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माउंटबेटन योजना
MOUNTBATTEN PLAN

माउंटबेटन योजना

3 जून 1947 — भारत का विभाजन, सत्ता हस्तांतरण और स्वतंत्रता की अंतिम योजना

माउंटबेटन योजना की पृष्ठभूमि

1946 की कैबिनेट मिशन योजना भारत को एक संयुक्त संघ के रूप में बनाए रखने में सफल नहीं हो सकी। कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच राजनीतिक मतभेद बढ़ते गए और देश में सांप्रदायिक हिंसा भी गंभीर होती गई। ब्रिटिश सरकार ने अंततः यह स्वीकार किया कि सत्ता हस्तांतरण में और अधिक देरी करना कठिन होगा। इसी परिस्थिति में लॉर्ड माउंटबेटन को भारत भेजा गया और जून 1947 में भारत के विभाजन तथा सत्ता हस्तांतरण की अंतिम योजना सामने आई।

01

एटली की 20 फरवरी 1947 की घोषणा

ब्रिटिश शासन समाप्त करने की समय-सीमा

ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने 20 फरवरी 1947 को घोषणा की कि ब्रिटिश सरकार भारत में सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को अब और लंबा नहीं खींचेगी।

ब्रिटिश सरकार ने सत्ता हस्तांतरण के लिए अधिकतम समय-सीमा जून 1948 निर्धारित की थी।

लेकिन भारत की तेजी से बिगड़ती राजनीतिक और सांप्रदायिक स्थिति के कारण सत्ता हस्तांतरण निर्धारित अंतिम समय से काफी पहले कर दिया गया। ब्रिटिश संसद के 3 जून 1947 के वक्तव्य में भी फरवरी 1947 की इसी घोषणा और जून 1948 की मूल समय-सीमा का उल्लेख किया गया था।

🎯 तिथि याद रखें

20 फरवरी 1947 — एटली की घोषणा — जून 1948 तक सत्ता हस्तांतरण का लक्ष्य।

02

लॉर्ड माउंटबेटन का भारत आगमन

24 मार्च 1947

लॉर्ड लुई माउंटबेटन ने 24 मार्च 1947 को भारत के वायसराय के रूप में पदभार संभाला।

वे ब्रिटिश भारत के अंतिम वायसराय थे। उनका प्रमुख दायित्व भारतीय नेताओं से समझौता कर सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को पूरा करना था।

स्वतंत्रता के बाद माउंटबेटन स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर-जनरल बने।

इसलिए उन्हें “भारत का अंतिम गवर्नर-जनरल” कहना सही नहीं है। स्वतंत्र भारत के अंतिम गवर्नर-जनरल सी. राजगोपालाचारी थे।

🔎 पदों में भ्रम न रखें

माउंटबेटन — ब्रिटिश भारत के अंतिम वायसराय + स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर-जनरल।

03

माउंटबेटन की प्रारंभिक बातचीत

कांग्रेस और मुस्लिम लीग से समाधान की खोज

भारत पहुँचने के बाद माउंटबेटन ने महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, मुहम्मद अली जिन्ना तथा अन्य प्रमुख भारतीय नेताओं से बातचीत की।

उनका प्रारंभिक उद्देश्य ऐसा समाधान तलाशना था जिससे सत्ता हस्तांतरण शीघ्र हो सके और राजनीतिक गतिरोध समाप्त हो।

लेकिन कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच संयुक्त भारत की राजनीतिक संरचना पर सहमति बनना लगभग असंभव हो चुका था।

अंततः माउंटबेटन ने भारत के विभाजन को सत्ता हस्तांतरण का व्यावहारिक समाधान मानकर नई योजना तैयार की।

04

डिकी बर्ड योजना क्या थी?

3 जून योजना से अलग प्रारंभिक मसौदा

माउंटबेटन के सामने सत्ता हस्तांतरण के लिए कई प्रारंभिक विचार और मसौदे रखे गए थे। इन्हीं में से एक प्रारंभिक योजना को सामान्यतः डिकी बर्ड योजना अथवा प्लान बाल्कन कहा जाता है।

इस योजना में ब्रिटिश भारत के प्रांतों को बहुत व्यापक विकल्प देने का विचार था, जिससे भारत कई स्वतंत्र राजनीतिक इकाइयों में टूट सकता था।

