भारत की मृदा
निर्माण, प्रकार, वितरण, गुण, फसलें, मृदा अपरदन एवं संरक्षण
भारत की मृदा : एक परिचय
भारत में मृदा की विविधता उसकी भौगोलिक स्थिति, मूल शैल, स्थलाकृति, जलवायु, प्राकृतिक वनस्पति, जैविक क्रियाओं तथा अपक्षय और अपरदन जैसी प्रक्रियाओं से प्रभावित होती है। मृदा कृषि और वनस्पति का आधार होने के साथ-साथ जल संरक्षण, पोषक तत्वों के चक्र तथा मानव जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है।
सामान्य प्रतियोगी परीक्षा के वर्गीकरण में भारत की प्रमुख मृदाओं को जलोढ़ मृदा, काली मृदा, लाल एवं पीली मृदा, लेटराइट मृदा, शुष्क या मरुस्थलीय मृदा तथा वन एवं पर्वतीय मृदा के रूप में पढ़ा जाता है।
मृदा का अर्थ एवं निर्माण
मृदा निर्माण के आधारभूत तथ्य
मृदा पृथ्वी की ऊपरी ढीली परत है जिसमें खनिज पदार्थ, जैविक पदार्थ, जल, वायु तथा असंख्य सूक्ष्म जीव पाए जाते हैं और जिसमें पौधे विकसित होते हैं।
मृदा विज्ञान में प्रयुक्त अंग्रेजी शब्द सॉइल की व्युत्पत्ति लैटिन के सोलम शब्द से मानी जाती है, जिसका अर्थ भूमि या धरातल है।
मृदा का निर्माण अत्यंत धीमी प्रक्रिया है। मूल चट्टानों के अपक्षय के साथ जलवायु, स्थलरूप, वनस्पति, जीव-जंतु और समय मिलकर मृदा के स्वरूप को निर्धारित करते हैं।
मृदा निर्माण को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक हैं — मूल शैल, जलवायु, स्थलाकृति, जैविक कारक और समय।
🎯 परीक्षा में याद रखें
सॉइल — लैटिन शब्द सोलम से संबंधित — अर्थ: भूमि या धरातल।
जलोढ़ मृदा
भारत में सर्वाधिक विस्तृत मृदा
जलोढ़ या कछारी मृदा भारत में सबसे अधिक क्षेत्रफल पर पाई जाने वाली मृदा है। यह भारत की अत्यंत महत्वपूर्ण कृषि मृदा है।
इसका निर्माण मुख्य रूप से नदियों द्वारा लाए गए और जमा किए गए बालू, गाद और चिकनी मिट्टी जैसे अवसादों से होता है।
गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु नदी प्रणालियों द्वारा निर्मित उत्तरी विशाल मैदान में इसका सबसे अधिक विस्तार मिलता है।
जलोढ़ मृदा राजस्थान और गुजरात के कुछ भागों तथा प्रायद्वीपीय भारत की अनेक नदी घाटियों और डेल्टा क्षेत्रों में भी पाई जाती है।
जलोढ़ मृदा सामान्यतः पोटाश, फॉस्फोरिक अम्ल और चूने की दृष्टि से पर्याप्त हो सकती है, लेकिन कई क्षेत्रों में नाइट्रोजन और ह्यूमस की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है।
यह गेहूँ, धान, गन्ना, मक्का, दलहन, तिलहन तथा अनेक अन्य फसलों के लिए अत्यंत उपयोगी होती है।
भांगर और खादर
पुरानी और नई जलोढ़ मृदा
| आधार | भांगर | खादर |
|---|---|---|
| प्रकार | पुरानी जलोढ़ मृदा | नई जलोढ़ मृदा |
| स्थिति | नदी के बाढ़ क्षेत्र से अपेक्षाकृत ऊँचे भाग | नदी के सक्रिय बाढ़ मैदान |
| निक्षेप | हर वर्ष नई गाद का जमाव नहीं होता | बाढ़ से नई गाद का जमाव होता रहता है |
| विशेषता | कंकर की परतें मिल सकती हैं | सामान्यतः अधिक नवीन और अधिक उपजाऊ |
📗 मुख्य तथ्य
गंगा के मैदान की पुरानी जलोढ़ मृदा = भांगर और नई जलोढ़ मृदा = खादर।
काली मृदा
