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राजभाषा
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संघ की राजभाषा, राज्यों की भाषा, भाषाई अल्पसंख्यक, आठवीं अनुसूची और शास्त्रीय भाषाएँ

राजभाषा संबंधी संवैधानिक व्यवस्था

भारतीय संविधान के भाग XVII में अनुच्छेद 343 से 351 तक राजभाषा से संबंधित प्रावधान दिए गए हैं। इसमें संघ की राजभाषा, राज्यों की राजभाषाएँ, केंद्र और राज्यों के बीच संचार की भाषा, उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों की भाषा, भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकार और हिंदी भाषा के विकास से संबंधित व्यवस्था शामिल है।

भारतीय संविधान ने हिंदी को देवनागरी लिपि में संघ की राजभाषा घोषित किया है। संविधान ने किसी भाषा को भारत की “राष्ट्रीय भाषा” घोषित नहीं किया है। इसलिए राजभाषा और राष्ट्रभाषा को एक ही अर्थ में नहीं पढ़ना चाहिए।

01

अनुच्छेद 343 — संघ की राजभाषा

हिंदी और देवनागरी लिपि

अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी और उसकी लिपि देवनागरी होगी।

संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त होने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतरराष्ट्रीय रूप होगा।

संविधान लागू होने के बाद प्रारंभिक 15 वर्षों तक उन सभी संघीय राजकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग जारी रखने की व्यवस्था की गई जिनमें संविधान लागू होने से ठीक पहले अंग्रेजी का उपयोग हो रहा था।

संविधान ने संसद को 15 वर्ष की अवधि समाप्त होने के बाद भी कानून द्वारा अंग्रेजी के प्रयोग को जारी रखने का अधिकार दिया।

02

क्या 1965 के बाद अंग्रेजी समाप्त हो गई?

राजभाषा अधिनियम, 1963

संविधान के अनुसार प्रारंभिक 15 वर्ष की अवधि 26 जनवरी 1965 को पूरी हुई, लेकिन इसके बाद अंग्रेजी का प्रयोग समाप्त नहीं हुआ।

राजभाषा अधिनियम, 1963 ने संघ के अनेक राजकीय प्रयोजनों और संसद के कार्यों में हिंदी के साथ अंग्रेजी के प्रयोग को जारी रखने की व्यवस्था की।

इसलिए यह कहना कि “15 वर्ष बाद अंग्रेजी स्वतः समाप्त हो जानी थी” सही नहीं है। संविधान ने स्वयं संसद को इसके आगे के प्रयोग पर कानून बनाने की शक्ति दी थी।

03

भारत की राष्ट्रभाषा और राजभाषा में अंतर

बहुत महत्वपूर्ण परीक्षा तथ्य

⚠️ भ्रम न करें

गलत: हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है।
सही: संविधान हिंदी को देवनागरी लिपि में संघ की राजभाषा घोषित करता है। संविधान ने किसी भाषा को राष्ट्रभाषा घोषित नहीं किया है।

04

अनुच्छेद 344 — राजभाषा आयोग

आयोग और संसदीय समिति

अनुच्छेद 344 संघ की राजभाषा के संबंध में आयोग और संसद की समिति की व्यवस्था करता है।

राष्ट्रपति को संविधान लागू होने के पाँच वर्ष की समाप्ति पर और उसके बाद संविधान लागू होने के दस वर्ष की समाप्ति पर आयोग गठित करने की व्यवस्था दी गई थी।

यह कहना कि संविधान प्रत्येक दस वर्ष में हमेशा नया राजभाषा आयोग गठित करने को कहता है, सही नहीं है। अनुच्छेद 344 की मूल भाषा पाँचवें और दसवें वर्ष से संबंधित है।

आयोग में अध्यक्ष तथा आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट विभिन्न भाषाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्य होते हैं जिन्हें राष्ट्रपति नियुक्त करता है।

