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भारतीय संविधान के प्रमुख संशोधन
IMPORTANT CONSTITUTIONAL AMENDMENTS OF INDIA

भारतीय संविधान के प्रमुख संशोधन

भूमि सुधार, मौलिक अधिकार, आपातकाल, पंचायत, शिक्षा, आरक्षण और कर व्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण संशोधन

संविधान संशोधन का अर्थ

भारतीय संविधान समय और आवश्यकता के अनुसार परिवर्तन की अनुमति देता है। संविधान संशोधन की मुख्य प्रक्रिया अनुच्छेद 368 में दी गई है। कुछ संशोधन साधारण बहुमत से होने वाले संवैधानिक परिवर्तनों से अलग होते हैं, जबकि अनुच्छेद 368 के अंतर्गत अधिकांश संशोधनों के लिए संसद में विशेष बहुमत आवश्यक होता है। संघीय स्वरूप से जुड़े कुछ विषयों में कम-से-कम आधे राज्यों की विधानसभाओं की स्वीकृति भी आवश्यक होती है।

01

पहला संशोधन अधिनियम, 1951

भूमि सुधार और नौवीं अनुसूची

पहला संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 स्वतंत्र भारत के प्रारंभिक वर्षों का अत्यंत महत्वपूर्ण संशोधन था। इसका एक प्रमुख उद्देश्य राज्यों द्वारा बनाए गए कृषि और कृषि भूमि सुधार संबंधी कानूनों को संवैधानिक संरक्षण देना था।

इस संशोधन द्वारा अनुच्छेद 31A और 31B जोड़े गए तथा नौवीं अनुसूची बनाई गई। इसका उद्देश्य विशेष रूप से जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार संबंधी कानूनों को मौलिक अधिकारों के आधार पर होने वाली न्यायिक चुनौती से संरक्षण देना था।

पहले संशोधन ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से संबंधित अनुच्छेद 19(2) में भी परिवर्तन किए और राज्य को सामाजिक तथा शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान करने हेतु अनुच्छेद 15(4) का आधार प्रदान किया।

🎯 परीक्षा में याद रखें

पहला संशोधन = अनुच्छेद 31A + 31B + नौवीं अनुसूची + भूमि सुधार।

02

छठा संशोधन अधिनियम, 1956

अंतर्राज्यीय व्यापार पर कर

छठा संविधान संशोधन अधिनियम, 1956 अंतर्राज्यीय व्यापार और वाणिज्य में वस्तुओं के क्रय-विक्रय पर कर से संबंधित था। इस संशोधन द्वारा मुख्य रूप से अनुच्छेद 269 और 286 तथा संघ सूची से संबंधित प्रावधानों में परिवर्तन किए गए।

इसका उद्देश्य अंतर्राज्यीय बिक्री पर कर लगाने और कर राजस्व के वितरण से संबंधित संवैधानिक व्यवस्था को अधिक स्पष्ट करना था।

03

सातवाँ संशोधन अधिनियम, 1956

राज्यों का पुनर्गठन

सातवाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1956 राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के साथ लागू की गई नई राज्य व्यवस्था से संबंधित था। भाषायी और प्रशासनिक आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के बाद संविधान में आवश्यक परिवर्तन किए गए।

इससे राज्यों की पुरानी भाग-क, भाग-ख, भाग-ग और भाग-घ वाली श्रेणियों को समाप्त कर मुख्य रूप से राज्य और केंद्रशासित प्रदेश की व्यवस्था स्थापित की गई।

इस संशोधन से संविधान की प्रथम अनुसूची, दूसरी अनुसूची और सातवीं अनुसूची सहित अनेक प्रावधानों में परिवर्तन किए गए। इसलिए केवल दूसरी और सातवीं अनुसूची कहना अधूरा है।

04

दसवाँ संशोधन अधिनियम, 1961

दादरा और नगर हवेली

दसवें संविधान संशोधन अधिनियम, 1961 द्वारा दादरा और नगर हवेली को भारत के केंद्रशासित प्रदेश के रूप में संविधान की प्रथम अनुसूची में शामिल किया गया।

