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भारतीय संविधान के प्रमुख संविधान संशोधन
IMPORTANT CONSTITUTIONAL AMENDMENTS

भारतीय संविधान के प्रमुख संविधान संशोधन

1951 से आधुनिक काल तक — महत्वपूर्ण संशोधन, अनुच्छेद और परीक्षा-उपयोगी तथ्य

संविधान संशोधन क्यों आवश्यक हैं?

भारतीय संविधान एक जीवंत दस्तावेज है। समय के साथ सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुसार इसमें परिवर्तन करने की व्यवस्था अनुच्छेद 368 में दी गई है।

कुछ संशोधनों ने मौलिक अधिकारों, नीति-निदेशक तत्वों, संघीय व्यवस्था, स्थानीय स्वशासन, आरक्षण, शिक्षा, कर प्रणाली और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर अत्यंत महत्वपूर्ण प्रभाव डाला है।

प्रतियोगी परीक्षाओं में संशोधन की केवल संख्या नहीं, बल्कि उसका वर्ष, संबंधित अनुच्छेद, जोड़ी गई अनुसूची और मुख्य प्रभाव भी पूछा जाता है।

01

प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम, 1951

भूमि सुधार, अभिव्यक्ति और नौवीं अनुसूची

प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 स्वतंत्र भारत का पहला संविधान संशोधन था।

इसका एक प्रमुख उद्देश्य राज्यों द्वारा किए जा रहे जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार संबंधी कानूनों को संवैधानिक चुनौतियों से संरक्षण देना था।

इस संशोधन द्वारा अनुच्छेद 31-क और 31-ख जोड़े गए।

इसके साथ संविधान में नौवीं अनुसूची जोड़ी गई। प्रारंभिक रूप से इसमें भूमि सुधार और संपत्ति संबंधी कुछ कानूनों को रखा गया ताकि उन्हें मौलिक अधिकारों के आधार पर बार-बार चुनौती दिए जाने से सुरक्षा मिल सके।

इस संशोधन ने अनुच्छेद 19(2) में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाए जा सकने वाले युक्तियुक्त प्रतिबंधों के आधारों का भी विस्तार किया।

अनुच्छेद 15(4) जोड़कर सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की उन्नति के लिए राज्य द्वारा विशेष प्रावधान किए जाने का संवैधानिक आधार मजबूत किया गया।

🎯 प्रथम संशोधन

31-क + 31-ख + नौवीं अनुसूची + पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान।

02

छठा संविधान संशोधन अधिनियम, 1956

अंतरराज्यीय व्यापार और कर

छठे संविधान संशोधन अधिनियम, 1956 का मुख्य संबंध अंतरराज्यीय व्यापार और वाणिज्य में वस्तुओं की बिक्री या खरीद पर कर लगाने की संवैधानिक व्यवस्था से था।

इस संशोधन द्वारा विशेष रूप से अनुच्छेद 269 और 286 में परिवर्तन किए गए।

इससे अंतरराज्यीय बिक्री पर कर लगाने और उसके संघ तथा राज्यों के बीच वितरण की संवैधानिक स्थिति अधिक स्पष्ट की गई।

03

सातवाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1956

राज्य पुनर्गठन

सातवाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1956 भारत में राज्यों के व्यापक पुनर्गठन से संबंधित अत्यंत महत्वपूर्ण संशोधन था।

इसे राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के साथ लागू किया गया। भाषायी और प्रशासनिक आधार पर राज्यों की सीमाओं में व्यापक परिवर्तन किए गए।

पुरानी भाग क, भाग ख, भाग ग और भाग घ राज्यों की श्रेणियों वाली व्यवस्था समाप्त की गई और राज्यों तथा संघ राज्यक्षेत्रों की नई व्यवस्था स्थापित हुई।

संविधान का भाग 7 और अनुच्छेद 238 निरसित किया गया।

इस संशोधन से पहली, दूसरी, चौथी और सातवीं अनुसूची सहित अनेक संवैधानिक प्रावधानों में आवश्यक परिवर्तन किए गए।

🎯 याद रखें

7वाँ संशोधन = राज्य पुनर्गठन + भाग 7 समाप्त + संघ राज्यक्षेत्र व्यवस्था का पुनर्गठन।

04

दसवाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1961

दादरा और नगर हवेली

दसवें संविधान संशोधन अधिनियम, 1961 द्वारा दादरा और नगर हवेली को भारत के संघ में एक संघ राज्यक्षेत्र के रूप में सम्मिलित किया गया।

