शिक्षा का विकास
ब्रिटिश शासन के दौरान भारत की शिक्षा व्यवस्था में अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। प्रारंभ में ईस्ट इंडिया कंपनी शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हस्तक्षेप से बचती रही, लेकिन धीरे-धीरे ब्रिटिश सरकार ने शिक्षा संबंधी नीतियाँ बनानी शुरू कीं। चार्टर एक्ट 1813, मैकाले का विवरण-पत्र 1835, वुड का घोषणा-पत्र 1854, हंटर आयोग 1882, रैले आयोग 1902, सैडलर आयोग 1917, हार्टोग समिति 1929, वर्धा योजना 1937 और सार्जेंट योजना 1944 भारतीय शिक्षा के विकास के महत्वपूर्ण पड़ाव रहे।
चार्ल्स ग्रांट और आधुनिक शिक्षा
चार्ल्स ग्रांट भारत में पाश्चात्य शिक्षा के प्रारंभिक समर्थकों में प्रमुख थे। प्रतियोगी परीक्षाओं से संबंधित सामान्य ज्ञान में उन्हें प्रायः “भारत में आधुनिक शिक्षा का जन्मदाता” कहा जाता है।
चार्ल्स ग्रांट ने भारत में पाश्चात्य ज्ञान और अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार का समर्थन किया। उनके विचारों ने आगे चलकर ब्रिटिश सरकार की भारतीय शिक्षा नीति को प्रभावित किया।
परीक्षा के लिए
चार्ल्स ग्रांट → भारत में आधुनिक शिक्षा के प्रारंभिक प्रमुख समर्थक → सामान्य प्रतियोगी परीक्षाओं में “आधुनिक शिक्षा का जन्मदाता”।
चार्टर एक्ट — 1813
चार्टर एक्ट 1813 भारतीय शिक्षा के इतिहास में महत्वपूर्ण पड़ाव था। इसके द्वारा पहली बार ईस्ट इंडिया कंपनी की जिम्मेदारियों में भारतीय शिक्षा को स्पष्ट स्थान मिला।
इस अधिनियम के अंतर्गत भारत में शिक्षा के प्रसार के लिए प्रतिवर्ष एक लाख रुपये की राशि खर्च करने का प्रावधान किया गया।
इसके बाद इस बात को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ कि शिक्षा पर उपलब्ध धन भारतीय परंपरागत शिक्षा और प्राच्य साहित्य पर खर्च किया जाए या पाश्चात्य ज्ञान एवं अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार पर। यह विवाद आगे चलकर प्राच्य-पाश्चात्य विवाद के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
अति महत्वपूर्ण
चार्टर एक्ट 1813 → शिक्षा के लिए प्रतिवर्ष 1 लाख रुपये की राशि का प्रावधान।
मैकाले का विवरण-पत्र — 1835
ब्रिटिश शासन की शिक्षा नीति में निर्णायक परिवर्तन 1835 में आया। उस समय गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिंक था।
थॉमस बैबिंगटन मैकाले ने 2 फरवरी 1835 को अपना प्रसिद्ध शिक्षा संबंधी विवरण-पत्र प्रस्तुत किया। मैकाले पाश्चात्य ज्ञान और अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा देने का समर्थक था।
7 मार्च 1835 को लॉर्ड विलियम बेंटिंक ने मैकाले के विचारों के आधार पर अंग्रेजी शिक्षा को प्रोत्साहित करने वाली नीति को स्वीकृति दी।
इस नीति में उच्च शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रेजी को विशेष महत्व मिला और सरकारी संसाधनों को यूरोपीय विज्ञान एवं साहित्य के प्रसार की दिशा में लगाने पर बल दिया गया।
क्रम याद रखें
चार्टर एक्ट 1813 → प्राच्य-पाश्चात्य विवाद → मैकाले का विवरण-पत्र 1835 → अंग्रेजी एवं पाश्चात्य शिक्षा को बढ़ावा।
वुड का घोषणा-पत्र — 1854
1854 में ब्रिटिश नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष सर चार्ल्स वुड ने भारत की शिक्षा व्यवस्था के संबंध में एक विस्तृत घोषणा-पत्र भेजा। इसे सामान्यतः वुड का घोषणा-पत्र कहा जाता है।
यह घोषणा-पत्र लॉर्ड डलहौजी के शासनकाल में आया था। भारतीय शिक्षा के विकास की व्यापक रूपरेखा प्रस्तुत करने के कारण इसे “भारत में अंग्रेजी शिक्षा का मैग्नाकार्टा” कहा जाता है।