05

बारहवाँ संशोधन अधिनियम, 1962

गोवा, दमन और दीव

बारहवें संविधान संशोधन अधिनियम, 1962 द्वारा गोवा, दमन और दीव को भारत के केंद्रशासित प्रदेश के रूप में प्रथम अनुसूची में शामिल किया गया। ये क्षेत्र 1961 में पुर्तगाली शासन से मुक्त हुए थे।

बाद में 1987 में गोवा पूर्ण राज्य बना, जबकि दमन और दीव केंद्रशासित प्रदेश बने रहे।

06

चौदहवाँ संशोधन अधिनियम, 1962

पांडिचेरी और केंद्रशासित प्रदेशों की विधानसभाएँ

चौदहवें संविधान संशोधन अधिनियम, 1962 द्वारा तत्कालीन पांडिचेरी, जिसका वर्तमान नाम पुदुचेरी है, को केंद्रशासित प्रदेश के रूप में प्रथम अनुसूची में शामिल किया गया।

इस संशोधन से अनुच्छेद 239A जोड़ा गया, जिसके आधार पर संसद को हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, गोवा-दमन और दीव तथा पांडिचेरी जैसे कुछ केंद्रशासित प्रदेशों के लिए विधानमंडल अथवा मंत्रिपरिषद बनाने की शक्ति दी गई।

07

चौबीसवाँ संशोधन अधिनियम, 1971

संसद की संविधान संशोधन शक्ति

चौबीसवाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1971 अत्यंत महत्वपूर्ण संशोधन है। इसके द्वारा स्पष्ट किया गया कि संसद संविधान के किसी भी भाग, जिसमें मौलिक अधिकार भी शामिल हैं, में अनुच्छेद 368 के अनुसार संशोधन कर सकती है।

राष्ट्रपति के लिए विधिवत पारित संविधान संशोधन विधेयक पर स्वीकृति देना अनिवार्य किया गया।

08

पच्चीसवाँ संशोधन अधिनियम, 1971

संपत्ति का अधिकार और अनुच्छेद 31C

पच्चीसवें संविधान संशोधन अधिनियम, 1971 ने तत्कालीन संपत्ति के मौलिक अधिकार पर राज्य की शक्ति को बढ़ाया और अनुच्छेद 31 में परिवर्तन किया।

इस संशोधन में संपत्ति अधिग्रहण के संदर्भ में “मुआवजा” शब्द के स्थान पर “राशि” की अवधारणा लाई गई, जिससे न्यायालय की समीक्षा का दायरा सीमित करने का प्रयास किया गया।

इस संशोधन द्वारा नया अनुच्छेद 31C जोड़ा गया। इसका उद्देश्य अनुच्छेद 39(b) और 39(c) में दिए नीति-निर्देशक सिद्धांतों को लागू करने वाले कानूनों को अनुच्छेद 14 और 19 के आधार पर चुनौती से विशेष संरक्षण देना था।

यह कहना सही नहीं है कि इसके बाद संपत्ति संबंधी किसी भी कानून को अदालत में चुनौती देना पूर्णतः असंभव हो गया। न्यायिक समीक्षा समाप्त करने वाला इसका अत्यधिक व्यापक भाग सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक व्याख्या के अधीन रहा।

सरकार पहले भी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए कानून के अनुसार निजी संपत्ति का अधिग्रहण कर सकती थी; इस संशोधन ने उस व्यवस्था में राज्य की स्थिति को और मजबूत किया।

⚠️ महत्वपूर्ण सीमा

अनुच्छेद 31C का वर्तमान मुख्य संरक्षण अनुच्छेद 39(b) और 39(c) को लागू करने वाले कानूनों से जुड़ा है।

09

छब्बीसवाँ संशोधन अधिनियम, 1971

प्रिवी पर्स की समाप्ति

छब्बीसवें संविधान संशोधन अधिनियम, 1971 द्वारा पूर्व रियासतों के शासकों को दिए जाने वाले प्रिवी पर्स और उनकी आधिकारिक मान्यता समाप्त कर दी गई।

10

बयालीसवाँ संशोधन अधिनियम, 1976

मिनी संविधान

42वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 अत्यंत व्यापक था, इसलिए इसे प्रायः “मिनी संविधान” कहा जाता है।

