मुद्रास्फीति
अर्थ, कारण, मापन, प्रभाव और नियंत्रण के उपाय
मुद्रास्फीति का अर्थ
मुद्रास्फीति से तात्पर्य अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं के सामान्य मूल्य स्तर में लगातार और व्यापक वृद्धि से है।
जब वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें सामान्य रूप से बढ़ती हैं, तो समान मात्रा की मुद्रा से पहले की तुलना में कम वस्तुएँ और सेवाएँ खरीदी जा सकती हैं। इसलिए मुद्रास्फीति के कारण मुद्रा की क्रय शक्ति घटती है।
केवल किसी एक वस्तु, जैसे टमाटर या पेट्रोल, की कीमत बढ़ जाना अपने-आप में मुद्रास्फीति नहीं कहलाता। मुद्रास्फीति में अर्थव्यवस्था के सामान्य मूल्य स्तर में व्यापक और अपेक्षाकृत लगातार वृद्धि होती है।
यदि आय में वृद्धि कीमतों की वृद्धि से कम हो, तो गरीब, निम्न तथा मध्यम आय वर्ग पर महँगाई का प्रभाव अधिक पड़ सकता है क्योंकि उनकी वास्तविक आय और क्रय शक्ति कम हो जाती है।
मुद्रास्फीति के मुख्य कारण
मुद्रास्फीति के कारणों को सामान्यतः दो प्रमुख भागों में बाँटा जाता है— माँग-जनित मुद्रास्फीति और लागत-जनित मुद्रास्फीति।
व्यवहार में कई बार दोनों प्रकार की शक्तियाँ एक साथ भी काम करती हैं। उदाहरण के लिए मजबूत मांग के साथ ऊर्जा और कच्चे माल की लागत बढ़ने पर कीमतों पर अधिक दबाव पड़ सकता है।
माँग-जनित मुद्रास्फीति
माँग-जनित मुद्रास्फीति उस स्थिति में उत्पन्न होती है जब अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं की कुल माँग उपलब्ध आपूर्ति या उत्पादन क्षमता की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ जाती है।
जब अधिक लोग सीमित मात्रा में उपलब्ध वस्तुओं और सेवाओं को खरीदने का प्रयास करते हैं, तो कीमतों पर ऊपर की ओर दबाव पड़ता है।
इसे आसान शब्दों में “अधिक माँग और अपेक्षाकृत कम आपूर्ति” की स्थिति कहा जा सकता है।
🎯 आसान सूत्र
माँग-जनित मुद्रास्फीति के कारण
जनसंख्या बढ़ने के साथ वस्तुओं और सेवाओं की माँग बढ़ सकती है। यदि उत्पादन उसी अनुपात में नहीं बढ़े तो कीमतों पर दबाव पड़ सकता है।
लोगों की आय में तेजी से वृद्धि होने पर उपभोग की माँग बढ़ सकती है।
सरकारी खर्च में बड़ी वृद्धि कुल माँग को बढ़ा सकती है, विशेष रूप से तब जब अर्थव्यवस्था पहले से अपनी उत्पादन क्षमता के निकट हो।
बैंक ऋण की अत्यधिक तेज वृद्धि और आसान ऋण परिस्थितियाँ उपभोग तथा निवेश की माँग बढ़ा सकती हैं।
अर्थव्यवस्था में मुद्रा और तरलता की अत्यधिक वृद्धि भी अन्य परिस्थितियाँ समान रहने पर माँग पर दबाव बढ़ा सकती है।
अघोषित आय या काले धन का बड़े पैमाने पर उपभोग में उपयोग भी कुछ क्षेत्रों में अतिरिक्त माँग उत्पन्न कर सकता है।
लागत-जनित मुद्रास्फीति
लागत-जनित मुद्रास्फीति तब उत्पन्न होती है जब वस्तुओं और सेवाओं की उत्पादन लागत बढ़ जाती है और उत्पादक उस बढ़ी हुई लागत का कुछ हिस्सा ऊँची कीमतों के रूप में उपभोक्ताओं पर डालते हैं।
कच्चा माल, ऊर्जा, परिवहन, मजदूरी, कर और आयातित वस्तुएँ महँगी होने पर उत्पादन लागत बढ़ सकती है।
यदि उत्पादन लागत बढ़ने के कारण उत्पादन घटता है और कीमतें बढ़ती हैं, तो अर्थव्यवस्था को एक साथ महँगाई और उत्पादन संबंधी दबाव का सामना करना पड़ सकता है।