रेगुर तथा कपास की मृदा
काली मृदा को रेगुर मृदा भी कहा जाता है। इसे कपास की खेती के लिए अत्यंत उपयुक्त होने के कारण कपास की मृदा भी कहा जाता है।
इसका विकास मुख्यतः दक्कन ट्रैप क्षेत्र की बेसाल्टिक चट्टानों के अपक्षय से हुआ है।
इसका व्यापक विस्तार महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात और दक्कन के कुछ हिस्सों में मिलता है तथा यह कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के कुछ भागों में भी पाई जाती है।
भारत में काली मृदा का सबसे व्यापक विस्तार महाराष्ट्र में मिलता है।
मालवा के पठार के बड़े भाग में भी काली मृदा का विस्तार पाया जाता है।
काली मृदा में चिकनी मिट्टी की मात्रा अधिक होती है और इसकी जलधारण क्षमता बहुत अधिक होती है।
इसमें कैल्शियम कार्बोनेट, मैग्नीशियम, पोटाश और चूने जैसे खनिज पर्याप्त मात्रा में मिल सकते हैं, जबकि नाइट्रोजन, फास्फोरस और जैविक पदार्थ सामान्यतः कम होते हैं।
काली मृदा सूखने पर सिकुड़कर इसमें चौड़ी और गहरी दरारें पड़ जाती हैं। इन दरारों के कारण मृदा में वायु का प्रवेश होता है और मिट्टी स्वयं ढीली होने लगती है।
इसी गुण के कारण काली मृदा को स्वतः जुताई वाली मृदा भी कहा जाता है।
🎯 सबसे महत्वपूर्ण
काली मृदा = रेगुर = कपास की मृदा = अधिक जलधारण क्षमता = स्वतः जुताई
लाल एवं पीली मृदा
लौह यौगिकों से प्राप्त रंग
लाल मृदा का विकास मुख्यतः प्राचीन क्रिस्टलीय और कायांतरित चट्टानों के अपक्षय से हुआ है।
मृदा का लाल रंग मुख्य रूप से उसमें उपस्थित लौह ऑक्साइड के कारण होता है।
जब लौह यौगिक जलयोजित अवस्था में पाए जाते हैं तो उसी मृदा का रंग पीला दिखाई दे सकता है। इसलिए लाल और पीली मृदा को प्रायः एक ही व्यापक वर्ग में रखा जाता है।
इसका विस्तार तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड तथा मध्य एवं पूर्वी भारत के कई भागों में मिलता है।
यह मृदा सामान्यतः नाइट्रोजन, फास्फोरस और ह्यूमस में गरीब होती है और कई क्षेत्रों में इसकी प्रकृति अम्लीय होती है।
उचित सिंचाई और उर्वरकों के उपयोग से इसमें धान, मूँगफली, ज्वार, बाजरा, दालें तथा अनेक अन्य फसलें उगाई जा सकती हैं।
📗 रंग का कारण
लाल रंग — लौह ऑक्साइड।
पीला रंग — लौह यौगिकों की जलयोजित अवस्था से संबंधित।
लेटराइट मृदा
अधिक वर्षा और तीव्र निक्षालन से निर्मित मृदा
लेटराइट मृदा उच्च तापमान और अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में तीव्र अपक्षय तथा निक्षालन की प्रक्रिया से बनती है।
अधिक वर्षा के कारण घुलनशील पोषक पदार्थ मृदा की ऊपरी परत से नीचे बह जाते हैं। इसलिए यह मृदा सामान्यतः ह्यूमस, नाइट्रोजन, फास्फेट और अन्य पोषक तत्वों में गरीब होती है।
इसमें लौह और एल्युमिनियम के यौगिकों का सापेक्ष संचय हो सकता है। इसका कम उपजाऊ होना केवल लोहे की अधिक मात्रा के कारण नहीं, बल्कि मुख्यतः तीव्र निक्षालन और पोषक तत्वों की हानि से संबंधित है।
लेटराइट मृदा सामान्यतः अम्लीय प्रकृति की होती है।
