\n\n\n\n\n
VidyaGlobe
भारत में आर्थिक नियोजन
ECONOMIC PLANNING IN INDIA

भारत में आर्थिक नियोजन

आर्थिक नियोजन, पंचवर्षीय योजनाएँ, योजना आयोग और नीति आयोग

आर्थिक नियोजन का अर्थ

भारत ने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद गरीबी, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता और आर्थिक पिछड़ेपन जैसी समस्याओं से निपटने के लिए आर्थिक नियोजन को अपनाया। आर्थिक नियोजन का अर्थ उपलब्ध प्राकृतिक, मानव और वित्तीय संसाधनों का योजनाबद्ध ढंग से उपयोग करके निर्धारित समय में आर्थिक तथा सामाजिक लक्ष्यों को प्राप्त करना है।

भारतीय नियोजन का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं था, बल्कि कृषि और उद्योग का विकास, रोजगार के अवसर बढ़ाना, गरीबी कम करना, आत्मनिर्भरता प्राप्त करना, क्षेत्रीय असमानता घटाना और समाज के कमजोर वर्गों तक विकास का लाभ पहुँचाना भी था।

01

भारत में आर्थिक नियोजन की शुरुआत

स्वतंत्रता से पहले विकसित हुई नियोजन की अवधारणा

भारत में आर्थिक नियोजन की विचारधारा स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले ही विकसित होने लगी थी। भारतीय नेताओं, अर्थशास्त्रियों और उद्योगपतियों के बीच यह विचार मजबूत हुआ कि गरीबी और पिछड़ेपन से बाहर निकलने के लिए देश के संसाधनों का योजनाबद्ध उपयोग आवश्यक है।

1934 में मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया ने “प्लान्ड इकोनॉमी फॉर इंडिया” नामक पुस्तक प्रकाशित की। वे प्रसिद्ध इंजीनियर, प्रशासक और अर्थव्यवस्था के योजनाबद्ध औद्योगिक विकास के समर्थक थे। उन्हें केवल उद्योगपति कहना सही नहीं है।

1938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष सुभाष चंद्र बोस की पहल पर राष्ट्रीय योजना समिति का गठन किया गया। इस समिति के अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू बनाए गए। समिति ने कृषि, उद्योग, परिवहन, ऊर्जा और सामाजिक विकास सहित अनेक क्षेत्रों में राष्ट्रीय स्तर पर नियोजन की आवश्यकता पर बल दिया।

1944 में बॉम्बे योजना प्रस्तुत की गई। इसे जे.आर.डी. टाटा, घनश्यामदास बिड़ला, पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास और अन्य प्रमुख उद्योगपतियों से जुड़े समूह ने तैयार किया था। इसमें स्वतंत्र भारत के तीव्र औद्योगिक और आर्थिक विकास के लिए बड़े स्तर पर निवेश की आवश्यकता बताई गई थी।

इसी काल में अन्य वैकल्पिक योजनाएँ भी सामने आईं। एम.एन. रॉय की जन योजना, श्रीमन नारायण की गांधीवादी योजना तथा बाद में जयप्रकाश नारायण की सर्वोदय योजना नियोजन के इतिहास में परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

पी.सी. महालनोबिस ने भारत में नियोजन और विशेष रूप से औद्योगिक विकास की रणनीति को मजबूत वैचारिक आधार दिया। हालांकि उन्हें सीधे 1946 में भारत में नियोजन शुरू करने वाला कहना सही नहीं है। उनका प्रसिद्ध महालनोबिस मॉडल मुख्यतः द्वितीय पंचवर्षीय योजना से जुड़ा है।

15 मार्च 1950 को भारत सरकार ने योजना आयोग की स्थापना की और 1951 में प्रथम पंचवर्षीय योजना शुरू होने के साथ स्वतंत्र भारत में औपचारिक पंचवर्षीय आर्थिक नियोजन आरंभ हुआ।

🎯 महत्वपूर्ण क्रम

1934 — विश्वेश्वरैया 1938 — राष्ट्रीय योजना समिति 1944 — बॉम्बे योजना 1950 — योजना आयोग 1951 — प्रथम पंचवर्षीय योजना

⚠️ भ्रम से बचें

1938 में राष्ट्रीय योजना समिति का गठन सुभाष चंद्र बोस की पहल पर हुआ था, लेकिन इसके अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू थे।

02

योजना आयोग

केंद्रीय आर्थिक नियोजन की प्रमुख संस्था

योजना आयोग की स्थापना 15 मार्च 1950 को भारत सरकार के एक प्रस्ताव द्वारा की गई थी। यह संविधान द्वारा स्थापित संवैधानिक संस्था नहीं थी और न ही संसद के किसी अधिनियम से बनी वैधानिक संस्था थी। इसलिए इसे सामान्यतः गैर-संवैधानिक और गैर-वैधानिक संस्था माना जाता था।