इसमें प्रत्येक प्रांत में लोक शिक्षा विभाग स्थापित करने, शिक्षा संस्थानों को अनुदान देने, शिक्षक-प्रशिक्षण की व्यवस्था करने और शिक्षा के विभिन्न स्तरों के विस्तार की सिफारिश की गई।
प्राथमिक स्तर पर भारतीय भाषाओं तथा उच्च शिक्षा में अंग्रेजी के प्रयोग को महत्व दिया गया।
इसके अंतर्गत कलकत्ता, बंबई और मद्रास में विश्वविद्यालय स्थापित करने की सिफारिश भी की गई। परिणामस्वरूप 1857 में कलकत्ता, बंबई और मद्रास विश्वविद्यालय स्थापित हुए।
वुड के घोषणा-पत्र ने महिला शिक्षा तथा व्यावसायिक एवं तकनीकी शिक्षा को प्रोत्साहन देने की आवश्यकता पर भी बल दिया।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य
वुड का घोषणा-पत्र → 1854 → चार्ल्स वुड → लॉर्ड डलहौजी का काल → भारत में अंग्रेजी शिक्षा का मैग्नाकार्टा।
हंटर शिक्षा आयोग — 1882
1882 में वायसराय लॉर्ड रिपन के शासनकाल में भारतीय शिक्षा की प्रगति की समीक्षा के लिए हंटर शिक्षा आयोग का गठन किया गया।
इस आयोग के अध्यक्ष सर विलियम विल्सन हंटर थे। आयोग ने विशेष रूप से प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की स्थिति का अध्ययन किया।
आयोग ने प्राथमिक शिक्षा के विस्तार पर बल दिया तथा इसके प्रबंधन में स्थानीय निकायों की भूमिका बढ़ाने की सिफारिश की।
माध्यमिक शिक्षा के क्षेत्र में निजी संस्थाओं को प्रोत्साहन देने और अनुदान सहायता की व्यवस्था को बढ़ावा देने की बात कही गई।
हंटर आयोग ने अपनी रिपोर्ट 1883 में प्रस्तुत की, इसलिए इसे कई स्थानों पर 1882–83 का हंटर शिक्षा आयोग भी लिखा जाता है।
याद रखें
हंटर आयोग → 1882 → लॉर्ड रिपन → अध्यक्ष डब्ल्यू. डब्ल्यू. हंटर → प्राथमिक शिक्षा पर विशेष जोर।
रैले विश्वविद्यालय आयोग — 1902
वायसराय लॉर्ड कर्जन के शासनकाल में 1902 में भारतीय विश्वविद्यालयों की स्थिति और कार्यप्रणाली की समीक्षा के लिए एक विश्वविद्यालय आयोग का गठन किया गया।
इस आयोग के अध्यक्ष सर थॉमस रैले थे, इसलिए इसे रैले आयोग कहा जाता है।
आयोग का प्रमुख उद्देश्य भारतीय विश्वविद्यालयों की कार्यप्रणाली का अध्ययन करना और उच्च शिक्षा में सुधार के उपाय सुझाना था।
रैले आयोग की सिफारिशों के आधार पर भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम, 1904 पारित किया गया।
इस अधिनियम के माध्यम से विश्वविद्यालयों के प्रशासन, शिक्षण और संबद्ध महाविद्यालयों पर नियंत्रण को अधिक व्यवस्थित किया गया। साथ ही विश्वविद्यालयों पर सरकारी नियंत्रण भी बढ़ा।
सीधा प्रश्न
रैले आयोग 1902 → लॉर्ड कर्जन → भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम 1904।
सैडलर आयोग — 1917–19
1917 में कलकत्ता विश्वविद्यालय की समस्याओं और उच्च शिक्षा की स्थिति का अध्ययन करने के लिए एक आयोग गठित किया गया। इसके अध्यक्ष माइकल अर्नेस्ट सैडलर थे।
इसे सैडलर विश्वविद्यालय आयोग अथवा कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग के नाम से जाना जाता है।
आयोग ने विश्वविद्यालय शिक्षा की समस्याओं को माध्यमिक शिक्षा से जुड़ा माना और विद्यालयी तथा विश्वविद्यालयी शिक्षा के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया।
इसने विश्वविद्यालय में प्रवेश से पहले लगभग 12 वर्ष की स्कूली शिक्षा की व्यवस्था तथा माध्यमिक शिक्षा के बाद इंटरमीडिएट स्तर को अलग रूप से विकसित करने की सिफारिश की।
