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मांटेग्यू घोषणा (20 अगस्त 1917)
MONTAGU DECLARATION

मांटेग्यू घोषणा
(20 अगस्त 1917)

उत्तरदायी शासन की दिशा में ब्रिटिश घोषणा

20 अगस्त 1917 ई. को भारत सचिव एडविन सैमुअल मांटेग्यू ने ब्रिटिश सरकार की भारत संबंधी नई संवैधानिक नीति की घोषणा की। इसी कारण इसे मांटेग्यू घोषणा अथवा अगस्त घोषणा कहा जाता है।

इस घोषणा में पहली बार ब्रिटिश सरकार ने अपनी घोषित नीति के रूप में भारत में उत्तरदायी शासन की दिशा में क्रमिक प्रगति और प्रशासन की प्रत्येक शाखा में भारतीयों की बढ़ती भागीदारी की बात स्वीकार की।

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घोषणा की सही तिथि

मांटेग्यू घोषणा की सही तिथि 20 अगस्त 1917 ई. है।

इसे 20 अगस्त 1947 लिखना गलत है। 1947 भारत की स्वतंत्रता का वर्ष था, जबकि मांटेग्यू घोषणा प्रथम विश्व युद्ध के दौरान 1917 में हुई थी।

उस समय एडविन मांटेग्यू भारत सचिव और लॉर्ड चेम्सफोर्ड भारत के वायसराय थे।

परीक्षा के लिए

20 अगस्त 1917 → मांटेग्यू घोषणा → भारत सचिव एडविन मांटेग्यू → वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड।

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घोषणा की पृष्ठभूमि

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारत ने ब्रिटिश साम्राज्य को सैनिक, धन और संसाधनों के रूप में व्यापक सहायता दी थी।

इस सहयोग के बदले भारतीय नेताओं को आशा थी कि ब्रिटिश सरकार भारत को अधिक राजनीतिक अधिकार और स्वशासन की दिशा में वास्तविक संवैधानिक सुधार देगी।

इसी समय होमरूल आंदोलन, कांग्रेस की बढ़ती स्वशासन की मांग और भारतीय राजनीतिक दबाव ने ब्रिटिश सरकार को अपनी संवैधानिक नीति स्पष्ट करने के लिए मजबूर किया।

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मांटेग्यू घोषणा का मुख्य उद्देश्य

मांटेग्यू घोषणा में ब्रिटिश सरकार ने भारत के प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी को धीरे-धीरे बढ़ाने की नीति स्वीकार की।

इसके साथ भारत में स्वशासी संस्थाओं के क्रमिक विकास और अंततः ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत उत्तरदायी शासन की दिशा में आगे बढ़ने की बात कही गई।

हालाँकि इस घोषणा में पूर्ण स्वतंत्रता या तुरंत उत्तरदायी शासन देने की बात नहीं थी। राजनीतिक प्रगति को चरणबद्ध और ब्रिटिश सरकार द्वारा नियंत्रित प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया गया।

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उत्तरदायी शासन का अर्थ

उत्तरदायी शासन का अर्थ ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था से है जिसमें शासन चलाने वाले मंत्री निर्वाचित प्रतिनिधियों के प्रति उत्तरदायी हों।

1917 की घोषणा में इस दिशा में प्रगति स्वीकार करना महत्वपूर्ण था, क्योंकि इससे पहले ब्रिटिश सरकार ने उत्तरदायी शासन को भारत के संवैधानिक विकास का घोषित अंतिम लक्ष्य इस स्पष्ट रूप में स्वीकार नहीं किया था।

फिर भी इसका तत्काल अर्थ यह नहीं था कि भारत को पूर्ण संसदीय उत्तरदायी शासन प्रदान कर दिया गया।

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मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार

मांटेग्यू घोषणा के बाद भारत सचिव एडविन मांटेग्यू भारत आए और वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड के साथ भारतीय राजनीतिक स्थिति और संवैधानिक सुधारों का अध्ययन किया।

दोनों ने मिलकर संवैधानिक सुधारों की योजना तैयार की, जिसे मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार कहा गया।

इन सुधारों की रिपोर्ट 1918 में प्रकाशित हुई और आगे इसके आधार पर ब्रिटिश संसद ने भारत सरकार अधिनियम, 1919 पारित किया।