भारत के प्रधानमंत्री योजना आयोग के पदेन अध्यक्ष होते थे। इसके प्रथम अध्यक्ष प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू थे।

योजना आयोग का कार्य देश के उपलब्ध संसाधनों का आकलन करना, विकास की प्राथमिकताएँ निर्धारित करना, पंचवर्षीय योजनाओं का प्रारूप तैयार करना, केंद्र और राज्यों की योजनाओं में समन्वय स्थापित करना तथा योजनाओं की प्रगति का मूल्यांकन करना था।

योजना आयोग का व्यापक उद्देश्य देश के संसाधनों का अधिकतम और संतुलित उपयोग करके आर्थिक वृद्धि, सामाजिक न्याय, आत्मनिर्भरता और संतुलित क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देना था।

भारत ने मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया, इसलिए नियोजन में सार्वजनिक क्षेत्र के साथ निजी क्षेत्र की भूमिका भी बनी रही। बाद के वर्षों में समाजवादी समाज की स्थापना का विचार विशेष रूप से 1950 के दशक में राष्ट्रीय नीति का महत्वपूर्ण आधार बना।

03

भारत की पंचवर्षीय योजनाएँ

1951 से 2017 तक नियोजन का क्रम

भारत में कुल 12 पंचवर्षीय योजनाएँ लागू की गईं। पहली योजना 1951 में शुरू हुई और बारहवीं योजना की अवधि 2012 से 2017 तक रही।

तेरहवीं पंचवर्षीय योजना नहीं बनाई गई। योजना आयोग के स्थान पर 2015 में नीति आयोग की स्थापना के बाद पंचवर्षीय योजना प्रणाली को आगे जारी नहीं रखा गया।

पंचवर्षीय योजनाओं के बीच दो महत्वपूर्ण अवधियाँ ऐसी भी रहीं जब नियमित पंचवर्षीय योजना लागू नहीं थी—1966–69 का योजना अवकाश और 1990–92 की वार्षिक योजनाएँ

04

प्रथम पंचवर्षीय योजना

1951–1956

प्रथम पंचवर्षीय योजना 1951 से 1956 तक चली। इस योजना की रणनीति पर हैरॉड–डोमर वृद्धि मॉडल का प्रभाव माना जाता है।

स्वतंत्रता के प्रारंभिक वर्षों में देश खाद्यान्न की कमी, शरणार्थी पुनर्वास, महँगाई और कमजोर कृषि उत्पादन जैसी समस्याओं से जूझ रहा था। इसलिए प्रथम योजना में कृषि, सिंचाई, बिजली और ग्रामीण विकास को सबसे अधिक प्राथमिकता दी गई।

बड़ी सिंचाई और नदी-घाटी परियोजनाओं को इस योजना में विशेष महत्व मिला। भाखड़ा-नांगल और दामोदर घाटी परियोजना जैसी परियोजनाओं को प्रथम योजना के दौरान बड़ा प्रोत्साहन मिला। हालांकि इन परियोजनाओं की शुरुआत प्रथम योजना से पहले हो चुकी थी, इसलिए इन्हें केवल “प्रथम पंचवर्षीय योजना में शुरू हुई परियोजनाएँ” कहना पूरी तरह सही नहीं है।

व्यास परियोजना का प्रमुख निर्माण चरण बाद के वर्षों में विकसित हुआ, इसलिए इसे भी प्रथम योजना में शुरू हुई परियोजना के रूप में याद करना उचित नहीं है।

प्रथम योजना में राष्ट्रीय आय और कृषि उत्पादन में अपेक्षा से बेहतर वृद्धि दर्ज हुई। योजना की लक्षित वार्षिक वृद्धि लगभग 2.1 प्रतिशत थी, जबकि वास्तविक वृद्धि लगभग 3.6 प्रतिशत रही।

🎯 परीक्षा बिंदु

प्रथम योजना — कृषि एवं सिंचाई — हैरॉड–डोमर मॉडल — लक्ष्य 2.1% — उपलब्धि लगभग 3.6%

05

द्वितीय पंचवर्षीय योजना

1956–1961

द्वितीय पंचवर्षीय योजना 1956 से 1961 तक चली और यह मुख्यतः पी.सी. महालनोबिस के विकास मॉडल पर आधारित थी।

इस योजना का मुख्य उद्देश्य तेजी से औद्योगिकीकरण करना तथा भारी और आधारभूत उद्योगों को विकसित करना था। सार्वजनिक क्षेत्र को औद्योगिक विकास का प्रमुख आधार बनाया गया और मशीन निर्माण, इस्पात, भारी इंजीनियरिंग तथा आधारभूत संरचना में बड़े निवेश किए गए।

इस योजना के दौरान भिलाई, राउरकेला और दुर्गापुर इस्पात संयंत्र स्थापित किए गए। भिलाई संयंत्र सोवियत संघ, राउरकेला पश्चिम जर्मनी और दुर्गापुर ब्रिटेन के सहयोग से स्थापित हुआ।