05

राजभाषा आयोग के मुख्य कार्य

राष्ट्रपति को सिफारिश

संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए हिंदी भाषा के क्रमिक रूप से अधिक प्रयोग के संबंध में सिफारिश करना राजभाषा आयोग का महत्वपूर्ण कार्य है।

संघ के राजकीय प्रयोजनों में अंग्रेजी के प्रयोग पर किस प्रकार और किस सीमा तक प्रतिबंध लगाया जा सकता है, इस पर सिफारिश करना भी इसके कार्यों में शामिल था।

अनुच्छेद 348 में दिए गए प्रयोजनों के लिए किस भाषा का प्रयोग किया जाए, संघीय प्रयोजनों के लिए अंकों का कौन-सा रूप हो तथा राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए अन्य राजभाषा संबंधी विषयों पर भी आयोग सिफारिश कर सकता है।

आयोग को अपनी सिफारिशों में भारत की औद्योगिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक उन्नति तथा गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों के लोगों के न्यायसंगत हितों का भी ध्यान रखना होता है।

06

प्रथम राजभाषा आयोग

बी. जी. खेर आयोग, 1955

संविधान के अनुच्छेद 344 के अंतर्गत प्रथम राजभाषा आयोग का गठन 1955 में किया गया।

इसके अध्यक्ष बी. जी. खेर थे।

इस आयोग ने संघ के राजकीय कार्यों में हिंदी के क्रमिक विस्तार तथा अंग्रेजी के प्रयोग से संबंधित अनेक सिफारिशें प्रस्तुत कीं।

🎯 परीक्षा तथ्य

प्रथम राजभाषा आयोग → 1955 → बी. जी. खेर

07

संसदीय समिति और गोविंद बल्लभ पंत

प्रथम राजभाषा आयोग की सिफारिशों की समीक्षा

अनुच्छेद 344 के अंतर्गत राजभाषा आयोग की सिफारिशों पर विचार करने के लिए संसद के 30 सदस्यों वाली समिति का प्रावधान है।

इसमें लोकसभा के 20 और राज्यसभा के 10 सदस्य होते हैं।

प्रथम राजभाषा आयोग की सिफारिशों की समीक्षा के लिए 1957 में गठित समिति की अध्यक्षता पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने की।

समिति ने अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को 8 फरवरी 1959 को प्रस्तुत की।

08

अनुच्छेद 345 — राज्य की राजभाषा

राज्य विधानमंडल की शक्ति

अनुच्छेद 345 राज्य विधानमंडल को राज्य में प्रयुक्त एक या अधिक भाषाओं अथवा हिंदी को राज्य के सभी या किसी राजकीय प्रयोजन के लिए राजभाषा के रूप में अपनाने की शक्ति देता है।

जब तक राज्य विधानमंडल कानून द्वारा अन्य व्यवस्था न करे, राज्य के उन राजकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग जारी रह सकता है जिनके लिए संविधान लागू होने से पहले अंग्रेजी प्रयुक्त होती थी।

इसलिए प्रत्येक राज्य के लिए हिंदी को अपनी राजभाषा बनाना संवैधानिक रूप से अनिवार्य नहीं है।

09

अनुच्छेद 346 — केंद्र और राज्यों के बीच संचार

राजकीय संचार की भाषा

अनुच्छेद 346 संघ और किसी राज्य के बीच तथा एक राज्य और दूसरे राज्य के बीच राजकीय संचार में प्रयुक्त भाषा से संबंधित है।

सामान्यतः वह भाषा प्रयोग की जाती है जिसे संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए अधिकृत किया गया हो। वर्तमान वैधानिक व्यवस्था में हिंदी के साथ अंग्रेजी का भी व्यापक प्रयोग जारी है।

यदि दो या अधिक राज्य आपस में सहमत हों कि उनके बीच संचार की भाषा हिंदी होगी, तो वे हिंदी का प्रयोग कर सकते हैं।