इसके लिए संविधान की पहली अनुसूची में आवश्यक परिवर्तन किया गया।

05

बारहवाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1962

गोवा, दमन और दीव

बारहवें संविधान संशोधन अधिनियम, 1962 द्वारा गोवा, दमन और दीव को भारत के संघ राज्यक्षेत्र में सम्मिलित किया गया।

इसके लिए पहली अनुसूची में परिवर्तन किया गया।

इसे केवल “भारत का आठवाँ केंद्रशासित प्रदेश” जैसे स्थायी क्रमांक से याद करना उचित नहीं है, क्योंकि संघ राज्यक्षेत्रों की संख्या और स्वरूप समय-समय पर बदलते रहे हैं।

06

चौदहवाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1962

पांडिचेरी और संघ राज्यक्षेत्रों में विधानमंडल

चौदहवें संविधान संशोधन अधिनियम, 1962 द्वारा तत्कालीन पांडिचेरी को संघ राज्यक्षेत्र के रूप में संविधान की पहली अनुसूची में सम्मिलित किया गया।

इसके साथ संसद को हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, गोवा, दमन और दीव तथा पांडिचेरी जैसे कुछ संघ राज्यक्षेत्रों के लिए कानून द्वारा विधानमंडल और मंत्रिपरिषद बनाने की शक्ति प्रदान की गई।

इसके लिए अनुच्छेद 239-क जोड़ा गया।

07

चौबीसवाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1971

संसद की संविधान संशोधन शक्ति

24वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1971 संसद की संविधान संशोधन शक्ति से संबंधित अत्यंत महत्वपूर्ण संशोधन था।

इसने स्पष्ट किया कि संसद संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है और इस उद्देश्य से अनुच्छेद 13 और अनुच्छेद 368 में आवश्यक परिवर्तन किए गए।

राष्ट्रपति के लिए संसद द्वारा विधिवत पारित संविधान संशोधन विधेयक को स्वीकृति देना अनिवार्य किया गया।

🎯 24वाँ संशोधन

संसद की संविधान संशोधन शक्ति को स्पष्ट और मजबूत किया गया।

08

पच्चीसवाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1971

संपत्ति का अधिकार और अनुच्छेद 31-ग

25वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1971 ने संपत्ति के तत्कालीन मौलिक अधिकार को और सीमित किया।

अनुच्छेद 31 में परिवर्तन कर संपत्ति के अनिवार्य अधिग्रहण के मामले में पुराने “मुआवजा” शब्द के स्थान पर “राशि” की अवधारणा लाई गई।

इस संशोधन द्वारा नया अनुच्छेद 31-ग जोड़ा गया।

इसका उद्देश्य अनुच्छेद 39(ख) और 39(ग) में दिए नीति-निदेशक तत्वों को लागू करने वाले कुछ कानूनों को अनुच्छेद 14 और 19 की चुनौती से संरक्षण देना था।

यह कहना कि इस संशोधन के बाद संपत्ति अधिग्रहण संबंधी किसी भी कानून को किसी भी परिस्थिति में अदालत में चुनौती देना असंभव हो गया, सही नहीं है। न्यायिक समीक्षा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।

आगे केशवानंद भारती मामले, 1973 में सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 31-ग के न्यायिक समीक्षा को पूर्णतः बाहर करने वाले हिस्से को स्वीकार नहीं किया।

⚠️ याद रखें

25वाँ संशोधन = अनुच्छेद 31 में परिवर्तन + अनुच्छेद 31-ग + 39(ख) और 39(ग)।

09

छब्बीसवाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1971

प्रिवी पर्स का अंत

26वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1971 द्वारा पूर्व देशी रियासतों के शासकों को प्राप्त प्रिवी पर्स और विशेष मान्यताओं को समाप्त किया गया।

इसके अंतर्गत अनुच्छेद 291 और 362 हटाए गए तथा नया अनुच्छेद 363-क जोड़ा गया।

10

छत्तीसवाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1975

सिक्किम भारत का पूर्ण राज्य

36वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1975 द्वारा सिक्किम को भारत का पूर्ण राज्य बनाया गया।

सिक्किम को पहली अनुसूची में राज्य के रूप में सम्मिलित किया गया और उसके लिए विशेष प्रावधान के रूप में अनुच्छेद 371-च जोड़ा गया।

11

बयालीसवाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1976

मिनी संविधान

42वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 भारतीय संविधान के सबसे व्यापक संशोधनों में से एक था। इसके व्यापक प्रभाव के कारण इसे प्रायः “मिनी संविधान” कहा जाता है।