द्वितीय योजना की लक्षित वार्षिक वृद्धि लगभग 4.5 प्रतिशत थी और वास्तविक वृद्धि लगभग 4.2 से 4.3 प्रतिशत के आसपास रही।

🎯 याद रखें

द्वितीय योजना — महालनोबिस मॉडल — भारी उद्योग — सार्वजनिक क्षेत्र — भिलाई, राउरकेला, दुर्गापुर

06

तृतीय पंचवर्षीय योजना

1961–1966

तृतीय पंचवर्षीय योजना 1961 से 1966 तक चली। इसका प्रमुख उद्देश्य भारतीय अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर और स्वावलंबी बनाना था। कृषि उत्पादन बढ़ाने के साथ उद्योग के विस्तार पर भी ध्यान दिया गया।

कुछ परीक्षा पुस्तकों में इस योजना को सैंडी–चक्रवर्ती–महालनोबिस जैसे मॉडल नामों से जोड़ दिया जाता है, लेकिन आधिकारिक पंचवर्षीय योजना इतिहास में तृतीय योजना के लिए ऐसा एक सर्वमान्य मॉडल नाम निर्धारित नहीं है। परीक्षा में इसके मुख्य उद्देश्य—आत्मनिर्भरता और कृषि विकास—को प्राथमिक रूप से याद रखना अधिक सुरक्षित है।

तृतीय योजना को गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। 1962 का भारत-चीन युद्ध, 1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध और 1965–66 का गंभीर सूखा अर्थव्यवस्था और कृषि उत्पादन के लिए बड़े झटके साबित हुए।

इन परिस्थितियों के कारण योजना अपने विकास लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकी। लक्षित वार्षिक वृद्धि लगभग 5.6 प्रतिशत थी, जबकि पुराने योजना आँकड़ों में वास्तविक वृद्धि लगभग 2.4 से 2.8 प्रतिशत के बीच बताई जाती है। अलग-अलग आधार-वर्ष और आँकड़ा-श्रृंखलाओं के कारण इसमें थोड़ा अंतर मिलता है।

07

योजना अवकाश

1966–1969

तृतीय पंचवर्षीय योजना के बाद तत्काल चौथी पंचवर्षीय योजना शुरू नहीं की गई। 1966 से 1969 के बीच तीन वार्षिक योजनाएँ लागू की गईं। इस अवधि को सामान्यतः योजना अवकाश कहा जाता है।

इस अवधि में कृषि और खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाना सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता बन गया। नई उच्च उपज वाली बीज प्रजातियाँ, सिंचाई, रासायनिक उर्वरक और आधुनिक कृषि तकनीक के प्रयोग ने भारत में हरित क्रांति को गति दी।

भारत में हरित क्रांति से सबसे प्रमुख रूप से जुड़े कृषि वैज्ञानिक एम.एस. स्वामीनाथन माने जाते हैं, जबकि विश्व स्तर पर हरित क्रांति के प्रमुख प्रवर्तक नॉर्मन बोरलॉग थे।

📗 महत्वपूर्ण

1966–69 = तीन वार्षिक योजनाएँ = योजना अवकाश

08

चतुर्थ पंचवर्षीय योजना

1969–1974

चतुर्थ पंचवर्षीय योजना 1969 से 1974 तक चली। इसका मुख्य उद्देश्य विकास के साथ स्थिरता तथा आत्मनिर्भरता की क्रमिक प्राप्ति था।

गरीबी और आर्थिक असमानता इस समय महत्वपूर्ण राजनीतिक और आर्थिक मुद्दे थे, लेकिन चौथी योजना को केवल गरीबी उन्मूलन योजना कहना अधूरा होगा। गरीबी हटाने को अधिक स्पष्ट केंद्रीय लक्ष्य पंचम योजना में बनाया गया।

1969 में 14 प्रमुख वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। इसी वर्ष भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन—इसरो की स्थापना भी हुई। ये दोनों घटनाएँ चौथी योजना की अवधि के आरंभिक वर्ष से संबंधित हैं।

इस योजना की लक्षित वार्षिक वृद्धि लगभग 5.7 प्रतिशत और वास्तविक वृद्धि लगभग 3.3 प्रतिशत रही।

09

पंचम पंचवर्षीय योजना

1974–1979

पंचम पंचवर्षीय योजना 1974 में शुरू हुई और इसकी रणनीति तैयार करने में डी.पी. धर की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

इस योजना के दो प्रमुख उद्देश्य गरीबी उन्मूलन और आत्मनिर्भरता थे। समाज के कमजोर वर्गों तक विकास के लाभ पहुँचाने पर विशेष जोर दिया गया।

“गरीबी हटाओ” इंदिरा गांधी का प्रसिद्ध राजनीतिक नारा था, जो 1971 के आम चुनाव से ही प्रमुख रूप से प्रयोग में आ चुका था। इसलिए यह कहना सही नहीं है कि यह नारा पहली बार पंचम पंचवर्षीय योजना में दिया गया था। हाँ, गरीबी उन्मूलन पंचम योजना का प्रमुख लक्ष्य अवश्य था।