10

अनुच्छेद 347 — किसी भाषा को विशेष मान्यता

राज्य की जनसंख्या के पर्याप्त भाग की मांग

यदि राष्ट्रपति इस बात से संतुष्ट हो कि किसी राज्य की जनसंख्या का पर्याप्त भाग किसी भाषा को राज्य द्वारा मान्यता देने की मांग करता है, तो राष्ट्रपति निर्देश दे सकता है कि उस भाषा को पूरे राज्य या उसके किसी भाग में निर्दिष्ट राजकीय प्रयोजनों के लिए मान्यता दी जाए।

इसलिए अनुच्छेद 347 को केवल “राष्ट्रपति की अनुमति से कोई भाषा राज्य की आधिकारिक भाषा बन जाती है” के रूप में पढ़ना अत्यधिक सरल होगा।

11

अनुच्छेद 348 — न्यायालयों और विधायी पाठ की भाषा

अंग्रेजी का महत्वपूर्ण प्रयोग

अनुच्छेद 348 के अनुसार सामान्यतः उच्चतम न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय की कार्यवाही अंग्रेजी भाषा में होती है, जब तक संसद कानून द्वारा अन्य व्यवस्था न करे।

संसद और राज्य विधानमंडलों में प्रस्तुत विधेयकों, अधिनियमों, अध्यादेशों तथा नियमों आदि के प्राधिकृत पाठ के संबंध में भी अंग्रेजी की महत्वपूर्ण संवैधानिक भूमिका है।

राज्य का राज्यपाल राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से संबंधित उच्च न्यायालय की कार्यवाही में हिंदी या राज्य की किसी अन्य राजकीय भाषा के उपयोग को अधिकृत कर सकता है, लेकिन यह व्यवस्था उच्च न्यायालय के निर्णय, डिक्री या आदेश के प्राधिकृत पाठ पर स्वतः लागू नहीं होती।

12

अनुच्छेद 349 — भाषा संबंधी कानूनों के लिए विशेष प्रक्रिया

प्रारंभिक पंद्रह वर्षों की व्यवस्था

अनुच्छेद 349 ने संविधान लागू होने के प्रारंभिक 15 वर्षों के दौरान अनुच्छेद 348 में उल्लिखित प्रयोजनों की भाषा से संबंधित कुछ कानून बनाने के लिए विशेष प्रक्रिया निर्धारित की थी।

ऐसे विधेयक या संशोधन राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी के बिना संसद में प्रस्तुत नहीं किए जा सकते थे और राष्ट्रपति को राजभाषा आयोग तथा संसदीय समिति की सिफारिशों पर विचार करना होता था।

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अनुच्छेद 350 — शिकायत किसी भी प्रयुक्त भाषा में

भाषाई सुविधा का अधिकार

अनुच्छेद 350 के अनुसार कोई व्यक्ति अपनी शिकायत के निवारण के लिए संघ या राज्य के किसी अधिकारी अथवा प्राधिकारी को संघ या राज्य में प्रयुक्त किसी भी भाषा में अभ्यावेदन दे सकता है।

यह प्रावधान नागरिक को केवल हिंदी या अंग्रेजी तक सीमित नहीं करता।

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अनुच्छेद 350A — मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा

भाषाई अल्पसंख्यक बच्चों की सुविधा

अनुच्छेद 350A प्रत्येक राज्य और राज्य के भीतर प्रत्येक स्थानीय प्राधिकारी पर यह प्रयास करने का दायित्व डालता है कि भाषाई अल्पसंख्यक वर्गों के बच्चों को शिक्षा के प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की पर्याप्त सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ।

राष्ट्रपति भी आवश्यक समझे तो किसी राज्य को इस संबंध में निर्देश दे सकता है।

⚠️ अनुच्छेद संख्या सुधार

गलत: मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा का प्रावधान अनुच्छेद 350 में है।
सही: यह प्रावधान अनुच्छेद 350A में है।