संविधान की प्रस्तावना में “समाजवादी”, “धर्मनिरपेक्ष” और “अखंडता” शब्द जोड़े गए।

संविधान में नया भाग 4-क और अनुच्छेद 51-क जोड़कर नागरिकों के मूल कर्तव्य सम्मिलित किए गए। प्रारंभ में 10 मूल कर्तव्य थे।

राज्य के नीति-निदेशक तत्वों में अनुच्छेद 39-क के माध्यम से समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता, अनुच्छेद 43-क के माध्यम से उद्योगों के प्रबंधन में कर्मकारों की भागीदारी और अनुच्छेद 48-क के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण से संबंधित प्रावधान जोड़े गए।

राज्य सूची से पाँच विषय समवर्ती सूची में स्थानांतरित किए गए—शिक्षा, वन, बाट और माप, वन्य जीव एवं पक्षियों का संरक्षण तथा न्याय प्रशासन से संबंधित कुछ विषय

लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सामान्य अवधि 5 वर्ष से बढ़ाकर 6 वर्ष कर दी गई थी। बाद में 44वें संशोधन द्वारा इसे फिर पाँच वर्ष कर दिया गया।

संशोधन ने केंद्र सरकार की संवैधानिक स्थिति को अधिक मजबूत करने और न्यायिक समीक्षा को सीमित करने के अनेक प्रयास किए। इनमें से कई प्रावधान बाद में 43वें और 44वें संशोधनों तथा न्यायालय के निर्णयों से बदले या समाप्त किए गए।

🎯 42वाँ संशोधन

मिनी संविधान + प्रस्तावना में 3 शब्द + मूल कर्तव्य + 5 विषय समवर्ती सूची में + पर्यावरण + कर्मकार भागीदारी।

12

चवालीसवाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1978

आपातकाल और नागरिक स्वतंत्रता

44वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 ने 42वें संशोधन और आपातकालीन काल के कई प्रभावों में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए।

संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची से हटा दिया गया। अनुच्छेद 19(1)(च) और अनुच्छेद 31 से संबंधित पुरानी व्यवस्था हटाकर संपत्ति का अधिकार अनुच्छेद 300-क के तहत संवैधानिक अधिकार के रूप में रखा गया।

राष्ट्रीय आपातकाल के आधार के रूप में प्रयुक्त “आंतरिक अशांति” शब्द के स्थान पर “सशस्त्र विद्रोह” रखा गया।

राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद की सलाह पर एक बार पुनर्विचार करने के लिए कहने की शक्ति दी गई। पुनर्विचार के बाद दी गई सलाह के अनुसार राष्ट्रपति को कार्य करना होता है।

राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा के लिए मंत्रिमंडल की लिखित सलाह आवश्यक की गई।

अनुच्छेद 20 और 21 के अधिकारों को आपातकाल के दौरान भी पूरी तरह निलंबित न किए जाने की सुरक्षा मजबूत की गई।

लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की अवधि फिर 6 वर्ष से घटाकर 5 वर्ष की गई।

अनुच्छेद 257 को इस संशोधन द्वारा समाप्त नहीं किया गया था। अनुच्छेद 257 आज भी केंद्र द्वारा राज्यों पर कुछ परिस्थितियों में नियंत्रण से संबंधित प्रावधान के रूप में संविधान में मौजूद है।

⚠️ संपत्ति का अधिकार

इसे केवल सामान्य “कानूनी अधिकार” कहना अधूरा है। यह अब अनुच्छेद 300-क के अंतर्गत संवैधानिक अधिकार है, लेकिन मौलिक अधिकार नहीं है।

13

इक्यावनवाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1984

पूर्वोत्तर राज्यों में जनजातीय प्रतिनिधित्व

51वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1984 द्वारा नागालैंड, मेघालय, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश के संदर्भ में अनुसूचित जनजातियों के लिए लोकसभा और विधानसभाओं में प्रतिनिधित्व से संबंधित विशेष प्रावधान किए गए।

इसके लिए मुख्य रूप से अनुच्छेद 330 और 332 में परिवर्तन किया गया।

14

बावनवाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1985

दल-बदल विरोधी कानून

52वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 दल-बदल रोकने के उद्देश्य से किया गया।

इसके तहत संसद और राज्य विधानमंडलों के सदस्यों को निर्धारित परिस्थितियों में दल-बदल के आधार पर अयोग्य घोषित करने का प्रावधान किया गया।

संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी गई।

अनुच्छेद 101, 102, 190 और 191 में आवश्यक परिवर्तन किए गए।

इस संशोधन के प्रावधान 1 मार्च 1985 से प्रभावी हुए। इसलिए 15 फरवरी 1985 को लागू होने की बात सही नहीं है।

