लखनऊ समझौता
(1916)
कांग्रेस और मुस्लिम लीग की ऐतिहासिक सहमति
लखनऊ समझौता 1916 भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक था। इसमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अखिल भारतीय मुस्लिम लीग ने संवैधानिक सुधारों और भारतीयों को अधिक राजनीतिक अधिकार देने के संबंध में एक साझा योजना स्वीकार की।
यह समझौता इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि इसी समय कांग्रेस के भीतर लंबे समय से अलग चल रहे उदारवादी और उग्रवादी नेता भी पुनः एक साथ आए। इस कारण 1916 का लखनऊ अधिवेशन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में राजनीतिक एकता का महत्वपूर्ण चरण माना जाता है।
लखनऊ समझौते की पृष्ठभूमि
1907 के सूरत अधिवेशन के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस उदारवादी और उग्रवादी दो धाराओं में विभाजित हो गई थी।
दूसरी ओर 1906 में स्थापित मुस्लिम लीग प्रारंभिक वर्षों में ब्रिटिश सरकार के प्रति सहयोग की नीति अपनाती थी, लेकिन धीरे-धीरे उसके राजनीतिक उद्देश्यों में भी परिवर्तन आने लगा।
1913 ई. में मुस्लिम लीग ने भारत में स्वशासन प्राप्त करने को अपने उद्देश्यों में शामिल किया, जिससे कांग्रेस और लीग के बीच राजनीतिक सहयोग की संभावना बढ़ी।
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय नेताओं को यह महसूस होने लगा कि ब्रिटिश सरकार पर संयुक्त राजनीतिक दबाव डालकर संवैधानिक सुधार और स्वशासन की दिशा में प्रगति की जा सकती है।
1916 का लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 1916 का अधिवेशन लखनऊ में आयोजित किया गया।
इस अधिवेशन की अध्यक्षता अंबिका चरण मजूमदार ने की।
इसी समय मुस्लिम लीग का अधिवेशन भी लखनऊ में आयोजित हुआ और दोनों संगठनों ने संवैधानिक सुधारों से संबंधित साझा मांगों पर सहमति बनाई।
कांग्रेस और मुस्लिम लीग द्वारा स्वीकृत इसी संयुक्त संवैधानिक योजना को आगे लखनऊ समझौता कहा गया।
परीक्षा के लिए
1916 → लखनऊ अधिवेशन → कांग्रेस अध्यक्ष अंबिका चरण मजूमदार → कांग्रेस-लीग समझौता।
उदारवादी और उग्रवादी पुनर्मिलन
1916 के लखनऊ अधिवेशन की एक और अत्यंत महत्वपूर्ण उपलब्धि कांग्रेस के उदारवादी और उग्रवादी नेताओं का पुनर्मिलन था।
1907 के सूरत विभाजन के बाद बाल गंगाधर तिलक और उनके समर्थक कांग्रेस की मुख्यधारा से अलग हो गए थे।
1914 में तिलक की मांडले जेल से रिहाई और गोपालकृष्ण गोखले तथा फिरोजशाह मेहता जैसे प्रमुख उदारवादी नेताओं की मृत्यु के बाद कांग्रेस में पुनर्मिलन का मार्ग अधिक आसान हुआ।
अंततः 1916 के लखनऊ अधिवेशन में उग्रवादी नेता फिर कांग्रेस में शामिल हो गए।
बहुत महत्वपूर्ण
1907 सूरत → कांग्रेस विभाजन।
1916 लखनऊ → उदारवादी और उग्रवादी पुनर्मिलन।
समझौते के प्रमुख निर्माता
लखनऊ समझौते को तैयार करने में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के अनेक प्रमुख नेताओं ने भूमिका निभाई।
इनमें बाल गंगाधर तिलक, मुहम्मद अली जिन्ना, अंबिका चरण मजूमदार, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, एनी बेसेंट, मजहरुल हक और महमूदाबाद के राजा जैसे नेता विशेष रूप से उल्लेखनीय थे।