इस योजना की लक्षित वार्षिक वृद्धि लगभग 4.4 प्रतिशत थी और वास्तविक वृद्धि लगभग 4.8 प्रतिशत रही।

जनता पार्टी सरकार ने 1978 में पंचम योजना को निर्धारित समय से पहले समाप्त कर दिया। इसके बाद नई सरकार ने रोलिंग प्लान की अवधारणा अपनाई।

⚠️ महत्वपूर्ण सुधार

“गरीबी हटाओ” नारा 1971 से जुड़ा है; पंचम योजना 1974 में शुरू हुई।

10

रोलिंग प्लान

1978–1980

1978 से 1980 के बीच जनता पार्टी सरकार ने रोलिंग प्लान की व्यवस्था अपनाई। रोलिंग प्लान में योजना को हर वर्ष परिस्थितियों और उपलब्ध संसाधनों के आधार पर संशोधित किया जा सकता था।

इसे केवल एक-एक वर्ष की अलग योजना समझना सही नहीं है। इसकी विशेषता यह थी कि दीर्घकालीन योजना के लक्ष्यों और वार्षिक योजना के बीच निरंतर संशोधन की व्यवस्था रहती थी।

1980 में नई सरकार आने के बाद रोलिंग प्लान को समाप्त कर पुनः नियमित पंचवर्षीय योजना प्रणाली अपनाई गई।

11

षष्ठ पंचवर्षीय योजना

1980–1985

षष्ठ पंचवर्षीय योजना 1980 से 1985 तक चली। इस योजना का उद्देश्य आर्थिक वृद्धि के साथ गरीबी और बेरोजगारी कम करना, तकनीकी आधुनिकीकरण, ऊर्जा विकास और आत्मनिर्भरता को मजबूत करना था।

कुछ परीक्षा पुस्तकों में इसे आगत-निर्गत मॉडल से जोड़ा जाता है, लेकिन यह नाम योजना का सर्वमान्य आधिकारिक परिचय नहीं है। परीक्षा में इसके वास्तविक उद्देश्यों को प्राथमिकता देना अधिक उचित है।

कृषि, उद्योग, आधारभूत संरचना, ऊर्जा तथा सामाजिक विकास पर एक साथ ध्यान दिया गया।

1982 में राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक—नाबार्ड की स्थापना हुई। इसलिए नाबार्ड की स्थापना षष्ठ योजना की अवधि में हुई थी।

इस योजना की लक्षित वार्षिक वृद्धि लगभग 5.2 प्रतिशत और वास्तविक वृद्धि लगभग 5.7 प्रतिशत रही।

12

सप्तम पंचवर्षीय योजना

1985–1990

सप्तम पंचवर्षीय योजना 1985 से 1990 तक चली। इसका प्रसिद्ध मूल मंत्र खाद्य, कार्य और उत्पादकता से जुड़ा था।

कृषि उत्पादन, रोजगार, उत्पादकता, औद्योगिक विकास, तकनीकी आधुनिकीकरण और सामाजिक न्याय पर जोर दिया गया।

सरकारी वित्त और बाहरी उधारी से जुड़ी समस्याएँ इस दौर में बढ़ीं, इसलिए यह कहना अधिक सही है कि योजना के अंत तक राजकोषीय और भुगतान संतुलन की चुनौतियाँ गंभीर होने लगीं, न कि इसका मुख्य उद्देश्य केवल उधारी कम करना था।

इस योजना की लक्षित वार्षिक वृद्धि लगभग 5 प्रतिशत थी। वास्तविक वृद्धि लगभग 6 प्रतिशत के आसपास रही और लक्ष्य से अधिक थी।

13

1990–1992 की वार्षिक योजनाएँ

राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता का काल

1990 से 1992 के बीच नियमित आठवीं पंचवर्षीय योजना शुरू नहीं की जा सकी। राजनीतिक अस्थिरता और गंभीर आर्थिक संकट के कारण इस अवधि में दो वार्षिक योजनाएँ लागू की गईं।

1991 में भारत ने गंभीर भुगतान संतुलन संकट का सामना किया और इसी पृष्ठभूमि में उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण से जुड़े व्यापक आर्थिक सुधार शुरू हुए।

इसके बाद 1992 में आठवीं पंचवर्षीय योजना शुरू की गई।

14

आठवीं पंचवर्षीय योजना

1992–1997

आठवीं पंचवर्षीय योजना 1992 से 1997 तक चली। यह 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद शुरू होने वाली पहली पंचवर्षीय योजना थी।

इस योजना में मानव विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी में कमी और आर्थिक आधुनिकीकरण को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया। साथ ही उदारीकरण और बढ़ती निजी क्षेत्र की भूमिका के अनुरूप आर्थिक नीतियों को आगे बढ़ाया गया।