यह कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, ओडिशा, असम और पश्चिमी घाट के अनेक उच्च वर्षा वाले क्षेत्रों में पाई जाती है।
केरल के मालाबार क्षेत्र और पश्चिमी घाट के अन्य भागों में इसका महत्वपूर्ण विस्तार मिलता है, लेकिन इसे केवल मालाबार तट तक सीमित नहीं माना जाना चाहिए।
उचित खाद और उर्वरक के प्रयोग से इस मृदा में चाय, कॉफी और काजू जैसी फसलें उगाई जाती हैं।
⚠️ विशेष ध्यान
लेटराइट मृदा के अनुर्वर होने का मुख्य कारण लोहे की अधिकता नहीं, बल्कि अधिक वर्षा से पोषक पदार्थों का तीव्र निक्षालन है।
वन एवं पर्वतीय मृदा
हिमालय और पर्वतीय क्षेत्रों की मृदा
वन एवं पर्वतीय मृदा भारत के पर्वतीय और वनाच्छादित क्षेत्रों में पाई जाती है।
इसकी संरचना और उर्वरता ऊँचाई, ढाल, वर्षा, तापमान और वनस्पति के अनुसार बदलती रहती है।
हिमालयी क्षेत्रों में जम्मू-कश्मीर, लद्दाख के कुछ भाग, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम तथा अरुणाचल प्रदेश में विभिन्न प्रकार की पर्वतीय मृदाएँ मिलती हैं।
नदी घाटियों और निचली ढलानों पर यह मृदा अपेक्षाकृत उपजाऊ हो सकती है, जबकि ऊँची ढलानों पर इसकी परत पतली और अपरदन से प्रभावित हो सकती है।
पर्वतीय क्षेत्रों की अनुकूल मृदाओं में सेब और अन्य फल, चाय, मसाले तथा बागवानी फसलें उगाई जाती हैं।
मरुस्थलीय एवं शुष्क मृदा
कम वर्षा वाले क्षेत्रों की मृदा
मरुस्थलीय या शुष्क मृदा मुख्यतः पश्चिमी राजस्थान तथा गुजरात, हरियाणा और पंजाब के कुछ शुष्क एवं अर्धशुष्क क्षेत्रों में पाई जाती है।
इस मृदा में बालू की मात्रा अधिक होने के कारण इसकी जलधारण क्षमता सामान्यतः कम होती है।
इसमें जैविक पदार्थ और नाइट्रोजन की मात्रा कम होती है।
पश्चिमी राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों की मिट्टी में नीचे की परतों में कैल्शियम कार्बोनेट या कंकर का संचय पाया जा सकता है।
उचित सिंचाई उपलब्ध होने पर इस मृदा की कृषि क्षमता में काफी वृद्धि हो जाती है।
सिंचित क्षेत्रों में बाजरा, गेहूँ, जौ, चना, कपास तथा अन्य फसलें उगाई जा सकती हैं।
लवणीय एवं क्षारीय मृदा
रेह, कल्लर और ऊसर भूमि से संबंधित तथ्य
अधिक लवण या क्षारीयता से प्रभावित मृदाएँ भारत के शुष्क, अर्धशुष्क तथा खराब जल-निकास वाले क्षेत्रों में पाई जाती हैं।
उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात सहित कई राज्यों में लवणीय तथा सोडिक मृदाओं की समस्या मिलती है।
पुरानी सामान्य ज्ञान पुस्तकों में उत्तर प्रदेश को अत्यधिक क्षारीय या ऊसर भूमि वाले प्रमुख राज्यों में बताया जाता है, लेकिन “भारत में सर्वाधिक क्षारीय मृदा केवल उत्तर प्रदेश में है” जैसे कथन को स्थायी सर्वमान्य रैंकिंग के रूप में याद करना उचित नहीं है।
लवणीय मृदाओं में कृषि के लिए आवश्यक पोषक पदार्थों, विशेषकर नाइट्रोजन की कमी हो सकती है और कई ऐसी मृदाओं में कैल्शियम की उपलब्धता भी कम होती है।
सोडिक या क्षारीय मृदा के सुधार के लिए जिप्सम का उपयोग किया जाता है।
🎯 अम्लीय और क्षारीय में अंतर
अम्लीय मृदा → चूना