🎯 सबसे महत्वपूर्ण

52वाँ संशोधन = दल-बदल विरोधी कानून + दसवीं अनुसूची।

15

इकसठवाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1988

मतदान आयु 21 से 18 वर्ष

61वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1988 द्वारा लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों में मतदान की न्यूनतम आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई।

इसके लिए अनुच्छेद 326 में संशोधन किया गया।

यह परिवर्तन 1989 से प्रभावी हुआ, इसलिए कई पुस्तकों में इसे 1989 से जोड़ा हुआ मिलता है; संशोधन अधिनियम स्वयं 1988 का है।

16

पैंसठवाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1990

एससी-एसटी राष्ट्रीय आयोग

65वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1990 द्वारा अनुच्छेद 338 में परिवर्तन कर अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए बहुसदस्यीय राष्ट्रीय आयोग की व्यवस्था की गई।

बाद में 89वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए अलग-अलग राष्ट्रीय आयोग बनाए गए—अनुच्छेद 338 और 338-क।

17

उनहत्तरवाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1991

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली

69वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1991 द्वारा दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली का विशेष संवैधानिक दर्जा दिया गया।

संविधान में अनुच्छेद 239-कक और 239-कख जोड़े गए।

इसके अंतर्गत दिल्ली के लिए विधानसभा और मंत्रिपरिषद की संवैधानिक व्यवस्था की गई।

18

इकहत्तरवाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992

आठवीं अनुसूची में भाषाएँ

71वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया।

19

तिहत्तरवाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992

पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा

73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 ग्रामीण स्थानीय स्वशासन से संबंधित ऐतिहासिक संशोधन है।

इसके द्वारा संविधान में नया भाग 9 जोड़ा गया, जिसमें अनुच्छेद 243 से 243-ओ तक पंचायतों से संबंधित प्रावधान रखे गए।

संविधान में ग्यारहवीं अनुसूची जोड़ी गई, जिसमें पंचायतों से संबंधित 29 विषय हैं।

ग्राम सभा, त्रिस्तरीय पंचायती व्यवस्था, पंचायतों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण, महिलाओं के लिए कम से कम एक-तिहाई आरक्षण, पंचायती चुनाव, राज्य निर्वाचन आयोग और राज्य वित्त आयोग जैसे प्रावधान किए गए।

यह संशोधन 24 अप्रैल 1993 से प्रभावी हुआ। इसी कारण 24 अप्रैल को राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस के रूप में भी जाना जाता है।

“73वाँ संशोधन सबसे पहले मध्य प्रदेश ने लागू किया” को मुख्य संवैधानिक तथ्य के रूप में याद करना उचित नहीं है। भारत में आधुनिक पंचायती राज व्यवस्था का ऐतिहासिक उद्घाटन 2 अक्टूबर 1959 को राजस्थान के नागौर से जुड़ा है, जबकि 73वाँ संशोधन पूरे देश के लिए संवैधानिक ढाँचा लेकर आया।

🎯 73वाँ संशोधन

पंचायत + भाग 9 + अनुच्छेद 243 से 243-ओ + 11वीं अनुसूची + 29 विषय।

20

चौहत्तरवाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992

नगरपालिकाओं को संवैधानिक दर्जा

74वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 शहरी स्थानीय स्वशासन से संबंधित है।

इसके द्वारा नया भाग 9-क जोड़ा गया, जिसमें नगरपालिकाओं से संबंधित अनुच्छेद 243-पी से 243-जेडजी तक रखे गए।

संविधान में बारहवीं अनुसूची जोड़ी गई, जिसमें नगरपालिकाओं से संबंधित 18 विषय हैं।

नगर पंचायत, नगरपालिका परिषद और नगर निगम की संवैधानिक व्यवस्था को मजबूत किया गया।

यह संशोधन 1 जून 1993 से प्रभावी हुआ।

21

छिहत्तरवाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1994

तमिलनाडु आरक्षण कानून

76वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1994 द्वारा तमिलनाडु के 69 प्रतिशत आरक्षण संबंधी कानून को नौवीं अनुसूची में शामिल किया गया।

यह संशोधन आरक्षण और नौवीं अनुसूची से जुड़े परीक्षा प्रश्नों में महत्वपूर्ण है।

22

अस्सीवाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2000

संघीय करों का राज्यों में बँटवारा

80वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2000 द्वारा केंद्र द्वारा लगाए और एकत्र किए जाने वाले करों के राज्यों के साथ वितरण के लिए नई व्यवस्था अपनाई गई।

