भारत सरकार अधिनियम, 1935
संघीय योजना, प्रांतीय स्वायत्तता, 1937 के चुनाव और राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े तथ्य
भारत के संवैधानिक विकास का महत्वपूर्ण चरण
भारत सरकार अधिनियम, 1935 ब्रिटिश शासन के दौरान भारत के संवैधानिक विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण अधिनियम था। इसकी पृष्ठभूमि साइमन कमीशन, गोलमेज सम्मेलनों, 1933 के श्वेत पत्र और ब्रिटिश संसद की संयुक्त प्रवर समिति की सिफारिशों से बनी। इस अधिनियम ने भारत में संघीय व्यवस्था की योजना प्रस्तुत की और प्रांतों को पहले की तुलना में अधिक स्वायत्तता प्रदान की।
भारत सरकार अधिनियम, 1935
ब्रिटिश भारत का सबसे विस्तृत संवैधानिक अधिनियम
भारत सरकार अधिनियम, 1935 ब्रिटिश संसद द्वारा पारित भारत से संबंधित सबसे विस्तृत संवैधानिक अधिनियमों में से एक था। इसमें भारत की शासन व्यवस्था में बड़े परिवर्तन करने की योजना बनाई गई।
इस अधिनियम में भारत में संघात्मक शासन व्यवस्था स्थापित करने का प्रस्ताव रखा गया। प्रस्तावित अखिल भारतीय संघ में ब्रिटिश भारतीय प्रांतों और देशी रियासतों को सम्मिलित किया जाना था।
देशी रियासतों का संघ में सम्मिलित होना स्वैच्छिक था। आवश्यक संख्या में रियासतों के संघ में शामिल न होने के कारण अखिल भारतीय संघ की योजना कभी लागू नहीं हो सकी।
इस अधिनियम का प्रांतीय भाग लागू किया गया और इसके आधार पर प्रांतों में प्रांतीय स्वायत्तता स्थापित हुई।
🎯 सबसे महत्वपूर्ण बात
1935 के अधिनियम ने अखिल भारतीय संघ का प्रस्ताव दिया, लेकिन संघीय व्यवस्था व्यवहार में लागू नहीं हो सकी।
अधिनियम की पृष्ठभूमि
गोलमेज सम्मेलनों से 1935 के अधिनियम तक
भारत सरकार अधिनियम, 1935 अचानक नहीं बनाया गया था। इसकी पृष्ठभूमि में साइमन कमीशन, तीनों गोलमेज सम्मेलन, ब्रिटिश सरकार का 1933 का श्वेत पत्र और संयुक्त प्रवर समिति की रिपोर्ट महत्वपूर्ण थी।
इन संवैधानिक चर्चाओं के बाद ब्रिटिश संसद ने भारत के लिए एक नई शासन व्यवस्था तैयार की, जो अंततः भारत सरकार अधिनियम, 1935 के रूप में सामने आई।
यह स्वतंत्रता से पहले ब्रिटिश संसद द्वारा भारत की शासन व्यवस्था के लिए बनाया गया अंतिम प्रमुख और व्यापक संवैधानिक अधिनियम था। हालांकि इसे ब्रिटिश शासन का बिल्कुल अंतिम संवैधानिक कानून नहीं कहा जा सकता, क्योंकि बाद में भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 भी पारित हुआ।
संघीय शासन व्यवस्था
अखिल भारतीय संघ की प्रस्तावित योजना
अधिनियम में एक अखिल भारतीय संघ बनाने की योजना थी। इसमें ब्रिटिश भारतीय प्रांत और संघ में शामिल होने वाली देशी रियासतें इकाइयों के रूप में रहने वाली थीं।
शासन के विषयों को केंद्र और प्रांतों के बीच बाँटने के लिए संघीय सूची, प्रांतीय सूची और समवर्ती सूची की व्यवस्था की गई। इससे केंद्र और प्रांतों के अधिकार-क्षेत्र को अलग-अलग निर्धारित करने का प्रयास हुआ।
संघ की स्थापना के लिए देशी रियासतों का आवश्यक संख्या में शामिल होना जरूरी था। रियासतों ने अपेक्षित संख्या में भाग नहीं लिया, इसलिए अधिनियम का संघीय भाग लागू नहीं हो सका।
प्रांतीय स्वायत्तता
प्रांतों में द्वैध शासन का अंत
भारत सरकार अधिनियम, 1919 के अंतर्गत प्रांतों में लागू द्वैध शासन की व्यवस्था को 1935 के अधिनियम ने समाप्त कर दिया और उसके स्थान पर प्रांतीय स्वायत्तता की व्यवस्था की।