15

अनुच्छेद 350B — भाषाई अल्पसंख्यकों के विशेष अधिकारी

राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति

अनुच्छेद 350B भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए एक विशेष अधिकारी की व्यवस्था करता है जिसे राष्ट्रपति नियुक्त करता है।

इस अधिकारी का कर्तव्य संविधान के अंतर्गत भाषाई अल्पसंख्यकों को प्रदान किए गए संरक्षण से संबंधित मामलों की जाँच करना और राष्ट्रपति को रिपोर्ट देना है।

राष्ट्रपति इन रिपोर्टों को संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाता है तथा संबंधित राज्य सरकारों को भेजता है।

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अनुच्छेद 351 — हिंदी भाषा के विकास का निर्देश

संघ का संवैधानिक कर्तव्य

अनुच्छेद 351 संघ को हिंदी भाषा के प्रसार और विकास का कर्तव्य देता है ताकि हिंदी भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके।

हिंदी के विकास में हिंदुस्तानी तथा आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट अन्य भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त रूप, शैली और पदों को आत्मसात करने की बात कही गई है।

शब्द-भंडार की समृद्धि के लिए आवश्यक या वांछनीय होने पर मुख्यतः संस्कृत और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करने की दिशा दी गई है।

अनुच्छेद 351 में सीधे “हिंदी को वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा बनाना” जैसे शब्द नहीं लिखे गए हैं, लेकिन हिंदी को आधुनिक ज्ञान और भारत की सामासिक संस्कृति की प्रभावी अभिव्यक्ति का सक्षम माध्यम बनाने की व्यापक संवैधानिक दिशा इसमें निहित है।

17

आठवीं अनुसूची

वर्तमान में 22 भाषाएँ

भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्तमान में 22 भाषाएँ सम्मिलित हैं।

मूल संविधान में आठवीं अनुसूची में केवल 14 भाषाएँ थीं। विभिन्न संविधान संशोधनों द्वारा समय-समय पर आठ और भाषाएँ जोड़ी गईं।

आठवीं अनुसूची में किसी भाषा का सम्मिलित होना उसे स्वतः संघ की राजभाषा या राष्ट्रभाषा नहीं बनाता।

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आठवीं अनुसूची की 22 भाषाएँ

पूरी सूची

क्रम भाषा क्रम भाषा
1असमिया12मणिपुरी
2बंगाली13मराठी
3बोडो14नेपाली
4डोगरी15ओड़िया
5गुजराती16पंजाबी
6हिंदी17संस्कृत
7कन्नड़18संथाली
8कश्मीरी19सिंधी
9कोंकणी20तमिल
10मैथिली21तेलुगु
11मलयालम22उर्दू
19

मूल आठवीं अनुसूची की 14 भाषाएँ

1950 की मूल सूची

मूल संविधान में आठवीं अनुसूची की 14 भाषाएँ थीं—असमिया, बंगाली, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, मलयालम, मराठी, ओड़िया, पंजाबी, संस्कृत, तमिल, तेलुगु और उर्दू।

इसके बाद सिंधी, कोंकणी, मणिपुरी, नेपाली, बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली को अलग-अलग संविधान संशोधनों से जोड़ा गया।

20

21वाँ संविधान संशोधन, 1967

सिंधी भाषा

21वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1967 द्वारा सिंधी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित किया गया।

इसके बाद आठवीं अनुसूची की भाषाओं की संख्या 14 से बढ़कर 15 हो गई।

21

71वाँ संविधान संशोधन, 1992

कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली

71वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा आठवीं अनुसूची में तीन भाषाएँ जोड़ी गईं—

कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली।

इसके बाद आठवीं अनुसूची की भाषाओं की संख्या 18 हो गई।

22

92वाँ संविधान संशोधन, 2003

बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली

92वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा आठवीं अनुसूची में बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली भाषाएँ सम्मिलित की गईं।