बाल गंगाधर तिलक ने कांग्रेस के भीतर समझौते के पक्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मुहम्मद अली जिन्ना उस समय कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों से जुड़े हुए थे और कांग्रेस-लीग सहयोग को आगे बढ़ाने वाले प्रमुख नेताओं में थे।
कांग्रेस और मुस्लिम लीग की साझा मांग
लखनऊ समझौते में कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने ब्रिटिश सरकार के सामने संवैधानिक सुधारों की संयुक्त योजना प्रस्तुत की।
दोनों संगठनों ने केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों में निर्वाचित सदस्यों की संख्या बढ़ाने की मांग की।
प्रांतीय विधान परिषदों में लगभग चार-पाँचवाँ सदस्य निर्वाचित और एक-पाँचवाँ सदस्य मनोनीत रखने का प्रस्ताव था।
मताधिकार को अधिक व्यापक बनाने तथा भारतीयों को शासन में अधिक वास्तविक भागीदारी देने की मांग की गई।
पृथक निर्वाचन की स्वीकृति
लखनऊ समझौते का सबसे महत्वपूर्ण और आगे चलकर सबसे विवादास्पद प्रावधान मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल को कांग्रेस द्वारा स्वीकार किया जाना था।
मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था ब्रिटिश सरकार ने पहले ही 1909 के मार्ले-मिंटो सुधारों के माध्यम से लागू कर दी थी।
लखनऊ समझौते में कांग्रेस ने पहली बार मुस्लिम लीग के साथ राजनीतिक समझौते के हिस्से के रूप में इस व्यवस्था को स्वीकार किया।
इसका उद्देश्य उस समय कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच राजनीतिक सहयोग और संयुक्त संवैधानिक मांगों के लिए सहमति स्थापित करना था।
भ्रम से बचें
पृथक निर्वाचन की शुरुआत लखनऊ समझौते से नहीं हुई थी।
1909 → मार्ले-मिंटो सुधार द्वारा पृथक निर्वाचन लागू।
1916 → कांग्रेस ने लखनऊ समझौते में इसे स्वीकार किया।
केंद्रीय विधान परिषद में मुस्लिम प्रतिनिधित्व
लखनऊ समझौते के अनुसार केंद्रीय अर्थात तत्कालीन इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में निर्वाचित भारतीय सदस्यों में एक-तिहाई मुस्लिम सदस्य होने का प्रस्ताव रखा गया।
इन मुस्लिम प्रतिनिधियों का निर्वाचन पृथक मुस्लिम निर्वाचन मंडलों द्वारा किया जाना था।
इस व्यवस्था का उद्देश्य मुस्लिम लीग को यह आश्वासन देना था कि केंद्रीय राजनीति में मुसलमानों का निश्चित प्रतिनिधित्व बना रहेगा।
याद रखें
लखनऊ समझौता → केंद्रीय विधान परिषद में निर्वाचित भारतीय सदस्यों का 1/3 मुस्लिम प्रतिनिधित्व।
प्रांतों में मुस्लिम प्रतिनिधित्व
लखनऊ समझौते में विभिन्न प्रांतों में मुस्लिम प्रतिनिधित्व का अनुपात भी निर्धारित किया गया।
कुछ प्रांतों में मुसलमानों को उनकी जनसंख्या से अधिक प्रतिनिधित्व दिया गया, जबकि मुस्लिम बहुल पंजाब और बंगाल में उनकी जनसंख्या की तुलना में निर्धारित प्रतिनिधित्व कम था।
| प्रांत | मुस्लिम प्रतिनिधित्व |
|---|---|
| पंजाब | 50 प्रतिशत |
| बंगाल | 40 प्रतिशत |
| संयुक्त प्रांत | 30 प्रतिशत |
| बिहार | 25 प्रतिशत |
| बंबई | एक-तिहाई |
| मध्य प्रांत | 15 प्रतिशत |
| मद्रास | 15 प्रतिशत |
सांप्रदायिक विषयों पर विशेष सुरक्षा
समझौते में धार्मिक समुदायों से संबंधित विधायी मामलों के लिए एक विशेष सुरक्षा का प्रस्ताव भी रखा गया।
यदि किसी विधान परिषद में किसी समुदाय के तीन-चौथाई सदस्य किसी ऐसे विधेयक या प्रस्ताव का विरोध करते जो उनके समुदाय को प्रभावित करता हो, तो उस प्रस्ताव को आगे नहीं बढ़ाया जाना था।