🎯 आसान सूत्र
लागत-जनित मुद्रास्फीति के कारण
कच्चे माल की कीमतों में वृद्धि से उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ सकती है।
उत्पादकता में समान वृद्धि के बिना मजदूरी लागत तेजी से बढ़ने पर उत्पादन लागत बढ़ सकती है।
पेट्रोलियम, गैस और बिजली जैसी ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि का प्रभाव परिवहन और लगभग पूरी उत्पादन शृंखला पर पड़ सकता है।
आयातित कच्चे माल या ऊर्जा की कीमत बढ़ने अथवा घरेलू मुद्रा के कमजोर होने से आयातित मुद्रास्फीति पैदा हो सकती है।
आयात शुल्क तथा अन्य अप्रत्यक्ष करों में वृद्धि भी कुछ वस्तुओं की लागत और कीमत बढ़ा सकती है।
युद्ध, प्राकृतिक आपदा, खराब मानसून, वैश्विक आपूर्ति-शृंखला में व्यवधान या उत्पादन की कमी भी लागत और कीमतों को बढ़ा सकती है।
मुद्रास्फीति की गणना
मुद्रास्फीति को मापने के लिए समय के साथ वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में परिवर्तन का अध्ययन किया जाता है।
भारत में मूल्य परिवर्तन को मापने के लिए दो अत्यंत महत्वपूर्ण सूचकांक हैं— थोक मूल्य सूचकांक और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक।
दोनों सूचकांकों की वस्तु-टोकरी, भार और मूल्य संग्रह का स्तर अलग होता है, इसलिए दोनों से प्राप्त मुद्रास्फीति दर समान होना आवश्यक नहीं है।
थोक मूल्य सूचकांक
थोक मूल्य सूचकांक अर्थव्यवस्था में चयनित वस्तुओं के थोक या प्रारंभिक लेन-देन स्तर की कीमतों में औसत परिवर्तन को मापता है।
भारत के थोक मूल्य सूचकांक में मुख्य रूप से प्राथमिक वस्तुएँ, ईंधन एवं बिजली और विनिर्मित उत्पाद शामिल होते हैं।
यह मुख्यतः वस्तुओं पर आधारित सूचकांक है और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की तरह उपभोक्ता सेवाओं की व्यापक टोकरी को शामिल नहीं करता।
पुरानी श्रृंखला में थोक मूल्य सूचकांक का आधार वर्ष 2011-12 था, जिसे मई 2017 में जारी किया गया था।
वर्तमान नई श्रृंखला में थोक मूल्य सूचकांक का आधार वर्ष 2022-23 कर दिया गया है। नई श्रृंखला जून 2026 से जारी की गई।
⚠️ नया आधार वर्ष
पुराना थोक मूल्य सूचकांक = 2011-12
वर्तमान थोक मूल्य सूचकांक = 2022-23
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक उन वस्तुओं और सेवाओं की खुदरा कीमतों में परिवर्तन को मापता है जिन्हें परिवार अपने दैनिक जीवन में उपभोग करते हैं।
इसमें खाद्य एवं पेय पदार्थ, आवास, कपड़े, ईंधन तथा विभिन्न उपभोक्ता सेवाओं से संबंधित कीमतों को शामिल किया जाता है।
यह आम उपभोक्ता द्वारा महसूस की जाने वाली महँगाई को समझने के लिए अधिक उपयोगी माना जाता है।
भारत में संयुक्त उपभोक्ता मूल्य सूचकांक ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के मूल्य परिवर्तनों को समाहित करता है।
पुरानी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक श्रृंखला का आधार वर्ष 2012=100 था।
फरवरी 2026 से नई उपभोक्ता मूल्य सूचकांक श्रृंखला लागू की गई, जिसका आधार वर्ष 2024=100 है।
🎯 नया परीक्षा तथ्य
वर्तमान CPI आधार वर्ष = 2024
थोक और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में अंतर