इस संशोधन के बाद आठवीं अनुसूची की भाषाओं की संख्या 18 से बढ़कर 22 हो गई।

इस प्रकार मैथिली को भी 92वें संविधान संशोधन के माध्यम से आठवीं अनुसूची में स्थान मिला।

🎯 याद रखने का क्रम

21वाँ — सिंधी 71वाँ — कोंकणी, मणिपुरी, नेपाली 92वाँ — बोडो, डोगरी, मैथिली, संथाली
23

उत्तराखंड की द्वितीय राजभाषा

संस्कृत

उत्तराखंड में संस्कृत को द्वितीय राजभाषा का दर्जा प्राप्त है।

इस तथ्य को आठवीं अनुसूची या संघ की राजभाषा से अलग समझना चाहिए। यह संबंधित राज्य की राजभाषा नीति से जुड़ा तथ्य है।

24

राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, तिरुपति

नाम में हुआ महत्वपूर्ण परिवर्तन

तिरुपति, आंध्र प्रदेश में संस्कृत अध्ययन का महत्वपूर्ण केंद्रीय विश्वविद्यालय राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय स्थित है।

इसे पहले राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ के नाम से जाना जाता था। वर्ष 2020 में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय अधिनियम के बाद इसे केंद्रीय विश्वविद्यालय के रूप में राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय का नाम मिला।

इसलिए वर्तमान नोट्स में “राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ, तिरुपति” के स्थान पर राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, तिरुपति लिखना अधिक सही है।

25

भारत की शास्त्रीय भाषाएँ

वर्तमान संख्या 11

पहले भारत में केवल छह भाषाओं—तमिल, संस्कृत, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम और ओड़िया—को शास्त्रीय भाषा का दर्जा प्राप्त था।

लेकिन अक्टूबर 2024 में मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बंगाली को भी शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया गया।

इस प्रकार वर्तमान में भारत में कुल 11 शास्त्रीय भाषाएँ हैं।

इसलिए “भारत में केवल छह शास्त्रीय भाषाएँ हैं” वाला पुराना तथ्य अब सही नहीं है।

⚠️ वर्तमान तथ्य

पुराना: भारत में 6 शास्त्रीय भाषाएँ।
वर्तमान: भारत में 11 शास्त्रीय भाषाएँ हैं।

26

शास्त्रीय भाषाएँ और मान्यता वर्ष

पूरी वर्तमान सूची

भाषा शास्त्रीय भाषा की मान्यता
तमिल2004
संस्कृत2005
तेलुगु2008
कन्नड़2008
मलयालम2013
ओड़िया2014
मराठी2024
असमिया2024
बंगाली2024
पाली2024
प्राकृत2024
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आठवीं अनुसूची और शास्त्रीय भाषा में अंतर

दो अलग अवधारणाएँ

आठवीं अनुसूची में सम्मिलित भाषा और शास्त्रीय भाषा का दर्जा दो अलग अवधारणाएँ हैं।

उदाहरण के लिए पाली और प्राकृत को 2024 में शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया गया, लेकिन वे संविधान की आठवीं अनुसूची की 22 भाषाओं में शामिल नहीं हैं।

इसी प्रकार आठवीं अनुसूची में शामिल प्रत्येक भाषा को शास्त्रीय भाषा का दर्जा प्राप्त नहीं है।

28

सबसे अधिक बोली जाने वाली अनुसूचित भाषाएँ

जनगणना आधारित परीक्षा तथ्य

भारत की जनगणना 2011 के मातृभाषा संबंधी आँकड़ों में हिंदी सबसे अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली अनुसूचित भाषा है।

बंगाली दूसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली अनुसूचित भाषा है।

इसलिए आपके नोट्स का यह बिंदु परीक्षा की दृष्टि से सही है, लेकिन इसे जनगणना 2011 के आधार पर पढ़ना अधिक उचित है।