सोडिक/क्षारीय मृदा → जिप्सम
अम्लीय मृदा का सुधार
मृदा अम्लता कम करने का उपाय
अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में क्षारीय तत्वों के निक्षालन के कारण मृदा अम्लीय हो सकती है।
अम्लीय मृदा को कृषि के लिए अधिक उपयुक्त बनाने हेतु चूना या चूना-पत्थर आधारित पदार्थों का प्रयोग किया जाता है।
चूना मृदा की अत्यधिक अम्लता को कम करने और कई आवश्यक पोषक तत्वों की उपलब्धता सुधारने में सहायता करता है।
📗 सीधा प्रश्न
अम्लीय मृदा का सुधार — चूना।
मृदा की जलधारण क्षमता
बालू, दोमट और चिकनी मिट्टी का अंतर
मृदा की जलधारण क्षमता उसके कणों के आकार, रंध्रों, जैविक पदार्थ और संरचना पर निर्भर करती है।
बलुई मृदा में कण बड़े और रंध्र भी बड़े होते हैं, इसलिए पानी तेजी से नीचे चला जाता है और इसकी जलधारण क्षमता कम होती है।
चिकनी मृदा में बहुत सूक्ष्म कण होते हैं और यह कुल मात्रा में अधिक पानी रोक सकती है।
लेकिन मृदा में कुल संचित जल और पौधे को वास्तव में उपलब्ध जल एक ही बात नहीं हैं। चिकनी मिट्टी पानी को बहुत मजबूती से पकड़ सकती है।
इसलिए “पौधों को सबसे अधिक उपलब्ध जल हमेशा चिकनी मृदा से मिलता है” कहना सही नहीं है। कृषि के लिए संतुलित दोमट मृदा में वायु, जलधारण और जल-उपलब्धता का अच्छा संतुलन मिलता है।
⚠️ भ्रम न करें
कम जलधारण क्षमता — बलुई मृदा।
चिकनी मिट्टी कुल जल अधिक रोक सकती है, पर सारा जल पौधों को
सुलभ नहीं होता।
दलहनी फसल और मृदा की उर्वरता
प्राकृतिक नाइट्रोजन स्थिरीकरण
मृदा की उर्वरता बनाए रखने में दलहनी फसलें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
मटर, चना, मूँग, उड़द, अरहर आदि दलहनी पौधों की जड़ों की ग्रंथियों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले जीवाणु पाए जाते हैं।
ये जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन को पौधों के उपयोग योग्य रूप में बदलने में सहायता करते हैं।
इसी कारण फसल चक्र में दलहनी फसलों को शामिल करना मृदा की नाइट्रोजन स्थिति और उर्वरता सुधारने का महत्वपूर्ण उपाय है।
मृदा अपरदन
मृदा की उपजाऊ ऊपरी परत का हटना
जल, वायु अथवा अन्य प्राकृतिक और मानवीय कारकों द्वारा मृदा की उपजाऊ ऊपरी परत के हटने को मृदा अपरदन कहते हैं।
वनों की कटाई, अत्यधिक चराई, ढलान पर अनुचित खेती, अत्यधिक जुताई और भूमि का अनुचित उपयोग मृदा अपरदन की गति बढ़ा सकते हैं।
जल द्वारा मृदा अपरदन के प्रमुख रूपों में परत अपरदन और अवनलिका अपरदन शामिल हैं।
जब बहता जल भूमि में गहरी नालियाँ काट देता है तो इसे अवनलिका अपरदन कहा जाता है।
चंबल नदी और उसकी सहायक नदियों के आसपास विकसित बीहड़ भूमि अवनलिका अपरदन का प्रसिद्ध उदाहरण है।
🎯 अत्यंत महत्वपूर्ण
चंबल के बीहड़ — अवनलिका अपरदन।
मृदा संरक्षण
अपरदन और उर्वरता ह्रास रोकने के उपाय
मृदा संरक्षण का उद्देश्य मृदा की उपजाऊ ऊपरी परत को बचाना, अपरदन को कम करना तथा भूमि की उत्पादकता बनाए रखना है।
वनारोपण और वृक्षारोपण मृदा अपरदन रोकने के महत्वपूर्ण उपाय हैं। वृक्षों की जड़ें मिट्टी को बाँधती हैं और वर्षा के जल के सीधे प्रहार को कम करती हैं।