| आधार | थोक मूल्य सूचकांक | उपभोक्ता मूल्य सूचकांक |
|---|---|---|
| मूल्य स्तर | थोक/प्रारंभिक लेन-देन स्तर | खुदरा/उपभोक्ता स्तर |
| मुख्य फोकस | वस्तुओं की कीमतें | उपभोक्ता वस्तुएँ और सेवाएँ |
| उपभोक्ता जीवन-यापन | प्रत्यक्ष माप नहीं | अधिक प्रत्यक्ष रूप से दर्शाता है |
| वर्तमान आधार वर्ष | 2022-23 | 2024=100 |
| प्रमुख उपयोग | थोक मूल्य दबाव का अध्ययन | खुदरा महँगाई और मौद्रिक नीति के लिए महत्वपूर्ण |
मौद्रिक नीति और उपभोक्ता मुद्रास्फीति
भारत की आधुनिक मौद्रिक नीति व्यवस्था में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित हेडलाइन मुद्रास्फीति केंद्रीय महत्व रखती है।
लचीली मुद्रास्फीति लक्ष्य व्यवस्था में सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक ने उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति को मौद्रिक नीति का प्रमुख मूल्य-सूचक बनाया।
अप्रैल 2021 से मार्च 2026 तक निर्धारित लक्ष्य 4% था, जिसके आसपास ±2 प्रतिशत अंक की सहनशीलता सीमा निर्धारित थी। अर्थात उस अवधि में सीमा 2% से 6% थी।
⚠️ तारीख के साथ याद करें
4% ± 2% वाला लक्ष्य अप्रैल 2021 से मार्च 2026 की अधिसूचित अवधि से संबंधित है।
मुद्रास्फीति दर कैसे निकाली जाती है?
मुद्रास्फीति दर सामान्यतः किसी मूल्य सूचकांक में पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में प्रतिशत परिवर्तन से निकाली जाती है।
उदाहरण के लिए यदि किसी वर्ष किसी माह का उपभोक्ता मूल्य सूचकांक 110 हो और पिछले वर्ष उसी माह का सूचकांक 100 था, तो वार्षिक मुद्रास्फीति लगभग 10% होगी।
💡 सरल सूत्र
मुद्रास्फीति दर = [(वर्तमान सूचकांक − पिछले वर्ष का सूचकांक) ÷ पिछले वर्ष का सूचकांक] × 100
मुद्रास्फीति के सकारात्मक प्रभाव
बहुत कम और स्थिर स्तर की मुद्रास्फीति बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ सामान्य रूप से देखी जा सकती है।
यदि वस्तुओं के विक्रय मूल्य नियंत्रित रूप से बढ़ें और लागत उससे कम तेजी से बढ़े, तो उत्पादकों के लाभ और निवेश की प्रेरणा बढ़ सकती है।
मध्यम तथा अनुमानित मुद्रास्फीति के वातावरण में कंपनियाँ भविष्य की मांग को देखते हुए उत्पादन और निवेश बढ़ा सकती हैं।
लेकिन इसे इस अर्थ में नहीं समझना चाहिए कि अधिक मुद्रास्फीति आर्थिक विकास के लिए लाभकारी है। उच्च और अस्थिर मुद्रास्फीति आर्थिक निर्णयों और निवेश दोनों को नुकसान पहुँचा सकती है।
मुद्रास्फीति के नकारात्मक प्रभाव
मुद्रास्फीति से मुद्रा की क्रय शक्ति घटती है।
यदि वेतन और आय महँगाई की गति से न बढ़ें तो लोगों की वास्तविक आय कम हो जाती है।
निश्चित आय प्राप्त करने वाले पेंशनभोगी, वेतनभोगी और निम्न आय वर्ग अधिक प्रभावित हो सकते हैं।
नकद और निश्चित ब्याज वाली बचत का वास्तविक मूल्य कम हो सकता है।
यदि विभिन्न वर्गों की आय और संपत्ति पर महँगाई का प्रभाव अलग-अलग हो, तो आर्थिक असमानता बढ़ सकती है।
बहुत अधिक और अनिश्चित मुद्रास्फीति उद्योगों के लिए लागत और भविष्य की कीमतों का अनुमान कठिन बनाकर निवेश निर्णयों को प्रभावित कर सकती है।
मुद्रास्फीति से किसे लाभ और किसे हानि?