यह परिवर्तन मुख्यतः दसवें वित्त आयोग की सिफारिशों से संबंधित था।

संघ के अधिकांश साझा करने योग्य केंद्रीय करों की शुद्ध प्राप्तियों में राज्यों को हिस्सा देने की व्यवस्था को व्यापक बनाया गया।

23

पचासीवाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2001

पदोन्नति में परिणामिक वरिष्ठता

85वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सरकारी कर्मचारियों के लिए पदोन्नति में आरक्षण से जुड़ी परिणामिक वरिष्ठता की व्यवस्था को संवैधानिक आधार दिया।

इसके लिए अनुच्छेद 16(4-क) में परिवर्तन किया गया।

24

छियासीवाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2002

शिक्षा का मौलिक अधिकार

86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 ने बच्चों की शिक्षा के संवैधानिक ढाँचे में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया।

नया अनुच्छेद 21-क जोड़कर 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का मौलिक अधिकार प्रदान किया गया।

अनुच्छेद 45 को बदलकर छह वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा उपलब्ध कराने का नीति-निदेशक तत्व बनाया गया।

अनुच्छेद 51-क(ट) जोड़कर माता-पिता या अभिभावक का यह मूल कर्तव्य निर्धारित किया गया कि वे 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चे को शिक्षा का अवसर प्रदान करें।

🎯 86वाँ संशोधन

21-क + संशोधित 45 + 51-क(ट)।

25

इक्यानवेवाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2003

मंत्रिपरिषद का आकार और दल-बदल

91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 का उद्देश्य अत्यधिक बड़े मंत्रिमंडलों और राजनीतिक दल-बदल पर नियंत्रण मजबूत करना था।

केंद्र में प्रधानमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या लोकसभा की कुल सदस्य-संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती।

राज्यों में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की संख्या संबंधित विधानसभा की कुल सदस्य-संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती; सामान्यतः न्यूनतम 12 मंत्री की व्यवस्था है।

दल-बदल के कारण अयोग्य सदस्य को कुछ परिस्थितियों में मंत्री बनने से रोकने की व्यवस्था भी मजबूत की गई।

26

तिरानवेवाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2005

शैक्षणिक संस्थानों में विशेष प्रावधान

93वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2005 द्वारा संविधान में अनुच्छेद 15(5) जोड़ा गया।

इसने राज्य को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की उन्नति के लिए शिक्षण संस्थानों में प्रवेश से संबंधित विशेष प्रावधान करने की शक्ति दी।

यह प्रावधान सरकारी तथा निजी शिक्षण संस्थानों तक लागू किया जा सकता है, चाहे वे सहायता प्राप्त हों या गैर-सहायता प्राप्त; लेकिन अनुच्छेद 30(1) के अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान इससे बाहर हैं।

इसे केवल अनुच्छेद 15(4) का संशोधन समझना गलत है; इसकी मुख्य पहचान अनुच्छेद 15(5) है।

27

सत्तानवेवाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2011

सहकारी समितियाँ

97वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2011 का संबंध सहकारी समितियों से है।

अनुच्छेद 19(1)(ग) में सहकारी समितियाँ बनाने के अधिकार को संघ बनाने की स्वतंत्रता के साथ जोड़ा गया।

राज्य के नीति-निदेशक तत्वों में नया अनुच्छेद 43-ख जोड़ा गया, जिसके अनुसार राज्य सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त संचालन, लोकतांत्रिक नियंत्रण और व्यावसायिक प्रबंधन को बढ़ावा देगा।

संविधान में नया भाग 9-ख जोड़कर सहकारी समितियों के संबंध में विस्तृत प्रावधान किए गए।

बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यों की सहकारी समितियों पर लागू भाग 9-ख के कुछ हिस्सों को आवश्यक राज्य अनुमोदन के अभाव में अमान्य माना, जबकि बहु-राज्य सहकारी समितियों से संबंधित संवैधानिक प्रभाव बना रहा। इसलिए 97वें संशोधन को बिना इस वर्तमान न्यायिक स्थिति के पढ़ना अधूरा है।

28

सौवाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2015

भारत-बांग्लादेश भूमि सीमा समझौता

100वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2015 का संबंध भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय से लंबित भूमि सीमा समझौते से था।

दोनों देशों ने आपसी सहमति के आधार पर कुछ एन्क्लेव और भू-भागों के आदान-प्रदान की व्यवस्था लागू की।