पर्वतीय ढलानों पर सीढ़ीनुमा खेती पानी के बहाव की गति कम करके मृदा को बहने से बचाती है।
समोच्च जुताई और समोच्च बंध ढलानों पर बहते पानी की गति कम करने में सहायता करते हैं।
शुष्क और अर्धशुष्क क्षेत्रों में वृक्षों की कतारें लगाकर रक्षक पट्टियाँ बनाना पवन अपरदन कम करने में सहायक होता है।
फसल चक्र, मिश्रित खेती, दलहनी फसलों का समावेश, जैविक खाद, नियंत्रित चराई और उचित सिंचाई भी मृदा की गुणवत्ता बनाए रखने में सहायक हैं।
मृदा स्वास्थ्य कार्ड
मृदा परीक्षण और संतुलित पोषण
मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना का उद्देश्य किसानों को उनके खेत की मृदा में उपलब्ध प्रमुख एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों की स्थिति की जानकारी देना है।
मृदा स्वास्थ्य कार्ड में मृदा के नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, सल्फर, जस्ता, लोहा, तांबा, मैंगनीज और बोरॉन जैसे पोषक तत्वों के साथ पीएच, विद्युत चालकता और जैविक कार्बन की स्थिति का आकलन किया जाता है।
इसके आधार पर किसान को उर्वरकों की उपयुक्त मात्रा तथा आवश्यकता के अनुसार मृदा सुधारकों के प्रयोग की सलाह दी जाती है।
इसका मुख्य उद्देश्य अंधाधुंध उर्वरक उपयोग के स्थान पर मृदा की वास्तविक आवश्यकता के अनुसार संतुलित पोषण को बढ़ावा देना है।
मृदा में जस्ता एवं सूक्ष्म पोषक तत्व
पोषक तत्वों की कमी से संबंधित तथ्य
भारतीय कृषि मृदाओं में विभिन्न क्षेत्रों के अनुसार जस्ता, लोहा, बोरॉन, मैंगनीज तथा अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी पाई जा सकती है।
जस्ता की कमी भारत में व्यापक रूप से पाई जाने वाली महत्वपूर्ण सूक्ष्म पोषक तत्व कमियों में से एक है और कई कृषि क्षेत्रों में यह उत्पादन को प्रभावित करती है।
लेकिन पूरे भारत के लिए हर समय “मृदा में सर्वाधिक कमी केवल जस्ता की ही होती है” जैसी स्थायी रैंकिंग लिखना उचित नहीं है, क्योंकि पोषक तत्वों की कमी क्षेत्र, मृदा और फसल के अनुसार बदलती है।
जलभराव वाली मृदा का नीला-धूसर रंग
फेरस लौह और ऑक्सीजन की कमी
लंबे समय तक जलभराव वाली मृदा में ऑक्सीजन की कमी होने पर लौह यौगिकों का रासायनिक रूप बदल सकता है और मृदा में धूसर, नीला-धूसर या हरित-धूसर रंग दिखाई दे सकता है।
यह रंग मुख्यतः अपचय की दशाओं में बनने वाले फेरस लौह से संबंधित होता है।
इसे केवल “जैव मृदा नीली होती है क्योंकि वह अम्लीय होती है” कहना सही नहीं है। जलभराव और ऑक्सीजन की कमी इस रंग परिवर्तन के मुख्य कारक हैं।
दूसरी ओर अत्यधिक जैविक पदार्थ वाली पीटमय मृदा सामान्यतः गहरे भूरे से काले रंग की होती है और कई क्षेत्रों में अम्लीय प्रकृति की हो सकती है।
प्रमुख मृदाएँ और फसलें
एक नज़र में याद रखने योग्य तालिका
| मृदा | मुख्य क्षेत्र | प्रमुख फसलें |
|---|---|---|
| जलोढ़ | उत्तरी मैदान, नदी घाटियाँ एवं डेल्टा | धान, गेहूँ, गन्ना, मक्का, दलहन |