कुछ सामान्य अध्ययन पुस्तकों में इसे मिलर मॉडल से जोड़ दिया जाता है, लेकिन आधिकारिक भारतीय योजना दस्तावेजों में आठवीं योजना को इस नाम से मानकीकृत नहीं किया गया है। इसलिए इस मॉडल नाम को अनिवार्य तथ्य के रूप में याद करना उचित नहीं है।

इस योजना की लक्षित वार्षिक वृद्धि लगभग 5.6 प्रतिशत थी, जबकि वास्तविक वृद्धि लगभग 6.7 से 6.8 प्रतिशत रही।

15

नवम पंचवर्षीय योजना

1997–2002

नवम पंचवर्षीय योजना 1997 से 2002 तक चली। इसका प्रमुख उद्देश्य सामाजिक न्याय और समानता के साथ विकास था।

कृषि और ग्रामीण विकास, रोजगार, गरीबी उन्मूलन, आधारभूत सेवाएँ, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा क्षेत्रीय संतुलन पर जोर दिया गया।

कुछ अध्ययन सामग्रियों में इस योजना को आगत-निर्गत मॉडल से जोड़कर प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन यह नवम योजना का सर्वमान्य आधिकारिक मॉडल नाम नहीं है।

इस योजना की लक्षित वार्षिक वृद्धि लगभग 6.5 प्रतिशत थी, जबकि वास्तविक वृद्धि लगभग 5.4 से 5.5 प्रतिशत के आसपास रही।

16

दसवीं पंचवर्षीय योजना

2002–2007

दसवीं पंचवर्षीय योजना 2002 से 2007 तक चली। इसका प्रमुख लक्ष्य तेज आर्थिक वृद्धि के साथ गरीबी कम करना और मानव विकास में सुधार करना था।

योजना में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, लैंगिक अंतर में कमी तथा राज्यों के बीच विकास अंतर कम करने के लिए मापनीय लक्ष्य निर्धारित किए गए।

आधुनिक तकनीक, आधारभूत संरचना और निजी निवेश की भूमिका भी इस दौर में लगातार बढ़ी।

दसवीं योजना ने औसत वार्षिक आर्थिक वृद्धि का लक्ष्य 8 प्रतिशत निर्धारित किया था। अलग-अलग राष्ट्रीय आय श्रृंखलाओं के कारण वास्तविक वृद्धि के आँकड़ों में थोड़ा अंतर मिलता है, लेकिन सामान्य परीक्षा सामग्री में इसे लगभग 7.5 से 7.7 प्रतिशत के आसपास माना जाता है।

17

ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना

2007–2012

ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना 2007 से 2012 तक चली। इसका केंद्रीय विचार तेज और अधिक समावेशी विकास था।

योजना में शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल, रोजगार, कृषि, ग्रामीण विकास और सामाजिक क्षेत्र पर विशेष ध्यान दिया गया ताकि तेज आर्थिक वृद्धि का लाभ समाज के कमजोर और पिछड़े वर्गों तक पहुँच सके।

गरीबी और आर्थिक असमानता को कम करना तथा विकास में क्षेत्रीय संतुलन स्थापित करना भी इसके प्रमुख उद्देश्यों में शामिल था।

इस योजना का प्रारंभिक औसत वार्षिक वृद्धि लक्ष्य लगभग 9 प्रतिशत था। वास्तविक वृद्धि के लिए अलग-अलग आधार-वर्ष वाली राष्ट्रीय आय श्रृंखलाओं में लगभग 8 प्रतिशत से कुछ अधिक आँकड़े मिलते हैं। इसलिए 8.3 प्रतिशत को एकमात्र अपरिवर्तनीय आँकड़ा मानना उचित नहीं है।

18

बारहवीं पंचवर्षीय योजना

2012–2017

बारहवीं पंचवर्षीय योजना 2012 से 2017 तक चली और यह भारत की अंतिम पंचवर्षीय योजना थी।

इस योजना का आधिकारिक केंद्रीय लक्ष्य तेज, अधिक समावेशी और टिकाऊ विकास था। आर्थिक वृद्धि के साथ रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा, आधारभूत संरचना, पर्यावरणीय स्थिरता और बेहतर शासन पर जोर दिया गया।

इस योजना को केवल आत्मनिर्भरता और समाजवादी विकास पर केंद्रित योजना कहना पर्याप्त नहीं है। पर्यावरणीय स्थिरता और समावेशी विकास इसकी प्रमुख विशेषताएँ थीं।

नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, पर्यावरण संरक्षण और आधुनिक तकनीक को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया।

बारहवीं योजना के अंतिम स्वीकृत दस्तावेज में औसत वार्षिक आर्थिक वृद्धि का लक्ष्य लगभग 8 प्रतिशत रखा गया था। इसलिए 9 प्रतिशत लक्ष्य लिखना सही नहीं है। इस अवधि की वास्तविक वृद्धि भी 8 प्रतिशत नहीं रही; राष्ट्रीय आय के संशोधित आधार-वर्ष के अनुसार औसत वृद्धि लगभग 7 प्रतिशत के आसपास रही।