इस संशोधन द्वारा संविधान की प्रस्तावना में “समाजवादी”, “धर्मनिरपेक्ष” और “अखंडता” शब्द जोड़े गए।

इस संशोधन द्वारा संविधान में भाग IVA जोड़कर अनुच्छेद 51A के अंतर्गत मौलिक कर्तव्य जोड़े गए। इसे “घोषणा” कहना सही नहीं है। प्रारंभ में 10 मौलिक कर्तव्य थे; 11वाँ कर्तव्य बाद में 86वें संशोधन से जोड़ा गया।

इस संशोधन ने केंद्र सरकार की शक्तियों को कई क्षेत्रों में मजबूत किया और संसद तथा न्यायपालिका से संबंधित अनेक संवैधानिक प्रावधानों में परिवर्तन किए। इसे केवल “नौकरशाही बढ़ाई गई” कहना स्पष्ट संवैधानिक तथ्य नहीं है।

राज्य सूची से पाँच विषय समवर्ती सूची में स्थानांतरित किए गए—शिक्षा, वन, वन्य जीव एवं पक्षियों का संरक्षण, बाट और माप तथा न्याय प्रशासन व उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय को छोड़कर अन्य न्यायालयों का संगठन

इस संशोधन द्वारा अनुच्छेद 48A जोड़ा गया, जिसके अनुसार राज्य पर्यावरण की रक्षा और सुधार तथा वन एवं वन्य जीवों की सुरक्षा का प्रयास करेगा।

अनुच्छेद 43A जोड़ा गया, जिसमें उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी को बढ़ावा देने की बात कही गई।

लोकसभा और राज्य विधानसभाओं का सामान्य कार्यकाल 5 वर्ष से बढ़ाकर 6 वर्ष किया गया। बाद में 44वें संशोधन ने इसे पुनः 5 वर्ष कर दिया।

42वें संशोधन ने अनुच्छेद 31C का संरक्षण सभी नीति-निर्देशक सिद्धांतों तक बढ़ाने का प्रयास किया था, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने मिनर्वा मिल्स मामले में इस विस्तार को असंवैधानिक घोषित कर दिया।

🎯 सबसे महत्वपूर्ण जोड़ी

42वाँ संशोधन = प्रस्तावना में 3 शब्द + मौलिक कर्तव्य + 5 विषय समवर्ती सूची + 48A + 43A।

11

चवालीसवाँ संशोधन अधिनियम, 1978

आपातकालीन प्रावधान और संपत्ति का अधिकार

44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची से हटा दिया गया। अब संपत्ति का अधिकार अनुच्छेद 300A के अंतर्गत संवैधानिक अथवा कानूनी अधिकार है, मौलिक अधिकार नहीं।

राष्ट्रीय आपातकाल से संबंधित अनुच्छेद 352 में “आंतरिक अशांति” के स्थान पर “सशस्त्र विद्रोह” शब्द रखा गया।

राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद की सलाह को एक बार पुनर्विचार के लिए वापस भेजने की शक्ति दी गई। पुनर्विचार के बाद वही सलाह दोबारा दी जाए तो राष्ट्रपति उसका पालन करने के लिए बाध्य होता है।

अनुच्छेद 257 नहीं हटाया गया। सही तथ्य यह है कि 42वें संशोधन से जोड़ा गया अनुच्छेद 257A 44वें संशोधन द्वारा हटा दिया गया।

लोकसभा और विधानसभाओं का कार्यकाल पुनः 6 वर्ष से घटाकर 5 वर्ष किया गया।

आपातकाल के दौरान भी अनुच्छेद 20 और अनुच्छेद 21 के अधिकारों के प्रवर्तन को निलंबित नहीं किया जा सकता—यह 44वें संशोधन की अत्यंत महत्वपूर्ण सुरक्षा है।

राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा के लिए मंत्रिमंडल की लिखित सलाह आवश्यक की गई।

12

इक्यावनवाँ संशोधन अधिनियम, 1984

पूर्वोत्तर में अनुसूचित जनजाति आरक्षण

51वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1984 द्वारा नागालैंड, मेघालय, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश में अनुसूचित जनजातियों के लिए लोकसभा तथा संबंधित विधानसभाओं में सीटों के आरक्षण से जुड़े विशेष प्रावधान किए गए।