प्रांतों में मंत्रियों को प्रांतीय विधानमंडलों के प्रति उत्तरदायी बनाया गया। इससे निर्वाचित भारतीय नेताओं को शिक्षा, कृषि, स्थानीय प्रशासन और अन्य प्रांतीय विषयों पर पहले की तुलना में अधिक अधिकार प्राप्त हुए।
हालांकि प्रांतीय स्वायत्तता पूर्ण नहीं थी। प्रांतीय गवर्नरों को विशेष उत्तरदायित्व और विवेकाधीन शक्तियाँ दी गई थीं, जिनके कारण ब्रिटिश नियंत्रण पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था।
📌 याद रखें
1919 का अधिनियम — प्रांतों में द्वैध शासन
1935 का अधिनियम — प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त, प्रांतीय स्वायत्तता लागू
केंद्र में द्वैध शासन की योजना
प्रस्तावित लेकिन लागू नहीं
जहाँ प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त किया गया, वहीं 1935 के अधिनियम में केंद्र में द्वैध शासन लागू करने का प्रस्ताव रखा गया था।
लेकिन केंद्र में द्वैध शासन अखिल भारतीय संघ की स्थापना से जुड़ा हुआ था। चूँकि संघीय व्यवस्था ही लागू नहीं हो सकी, इसलिए केंद्र में प्रस्तावित द्वैध शासन भी व्यवहार में लागू नहीं हुआ।
🎯 भ्रम से बचें
1935 का अधिनियम — प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त; केंद्र में द्वैध शासन प्रस्तावित, पर लागू नहीं।
अधिनियम के अन्य महत्वपूर्ण प्रावधान
परीक्षा में बार-बार पूछे जाने वाले तथ्य
1935 के अधिनियम ने केंद्र और प्रांतों के बीच विधायी शक्तियों के विभाजन के लिए तीन सूचियों की व्यवस्था की — संघीय सूची, प्रांतीय सूची और समवर्ती सूची।
अधिनियम में संघीय न्यायालय की स्थापना का प्रावधान किया गया। इसके परिणामस्वरूप भारत का संघीय न्यायालय 1937 में स्थापित हुआ।
मताधिकार का विस्तार किया गया, जिससे पहले की तुलना में अधिक भारतीयों को चुनावों में मतदान का अधिकार मिला। फिर भी सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की व्यवस्था नहीं थी।
अधिनियम के अंतर्गत सिंध को बंबई प्रेसीडेंसी से अलग किया गया और उड़ीसा को अलग प्रांत बनाया गया।
प्रांतीय विधानमंडलों की संरचना में भी परिवर्तन हुए और कुछ प्रांतों में द्विसदनीय विधानमंडल की व्यवस्था की गई।
प्रांतीय चुनाव — 1937
1935 के अधिनियम का व्यावहारिक प्रयोग
भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अंतर्गत 1937 में प्रांतीय चुनाव आयोजित किए गए। ये चुनाव ब्रिटिश भारत के ग्यारह प्रांतों में हुए।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इन चुनावों में व्यापक रूप से भाग लिया और सबसे प्रभावशाली राजनीतिक दल के रूप में उभरी। कांग्रेस ने कई प्रांतों में स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया और कुछ अन्य प्रांतों में सबसे बड़े दल के रूप में सामने आई।
प्रारंभ में कांग्रेस ने मंत्रिमंडल बनाने में संकोच किया क्योंकि गवर्नरों के पास व्यापक विशेष शक्तियाँ थीं। बाद में आवश्यक राजनीतिक आश्वासन मिलने पर कांग्रेस ने प्रांतों में सरकार बनाने का निर्णय लिया।
🎯 महत्वपूर्ण तथ्य
1935 का अधिनियम → 1937 के प्रांतीय चुनाव → कांग्रेस मंत्रिमंडलों का गठन।
कांग्रेस मंत्रिमंडलों का गठन
1937 से 1939 तक प्रांतीय शासन
चुनावों के बाद कांग्रेस ने मद्रास, बंबई, संयुक्त प्रांत, बिहार, मध्य प्रांत एवं बरार, उड़ीसा और उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत सहित कई प्रांतों में मंत्रालय बनाए। बाद में असम में भी कांग्रेस मंत्रालय बना। इस प्रकार कांग्रेस ने अंततः आठ प्रांतों में सरकार चलाई।
कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने नागरिक स्वतंत्रताओं में राहत, राजनीतिक बंदियों की रिहाई, शिक्षा, किसानों और श्रमिकों से संबंधित कुछ सुधारों तथा दमनकारी कानूनों में राहत देने जैसे कदम उठाए।
इन मंत्रिमंडलों ने लगभग दो वर्ष तक कार्य किया। 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने पर वायसराय ने भारतीय नेताओं से परामर्श किए बिना भारत को ब्रिटेन की ओर से युद्ध में शामिल घोषित कर दिया। इसके विरोध में कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने 1939 में इस्तीफा दे दिया।
कांग्रेस समाजवादी पार्टी
कांग्रेस के भीतर समाजवादी विचारधारा
1934 में कांग्रेस समाजवादी पार्टी की स्थापना कांग्रेस के भीतर समाजवादी विचारधारा वाले नेताओं ने की। इसके प्रमुख नेताओं में आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण और अच्युत पटवर्धन शामिल थे।
कांग्रेस समाजवादी पार्टी का पहला अखिल भारतीय सम्मेलन मई 1934 में पटना में हुआ। आचार्य नरेंद्र देव इसके प्रमुख संस्थापक नेताओं और प्रथम अध्यक्ष के रूप में जुड़े, जबकि जयप्रकाश नारायण संगठन के प्रमुख महासचिव बने।
इस संगठन का उद्देश्य स्वतंत्रता संघर्ष को समाजवादी आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन के विचारों से जोड़ना था। यह कांग्रेस से अलग तत्काल स्वतंत्र राष्ट्रीय पार्टी के रूप में नहीं, बल्कि प्रारंभ में कांग्रेस के भीतर एक समाजवादी समूह के रूप में कार्य करती थी।
राममनोहर लोहिया, मीनू मसानी, यूसुफ मेहरअली और अशोक मेहता जैसे नेता भी आगे चलकर कांग्रेस समाजवादी धारा से प्रमुख रूप से जुड़े।
📗 महत्वपूर्ण संबंध
कांग्रेस समाजवादी पार्टी — 1934 — आचार्य नरेंद्र देव — जयप्रकाश नारायण — अच्युत पटवर्धन।
श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ और झंडा गीत
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा
स्वतंत्रता सेनानी और कवि श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ ने प्रसिद्ध झंडा गीत की रचना की। इसकी प्रसिद्ध प्रारंभिक पंक्ति “विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊँचा रहे हमारा” है।
इसे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान और देशभक्ति की भावना से जुड़े प्रमुख गीतों में स्थान मिला।
यहाँ नाम को केवल श्यामलाल लिखने के बजाय पूरा नाम श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ याद रखना अधिक उपयोगी है।
🎯 एक पंक्ति में
झंडा गीत — श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ — “विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊँचा रहे हमारा।”
‘सारे जहाँ से अच्छा’
मोहम्मद इकबाल की प्रसिद्ध रचना
प्रसिद्ध देशभक्ति गीत “सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा” की रचना मोहम्मद इकबाल ने की थी।
इस रचना का मूल नाम ‘तराना-ए-हिन्दी’ था। यह भारत की सांस्कृतिक एकता और देशप्रेम की भावना को व्यक्त करने वाली इकबाल की अत्यंत प्रसिद्ध रचनाओं में से एक है।
मोहम्मद इकबाल को बाद के उनके राजनीतिक विचारों के कारण केवल इसी गीत के आधार पर समझना उचित नहीं है; परीक्षा में मुख्य तथ्य यही है कि ‘सारे जहाँ से अच्छा’ के रचयिता मोहम्मद इकबाल थे।
वंदे मातरम् और आनंदमठ
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की ऐतिहासिक रचना
‘वंदे मातरम्’ की रचना बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। इसे बाद में उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया, जिसका प्रकाशन 1882 में हुआ।