सैडलर आयोग ने विश्वविद्यालयों को केवल परीक्षा लेने वाली संस्थाओं तक सीमित न रखकर शिक्षण और अनुसंधान को भी महत्व देने की सिफारिश की।
परीक्षा के लिए
सैडलर आयोग → 1917–19 → कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग → अध्यक्ष माइकल सैडलर।
हार्टोग समिति — 1929
1929 में भारतीय शिक्षा की प्रगति की समीक्षा के लिए सर फिलिप हार्टोग की अध्यक्षता में हार्टोग समिति ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।
समिति ने प्राथमिक शिक्षा के केवल संख्यात्मक विस्तार के स्थान पर उसकी गुणवत्ता में सुधार पर अधिक जोर दिया।
प्राथमिक शिक्षा में विद्यार्थियों के बीच होने वाले अपव्यय और अवरोध अर्थात पढ़ाई बीच में छोड़ने और एक ही कक्षा में लंबे समय तक बने रहने जैसी समस्याओं को कम करने की आवश्यकता बताई गई।
माध्यमिक शिक्षा में विद्यार्थियों की योग्यता और रुचि के अनुसार शिक्षा देने तथा व्यावसायिक एवं औद्योगिक शिक्षा को प्रोत्साहित करने की बात कही गई।
उच्च शिक्षा के अनियंत्रित विस्तार के बजाय योग्य विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा की ओर प्रोत्साहित करने पर बल दिया गया।
मुख्य शब्द
हार्टोग समिति → 1929 → प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता → अपव्यय एवं अवरोध कम करना।
वर्धा शिक्षा योजना — 1937
1937 में महात्मा गांधी ने शिक्षा के क्षेत्र में एक ऐसी व्यवस्था का विचार प्रस्तुत किया जिसमें बच्चों की शिक्षा को उत्पादक कार्य और हस्तशिल्प से जोड़ा जाए।
अक्टूबर 1937 में वर्धा में आयोजित शिक्षा सम्मेलन के बाद इस शिक्षा व्यवस्था को विकसित करने के लिए डॉ. जाकिर हुसैन की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई।
यह योजना वर्धा शिक्षा योजना, बुनियादी शिक्षा अथवा नई तालीम के नाम से प्रसिद्ध हुई।
इस योजना में लगभग 7 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का समर्थन किया गया।
शिक्षा का केंद्र किसी उत्पादक शिल्प या कार्य को बनाने पर जोर दिया गया, ताकि बच्चे पढ़ाई के साथ व्यावहारिक और श्रम आधारित ज्ञान भी प्राप्त करें।
इस व्यवस्था में मातृभाषा को शिक्षा का माध्यम बनाने पर विशेष बल दिया गया।
क्रम याद रखें
महात्मा गांधी → वर्धा सम्मेलन 1937 → डॉ. जाकिर हुसैन समिति → बुनियादी शिक्षा / नई तालीम।
सार्जेंट योजना — 1944
1944 में भारत में युद्धोत्तर शिक्षा के विकास के लिए एक व्यापक शिक्षा योजना प्रस्तुत की गई, जिसे सार्जेंट योजना कहा जाता है।
इस योजना का संबंध तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड से था और इसका नाम शिक्षा सलाहकार सर जॉन सार्जेंट से जुड़ा था।
योजना में पूर्व-प्राथमिक, प्राथमिक, माध्यमिक, उच्च, तकनीकी तथा व्यावसायिक शिक्षा के विकास की व्यापक रूपरेखा प्रस्तुत की गई।
इसमें 6 से 11 वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था पर जोर दिया गया।
इसके साथ प्राथमिक विद्यालयों और माध्यमिक विद्यालयों के विस्तार, शिक्षक-प्रशिक्षण तथा शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार की आवश्यकता बताई गई।
इस योजना का दीर्घकालीन उद्देश्य भारत में ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित करना था जो व्यापक स्तर पर विकसित देशों की शिक्षा व्यवस्था के समकक्ष पहुँच सके।
याद रखें
सार्जेंट योजना → 1944 → युद्धोत्तर शिक्षा योजना → निःशुल्क एवं अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा पर जोर।
महत्वपूर्ण घटनाक्रम
| वर्ष | शिक्षा संबंधी घटना | प्रमुख तथ्य |
|---|---|---|