29

राजभाषा संबंधी प्रावधान में संशोधन

दो-तिहाई बहुमत वाले कथन की सही समझ

यह कहना कि “भारत की राजभाषा से संबंधित प्रत्येक प्रावधान को संसद केवल दो-तिहाई बहुमत से ही बदल सकती है” अत्यधिक व्यापक कथन है।

यदि संविधान के भाग XVII के किसी संवैधानिक प्रावधान में संशोधन करना हो, तो अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान संशोधन की निर्धारित प्रक्रिया लागू होगी, जिसमें प्रत्येक सदन में कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत आवश्यक होता है।

लेकिन राजभाषा से संबंधित प्रत्येक वैधानिक परिवर्तन संविधान संशोधन नहीं होता। उदाहरण के लिए अंग्रेजी के निरंतर प्रयोग से संबंधित कई व्यवस्थाएँ राजभाषा अधिनियम, 1963 के माध्यम से संचालित होती हैं।

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प्रमुख अनुच्छेद — एक नज़र में

343 से 351 तक

अनुच्छेद मुख्य विषय
343संघ की राजभाषा — हिंदी, लिपि — देवनागरी
344राजभाषा आयोग और संसद की समिति
345राज्य की राजभाषा
346संघ-राज्य और अंतर-राज्य संचार की भाषा
347राज्य की जनसंख्या के किसी भाग द्वारा बोली जाने वाली भाषा को विशेष मान्यता
348उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय और विधायी प्राधिकृत पाठ की भाषा
349भाषा संबंधी कुछ कानूनों के लिए विशेष प्रक्रिया
350शिकायत के निवारण के लिए किसी प्रयुक्त भाषा में अभ्यावेदन
350Aभाषाई अल्पसंख्यक बच्चों को प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की सुविधा
350Bभाषाई अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी
351हिंदी भाषा के विकास के लिए संघ का निर्देश
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महत्वपूर्ण भ्रम और सही तथ्य

परीक्षा में गलती से बचें

गलत: हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है।
सही: हिंदी देवनागरी लिपि में संघ की राजभाषा है; संविधान ने कोई राष्ट्रभाषा घोषित नहीं की।

गलत: 1965 के बाद अंग्रेजी का प्रयोग समाप्त हो गया।
सही: राजभाषा अधिनियम, 1963 के अंतर्गत हिंदी के साथ अंग्रेजी का प्रयोग जारी है।

गलत: अनुच्छेद 344 के अनुसार हर दस वर्ष में हमेशा राजभाषा आयोग बनता है।
सही: संविधान की भाषा पाँचवें वर्ष और फिर संविधान लागू होने के दसवें वर्ष पर आयोग गठन की व्यवस्था करती है।

गलत: अनुच्छेद 347 में राष्ट्रपति की अनुमति से कोई भी भाषा सीधे पूरे राज्य की राजभाषा बन जाती है।
सही: पर्याप्त जनसंख्या की मांग पर राष्ट्रपति किसी भाषा को पूरे राज्य या उसके किसी भाग में निर्दिष्ट प्रयोजनों के लिए मान्यता देने का निर्देश दे सकता है।

गलत: मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा अनुच्छेद 350 में है।
सही: यह अनुच्छेद 350A में है।

पुराना: भारत में केवल छह शास्त्रीय भाषाएँ हैं।
सही: 2024 में पाँच नई भाषाएँ जुड़ने के बाद कुल 11 शास्त्रीय भाषाएँ हैं।

गलत: पाली और प्राकृत आठवीं अनुसूची में शामिल हैं क्योंकि वे शास्त्रीय भाषा हैं।
सही: पाली और प्राकृत शास्त्रीय भाषाएँ हैं, लेकिन आठवीं अनुसूची की 22 भाषाओं में शामिल नहीं हैं।

पुराना नाम: राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ, तिरुपति।
वर्तमान: राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, तिरुपति।