इसके अनुसार संविधान की पहली अनुसूची में आवश्यक परिवर्तन किए गए।

29

एक सौ पहला संविधान संशोधन अधिनियम, 2016

वस्तु एवं सेवा कर

101वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2016 भारत में वस्तु एवं सेवा कर की संवैधानिक व्यवस्था स्थापित करने के लिए किया गया।

इस संशोधन द्वारा केंद्र और राज्यों के अनेक अप्रत्यक्ष करों को एक व्यापक वस्तु एवं सेवा कर प्रणाली में समाहित करने का संवैधानिक आधार तैयार किया गया।

इसके अंतर्गत अनुच्छेद 246-क, 269-क और 279-क जैसे महत्वपूर्ण नए प्रावधान जोड़े गए।

अनुच्छेद 279-क के अंतर्गत वस्तु एवं सेवा कर परिषद की व्यवस्था की गई।

वस्तु एवं सेवा कर पूरे देश में 1 जुलाई 2017 से लागू हुआ।

⚠️ वर्ष का अंतर

101वाँ संशोधन = 2016।
वस्तु एवं सेवा कर लागू = 1 जुलाई 2017।

30

एक सौ दूसरा संविधान संशोधन अधिनियम, 2018

राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग

102वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2018 द्वारा राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा दिया गया।

इसके लिए नया अनुच्छेद 338-ख जोड़ा गया।

इसके साथ अनुच्छेद 342-क में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों से संबंधित संवैधानिक व्यवस्था तथा अनुच्छेद 366 में संबंधित परिभाषा जोड़ी गई।

31

एक सौ तीसरा संविधान संशोधन अधिनियम, 2019

आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग

103वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2019 द्वारा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में अधिकतम 10 प्रतिशत आरक्षण का संवैधानिक आधार बनाया गया।

इसके लिए संविधान में अनुच्छेद 15(6) और 16(6) जोड़े गए।

यह व्यवस्था उन आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों से संबंधित है जो अनुच्छेद 15(4), 15(5) और 16(4) के अंतर्गत आने वाले आरक्षित वर्गों से अलग हैं।

🎯 103वाँ संशोधन

आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग — 10% — अनुच्छेद 15(6) और 16(6)।

32

एक सौ चौथा संविधान संशोधन अधिनियम, 2019

एससी-एसटी प्रतिनिधित्व और आंग्ल-भारतीय व्यवस्था

104वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2019 को जनवरी 2020 में राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली।

लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सीट आरक्षण की संवैधानिक अवधि को 70 वर्ष से बढ़ाकर 80 वर्ष किया गया।

इस प्रकार एससी और एसटी के लिए विधायी सीट आरक्षण की अवधि 25 जनवरी 2030 तक बढ़ी।

लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में आंग्ल-भारतीय समुदाय के मनोनीत प्रतिनिधित्व की विशेष व्यवस्था को आगे नहीं बढ़ाया गया।

इस संशोधन का जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद 1 में राज्य अथवा संघ राज्यक्षेत्र बनाने से कोई संबंध नहीं है।

जम्मू-कश्मीर की 2019 की संवैधानिक और क्षेत्रीय पुनर्व्यवस्था अलग कानूनी प्रक्रिया तथा जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 से संबंधित थी।

⚠️ महत्वपूर्ण सुधार

104वाँ संशोधन ≠ जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन।

33

एक सौ पाँचवाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2021

राज्यों की पिछड़ा वर्ग सूची की शक्ति

105वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2021 ने राज्यों और संघ राज्यक्षेत्रों की सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की अपनी सूची पहचानने की शक्ति को स्पष्ट रूप से बहाल किया।

इस संशोधन का संबंध विशेष रूप से 102वें संशोधन के बाद उत्पन्न संवैधानिक व्याख्या से था।

34

एक सौ छठा संविधान संशोधन अधिनियम, 2023

महिलाओं के लिए विधायी आरक्षण

106वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2023 लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की विधानसभा में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीट आरक्षण से संबंधित है।

इसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों के भीतर भी महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान है।

इसके लिए संविधान में अनुच्छेद 330-क, 332-क और 334-क जैसे नए प्रावधान जोड़े गए तथा दिल्ली से संबंधित प्रावधान में परिवर्तन किया गया।

महिला आरक्षण तत्काल प्रत्येक निर्वाचन में लागू होने के बजाय अधिनियम के प्रावधान के अनुसार संबंधित जनगणना के बाद परिसीमन की प्रक्रिया से जुड़ा है।