इसका उद्देश्य बहुसंख्यक राजनीतिक शक्ति द्वारा किसी समुदाय के हितों की अनदेखी किए जाने की आशंका को कम करना था।
विधान परिषदों में सुधार की मांग
लखनऊ समझौते में केवल हिंदू-मुस्लिम प्रतिनिधित्व का प्रश्न ही नहीं था, बल्कि व्यापक संवैधानिक सुधारों की भी मांग की गई।
प्रांतीय और केंद्रीय विधान परिषदों में निर्वाचित सदस्यों का अनुपात बढ़ाने का प्रस्ताव था।
विधान परिषदों को बजट, कर और प्रशासनिक मामलों पर अधिक नियंत्रण देने की मांग की गई।
सदस्यों को प्रश्न और पूरक प्रश्न पूछने तथा महत्वपूर्ण सार्वजनिक मामलों पर प्रस्ताव लाने के अधिक अधिकार देने की मांग की गई।
कार्यपालिका में भारतीयों की भागीदारी
समझौते में प्रांतीय सरकारों की कार्यकारी परिषदों में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाने की मांग की गई।
प्रस्ताव था कि प्रांतीय कार्यकारी परिषदों के कम-से-कम आधे सदस्य भारतीय हों।
इसी प्रकार भारत के गवर्नर-जनरल की कार्यकारी परिषद में भी भारतीय प्रतिनिधित्व बढ़ाने का प्रस्ताव था।
इसका उद्देश्य केवल विधान परिषदों में भारतीयों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि वास्तविक प्रशासनिक निर्णयों में भी भारतीयों की भूमिका मजबूत करना था।
भारत सचिव के नियंत्रण में कमी
लखनऊ समझौते की संयुक्त योजना में भारत सरकार को ब्रिटेन स्थित भारत सचिव के नियंत्रण से अधिक स्वतंत्र बनाने की मांग भी शामिल थी।
भारत सचिव की परिषद को समाप्त करने तथा भारत के प्रशासन में भारतीय प्रतिनिधित्व बढ़ाने की मांग की गई।
इसके पीछे उद्देश्य भारत के प्रशासन को ब्रिटेन के प्रत्यक्ष नौकरशाही नियंत्रण से धीरे-धीरे मुक्त कर अधिक उत्तरदायी शासन की दिशा में ले जाना था।
जिन्ना की भूमिका
मुहम्मद अली जिन्ना लखनऊ समझौते के समय कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौता कराने वाले प्रमुख नेताओं में थे।
उस समय उनकी राजनीति हिंदू-मुस्लिम सहयोग और संवैधानिक माध्यम से भारतीयों को अधिक राजनीतिक अधिकार दिलाने पर केंद्रित थी।
कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच 1916 में बनी निकटता के कारण उनके राजनीतिक जीवन के इस दौर को विशेष महत्व दिया जाता है।
बाद के दशकों में भारतीय राजनीति की परिस्थितियाँ बहुत बदल गईं और कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के संबंध भी बदल गए, इसलिए 1916 की जिन्ना की भूमिका को बाद की राजनीतिक घटनाओं से अलग संदर्भ में समझना चाहिए।
बाल गंगाधर तिलक की भूमिका
बाल गंगाधर तिलक लखनऊ समझौते के समर्थकों में सबसे प्रभावशाली कांग्रेस नेताओं में थे।
उन्होंने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौते को राष्ट्रीय आंदोलन में राजनीतिक एकता मजबूत करने के लिए आवश्यक माना।
तिलक के प्रभाव ने कांग्रेस के भीतर इस समझौते को स्वीकार कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1916 तिलक के राजनीतिक जीवन में इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि इसी वर्ष वे कांग्रेस की मुख्यधारा में वापस आए और होमरूल आंदोलन को भी आगे बढ़ा रहे थे।
लखनऊ समझौते का महत्व
लखनऊ समझौते ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग को पहली बार महत्वपूर्ण संवैधानिक मांगों पर एक साझा राजनीतिक मंच प्रदान किया।