इस प्रारूप को अंतिम रूप में स्वीकार नहीं किया गया। इसके बाद संशोधित योजना तैयार हुई जो 3 जून 1947 की माउंटबेटन योजना बनी।

🔎 सबसे जरूरी अंतर

डिकी बर्ड योजना = प्रारंभिक मसौदा।
3 जून योजना = अंतिम माउंटबेटन योजना।

05

3 जून 1947 की माउंटबेटन योजना

भारत विभाजन की औपचारिक योजना

3 जून 1947 को ब्रिटिश सरकार ने भारत में सत्ता हस्तांतरण और विभाजन से संबंधित नई योजना की घोषणा की।

इसे माउंटबेटन योजना या 3 जून योजना कहा जाता है।

इस योजना ने कैबिनेट मिशन की संयुक्त भारत वाली व्यवस्था को छोड़कर भारत को दो राजनीतिक इकाइयों — भारत और पाकिस्तान — में विभाजित करने का मार्ग खोल दिया।

ब्रिटिश संसद में 3 जून 1947 को घोषित योजना में पंजाब और बंगाल की विधानसभाओं को मुस्लिम-बहुल तथा गैर-मुस्लिम-बहुल भागों में अलग-अलग बैठकर विभाजन पर निर्णय करने की व्यवस्था दी गई थी।

🎯 सीधा प्रश्न

माउंटबेटन योजना — 3 जून 1947।

06

भारत का विभाजन स्वीकार

भारत और पाकिस्तान का मार्ग

माउंटबेटन योजना का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम ब्रिटिश भारत के विभाजन को स्वीकार करना था।

इसके आधार पर ब्रिटिश भारत से दो नए डोमिनियन — भारत और पाकिस्तान — बनाए जाने का मार्ग प्रशस्त हुआ।

पाकिस्तान के अंतर्गत उत्तर-पश्चिम और पूर्वी भारत के प्रमुख मुस्लिम-बहुल क्षेत्र जाने वाले थे, जबकि शेष ब्रिटिश भारतीय क्षेत्र भारत में रहने वाले थे।

07

पंजाब और बंगाल का विभाजन

विधानसभाओं द्वारा निर्णय

माउंटबेटन योजना में पंजाब और बंगाल की विधानसभाओं के मुस्लिम-बहुल और गैर-मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों के सदस्यों को अलग-अलग बैठक कर यह तय करने की व्यवस्था दी गई कि प्रांत का विभाजन किया जाए या नहीं।

अंततः पंजाब और बंगाल दोनों का विभाजन हुआ।

इन दोनों प्रांतों की अंतिम सीमा निर्धारित करने के लिए अलग-अलग सीमा आयोग बनाए गए।

08

सीमा आयोग और रेडक्लिफ

भारत-पाकिस्तान सीमा का निर्धारण

पंजाब और बंगाल के विभाजन के बाद नई अंतरराष्ट्रीय सीमा निर्धारित करने के लिए सीमा आयोग बनाए गए।

दोनों आयोगों के अध्यक्ष ब्रिटिश विधिवेत्ता सर सिरिल रेडक्लिफ थे।

इसी कारण भारत और पाकिस्तान के बीच निर्धारित सीमाओं को सामान्यतः रेडक्लिफ रेखा से जोड़ा जाता है।

रेडक्लिफ ने अगस्त 1947 में अपनी सीमा संबंधी रिपोर्ट प्रस्तुत की, लेकिन अंतिम सीमा निर्णय स्वतंत्रता के बाद सार्वजनिक किए गए।

🎯 महत्वपूर्ण जोड़ी

भारत-पाकिस्तान सीमा आयोग — सर सिरिल रेडक्लिफ।

09

उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत

जनमत संग्रह

माउंटबेटन योजना में उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत के लोगों को यह तय करने के लिए जनमत संग्रह की व्यवस्था दी गई कि वे भारत या पाकिस्तान में से किसके साथ शामिल होना चाहते हैं।

जनमत संग्रह के परिणाम में पाकिस्तान के पक्ष को बहुमत मिला और प्रांत पाकिस्तान में शामिल हुआ।

10

सिलहट का जनमत संग्रह

असम और पूर्वी बंगाल का प्रश्न

असम के मुस्लिम-बहुल सिलहट जिले में भी जनमत संग्रह कराने की व्यवस्था की गई।

जनमत संग्रह में अधिकांश मतदाताओं ने सिलहट को पूर्वी बंगाल के साथ मिलाकर पाकिस्तान में शामिल करने के पक्ष में मतदान किया।