🎯 नवीन महत्वपूर्ण संशोधन

106वाँ संशोधन, 2023 = लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण।

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सबसे महत्वपूर्ण संशोधन — एक नज़र में

परीक्षा के लिए त्वरित सारणी

संशोधन वर्ष मुख्य तथ्य
1वाँ195131-क, 31-ख, नौवीं अनुसूची
7वाँ1956राज्यों का पुनर्गठन
24वाँ1971संसद की संविधान संशोधन शक्ति
25वाँ1971अनुच्छेद 31-ग
26वाँ1971प्रिवी पर्स समाप्त
36वाँ1975सिक्किम पूर्ण राज्य
42वाँ1976मिनी संविधान, मूल कर्तव्य
44वाँ1978संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकार से हटाया
52वाँ1985दल-बदल, दसवीं अनुसूची
61वाँ1988मतदान आयु 21 से 18
69वाँ1991राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली
71वाँ1992कोंकणी, मणिपुरी, नेपाली
73वाँ1992पंचायत
74वाँ1992नगरपालिका
76वाँ1994तमिलनाडु 69% आरक्षण कानून नौवीं अनुसूची में
80वाँ2000केंद्रीय करों का राज्यों से वितरण
85वाँ2001पदोन्नति में परिणामिक वरिष्ठता
86वाँ2002शिक्षा का अधिकार
91वाँ2003मंत्रिपरिषद का अधिकतम आकार
93वाँ2005अनुच्छेद 15(5)
97वाँ2011सहकारी समितियाँ
100वाँ2015भारत-बांग्लादेश भूमि सीमा समझौता
101वाँ2016वस्तु एवं सेवा कर
102वाँ2018राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग
103वाँ2019आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग — 10%
104वाँ2019एससी-एसटी सीट आरक्षण अवधि बढ़ी
105वाँ2021राज्यों की पिछड़ा वर्ग सूची की शक्ति
106वाँ2023महिला आरक्षण
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महत्वपूर्ण भ्रम और सही तथ्य

परीक्षा में गलती से बचें

गलत: 42वें संशोधन से अनुच्छेद 51-क में “घोषणा” जोड़ी गई।
सही: अनुच्छेद 51-क के तहत मूल कर्तव्य जोड़े गए।

गलत: 44वें संशोधन से अनुच्छेद 257 समाप्त हुआ।
सही: अनुच्छेद 257 समाप्त नहीं हुआ।

अधूरा: संपत्ति का अधिकार केवल कानूनी अधिकार है।
सही: संपत्ति का अधिकार अनुच्छेद 300-क के अंतर्गत संवैधानिक अधिकार है, लेकिन मौलिक अधिकार नहीं।

गलत: 25वें संशोधन के बाद संपत्ति कानून को कभी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
सही: न्यायिक समीक्षा पूर्णतः समाप्त नहीं हुई।

गलत: 52वाँ संशोधन 15 फरवरी 1985 से लागू हुआ।
सही: इसके प्रमुख प्रावधान 1 मार्च 1985 से प्रभावी हुए।

भ्रम: 61वाँ संशोधन 1989 का है।
सही: संशोधन अधिनियम 1988 का है; इसका प्रभाव 1989 के चुनावी ढाँचे में दिखाई दिया।

गलत: 73वाँ संशोधन सबसे पहले मध्य प्रदेश में लागू हुआ।
सही: संशोधन पूरे देश में 24 अप्रैल 1993 से प्रभावी हुआ; आधुनिक पंचायती राज का ऐतिहासिक उद्घाटन 1959 में राजस्थान से जुड़ा है।

गलत: 93वाँ संशोधन केवल अनुच्छेद 15(4) से संबंधित है।
सही: इसकी मुख्य पहचान नया अनुच्छेद 15(5) है।

गलत: 101वाँ संविधान संशोधन 2017 का है।
सही: 101वाँ संशोधन अधिनियम, 2016; वस्तु एवं सेवा कर 1 जुलाई 2017 से लागू।

गलत: 104वें संशोधन से जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद 1 में संघीय राज्य बनाया गया।
सही: 104वें संशोधन का मुख्य संबंध एससी-एसटी विधायी आरक्षण की अवधि तथा आंग्ल-भारतीय नामांकन से है।

गलत: 102वाँ संशोधन केवल पिछड़ा वर्ग आयोग का नाम बदलता है।
सही: इसने राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा दिया और अनुच्छेद 338-ख तथा 342-क जैसे प्रावधान जोड़े।