इसके लिए मुख्य रूप से अनुच्छेद 330 और 332 में संशोधन किया गया।

13

बावनवाँ संशोधन अधिनियम, 1985

दल-बदल विरोधी कानून

52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा संसद और राज्य विधानमंडलों के सदस्यों को राजनीतिक दल-बदल के आधार पर अयोग्य ठहराने की संवैधानिक व्यवस्था बनाई गई।

इस संशोधन द्वारा संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी गई, जिसे सामान्यतः दल-बदल विरोधी कानून कहा जाता है।

इस संशोधन से अनुच्छेद 101, 102, 190 और 191 में आवश्यक परिवर्तन किए गए।

संशोधन को 15 फरवरी 1985 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली, जबकि संबंधित दल-बदल प्रावधान 1 मार्च 1985 से प्रभावी हुए।

बाद में 91वें संविधान संशोधन, 2003 ने दल-बदल से संबंधित व्यवस्था को और कठोर किया और एक-तिहाई सदस्यों वाले “विभाजन” की छूट समाप्त कर दी।

14

इकसठवाँ संशोधन अधिनियम, 1988

मतदान की आयु 18 वर्ष

61वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1988 द्वारा लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों में मतदान की न्यूनतम आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई।

इसके लिए अनुच्छेद 326 में संशोधन किया गया। इस परिवर्तन का चुनावी प्रभाव 1989 से दिखाई पड़ा, इसलिए कई पुरानी पुस्तकों में इसे “1989 का संशोधन” लिखा मिलता है, लेकिन अधिनियम का सही नाम 61वाँ संशोधन अधिनियम, 1988 है।

15

पैंसठवाँ संशोधन अधिनियम, 1990

अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग

65वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1990 द्वारा अनुच्छेद 338 में संशोधन कर अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए बहुसदस्यीय राष्ट्रीय आयोग की संवैधानिक व्यवस्था की गई।

बाद में 89वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 के द्वारा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए अलग-अलग राष्ट्रीय आयोग बनाए गए। अनुसूचित जनजाति आयोग के लिए अनुच्छेद 338A जोड़ा गया।

16

उनहत्तरवाँ संशोधन अधिनियम, 1991

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली

69वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1991 द्वारा केंद्रशासित प्रदेश दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली का विशेष संवैधानिक दर्जा दिया गया।

इस संशोधन द्वारा अनुच्छेद 239AA और 239AB जोड़े गए। दिल्ली के लिए विधानसभा और मंत्रिपरिषद की व्यवस्था की गई, जबकि सार्वजनिक व्यवस्था, पुलिस और भूमि जैसे कुछ महत्वपूर्ण विषय संघ के नियंत्रण में रखे गए।

17

इकहत्तरवाँ संशोधन अधिनियम, 1992

तीन भाषाएँ आठवीं अनुसूची में

71वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया।

18

तिहत्तरवाँ संशोधन अधिनियम, 1992

पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा

73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा भारत में पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिया गया। यह संशोधन 24 अप्रैल 1993 से प्रभावी हुआ। इसी कारण प्रत्येक वर्ष 24 अप्रैल को राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस मनाया जाता है।

संविधान में नया भाग IX जोड़ा गया, जिसमें अनुच्छेद 243 से 243O तक पंचायतों से संबंधित प्रावधान दिए गए।

इसके साथ ग्यारहवीं अनुसूची जोड़ी गई, जिसमें पंचायतों से संबंधित 29 विषय हैं।

राज्यों पर संविधान के भाग IX के अनुसार पंचायती राज संस्थाओं की व्यवस्था करने का संवैधानिक दायित्व आया।

पंचायतों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण तथा महिलाओं के लिए कम-से-कम एक-तिहाई सीटों का आरक्षण निर्धारित किया गया। कई राज्यों ने बाद में महिलाओं का आरक्षण 50 प्रतिशत कर दिया।

पंचायतों का सामान्य कार्यकाल 5 वर्ष निर्धारित किया गया और प्रत्येक राज्य में राज्य निर्वाचन आयोग तथा राज्य वित्त आयोग की व्यवस्था की गई।