बारहवीं योजना की अवधि के दौरान ही 2015 में योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग का गठन किया गया। इसके बावजूद बारहवीं योजना की निर्धारित अवधि 2017 तक मानी जाती है।

⚠️ अत्यंत महत्वपूर्ण

बारहवीं योजना — 2012–17 — तेज, अधिक समावेशी और टिकाऊ विकास — लक्ष्य लगभग 8%, न कि 9%

19

पंचवर्षीय योजनाओं का सार

एक नज़र में पूरी योजना व्यवस्था

योजना अवधि मुख्य प्राथमिकता
प्रथम 1951–56 कृषि, सिंचाई और ग्रामीण विकास
द्वितीय 1956–61 भारी उद्योग और औद्योगिकीकरण
तृतीय 1961–66 आत्मनिर्भरता और कृषि
योजना अवकाश 1966–69 वार्षिक योजनाएँ और कृषि
चतुर्थ 1969–74 विकास के साथ स्थिरता और आत्मनिर्भरता
पंचम 1974–78 गरीबी उन्मूलन और आत्मनिर्भरता
रोलिंग प्लान 1978–80 हर वर्ष संशोधित होने वाली योजना व्यवस्था
षष्ठ 1980–85 गरीबी, रोजगार, आधुनिकीकरण और आत्मनिर्भरता
सप्तम 1985–90 खाद्य, कार्य और उत्पादकता
वार्षिक योजनाएँ 1990–92 आर्थिक और राजनीतिक संकट का काल
आठवीं 1992–97 मानव विकास और आर्थिक सुधार
नवम 1997–2002 सामाजिक न्याय और समानता के साथ विकास
दसवीं 2002–07 तेज वृद्धि और गरीबी में कमी
ग्यारहवीं 2007–12 तेज और अधिक समावेशी विकास
बारहवीं 2012–17 तेज, समावेशी और टिकाऊ विकास
20

योजना आयोग से नीति आयोग

भारतीय नियोजन व्यवस्था में परिवर्तन

1 जनवरी 2015 को भारत सरकार ने योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग का गठन किया।

नीति आयोग का पूरा नाम राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्थान है। यह केंद्र सरकार का प्रमुख सार्वजनिक नीति संस्थान और विचार मंच है।

योजना आयोग की व्यवस्था अपेक्षाकृत ऊपर से नीचे की ओर योजना निर्धारण पर आधारित थी, जबकि नीति आयोग में राज्यों की सक्रिय भागीदारी तथा नीचे से ऊपर की ओर दृष्टिकोण को अधिक महत्व दिया गया।

नीति आयोग का उद्देश्य सहकारी संघवाद को बढ़ावा देना है, अर्थात केंद्र और राज्य सरकारें राष्ट्रीय विकास के लिए साझेदारी से काम करें।

यह दीर्घकालीन नीति, रणनीतिक दिशा, नवाचार, सतत विकास, राज्यों के साथ समन्वय और विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों की निगरानी तथा मूल्यांकन में भूमिका निभाता है।

21

योजना आयोग और नीति आयोग में अंतर

परीक्षा में बार-बार पूछा जाने वाला अंतर

आधार योजना आयोग नीति आयोग
स्थापना 15 मार्च 1950 1 जनवरी 2015
मुख्य भूमिका पंचवर्षीय योजनाएँ तैयार करना नीति और रणनीतिक सलाह देना
दृष्टिकोण केंद्र-प्रधान नियोजन राज्यों की अधिक भागीदारी
संघवाद केंद्र की मजबूत भूमिका सहकारी संघवाद पर जोर
योजना निधि योजना संसाधन आवंटन में महत्वपूर्ण भूमिका राज्यों को योजना निधि आवंटित करने वाली संस्था नहीं
पंचवर्षीय योजना तैयार करता था पंचवर्षीय योजना तैयार नहीं करता
22

भारत में नियोजन की विशेषताएँ

भारतीय विकास मॉडल की प्रमुख विशेषताएँ

मिश्रित अर्थव्यवस्था: भारत में सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों को अर्थव्यवस्था में स्थान दिया गया। आधारभूत और रणनीतिक क्षेत्रों में सरकार की बड़ी भूमिका रही, जबकि निजी क्षेत्र भी उत्पादन और निवेश में सक्रिय रहा।

सामाजिक न्याय की दिशा: आर्थिक नियोजन का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं था, बल्कि गरीबी और असमानता कम करके विकास का लाभ व्यापक समाज तक पहुँचाना भी था।

निर्धारित अवधि और लक्ष्य: पंचवर्षीय योजनाओं में पाँच वर्ष की अवधि के लिए कृषि, उद्योग, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक वृद्धि जैसे क्षेत्रों के लक्ष्य निर्धारित किए जाते थे।