| वर्ग | संभावित प्रभाव |
|---|---|
| निश्चित आय वाला व्यक्ति | क्रय शक्ति घटने से सामान्यतः हानि |
| नकद बचत रखने वाला | वास्तविक मूल्य घट सकता है |
| ऋणदाता | अप्रत्याशित महँगाई में वास्तविक वापसी कम हो सकती है |
| ऋणी | यदि आय बढ़े और ऋण निश्चित राशि का हो तो वास्तविक ऋण भार कम हो सकता है |
| उत्पादक | यदि विक्रय मूल्य लागत से अधिक तेजी से बढ़े तो लाभ हो सकता है |
मौद्रिक उपाय
माँग-जनित मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक मौद्रिक नीति को कड़ा कर सकता है।
नीति ब्याज दर बढ़ाने से ऋण महँगा हो सकता है, जिससे उधार, निवेश और उपभोग की माँग पर नियंत्रण पड़ सकता है।
रिजर्व बैंक तरलता प्रबंधन, खुले बाजार की कार्रवाइयों और अन्य मौद्रिक साधनों का उपयोग भी कर सकता है।
लेकिन खाद्य उत्पादन में कमी या तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों जैसे आपूर्ति-पक्ष के झटकों को केवल ब्याज दर बढ़ाकर पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता।
राजकोषीय उपाय
सरकार अत्यधिक माँग की स्थिति में गैर-जरूरी सरकारी व्यय को नियंत्रित करके कुल माँग पर दबाव कम कर सकती है।
कर नीति के माध्यम से भी अर्थव्यवस्था में खर्च योग्य आय और कुल माँग को प्रभावित किया जा सकता है।
हालाँकि आर्थिक मंदी या कमजोर विकास की स्थिति में सरकारी खर्च में कटौती सावधानी से करनी होती है, क्योंकि इससे विकास और रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
आपूर्ति-पक्ष के उपाय
आवश्यक वस्तुओं की घरेलू कमी होने पर सरकार आयात बढ़ाकर उपलब्धता सुधार सकती है।
सरकार आवश्यक वस्तुओं के सुरक्षित भंडार से बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति जारी कर सकती है।
जमाखोरी और कृत्रिम कमी के विरुद्ध कार्रवाई करके बाजार में उपलब्धता बढ़ाई जा सकती है।
कृषि उत्पादन, भंडारण, शीत शृंखला, परिवहन और लॉजिस्टिक व्यवस्था में सुधार से खाद्य कीमतों की अस्थिरता कम करने में सहायता मिल सकती है।
आयात शुल्क और अप्रत्यक्ष करों में उचित बदलाव करके भी कुछ आवश्यक वस्तुओं की घरेलू कीमत पर दबाव कम किया जा सकता है।
मुद्रास्फीति से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण शब्द
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अपस्फीति | सामान्य मूल्य स्तर में लगातार गिरावट |
| अवमुद्रास्फीति | मुद्रास्फीति दर का कम होना; कीमतें बढ़ती रहती हैं लेकिन धीमी गति से |
| मुद्रास्फीतिजनित मंदी | उच्च मुद्रास्फीति के साथ कमजोर आर्थिक वृद्धि और बेरोजगारी |
| मूल मुद्रास्फीति | अस्थिर घटकों को अलग कर अंतर्निहित मूल्य दबाव मापने की अवधारणा; भारत में सामान्यतः खाद्य और ईंधन को हटाकर विश्लेषण किया जाता है |
| हेडलाइन मुद्रास्फीति | सूचकांक की पूरी टोकरी के आधार पर निकाली गई कुल मुद्रास्फीति |
| आयातित मुद्रास्फीति | विदेशी वस्तुओं, तेल या कच्चे माल की कीमत बढ़ने से घरेलू कीमतों में वृद्धि |
मुद्रास्फीति और अवमुद्रास्फीति में अंतर