इसके बाद सिलहट का अधिकांश भाग पूर्वी पाकिस्तान में शामिल हो गया।

11

सिंध और बलूचिस्तान

पाकिस्तान में शामिल होने का निर्णय

सिंध की विधानसभा को भी भारत या पाकिस्तान में शामिल होने के प्रश्न पर निर्णय करने का अवसर दिया गया।

सिंध ने पाकिस्तान में शामिल होने का निर्णय लिया।

बलूचिस्तान से संबंधित प्रतिनिधि निकायों ने भी पाकिस्तान में शामिल होने की दिशा में निर्णय दिया।

12

दो संविधान सभाएँ

भारत और पाकिस्तान के लिए अलग व्यवस्था

भारत के विभाजन के बाद पाकिस्तान के लिए अलग संविधान सभा गठित की गई।

1946 में गठित भारतीय संविधान सभा के वे सदस्य जो पाकिस्तान में जाने वाले क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते थे, भारत की संविधान सभा से अलग हो गए।

विभाजन के बाद भारत की संविधान सभा की सदस्य संख्या 389 से घटकर 299 रह गई।

🎯 संख्या याद रखें

विभाजन से पहले संविधान सभा — 389 सदस्य।
विभाजन के बाद भारतीय संविधान सभा — 299 सदस्य।

13

कांग्रेस ने विभाजन क्यों स्वीकार किया?

कठिन राजनीतिक समझौता

कांग्रेस लंबे समय तक भारत के विभाजन का विरोध करती रही थी, लेकिन 1946–47 की राजनीतिक परिस्थिति अत्यंत गंभीर हो चुकी थी।

कांग्रेस नेतृत्व के सामने विकल्प था कि सत्ता हस्तांतरण को और टाला जाए या विभाजन स्वीकार करके शीघ्र स्वतंत्रता प्राप्त की जाए।

जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल सहित कांग्रेस नेतृत्व के एक बड़े हिस्से ने अंततः विभाजन को अत्यंत कठिन लेकिन व्यावहारिक राजनीतिक समाधान के रूप में स्वीकार किया।

महात्मा गांधी व्यक्तिगत रूप से भारत के विभाजन से गहरे दुखी थे और अंत तक हिंदू-मुस्लिम एकता के पक्षधर रहे।

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मुस्लिम लीग की स्वीकृति

पाकिस्तान की माँग को मार्ग

मुहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व वाली मुस्लिम लीग ने माउंटबेटन योजना को स्वीकार कर लिया क्योंकि इससे अलग पाकिस्तान की स्थापना का मार्ग स्पष्ट हो गया।

हालाँकि मुस्लिम लीग की मूल माँग के अनुरूप पूरा पंजाब और पूरा बंगाल पाकिस्तान में नहीं गया; दोनों प्रांतों का विभाजन किया गया।

15

15 अगस्त 1947 की तारीख

सत्ता हस्तांतरण निर्धारित समय से पहले

ब्रिटिश सरकार ने पहले सत्ता हस्तांतरण के लिए जून 1948 तक की समय-सीमा निर्धारित की थी।

माउंटबेटन ने प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाया और सत्ता हस्तांतरण के लिए 15 अगस्त 1947 की तारीख तय की।

इस प्रकार ब्रिटिश शासन लगभग दस महीने पहले समाप्त कर दिया गया।

ब्रिटिश संसद के अभिलेख भी पुष्टि करते हैं कि माउंटबेटन के निर्णय के अनुसार भारत और पाकिस्तान के गठन तथा सत्ता हस्तांतरण को अगस्त 1947 में लागू किया गया।

🎯 महत्वपूर्ण

मूल अंतिम समय — जून 1948
वास्तविक सत्ता हस्तांतरण — अगस्त 1947

16

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम

18 जुलाई 1947

माउंटबेटन योजना को कानूनी रूप देने के लिए ब्रिटिश संसद ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 पारित किया।

इस अधिनियम को 18 जुलाई 1947 को ब्रिटिश राजकीय स्वीकृति प्राप्त हुई।

अधिनियम के द्वारा ब्रिटिश भारत को भारत और पाकिस्तान नामक दो स्वतंत्र डोमिनियनों में बाँटने का प्रावधान किया गया।