⚡ अंतिम पुनरावृत्ति

1वाँ संशोधन, 1951 — अनुच्छेद 31-क, 31-ख और नौवीं अनुसूची।

6वाँ संशोधन, 1956 — अंतरराज्यीय बिक्री पर कर; अनुच्छेद 269 और 286।

7वाँ संशोधन, 1956 — राज्य पुनर्गठन; भाग 7 समाप्त।

10वाँ संशोधन, 1961 — दादरा और नगर हवेली।

12वाँ संशोधन, 1962 — गोवा, दमन और दीव।

14वाँ संशोधन, 1962 — पांडिचेरी और अनुच्छेद 239-क।

24वाँ संशोधन, 1971 — संसद की संविधान संशोधन शक्ति।

25वाँ संशोधन, 1971 — अनुच्छेद 31-ग; अनुच्छेद 39(ख) और 39(ग)।

26वाँ संशोधन, 1971 — प्रिवी पर्स समाप्त।

36वाँ संशोधन, 1975 — सिक्किम भारत का पूर्ण राज्य।

42वाँ संशोधन, 1976 — मिनी संविधान; समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और अखंडता; मूल कर्तव्य।

44वाँ संशोधन, 1978 — संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकार से हटाया; सशस्त्र विद्रोह शब्द; आपातकाल सुरक्षा।

51वाँ संशोधन, 1984 — पूर्वोत्तर राज्यों में जनजातीय प्रतिनिधित्व।

52वाँ संशोधन, 1985 — दल-बदल विरोधी कानून और दसवीं अनुसूची।

61वाँ संशोधन, 1988 — मतदान आयु 21 से 18 वर्ष।

65वाँ संशोधन, 1990 — एससी-एसटी राष्ट्रीय आयोग की बहुसदस्यीय व्यवस्था।

69वाँ संशोधन, 1991 — राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली।

71वाँ संशोधन, 1992 — कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली आठवीं अनुसूची में।

73वाँ संशोधन, 1992 — पंचायत; भाग 9; ग्यारहवीं अनुसूची; 29 विषय।

74वाँ संशोधन, 1992 — नगरपालिका; भाग 9-क; बारहवीं अनुसूची; 18 विषय।

76वाँ संशोधन, 1994 — तमिलनाडु का 69 प्रतिशत आरक्षण कानून नौवीं अनुसूची में।

80वाँ संशोधन, 2000 — केंद्रीय करों के राज्यों में वितरण की नई व्यवस्था।

85वाँ संशोधन, 2001 — पदोन्नति में परिणामिक वरिष्ठता।

86वाँ संशोधन, 2002 — शिक्षा का अधिकार; अनुच्छेद 21-क।

91वाँ संशोधन, 2003 — मंत्रिपरिषद का आकार अधिकतम 15 प्रतिशत।

93वाँ संशोधन, 2005 — अनुच्छेद 15(5); शिक्षण संस्थानों में विशेष प्रावधान।

97वाँ संशोधन, 2011 — सहकारी समितियाँ; अनुच्छेद 43-ख और भाग 9-ख।

100वाँ संशोधन, 2015 — भारत-बांग्लादेश भूमि सीमा समझौता।

101वाँ संशोधन, 2016 — वस्तु एवं सेवा कर; 1 जुलाई 2017 से लागू।

102वाँ संशोधन, 2018 — राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा।

103वाँ संशोधन, 2019 — आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए अधिकतम 10 प्रतिशत आरक्षण; अनुच्छेद 15(6) और 16(6)।

104वाँ संशोधन, 2019 — एससी-एसटी सीट आरक्षण की अवधि बढ़ी; आंग्ल-भारतीय नामांकन आगे नहीं बढ़ा।

105वाँ संशोधन, 2021 — राज्यों की अपनी पिछड़ा वर्ग सूची पहचानने की शक्ति स्पष्ट रूप से बहाल।

106वाँ संशोधन, 2023 — लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीट आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान।

सबसे छोटा क्रम: 1वाँ—भूमि सुधार → 7वाँ—राज्य पुनर्गठन → 24वाँ—संशोधन शक्ति → 42वाँ—मिनी संविधान → 44वाँ—आपातकाल सुधार → 52वाँ—दल-बदल → 61वाँ—18 वर्ष मतदान → 73वाँ—पंचायत → 74वाँ—नगरपालिका → 86वाँ—शिक्षा → 101वाँ—वस्तु एवं सेवा कर → 102वाँ—पिछड़ा वर्ग आयोग → 103वाँ—आर्थिक कमजोर वर्ग → 106वाँ—महिला आरक्षण।

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