इसलिए सामान्य परीक्षा-भाषा में यह कहा जाता है कि ‘वंदे मातरम्’ आनंदमठ से लिया गया है, लेकिन अधिक सटीक रूप में यह गीत पहले रचा गया था और बाद में ‘आनंदमठ’ का हिस्सा बना।
रवीन्द्रनाथ टैगोर ने 1896 के कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में ‘वंदे मातरम्’ का गायन किया। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत राष्ट्रवादी चेतना का अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीक बना।
स्वतंत्र भारत में ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत का सम्मान प्राप्त है, जबकि ‘जन गण मन’ राष्ट्रीय गान है। दोनों को एक-दूसरे से नहीं मिलाना चाहिए।
📌 तीन गीत — तीन रचनाकार
झंडा गीत — श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’
सारे जहाँ से अच्छा — मोहम्मद इकबाल
वंदे मातरम् — बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय
महत्वपूर्ण घटनाक्रम
1934 से 1939 तक
| वर्ष | घटना | मुख्य तथ्य |
|---|---|---|
| 1934 | कांग्रेस समाजवादी पार्टी | आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन आदि से संबंधित समाजवादी संगठन। |
| 1935 | भारत सरकार अधिनियम | अखिल भारतीय संघ का प्रस्ताव और प्रांतीय स्वायत्तता। |
| 1937 | प्रांतीय चुनाव | भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अंतर्गत चुनाव हुए। |
| 1937 | कांग्रेस मंत्रिमंडल | कांग्रेस ने कई प्रांतों में सरकारें बनाईं। |
| 1939 | द्वितीय विश्व युद्ध प्रारंभ | भारत को बिना परामर्श युद्ध में शामिल करने के विरोध में कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने इस्तीफा दिया। |
एक साथ याद करें
महत्वपूर्ण संवैधानिक और राष्ट्रीय तथ्य
🧠 त्वरित क्रम
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति
भारत सरकार अधिनियम, 1935 ने भारत में अखिल भारतीय संघ स्थापित करने की योजना प्रस्तुत की।
प्रस्तावित संघ में ब्रिटिश भारतीय प्रांतों और देशी रियासतों को शामिल किया जाना था, लेकिन रियासतों के आवश्यक संख्या में शामिल न होने के कारण संघीय योजना लागू नहीं हो सकी।
1935 के अधिनियम ने प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त करके प्रांतीय स्वायत्तता लागू की।
केंद्र में द्वैध शासन प्रस्तावित था, लेकिन संघीय व्यवस्था लागू न होने के कारण यह भी व्यवहार में लागू नहीं हुआ।
केंद्र और प्रांतों के विषयों के लिए संघीय, प्रांतीय और समवर्ती सूची की व्यवस्था की गई।
इसी अधिनियम के प्रावधान के आधार पर 1937 में संघीय न्यायालय स्थापित हुआ।
1935 के अधिनियम के अंतर्गत 1937 में प्रांतीय चुनाव आयोजित हुए।
कांग्रेस ने चुनावों में बड़ी सफलता प्राप्त की और अंततः आठ प्रांतों में मंत्रालय चलाए।
1939 में भारत को बिना भारतीय नेतृत्व की सहमति के द्वितीय विश्व युद्ध में शामिल करने के विरोध में कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने इस्तीफा दे दिया।
कांग्रेस समाजवादी पार्टी की स्थापना 1934 में हुई। इसके प्रमुख नेताओं में आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण और अच्युत पटवर्धन थे।
झंडा गीत — श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’।
‘सारे जहाँ से अच्छा’ — मोहम्मद इकबाल।
‘वंदे मातरम्’ — बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय; इसे बाद में उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया।
वंदे मातरम् = राष्ट्रीय गीत और जन गण मन = राष्ट्रीय गान।