संतुलित क्षेत्रीय विकास: पिछड़े राज्यों और क्षेत्रों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना तथा क्षेत्रीय विषमताएँ कम करना नियोजन का महत्वपूर्ण उद्देश्य रहा।

मानव विकास पर बल: शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, रोजगार और सामाजिक कल्याण को भी आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया।

लोकतांत्रिक नियोजन: भारत ने सोवियत शैली की पूर्ण केंद्रीकृत अर्थव्यवस्था नहीं अपनाई। नियोजन लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था और मिश्रित अर्थव्यवस्था के भीतर संचालित हुआ।

23

आर्थिक नियोजन के उद्देश्य

भारतीय योजनाओं के प्रमुख लक्ष्य

गरीबी हटाना: आर्थिक विकास का लाभ गरीब और कमजोर वर्गों तक पहुँचाकर उनके जीवन स्तर में सुधार करना।

बेरोजगारी कम करना: कृषि, उद्योग, सेवा क्षेत्र और ग्रामीण विकास के माध्यम से रोजगार के अवसर बढ़ाना।

आर्थिक वृद्धि बढ़ाना: राष्ट्रीय आय, उत्पादन और प्रति व्यक्ति आय में लगातार वृद्धि करना।

सामाजिक और क्षेत्रीय असमानता घटाना: आय तथा अवसरों की असमानता कम करना और पिछड़े क्षेत्रों को आगे बढ़ाना।

आत्मनिर्भरता: आवश्यक वस्तुओं, कृषि, उद्योग और तकनीक में विदेशी निर्भरता कम करना।

आधुनिकीकरण: नई तकनीक, वैज्ञानिक पद्धतियों और आधुनिक उत्पादन प्रणाली को अपनाना।

औद्योगिक विकास: आधारभूत, भारी और आधुनिक उद्योगों का विकास करना।

सामाजिक न्याय: विकास के अवसर समाज के सभी वर्गों तक पहुँचाना।

24

आर्थिक नियोजन की उपलब्धियाँ

स्वतंत्र भारत की प्रमुख विकास उपलब्धियाँ

कृषि विकास: सिंचाई, उर्वरक, उच्च उपज वाले बीज और हरित क्रांति के कारण भारत खाद्यान्न उत्पादन में काफी हद तक आत्मनिर्भर बना।

औद्योगिकीकरण: स्वतंत्रता के समय सीमित औद्योगिक आधार से आगे बढ़ते हुए इस्पात, मशीन निर्माण, ऊर्जा, इंजीनियरिंग, पेट्रोकेमिकल और अन्य उद्योगों का विस्तार हुआ।

आधारभूत संरचना: बिजली, सिंचाई, सड़क, रेल, परिवहन, दूरसंचार और ऊर्जा क्षमता में बड़े पैमाने पर वृद्धि हुई।

मानव संसाधन विकास: शिक्षा, उच्च शिक्षा, तकनीकी संस्थानों, स्वास्थ्य सेवाओं और कौशल विकास का विस्तार हुआ।

गरीबी में कमी: दीर्घ अवधि में गरीबी के अनुपात में कमी आई, हालांकि गरीबी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।

आर्थिक विविधीकरण: भारतीय अर्थव्यवस्था कृषि-प्रधान संरचना से आगे बढ़कर उद्योग और सेवा क्षेत्र में व्यापक रूप से विकसित हुई।

25

आर्थिक नियोजन की चुनौतियाँ

योजनाओं के सामने प्रमुख समस्याएँ

क्रियान्वयन की कमजोरी: कई योजनाओं में लक्ष्य अच्छे थे, लेकिन जमीन पर उनका कार्यान्वयन अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच पाया।

भ्रष्टाचार और लालफीताशाही: प्रशासनिक जटिलता, परियोजनाओं में देरी और भ्रष्टाचार के कारण संसाधनों का पूर्ण उपयोग नहीं हो पाया।

क्षेत्रीय विषमता: देश के सभी राज्यों और क्षेत्रों में विकास समान गति से नहीं हुआ। कुछ क्षेत्र तेजी से आगे बढ़े जबकि अनेक क्षेत्र पीछे रह गए।

बेरोजगारी: तेज आर्थिक वृद्धि के बावजूद पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण रोजगार पैदा करना लगातार चुनौती बना रहा।

आर्थिक असमानता: आय और संपत्ति के वितरण में असमानता बनी रही तथा आर्थिक सुधारों के बाद कुछ क्षेत्रों और वर्गों के बीच अंतर बढ़ने की चिंता भी सामने आई।

गरीबी और सामाजिक विषमता: योजनाओं से गरीबी में कमी आई, लेकिन सामाजिक और आर्थिक वंचना पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी।

26

महत्वपूर्ण भ्रम और सही तथ्य

परीक्षा में गलती से बचने के लिए

राष्ट्रीय योजना समिति: गठन की पहल सुभाष चंद्र बोस ने की; अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू थे।