महत्वपूर्ण क्रम

मांटेग्यू घोषणा 1917 → मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट 1918 → भारत सरकार अधिनियम 1919।

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भारत सरकार अधिनियम, 1919 का आधार

मांटेग्यू घोषणा भारत सरकार अधिनियम, 1919 की महत्वपूर्ण संवैधानिक आधारभूमि बनी।

1919 का अधिनियम मांटेग्यू और चेम्सफोर्ड द्वारा प्रस्तुत संवैधानिक सुधारों पर आधारित था।

इस अधिनियम के माध्यम से प्रांतों में द्वैध शासन की व्यवस्था लागू की गई और केंद्रीय विधानमंडल को द्विसदनीय बनाया गया।

हालाँकि वास्तविक सत्ता का बड़ा भाग अभी भी ब्रिटिश अधिकारियों और गवर्नर-जनरल के नियंत्रण में बना रहा।

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उदारवादियों की प्रतिक्रिया

भारतीय राजनीति के कुछ उदारवादी नेताओं ने मांटेग्यू घोषणा को महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रगति माना।

प्रतियोगी परीक्षा साहित्य में इस घोषणा को उदारवादियों द्वारा “भारत का मैग्नाकार्टा” कहे जाने का उल्लेख मिलता है।

उनका मानना था कि ब्रिटिश सरकार द्वारा उत्तरदायी शासन को घोषित नीति के रूप में स्वीकार करना आगे के संवैधानिक विकास के लिए महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकता है।

परीक्षा के लिए

मांटेग्यू घोषणा → उदारवादी नेताओं से “भारत का मैग्नाकार्टा” कथन जुड़ा मिलता है।

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बाल गंगाधर तिलक की प्रतिक्रिया

बाल गंगाधर तिलक ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रस्तावित संवैधानिक सुधारों से संतुष्ट नहीं थे।

प्रतियोगी परीक्षाओं में तिलक से “सूर्यविहीन उषाकाल” कथन जोड़ा जाता है।

अधिक सटीक रूप में यह आलोचना आगे सामने आए मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों के लिए प्रयुक्त मानी जाती है, जिन्हें तिलक ने अपर्याप्त और निराशाजनक माना।

इसलिए “तिलक ने सीधे 20 अगस्त 1917 की घोषणा को ही सूर्यविहीन उषाकाल कहा” लिखने के बजाय इसे मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों की आलोचना के संदर्भ में रखना अधिक स्पष्ट है।

भ्रम से बचें

“सूर्यविहीन उषाकाल” → बाल गंगाधर तिलक → मुख्यतः मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों की आलोचना से संबंधित।

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एनी बेसेंट की प्रतिक्रिया

एनी बेसेंट भी मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों से संतुष्ट नहीं थीं।

उन्होंने इन सुधारों को भारत की राजनीतिक अपेक्षाओं की तुलना में बहुत सीमित माना।

उनसे यह प्रसिद्ध कथन जुड़ा है कि ये सुधार इंग्लैंड द्वारा देने और भारत द्वारा स्वीकार करने—दोनों के योग्य नहीं थे।

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घोषणा की प्रमुख सीमा

मांटेग्यू घोषणा की सबसे बड़ी सीमा यह थी कि इसमें भारत को उत्तरदायी शासन देने के लिए कोई निश्चित समय-सीमा नहीं बताई गई।

ब्रिटिश सरकार ने यह अधिकार अपने पास रखा कि भारत में राजनीतिक प्रगति किस गति से और किस सीमा तक होगी।

इस कारण अनेक राष्ट्रवादी नेताओं ने इसे अस्पष्ट और अपर्याप्त माना।

भारतीयों की तत्काल स्वशासन की अपेक्षा की तुलना में यह केवल क्रमिक संवैधानिक सुधार का आश्वासन था।

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मांटेग्यू घोषणा का महत्व

मांटेग्यू घोषणा ब्रिटिश भारत के संवैधानिक विकास में एक महत्वपूर्ण मोड़ थी क्योंकि इसमें उत्तरदायी शासन की दिशा को ब्रिटिश नीति के रूप में स्वीकार किया गया।