मध्य प्रदेश ने 73वें संशोधन के बाद नई व्यवस्था के अनुरूप पंचायती राज कानून बनाया और 1994 में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव कराने वाला पहला राज्य माना जाता है। इसे “भारत में पंचायती राज पहली बार मध्य प्रदेश ने लागू किया” नहीं समझना चाहिए, क्योंकि आधुनिक पंचायती राज व्यवस्था का उद्घाटन इससे बहुत पहले 1959 में राजस्थान में हो चुका था।

19

चौहत्तरवाँ संशोधन अधिनियम, 1992

शहरी स्थानीय निकाय

74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 ने नगरपालिकाओं और अन्य शहरी स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा दिया।

इससे संविधान में भाग IXA तथा बारहवीं अनुसूची जोड़ी गई। बारहवीं अनुसूची में नगरपालिकाओं से संबंधित 18 विषय हैं।

20

अस्सीवाँ संशोधन अधिनियम, 2000

केंद्र और राज्यों के बीच कर बँटवारा

80वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2000 द्वारा संघ और राज्यों के बीच केंद्रीय करों के बँटवारे के लिए नई व्यवस्था लागू की गई। यह व्यवस्था दसवें वित्त आयोग की सिफारिशों से संबंधित थी।

इसके तहत कुछ अपवादों को छोड़कर केंद्र द्वारा लगाए और वसूले जाने वाले करों के शुद्ध आगम में राज्यों की हिस्सेदारी की व्यापक व्यवस्था बनाई गई और अनुच्छेद 269 तथा 270 में परिवर्तन किए गए।

21

पचासीवाँ संशोधन अधिनियम, 2001

पदोन्नति में परिणामिक वरिष्ठता

85वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सरकारी कर्मचारियों के लिए आरक्षण के आधार पर पदोन्नति में परिणामिक वरिष्ठता का प्रावधान किया।

इसके लिए मुख्य रूप से अनुच्छेद 16(4A) में परिवर्तन किया गया। इसका प्रभाव 17 जून 1995 से पूर्वव्यापी रूप से दिया गया।

22

छियासीवाँ संशोधन अधिनियम, 2002

शिक्षा का मौलिक अधिकार

86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा 6 से 14 वर्ष के बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराने को मौलिक अधिकार बनाया गया।

इसके लिए नया अनुच्छेद 21A जोड़ा गया।

अनुच्छेद 51A में नया खंड 51A(k) जोड़कर माता-पिता अथवा अभिभावक का यह मौलिक कर्तव्य बनाया गया कि वे 6 से 14 वर्ष के बच्चे को शिक्षा का अवसर प्रदान करें।

अनुच्छेद 45 को बदलकर 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए प्रारंभिक बाल्य देखभाल और शिक्षा उपलब्ध कराने का प्रयास राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों में रखा गया।

23

इक्यानवेवाँ संशोधन अधिनियम, 2003

मंत्रिपरिषद का आकार और दल-बदल

91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 ने दल-बदल विरोधी व्यवस्था को अधिक कठोर किया। दसवीं अनुसूची में एक-तिहाई सदस्यों के दल छोड़ने पर मिलने वाली “विभाजन” की छूट समाप्त की गई।

केंद्र और राज्यों में मंत्रिपरिषद का आकार सामान्यतः संबंधित सदन की कुल सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत तक सीमित किया गया। राज्यों में मंत्रियों की न्यूनतम संख्या 12 रखी गई।

24

तिरानवेवाँ संशोधन अधिनियम, 2005

शैक्षणिक संस्थानों में विशेष प्रावधान

93वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2005 द्वारा अनुच्छेद 15(5) जोड़ा गया। इसलिए इसे अनुच्छेद 15(4) में किया गया संशोधन कहना सही नहीं है।

इससे राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश संबंधी विशेष प्रावधान बनाने की शक्ति मिली। इसमें राज्य द्वारा सहायता प्राप्त और निजी गैर-अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान भी शामिल हो सकते हैं।

अनुच्छेद 30(1) के अंतर्गत अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को इस प्रावधान से बाहर रखा गया।

अधिनियम 2005 का है और संबंधित संवैधानिक प्रावधान 20 जनवरी 2006 से प्रभावी हुआ, इसलिए कुछ पुस्तकों में 2005/2006 दोनों वर्ष दिखाई देते हैं।