इसके साथ भारत में ब्रिटिश शासन समाप्त होने की कानूनी प्रक्रिया पूरी हुई।

🎯 तिथि

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम — 18 जुलाई 1947।

17

पाकिस्तान और भारत की स्वतंत्रता

अगस्त 1947

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम के अनुसार अगस्त 1947 में ब्रिटिश भारत से दो स्वतंत्र डोमिनियन अस्तित्व में आए।

पाकिस्तान में सत्ता हस्तांतरण से संबंधित प्रमुख समारोह 14 अगस्त 1947 को कराची में हुआ और पाकिस्तान 14 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस मनाता है।

भारत में ब्रिटिश शासन 15 अगस्त 1947 से समाप्त हुआ और भारत स्वतंत्र राष्ट्र बना।

माउंटबेटन स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर-जनरल बने, जबकि जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बने।

18

माउंटबेटन और राजगोपालाचारी

गवर्नर-जनरल में भ्रम न रखें

व्यक्ति सही स्थिति
लॉर्ड माउंटबेटन ब्रिटिश भारत के अंतिम वायसराय और स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर-जनरल
सी. राजगोपालाचारी स्वतंत्र भारत के अंतिम गवर्नर-जनरल और इस पद पर बैठने वाले पहले भारतीय
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मुख्य प्रावधान एक नज़र में

परीक्षा के लिए सार

विषय माउंटबेटन योजना
घोषणा 3 जून 1947
मुख्य निर्णय ब्रिटिश भारत के विभाजन का मार्ग
नए डोमिनियन भारत और पाकिस्तान
पंजाब विभाजन
बंगाल विभाजन
उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत जनमत संग्रह
सिलहट जनमत संग्रह
सीमा आयोग सर सिरिल रेडक्लिफ की अध्यक्षता
सत्ता हस्तांतरण अगस्त 1947
20

महत्वपूर्ण तिथियाँ

पूरा घटनाक्रम

तिथि घटना
20 फरवरी 1947 एटली ने जून 1948 तक सत्ता हस्तांतरण की घोषणा की
24 मार्च 1947 लॉर्ड माउंटबेटन ने भारत के अंतिम वायसराय के रूप में पदभार संभाला
3 जून 1947 माउंटबेटन योजना की घोषणा
18 जुलाई 1947 भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम को राजकीय स्वीकृति
14 अगस्त 1947 पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस
15 अगस्त 1947 भारत स्वतंत्र हुआ
21

त्वरित पुनरावृत्ति

क्रम से याद करें

🧠 पूरा क्रम

20 फरवरी — एटली की घोषणा 24 मार्च — माउंटबेटन 3 जून योजना भारत विभाजन स्वीकार पंजाब-बंगाल विभाजन रेडक्लिफ आयोग 18 जुलाई — स्वतंत्रता अधिनियम अगस्त 1947 — सत्ता हस्तांतरण

⚡ अंतिम पुनरावृत्ति

माउंटबेटन योजना — 3 जून 1947।

लॉर्ड माउंटबेटन ने 24 मार्च 1947 को भारत के अंतिम वायसराय के रूप में पदभार संभाला।

वे स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर-जनरल भी बने; स्वतंत्र भारत के अंतिम गवर्नर-जनरल सी. राजगोपालाचारी थे।

ब्रिटिश सरकार ने पहले जून 1948 तक सत्ता हस्तांतरण करने का लक्ष्य रखा था, लेकिन माउंटबेटन ने इसे आगे बढ़ाकर अगस्त 1947 में पूरा करने का निर्णय लिया।

डिकी बर्ड योजना माउंटबेटन की एक प्रारंभिक योजना थी; इसे 3 जून 1947 की अंतिम माउंटबेटन योजना का दूसरा नाम नहीं समझना चाहिए।

3 जून योजना ने ब्रिटिश भारत को भारत और पाकिस्तान में विभाजित करने का मार्ग प्रशस्त किया।

पंजाब और बंगाल का विभाजन किया गया और उनकी सीमाएँ निर्धारित करने के लिए सर सिरिल रेडक्लिफ की अध्यक्षता में सीमा आयोग बनाए गए।

उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत और सिलहट में जनमत संग्रह की व्यवस्था की गई।

विभाजन के बाद पाकिस्तान की अलग संविधान सभा बनी और भारतीय संविधान सभा की सदस्य संख्या 389 से घटकर 299 रह गई।

18 जुलाई 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम को राजकीय स्वीकृति मिली।

भारत 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ और जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने।

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