यदि मुद्रास्फीति 8% से घटकर 5% हो जाए, तो इसका अर्थ सामान्यतः यह नहीं है कि कीमतें घट गईं।
इसका अर्थ है कि कीमतें अभी भी बढ़ रही हैं, लेकिन पहले की तुलना में धीमी गति से बढ़ रही हैं। इसे अवमुद्रास्फीति कहा जाता है।
वास्तविक सामान्य कीमतों में निरंतर गिरावट को अपस्फीति कहा जाता है।
🎯 बहुत महत्वपूर्ण
मुद्रास्फीति दर कम होना ≠ कीमतों का कम होना
महत्वपूर्ण भ्रम और सही तथ्य
भ्रम: किसी एक वस्तु की कीमत बढ़ते ही मुद्रास्फीति हो जाती है।
सही: मुद्रास्फीति सामान्य मूल्य स्तर में व्यापक और लगातार वृद्धि है।
भ्रम: WPI का वर्तमान आधार वर्ष 2011-12 है।
सही: वर्तमान नई WPI श्रृंखला का आधार वर्ष 2022-23 है।
भ्रम: CPI का वर्तमान आधार वर्ष 2012 है।
सही: नई CPI श्रृंखला का आधार वर्ष 2024=100 है।
भ्रम: WPI सीधे आम उपभोक्ता के जीवन-यापन की पूरी लागत मापता है।
सही: आम उपभोक्ता द्वारा महसूस की जाने वाली खुदरा महँगाई को CPI अधिक प्रत्यक्ष रूप से दर्शाता है।
भ्रम: मुद्रास्फीति दर कम होने का अर्थ वस्तुओं की कीमत कम होना है।
सही: मुद्रास्फीति दर कम होने पर कीमतें अभी भी बढ़ सकती हैं, केवल वृद्धि की गति कम होती है।
भ्रम: हर प्रकार की मुद्रास्फीति को केवल ब्याज दर बढ़ाकर समाप्त किया जा सकता है।
सही: माँग-जनित मुद्रास्फीति पर मौद्रिक नीति अधिक प्रभावी हो सकती है, जबकि आपूर्ति-पक्ष की महँगाई के लिए उत्पादन, आयात, भंडारण और आपूर्ति संबंधी उपाय भी आवश्यक हो सकते हैं।
त्वरित पुनरावृत्ति
⚡ एक नज़र में
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति बिंदु
मुद्रास्फीति = सामान्य मूल्य स्तर में निरंतर और व्यापक वृद्धि।
मुद्रास्फीति बढ़ने पर मुद्रा की क्रय शक्ति घटती है।
मुद्रास्फीति के दो प्रमुख कारण हैं— माँग-जनित और लागत-जनित मुद्रास्फीति।
माँग-जनित मुद्रास्फीति = माँग आपूर्ति से अधिक तेजी से बढ़े।
लागत-जनित मुद्रास्फीति = उत्पादन लागत बढ़ने से कीमतें बढ़ें।
पेट्रोलियम, कच्चा माल, मजदूरी, परिवहन, कर और आयात लागत में वृद्धि लागत-जनित महँगाई बढ़ा सकती है।
भारत में मुद्रास्फीति के प्रमुख मापों में WPI और CPI शामिल हैं।
वर्तमान WPI आधार वर्ष = 2022-23।
वर्तमान CPI आधार वर्ष = 2024=100।
CPI आम उपभोक्ता द्वारा झेली जाने वाली खुदरा महँगाई को WPI की तुलना में अधिक प्रत्यक्ष रूप से दर्शाता है।
भारत की आधुनिक मौद्रिक नीति में हेडलाइन CPI मुद्रास्फीति प्रमुख मूल्य-सूचक है।
अप्रैल 2021 से मार्च 2026 की अधिसूचित अवधि के लिए CPI मुद्रास्फीति लक्ष्य 4% ± 2 प्रतिशत अंक था।
सीमित और स्थिर मुद्रास्फीति आर्थिक गतिविधि के साथ सामान्य हो सकती है, लेकिन अत्यधिक और अस्थिर मुद्रास्फीति हानिकारक होती है।
मुद्रास्फीति से निश्चित आय वाले और गरीब परिवारों की वास्तविक क्रय शक्ति विशेष रूप से प्रभावित हो सकती है।
मुद्रास्फीति नियंत्रण के लिए मौद्रिक नीति, राजकोषीय नीति और आपूर्ति-पक्ष के उपाय अपनाए जाते हैं।
मुद्रास्फीति दर कम होना कीमतों का कम होना नहीं है; कीमतों की वृद्धि की गति कम होने को अवमुद्रास्फीति कहा जाता है।