25

सत्तानवेवाँ संशोधन अधिनियम, 2011

सहकारी समितियाँ

97वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2011 का उद्देश्य सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन, लोकतांत्रिक नियंत्रण और स्वतंत्र कार्यप्रणाली को संवैधानिक प्रोत्साहन देना था।

अनुच्छेद 19(1)(c) में सहकारी समितियाँ बनाने के अधिकार को शामिल किया गया और नीति-निर्देशक सिद्धांतों में नया अनुच्छेद 43B जोड़ा गया।

संविधान में नया भाग IXB भी जोड़ा गया, जिसमें सहकारी समितियों से संबंधित प्रावधान थे।

बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने 2021 में निर्णय दिया कि राज्य स्तर की सहकारी समितियों पर लागू भाग IXB के उन प्रावधानों के लिए आवश्यक राज्य अनुसमर्थन नहीं लिया गया था। इसलिए इसका वह हिस्सा राज्य सहकारी समितियों के संबंध में प्रभावी नहीं रहा, जबकि बहुराज्यीय सहकारी समितियों से संबंधित संवैधानिक व्यवस्था बनी रही।

26

सौवाँ संशोधन अधिनियम, 2015

भारत-बांग्लादेश भूमि सीमा समझौता

100वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2015 का संबंध भारत और बांग्लादेश के बीच भूमि सीमा समझौते को लागू करने से था।

इसके तहत दोनों देशों के बीच कुछ भू-भागों और अंतःक्षेत्रों के आदान-प्रदान को संवैधानिक रूप देने के लिए प्रथम अनुसूची में आवश्यक परिवर्तन किए गए।

27

एक सौ पहला संशोधन अधिनियम, 2016

वस्तु एवं सेवा कर

101वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2016 वस्तु एवं सेवा कर की संवैधानिक व्यवस्था से संबंधित है। इसे “101वाँ संशोधन अधिनियम, 2017” कहना सही नहीं है।

इस संशोधन ने केंद्र और राज्यों के अनेक अप्रत्यक्ष करों को एक व्यापक वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था में समाहित करने का संवैधानिक आधार बनाया।

नए अनुच्छेद 246A ने संसद और राज्य विधानमंडलों को वस्तु एवं सेवा कर पर कानून बनाने की शक्ति दी। अनुच्छेद 269A अंतर्राज्यीय वस्तु एवं सेवा कर से संबंधित है और अनुच्छेद 279A के अंतर्गत वस्तु एवं सेवा कर परिषद बनाई गई।

वस्तु एवं सेवा कर भारत में 1 जुलाई 2017 से लागू हुआ, लेकिन इसे सक्षम करने वाला संविधान संशोधन 2016 का है।

⚠️ वर्ष में भ्रम न करें

101वाँ संविधान संशोधन — 2016; वस्तु एवं सेवा कर लागू — 1 जुलाई 2017।

28

एक सौ दूसरा संशोधन अधिनियम, 2018

राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग

102वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2018 द्वारा राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा दिया गया।

इसके लिए नया अनुच्छेद 338B जोड़ा गया। साथ ही अनुच्छेद 342A और अनुच्छेद 366 में संबंधित प्रावधान जोड़े गए।

29

एक सौ तीसरा संशोधन अधिनियम, 2019

आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग का आरक्षण

103वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2019 द्वारा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए शिक्षा संस्थानों में प्रवेश और सरकारी नौकरियों में अधिकतम 10 प्रतिशत आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान किया गया।

इसके लिए अनुच्छेद 15(6) और 16(6) जोड़े गए। यह प्रावधान उन आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए है जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के मौजूदा आरक्षण के अंतर्गत नहीं आते।

30

एक सौ चौथा संशोधन अधिनियम, 2019

अनुसूचित जाति-जनजाति आरक्षण की अवधि

104वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2019 25 जनवरी 2020 से प्रभावी हुआ। इसलिए सामान्य पुस्तकों में इसे 2019 और 2020 दोनों संदर्भों में देखा जा सकता है।