इससे कुछ समय के लिए हिंदू-मुस्लिम राजनीतिक सहयोग को मजबूती मिली।
इसी अधिवेशन में कांग्रेस के उदारवादी और उग्रवादी नेताओं का पुनर्मिलन होने से राष्ट्रीय आंदोलन के विभिन्न राजनीतिक समूह फिर एक मंच पर आए।
इस संयुक्त दबाव ने ब्रिटिश सरकार को यह संकेत दिया कि भारतीय राजनीतिक नेतृत्व अधिक व्यापक संवैधानिक सुधार चाहता है।
1917 की मॉन्टेग्यू घोषणा और आगे के संवैधानिक सुधारों की राजनीतिक पृष्ठभूमि में भी उस समय की बढ़ती भारतीय एकता और राजनीतिक दबाव का महत्व था।
लखनऊ समझौते की सीमा
लखनऊ समझौते ने तत्कालीन परिस्थितियों में कांग्रेस और मुस्लिम लीग को निकट लाया, लेकिन इसमें कांग्रेस द्वारा पृथक निर्वाचन व्यवस्था स्वीकार करना बाद में विवाद का विषय बना।
पृथक निर्वाचन व्यवस्था ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व को धार्मिक समुदाय के आधार पर संस्थागत रूप देने की प्रक्रिया को और मजबूत किया।
इसी कारण इतिहासकारों का एक वर्ग लखनऊ समझौते को एक ओर हिंदू-मुस्लिम सहयोग की महत्वपूर्ण उपलब्धि मानता है, वहीं दूसरी ओर सांप्रदायिक निर्वाचन को स्वीकार करने के कारण इसकी दीर्घकालीन राजनीतिक सीमा भी बताता है।
इसलिए इसे केवल “हिंदू-मुस्लिम एकता की पूर्ण सफलता” के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं है; इसके तत्कालीन लाभ और दीर्घकालीन राजनीतिक प्रभाव दोनों महत्वपूर्ण हैं।
घटनाओं का सही क्रम
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1906 | अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना |
| 1907 | सूरत अधिवेशन में कांग्रेस का उदारवादी-उग्रवादी विभाजन |
| 1909 | मार्ले-मिंटो सुधार द्वारा मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन |
| 1913 | मुस्लिम लीग ने स्वशासन को अपने राजनीतिक उद्देश्यों में शामिल किया |
| 1914 | बाल गंगाधर तिलक मांडले कारावास से रिहा |
| 1916 | कांग्रेस में उदारवादी और उग्रवादी पुनर्मिलन |
| 1916 | लखनऊ में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौता |
| 1916 | कांग्रेस द्वारा पृथक निर्वाचन को समझौते के अंतर्गत स्वीकार किया गया |
परीक्षा में भ्रमित करने वाले तथ्य
लखनऊ समझौता — 1916 ई.
यह समझौता भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के बीच हुआ।
1916 के लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष — अंबिका चरण मजूमदार।
इसी अधिवेशन में कांग्रेस के उदारवादी और उग्रवादी नेता पुनः एक साथ आए।
उदारवादी और उग्रवादी कांग्रेस में 1907 के सूरत अधिवेशन में अलग हुए थे।
पृथक निर्वाचन की शुरुआत 1916 में नहीं बल्कि 1909 के मार्ले-मिंटो सुधारों से हुई थी।
1916 के लखनऊ समझौते में कांग्रेस ने मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन को स्वीकार किया।
केंद्रीय विधान परिषद में निर्वाचित भारतीय सदस्यों में एक-तिहाई मुस्लिम सदस्य रखने का प्रस्ताव था।
प्रांतीय विधान परिषदों में चार-पाँचवाँ सदस्य निर्वाचित और एक-पाँचवाँ मनोनीत रखने का प्रस्ताव था।
किसी समुदाय के तीन-चौथाई सदस्यों द्वारा विरोध किए जाने पर उस समुदाय को प्रभावित करने वाले प्रस्ताव को आगे न बढ़ाने का प्रावधान सुझाया गया।