| 1813 | चार्टर एक्ट | शिक्षा के लिए प्रतिवर्ष 1 लाख रुपये |
| 1835 | मैकाले का विवरण-पत्र | अंग्रेजी एवं पाश्चात्य शिक्षा को बढ़ावा |
| 1854 | वुड का घोषणा-पत्र | भारत में अंग्रेजी शिक्षा का मैग्नाकार्टा |
| 1857 | तीन विश्वविद्यालय | कलकत्ता, बंबई और मद्रास |
| 1882 | हंटर शिक्षा आयोग | प्राथमिक शिक्षा पर विशेष जोर |
| 1902 | रैले आयोग | विश्वविद्यालय शिक्षा की समीक्षा |
| 1904 | भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम | विश्वविद्यालय प्रशासन में सुधार एवं सरकारी नियंत्रण में वृद्धि |
| 1917–19 | सैडलर आयोग | कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग |
| 1929 | हार्टोग समिति | प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता पर जोर |
| 1937 | वर्धा योजना | बुनियादी शिक्षा एवं कार्य आधारित शिक्षण |
| 1944 | सार्जेंट योजना | युद्धोत्तर शिक्षा विकास की व्यापक योजना |
परीक्षा में बार-बार पूछे जाने वाले तथ्य
भारत में आधुनिक शिक्षा का जन्मदाता — प्रतियोगी परीक्षा सामान्य ज्ञान में चार्ल्स ग्रांट।
शिक्षा के लिए प्रतिवर्ष एक लाख रुपये — चार्टर एक्ट 1813।
मैकाले का विवरण-पत्र — 1835, लॉर्ड विलियम बेंटिंक के समय।
भारत में अंग्रेजी शिक्षा का मैग्नाकार्टा — वुड का घोषणा-पत्र, 1854।
वुड का घोषणा-पत्र — लॉर्ड डलहौजी के शासनकाल में।
कलकत्ता, बंबई और मद्रास विश्वविद्यालय — 1857।
हंटर शिक्षा आयोग — 1882, लॉर्ड रिपन के समय।
रैले आयोग — 1902, लॉर्ड कर्जन के समय।
भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम — 1904।
सैडलर आयोग — 1917–19, कलकत्ता विश्वविद्यालय से संबंधित।
हार्टोग समिति — 1929, प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता पर विशेष जोर।
वर्धा शिक्षा योजना — 1937, महात्मा गांधी के बुनियादी शिक्षा संबंधी विचारों पर आधारित।
वर्धा योजना से संबंधित समिति के अध्यक्ष — डॉ. जाकिर हुसैन।
सार्जेंट योजना — 1944, युद्धोत्तर शिक्षा विकास की व्यापक योजना।
अंतिम त्वरित पुनरावृत्ति
चार्ल्स ग्रांट भारत में आधुनिक पाश्चात्य शिक्षा के शुरुआती प्रमुख समर्थकों में थे और प्रतियोगी परीक्षाओं में उन्हें प्रायः आधुनिक शिक्षा के जन्मदाता के रूप में पूछा जाता है।
चार्टर एक्ट 1813 में शिक्षा के लिए प्रतिवर्ष एक लाख रुपये खर्च करने का प्रावधान किया गया।
1835 में मैकाले के विवरण-पत्र के बाद अंग्रेजी और पाश्चात्य शिक्षा को विशेष प्रोत्साहन मिला।
वुड का घोषणा-पत्र 1854 भारतीय शिक्षा की विस्तृत योजना प्रस्तुत करता था और इसे भारत में अंग्रेजी शिक्षा का मैग्नाकार्टा कहा जाता है।
हंटर आयोग 1882 ने प्राथमिक शिक्षा के विस्तार और सुधार पर विशेष बल दिया।
रैले आयोग 1902 की सिफारिशों के बाद भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम 1904 पारित हुआ।
सैडलर आयोग 1917–19 को कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग भी कहा जाता है।
हार्टोग समिति 1929 ने प्राथमिक शिक्षा में गुणवत्ता तथा अपव्यय और अवरोध को कम करने पर जोर दिया।
वर्धा योजना 1937 में बुनियादी, कार्य आधारित तथा मातृभाषा आधारित शिक्षा को महत्व दिया गया।
सार्जेंट योजना 1944 ने भारत में युद्धोत्तर शिक्षा विकास की व्यापक रूपरेखा प्रस्तुत की।
मुख्य क्रम याद रखें — चार्टर एक्ट 1813 → मैकाले 1835 → वुड 1854 → हंटर 1882 → रैले 1902 → विश्वविद्यालय अधिनियम 1904 → सैडलर 1917–19 → हार्टोग 1929 → वर्धा 1937 → सार्जेंट 1944।