अधूरा: राजभाषा संबंधी हर बदलाव के लिए केवल 2/3 बहुमत चाहिए।
सही: संवैधानिक प्रावधान बदलने पर अनुच्छेद 368 की विशेष बहुमत प्रक्रिया लागू होती है; सभी राजभाषा संबंधी वैधानिक बदलाव संविधान संशोधन नहीं होते।

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त्वरित पुनरावृत्ति

एक नज़र में पूरा अध्याय

⚡ याद रखने का क्रम

343 — संघ की राजभाषा 344 — राजभाषा आयोग 345 — राज्य की भाषा
346 — संचार 347 — विशेष मान्यता 348 — न्यायालय
350A — मातृभाषा 350B — विशेष अधिकारी 351 — हिंदी का विकास

⚡ अंतिम पुनरावृत्ति

राजभाषा संबंधी प्रावधान — संविधान का भाग XVII, अनुच्छेद 343 से 351।

संघ की राजभाषा — हिंदी।

हिंदी की लिपि — देवनागरी।

अंकों का रूप — भारतीय अंकों का अंतरराष्ट्रीय रूप।

राष्ट्रभाषा — संविधान ने किसी भाषा को भारत की राष्ट्रभाषा घोषित नहीं किया है।

अंग्रेजी का प्रारंभिक संवैधानिक प्रयोग — संविधान लागू होने से 15 वर्ष तक; इसके बाद संसद द्वारा कानून से प्रयोग जारी रखने की व्यवस्था।

राजभाषा अधिनियम — 1963।

अनुच्छेद 344 — राजभाषा आयोग और संसदीय समिति।

प्रथम राजभाषा आयोग — 1955।

प्रथम राजभाषा आयोग के अध्यक्ष — बी. जी. खेर।

अनुच्छेद 344 की संसदीय समिति — 30 सदस्य; 20 लोकसभा + 10 राज्यसभा।

प्रथम समिति के अध्यक्ष — पंडित गोविंद बल्लभ पंत।

अनुच्छेद 345 — राज्य की राजभाषा।

अनुच्छेद 346 — केंद्र-राज्य एवं अंतर-राज्य संचार।

अनुच्छेद 347 — राज्य की जनसंख्या के पर्याप्त भाग द्वारा बोली जाने वाली भाषा को विशेष मान्यता।

अनुच्छेद 348 — उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय तथा विधायी प्राधिकृत पाठ की भाषा संबंधी व्यवस्था।

अनुच्छेद 350 — शिकायत के निवारण हेतु प्रयुक्त भाषा में अभ्यावेदन।

अनुच्छेद 350A — भाषाई अल्पसंख्यक बच्चों को प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की पर्याप्त सुविधा।

अनुच्छेद 350B — भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी।

अनुच्छेद 351 — हिंदी भाषा के प्रसार और विकास का संघ का कर्तव्य।

आठवीं अनुसूची — वर्तमान में 22 भाषाएँ।

मूल आठवीं अनुसूची — 14 भाषाएँ।

21वाँ संविधान संशोधन, 1967 — सिंधी।

71वाँ संविधान संशोधन, 1992 — कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली।

92वाँ संविधान संशोधन, 2003 — बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली।

मैथिली — 92वें संविधान संशोधन द्वारा आठवीं अनुसूची में शामिल।

उत्तराखंड की द्वितीय राजभाषा — संस्कृत।

राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय — तिरुपति, आंध्र प्रदेश।

भारत की वर्तमान शास्त्रीय भाषाएँ — कुल 11।

2004 — तमिल।

2005 — संस्कृत।

2008 — तेलुगु और कन्नड़।

2013 — मलयालम।

2014 — ओड़िया।

2024 — मराठी, असमिया, बंगाली, पाली और प्राकृत।

बंगाली — जनगणना 2011 के अनुसार हिंदी के बाद दूसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली अनुसूचित भाषा।

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