लखनऊ समझौते में बाल गंगाधर तिलक और मुहम्मद अली जिन्ना की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
एक नजर में
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| समझौता | लखनऊ समझौता |
| वर्ष | 1916 ई. |
| स्थान | लखनऊ |
| पक्ष | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एवं अखिल भारतीय मुस्लिम लीग |
| कांग्रेस अध्यक्ष | अंबिका चरण मजूमदार |
| कांग्रेस की आंतरिक उपलब्धि | उदारवादी और उग्रवादी पुनर्मिलन |
| प्रमुख कांग्रेस नेता | बाल गंगाधर तिलक |
| प्रमुख लीग नेता | मुहम्मद अली जिन्ना |
| मुख्य विवादित प्रावधान | मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन की कांग्रेस द्वारा स्वीकृति |
| केंद्र में मुस्लिम प्रतिनिधित्व | निर्वाचित भारतीय सदस्यों का एक-तिहाई |
| मुख्य उद्देश्य | ब्रिटिश सरकार के सामने संयुक्त संवैधानिक मांगें रखना |
अंतिम त्वरित पुनरावृत्ति
1916 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के बीच लखनऊ समझौता हुआ।
कांग्रेस का 1916 का अधिवेशन लखनऊ में आयोजित हुआ और इसकी अध्यक्षता अंबिका चरण मजूमदार ने की।
इस अधिवेशन की एक बड़ी उपलब्धि कांग्रेस के उदारवादी और उग्रवादी नेताओं का पुनर्मिलन थी।
दोनों धाराएँ 1907 के सूरत अधिवेशन के बाद अलग हो गई थीं।
लखनऊ समझौता कांग्रेस और मुस्लिम लीग की संयुक्त संवैधानिक योजना थी।
समझौते को तैयार करने में बाल गंगाधर तिलक, मुहम्मद अली जिन्ना, एनी बेसेंट, सुरेंद्रनाथ बनर्जी और अंबिका चरण मजूमदार सहित कई नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
कांग्रेस ने इस समझौते में मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल को स्वीकार किया।
पृथक निर्वाचन की व्यवस्था पहली बार लखनऊ समझौते से नहीं आई थी; इसे ब्रिटिश सरकार ने 1909 के मार्ले-मिंटो सुधारों में लागू किया था।
लखनऊ समझौते के अनुसार केंद्रीय विधान परिषद में निर्वाचित भारतीय सदस्यों में एक-तिहाई मुसलमान होने का प्रस्ताव था।
प्रांतीय विधान परिषदों में मुसलमानों के प्रतिनिधित्व का अलग-अलग अनुपात तय किया गया था।
पंजाब 50 प्रतिशत, बंगाल 40 प्रतिशत, संयुक्त प्रांत 30 प्रतिशत, बिहार 25 प्रतिशत, बंबई एक-तिहाई तथा मध्य प्रांत और मद्रास 15-15 प्रतिशत मुस्लिम प्रतिनिधित्व प्रस्तावित था।
प्रांतीय विधान परिषदों में चार-पाँचवाँ सदस्य निर्वाचित रखने का प्रस्ताव था।
कार्यकारी परिषदों में भारतीय सदस्यों की संख्या बढ़ाने और प्रशासन में भारतीयों की वास्तविक भागीदारी मजबूत करने की मांग की गई।
किसी समुदाय को प्रभावित करने वाले प्रस्ताव को उस समुदाय के तीन-चौथाई सदस्यों के विरोध की स्थिति में आगे न बढ़ाने की व्यवस्था प्रस्तावित थी।
लखनऊ समझौते ने कुछ समय के लिए कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच राजनीतिक सहयोग को मजबूत किया।
लेकिन कांग्रेस द्वारा पृथक निर्वाचन स्वीकार करने के कारण आगे इस समझौते की आलोचना भी हुई, क्योंकि इससे धर्म आधारित राजनीतिक प्रतिनिधित्व को और संस्थागत मजबूती मिली।
परीक्षा के लिए मुख्य क्रम है — 1907 सूरत विभाजन → 1909 पृथक निर्वाचन → 1913 लीग ने स्वशासन स्वीकार किया → 1916 कांग्रेस में पुनर्मिलन → 1916 लखनऊ समझौता → कांग्रेस-लीग संयुक्त संवैधानिक मांगें।