| काली | दक्कन का पठार, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात | कपास, गन्ना, सोयाबीन, ज्वार |
| लाल एवं पीली | दक्षिणी तथा पूर्वी प्रायद्वीपीय क्षेत्र | मूँगफली, बाजरा, ज्वार, दलहन, धान |
| लेटराइट | अधिक वर्षा वाले पश्चिमी एवं दक्षिणी क्षेत्र | चाय, कॉफी, काजू |
| वन एवं पर्वतीय | हिमालय और पर्वतीय क्षेत्र | फल, चाय, मसाले, बागवानी |
| मरुस्थलीय | राजस्थान तथा पश्चिमी शुष्क क्षेत्र | बाजरा, जौ, चना; सिंचाई पर अन्य फसलें |
मृदा से जुड़े महत्वपूर्ण युग्म
परीक्षा में सीधे पूछे जाने वाले संबंध
भ्रम से बचने वाले महत्वपूर्ण तथ्य
मिलते-जुलते तथ्यों का स्पष्ट अंतर
काली मृदा स्वतः जुताई वाली क्यों? — सूखने पर सिकुड़ती है और गहरी दरारें बनती हैं।
लेटराइट मृदा कम उपजाऊ क्यों? — अधिक वर्षा से होने वाले तीव्र निक्षालन के कारण पोषक तत्व बह जाते हैं; केवल लोहे की अधिकता इसका कारण नहीं है।
लाल और पीली मृदा का अंतर — दोनों का रंग लौह यौगिकों से संबंधित है; लाल रंग ऑक्सीकरण और पीला रंग जलयोजित लौह यौगिकों से जुड़ा है।
सबसे कम जलधारण — सामान्यतः मोटे कणों वाली बलुई मृदा में।
चिकनी मृदा कुल जल बहुत अधिक रोकती है, लेकिन उसका पूरा जल पौधों के लिए उपलब्ध नहीं होता।
अम्लीय मृदा और क्षारीय मृदा का उपचार उल्टा न याद करें — अम्लीय में चूना और सोडिक/क्षारीय मृदा में जिप्सम।
नीला-धूसर रंग — जलभराव एवं ऑक्सीजन की कमी में फेरस लौह की दशाओं से संबंधित; इसे सामान्य “जैव मृदा” का रंग न मानें।
जस्ता — भारत में व्यापक सूक्ष्म पोषक कमी है, लेकिन हर क्षेत्र के लिए इसे एक निश्चित “सर्वाधिक कमी” कहना उचित नहीं है।
⚡ अंतिम त्वरित पुनरावृत्ति
भारत में सर्वाधिक क्षेत्रफल पर जलोढ़ मृदा पाई जाती है।
भांगर = पुरानी जलोढ़ तथा खादर = नई जलोढ़।
रेगुर = काली मृदा = कपास की मृदा।
काली मृदा का व्यापक विस्तार महाराष्ट्र में है तथा मालवा पठार के बड़े हिस्से में भी यह पाई जाती है।
काली मृदा की प्रमुख विशेषताएँ — अधिक जलधारण क्षमता और सूखने पर गहरी दरारें।
लाल मृदा का रंग लौह ऑक्साइड से संबंधित है।
लाल एवं पीली मृदा में सामान्यतः नाइट्रोजन, फास्फोरस और ह्यूमस की कमी होती है।
लेटराइट मृदा का निर्माण अधिक तापमान, भारी वर्षा और तीव्र निक्षालन से होता है।
लेटराइट मृदा में उचित खाद के साथ चाय, कॉफी और काजू उगाए जाते हैं।
मरुस्थलीय मृदा में नाइट्रोजन और जैविक पदार्थ कम तथा जलधारण क्षमता भी कम होती है।
पश्चिमी राजस्थान की कई शुष्क मृदाओं की निचली परत में कैल्शियम कार्बोनेट या कंकर का संचय मिलता है।
अम्लीय मृदा का सुधार — चूना।
सोडिक/क्षारीय मृदा का सुधार — जिप्सम।
मृदा की उर्वरता सुधारने में दलहनी फसलें महत्वपूर्ण हैं।
चंबल के बीहड़ — अवनलिका अपरदन का प्रसिद्ध उदाहरण हैं।
वनारोपण, समोच्च जुताई, सीढ़ीनुमा खेती और रक्षक पट्टियाँ मृदा अपरदन रोकने के महत्वपूर्ण उपाय हैं।
मृदा स्वास्थ्य कार्ड किसान को मृदा में पोषक तत्वों की स्थिति तथा उपयुक्त उर्वरक और मृदा सुधारक की जानकारी देता है।