इसने आगे होने वाले मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों और भारत सरकार अधिनियम, 1919 की संवैधानिक पृष्ठभूमि तैयार की।

इसके बावजूद भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन अब केवल सीमित प्रशासनिक सुधारों से संतुष्ट नहीं था और आने वाले वर्षों में स्वशासन तथा स्वतंत्रता की मांग अधिक तीव्र हुई।

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घटनाओं का सही क्रम

वर्ष / तिथि घटना
1914 प्रथम विश्व युद्ध प्रारंभ
1916 होमरूल आंदोलन और लखनऊ समझौता
20 अगस्त 1917 मांटेग्यू घोषणा
1918 मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट
1919 भारत सरकार अधिनियम, 1919
1919 प्रांतों में द्वैध शासन की संवैधानिक व्यवस्था का आधार
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परीक्षा में भ्रमित करने वाले तथ्य

मांटेग्यू घोषणा — 20 अगस्त 1917, 1947 नहीं।

इसे अगस्त घोषणा भी कहा जाता है।

घोषणा करने वाले भारत सचिव एडविन मांटेग्यू थे।

उस समय भारत के वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड थे।

इस घोषणा में प्रशासन की विभिन्न शाखाओं में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाने और उत्तरदायी शासन की दिशा में क्रमिक प्रगति का लक्ष्य स्वीकार किया गया।

मांटेग्यू घोषणा → मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार → भारत सरकार अधिनियम 1919 का क्रम याद रखें।

प्रतियोगी परीक्षा साहित्य में इसे उदारवादियों द्वारा भारत का मैग्नाकार्टा कहे जाने का उल्लेख मिलता है।

“सूर्यविहीन उषाकाल” → बाल गंगाधर तिलक से जुड़ा प्रसिद्ध कथन है, लेकिन इसे अधिक सटीक रूप से मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों की आलोचना से जोड़ना चाहिए।

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एक नजर में

तथ्य विवरण
घोषणा मांटेग्यू घोषणा
अन्य नाम अगस्त घोषणा
तिथि 20 अगस्त 1917
घोषणाकर्ता एडविन मांटेग्यू
पद भारत सचिव
वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड
मुख्य लक्ष्य भारत में क्रमिक उत्तरदायी शासन का विकास
आगे का विकास मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार
कानून भारत सरकार अधिनियम, 1919
उदारवादी परीक्षा-तथ्य भारत का मैग्नाकार्टा
तिलक से जुड़ा कथन सूर्यविहीन उषाकाल

अंतिम त्वरित पुनरावृत्ति

मांटेग्यू घोषणा 20 अगस्त 1917 ई. को हुई थी, 20 अगस्त 1947 को नहीं।

इस घोषणा को अगस्त घोषणा भी कहा जाता है।

घोषणा भारत सचिव एडविन मांटेग्यू ने की थी।

उस समय भारत के वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड थे।

घोषणा में भारत के प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाने और उत्तरदायी शासन की दिशा में क्रमिक प्रगति की नीति स्वीकार की गई।

इसमें भारत को तत्काल पूर्ण स्वशासन देने या इसके लिए कोई निश्चित समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई थी।

मांटेग्यू घोषणा के बाद मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार तैयार किए गए।

इन सुधारों की रिपोर्ट 1918 में प्रकाशित हुई।

इसी संवैधानिक प्रक्रिया के आधार पर भारत सरकार अधिनियम, 1919 पारित किया गया।

प्रतियोगी परीक्षा साहित्य में उदारवादियों द्वारा मांटेग्यू घोषणा को “भारत का मैग्नाकार्टा” कहे जाने का उल्लेख मिलता है।

बाल गंगाधर तिलक ने आगे के मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों को अपर्याप्त मानते हुए उन्हें “सूर्यविहीन उषाकाल” कहा।

एनी बेसेंट भी प्रस्तावित सुधारों को भारत की अपेक्षाओं की तुलना में अपर्याप्त मानती थीं।

परीक्षा के लिए मुख्य क्रम है — 1916 होमरूल एवं लखनऊ समझौता → 20 अगस्त 1917 मांटेग्यू घोषणा → 1918 मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट → 1919 भारत सरकार अधिनियम।

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