इस संशोधन ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सीट आरक्षण की संवैधानिक अवधि 70 वर्ष से बढ़ाकर 80 वर्ष कर दी, अर्थात इसे 25 जनवरी 2030 तक बढ़ाया गया।

एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में नामांकन द्वारा प्रतिनिधित्व की विशेष अवधि को आगे नहीं बढ़ाया गया। इसलिए यह व्यवस्था 70 वर्ष की अवधि पूरी होने के बाद समाप्त हो गई।

जम्मू-कश्मीर से संबंधित दिया जाने वाला कथन इस संशोधन का भाग नहीं है। जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 द्वारा हुआ, जिसके तहत 31 अक्टूबर 2019 से पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर राज्य को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख नामक दो केंद्रशासित प्रदेशों में पुनर्गठित किया गया।

❌ सामान्य गलती

104वाँ संशोधन = जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन — गलत। दोनों अलग संवैधानिक/वैधानिक घटनाएँ हैं।

31

एक सौ पाँचवाँ संशोधन अधिनियम, 2021

राज्यों की पिछड़ा वर्ग पहचान शक्ति

105वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2021 ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की अपने उद्देश्यों के लिए सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान करने तथा अपनी सूची बनाए रखने की शक्ति स्पष्ट रूप से बहाल की।

यह संशोधन 102वें संशोधन के बाद उत्पन्न संवैधानिक विवाद की पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण है।

32

एक सौ छठा संशोधन अधिनियम, 2023

महिला आरक्षण

106वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2023, जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम भी कहा जाता है, लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए लगभग एक-तिहाई सीटों के आरक्षण से संबंधित है।

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में भी महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान किया गया है।

इस आरक्षण का वास्तविक क्रियान्वयन संशोधन के बाद होने वाली पहली जनगणना के आंकड़े प्रकाशित होने और उसके आधार पर परिसीमन किए जाने से जुड़ा है।

33

सबसे महत्वपूर्ण भ्रम और सही तथ्य

परीक्षा में गलती से बचने के लिए

गलत: पहला संशोधन केवल भूमि सुधार से संबंधित था। सही: इसमें 31A, 31B, नौवीं अनुसूची के साथ अन्य महत्वपूर्ण संवैधानिक परिवर्तन भी हुए।

गलत: 42वें संशोधन ने अनुच्छेद 51A में “घोषणा” जोड़ी। सही: इसने भाग IVA और मौलिक कर्तव्य जोड़े।

गलत: 44वें संशोधन ने अनुच्छेद 257 हटा दिया। सही: अनुच्छेद 257A हटाया गया।

गलत: 61वाँ संशोधन अधिनियम 1989। सही: 61वाँ संशोधन अधिनियम, 1988 — मतदान आयु 21 से 18 वर्ष।

अधूरा: 73वाँ संशोधन सबसे पहले मध्य प्रदेश ने लागू किया। सही: संशोधन 24 अप्रैल 1993 से पूरे संवैधानिक ढाँचे में प्रभावी हुआ; मध्य प्रदेश 1994 में इसके अनुरूप पंचायत चुनाव कराने वाला पहला राज्य माना जाता है।

गलत: 93वें संशोधन में अनुच्छेद 15(4) जोड़ा गया। सही: अनुच्छेद 15(5) जोड़ा गया।

गलत: 97वें संशोधन ने अनुच्छेद 43(ख) जोड़ा। सही: नया अनुच्छेद 43B जोड़ा गया।

गलत: 101वाँ संशोधन अधिनियम 2017। सही: अधिनियम 2016; वस्तु एवं सेवा कर 1 जुलाई 2017 से लागू।

गलत: 104वें संशोधन ने जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद 1 में राज्य के रूप में जोड़ा। सही: जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन अलग जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 से हुआ।