महालनोबिस: उनकी प्रमुख योजना भूमिका द्वितीय पंचवर्षीय योजना और भारी उद्योग आधारित विकास मॉडल से जुड़ी है; उन्हें 1946 में भारतीय नियोजन का औपचारिक संस्थापक कहना सही नहीं है।

भाखड़ा-नांगल और दामोदर घाटी: प्रथम योजना में इन्हें विशेष महत्व मिला, लेकिन दोनों की शुरुआत प्रथम योजना से पहले हो चुकी थी।

व्यास परियोजना: इसका प्रमुख विकास बाद की अवधि में हुआ; इसे प्रथम पंचवर्षीय योजना की शुरुआत वाली परियोजना न मानें।

तृतीय योजना: इसके लिए कोई एक सर्वमान्य “सैंडी–चक्रवर्ती–महालनोबिस मॉडल” आधिकारिक नाम नहीं है।

चतुर्थ योजना: इसका मुख्य लक्ष्य विकास के साथ स्थिरता और आत्मनिर्भरता था, न कि केवल गरीबी उन्मूलन।

गरीबी हटाओ: नारा 1971 के चुनाव से जुड़ा है; पंचम योजना का प्रमुख उद्देश्य गरीबी उन्मूलन था।

रोलिंग प्लान: यह केवल लगातार एक-वर्षीय योजनाएँ नहीं थीं, बल्कि ऐसी योजना प्रणाली थी जिसे हर वर्ष संशोधित किया जा सकता था।

आठवीं योजना: “मिलर मॉडल” आधिकारिक और सर्वमान्य मॉडल नाम नहीं है।

नवम योजना: “आगत-निर्गत मॉडल” को इसका आधिकारिक प्रमुख मॉडल नाम नहीं माना जाता।

बारहवीं योजना: लक्ष्य लगभग 8 प्रतिशत था; 9 प्रतिशत लिखना सही नहीं है।

27

त्वरित पुनरावृत्ति

एक क्रम में पूरी योजना व्यवस्था

⚡ याद रखने का क्रम

प्रथम — कृषि द्वितीय — उद्योग तृतीय — आत्मनिर्भरता योजना अवकाश चतुर्थ — स्थिरता पंचम — गरीबी रोलिंग प्लान षष्ठ — गरीबी व आधुनिकीकरण सप्तम — खाद्य, कार्य, उत्पादकता
आठवीं — मानव विकास नवम — सामाजिक न्याय दसवीं — तेज वृद्धि ग्यारहवीं — समावेशी विकास बारहवीं — टिकाऊ विकास

⚡ अंतिम पुनरावृत्ति बिंदु

1934 — एम. विश्वेश्वरैया — “प्लान्ड इकोनॉमी फॉर इंडिया”।

1938 — सुभाष चंद्र बोस की पहल पर राष्ट्रीय योजना समिति; अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू।

1944 — बॉम्बे योजना।

15 मार्च 1950 — योजना आयोग की स्थापना।

1951 — प्रथम पंचवर्षीय योजना की शुरुआत।

प्रथम योजना — कृषि और सिंचाई — हैरॉड–डोमर मॉडल।

द्वितीय योजना — भारी उद्योग — महालनोबिस मॉडल।

तृतीय योजना — आत्मनिर्भरता; चीन युद्ध, पाकिस्तान युद्ध और सूखे से प्रभावित।

1966–69 — तीन वार्षिक योजनाएँ; योजना अवकाश; हरित क्रांति को गति।

चतुर्थ योजना — विकास के साथ स्थिरता और आत्मनिर्भरता; 1969 में 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण और इसरो की स्थापना।

पंचम योजना — गरीबी उन्मूलन और आत्मनिर्भरता; डी.पी. धर से जुड़ी।

1978–80 — रोलिंग प्लान।

षष्ठ योजना — गरीबी, रोजगार और आधुनिकीकरण; 1982 में नाबार्ड की स्थापना।

सप्तम योजना — खाद्य, कार्य और उत्पादकता।

1990–92 — दो वार्षिक योजनाएँ।

आठवीं योजना — 1992–97; आर्थिक सुधारों के बाद पहली पंचवर्षीय योजना; मानव विकास पर जोर।

नवम योजना — सामाजिक न्याय और समानता के साथ विकास।

दसवीं योजना — 8 प्रतिशत वृद्धि का लक्ष्य।

ग्यारहवीं योजना — तेज और अधिक समावेशी विकास।

बारहवीं योजना — तेज, अधिक समावेशी और टिकाऊ विकास; अंतिम पंचवर्षीय योजना।

1 जनवरी 2015 — योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग की स्थापना।

2017 के बाद भारत में पंचवर्षीय योजना प्रणाली आगे जारी नहीं रही और तेरहवीं पंचवर्षीय योजना नहीं बनाई गई।

Scroll to Top