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एक नज़र में प्रमुख संशोधन

त्वरित परीक्षा तालिका

संशोधन वर्ष मुख्य विषय
पहला195131A, 31B, नौवीं अनुसूची, भूमि सुधार
छठा1956अंतर्राज्यीय बिक्री पर कर
सातवाँ1956राज्यों का पुनर्गठन
दसवाँ1961दादरा और नगर हवेली
बारहवाँ1962गोवा, दमन और दीव
चौदहवाँ1962पांडिचेरी, अनुच्छेद 239A
चौबीसवाँ1971संसद की संशोधन शक्ति
पच्चीसवाँ1971संपत्ति अधिकार, अनुच्छेद 31C
छब्बीसवाँ1971प्रिवी पर्स समाप्त
बयालीसवाँ1976मिनी संविधान, मौलिक कर्तव्य
चवालीसवाँ1978संपत्ति अधिकार हटाया, आपातकाल सुधार
इक्यावनवाँ1984पूर्वोत्तर में जनजातीय आरक्षण
बावनवाँ1985दल-बदल कानून, दसवीं अनुसूची
इकसठवाँ1988मतदान आयु 18 वर्ष
पैंसठवाँ1990राष्ट्रीय अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग
उनहत्तरवाँ1991राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली
इकहत्तरवाँ1992कोंकणी, मणिपुरी, नेपाली
तिहत्तरवाँ1992पंचायती राज
चौहत्तरवाँ1992नगरपालिका
अस्सीवाँ2000करों का केंद्र-राज्य बँटवारा
पचासीवाँ2001पदोन्नति में परिणामिक वरिष्ठता
छियासीवाँ2002अनुच्छेद 21A, शिक्षा का अधिकार
इक्यानवेवाँ2003मंत्रिपरिषद आकार, दल-बदल सुधार
तिरानवेवाँ2005अनुच्छेद 15(5), शैक्षणिक प्रवेश
सत्तानवेवाँ2011सहकारी समितियाँ
सौवाँ2015भारत-बांग्लादेश भूमि सीमा समझौता
एक सौ पहला2016वस्तु एवं सेवा कर
एक सौ दूसरा2018राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग
एक सौ तीसरा2019आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को 10% आरक्षण
एक सौ चौथा2019अनुसूचित जाति-जनजाति सीट आरक्षण अवधि बढ़ी
एक सौ पाँचवाँ2021राज्यों की पिछड़ा वर्ग सूची की शक्ति
एक सौ छठा2023महिला आरक्षण

⚡ अंतिम त्वरित पुनरावृत्ति

पहला — 1951 — भूमि सुधार, 31A, 31B और नौवीं अनुसूची।

सातवाँ — 1956 — राज्यों का पुनर्गठन।

चौबीसवाँ — 1971 — संसद की संविधान संशोधन शक्ति।

पच्चीसवाँ — 1971 — अनुच्छेद 31C।

छब्बीसवाँ — 1971 — प्रिवी पर्स समाप्त।

बयालीसवाँ — 1976 — मिनी संविधान; समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, अखंडता; मौलिक कर्तव्य।

चवालीसवाँ — 1978 — संपत्ति मौलिक अधिकार नहीं; सशस्त्र विद्रोह; 5 वर्ष का कार्यकाल।

बावनवाँ — 1985 — दल-बदल विरोधी कानून और दसवीं अनुसूची।

इकसठवाँ — 1988 — मतदान आयु 21 से 18 वर्ष।

उनहत्तरवाँ — 1991 — राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली।

तिहत्तरवाँ — 1992 — पंचायतें; भाग IX; ग्यारहवीं अनुसूची; 29 विषय।

चौहत्तरवाँ — 1992 — नगरपालिकाएँ; भाग IXA; बारहवीं अनुसूची; 18 विषय।

छियासीवाँ — 2002 — अनुच्छेद 21A; 6–14 वर्ष शिक्षा का अधिकार।

तिरानवेवाँ — 2005 — अनुच्छेद 15(5)।

सत्तानवेवाँ — 2011 — सहकारी समितियाँ; 43B और भाग IXB।

सौवाँ — 2015 — भारत-बांग्लादेश भूमि सीमा समझौता।

101वाँ — 2016 — वस्तु एवं सेवा कर; लागू 1 जुलाई 2017।

102वाँ — 2018 — राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा।

103वाँ — 2019 — आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को 10% आरक्षण।

104वाँ — 2019 — अनुसूचित जाति-जनजाति सीट आरक्षण अवधि 2030 तक।

105वाँ — 2021 — राज्यों की पिछड़ा वर्ग पहचान शक्ति।

106वाँ — 2023 — लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान।

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