लॉर्ड मिंटो द्वितीय
1905–1910 — स्वदेशी आंदोलन, मुस्लिम लीग, सूरत विभाजन और मार्ले-मिंटो सुधार
लॉर्ड मिंटो द्वितीय का कार्यकाल
लॉर्ड मिंटो द्वितीय 1905 से 1910 तक भारत के वायसराय एवं गवर्नर-जनरल रहे। उनका कार्यकाल भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के एक महत्वपूर्ण दौर से जुड़ा था। इसी समय बंगाल विभाजन के विरोध में स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन का विस्तार हुआ, 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना हुई, 1907 में कांग्रेस का सूरत विभाजन हुआ और 1909 में मार्ले-मिंटो सुधार लागू किए गए।
स्वदेशी आंदोलन
Swadeshi Movement
स्वदेशी आंदोलन लॉर्ड मिंटो द्वितीय के कार्यकाल की प्रमुख राजनीतिक घटनाओं में से एक था। इसका तात्कालिक कारण लॉर्ड कर्जन द्वारा किया गया बंगाल विभाजन था, जो 16 अक्टूबर 1905 से प्रभावी हुआ। मिंटो ने नवंबर 1905 में वायसराय का पद संभाला, इसलिए आंदोलन का आरंभ कर्जन के समय हुआ लेकिन इसका प्रमुख विस्तार मिंटो के कार्यकाल में हुआ।
बंगाल विभाजन के विरोध में भारतीयों ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग को बढ़ावा दिया। आंदोलन केवल आर्थिक बहिष्कार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय शिक्षा, स्वदेशी उद्योग और राजनीतिक जनजागरण से भी जुड़ गया।
बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल और लाला लाजपत राय जैसे नेताओं ने स्वदेशी और राष्ट्रीय आंदोलन को अधिक व्यापक एवं सक्रिय स्वरूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन्हें प्रसिद्ध रूप से लाल-बाल-पाल कहा जाता है।
बंगाल में सुरेंद्रनाथ बनर्जी सहित अनेक राष्ट्रवादी नेताओं ने बंगाल विभाजन के विरोध और स्वदेशी आंदोलन को आगे बढ़ाया। इस दौर में स्वदेशी आंदोलन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को जनसाधारण तक पहुँचाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बना।
🎯 परीक्षा में ध्यान रखें
बंगाल विभाजन — 1905 — लॉर्ड कर्जन, जबकि लॉर्ड मिंटो द्वितीय का कार्यकाल 1905–1910 था। इसलिए बंगाल विभाजन का निर्णय मिंटो ने नहीं किया था; उसके विरोध में चल रहा स्वदेशी आंदोलन मिंटो के कार्यकाल की प्रमुख घटना बना।
मुस्लिम लीग की स्थापना
Formation of the Muslim League
अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना 30 दिसंबर 1906 को ढाका में हुई। यह घटना लॉर्ड मिंटो द्वितीय के कार्यकाल में हुई थी।
मुस्लिम लीग की स्थापना को केवल आगा खान द्वारा किया गया बताना पूर्ण तथ्य नहीं है। ढाका में आयोजित मुस्लिम नेताओं के सम्मेलन में नवाब सलीमुल्लाह खाँ ने एक राजनीतिक संगठन स्थापित करने का प्रस्ताव रखा और नवाब वकार-उल-मुल्क की अध्यक्षता में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना हुई।
आगा खान तृतीय मुस्लिम लीग के प्रमुख प्रारंभिक नेताओं में थे और उन्हें संगठन का प्रथम स्थायी अध्यक्ष चुना गया। इसलिए प्रतियोगी परीक्षाओं में आगा खान का नाम मुस्लिम लीग की स्थापना और प्रारंभिक नेतृत्व से विशेष रूप से जुड़ा मिलता है।
मुस्लिम लीग की स्थापना से कुछ समय पहले 1 अक्टूबर 1906 को आगा खान के नेतृत्व में मुस्लिम नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल शिमला में लॉर्ड मिंटो से मिला था। इसे शिमला प्रतिनिधिमंडल कहा जाता है। इस प्रतिनिधिमंडल ने मुसलमानों के लिए पृथक राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग रखी।
📗 याद रखने योग्य क्रम
कांग्रेस का सूरत विभाजन
Surat Split of Congress
1907 के सूरत अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस नरमपंथी और गरमपंथी गुटों में विभाजित हो गई। यह महत्वपूर्ण घटना लॉर्ड मिंटो द्वितीय के कार्यकाल में हुई।
कांग्रेस के भीतर राजनीतिक आंदोलन की पद्धति और नेतृत्व को लेकर पहले से मतभेद बढ़ रहे थे। गोपाल कृष्ण गोखले और फिरोजशाह मेहता जैसे नेता नरमपंथी विचारधारा से जुड़े थे, जबकि बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल गरमपंथी नेतृत्व के प्रमुख चेहरे थे।
1906 के कलकत्ता अधिवेशन में दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता में स्वराज, स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा से संबंधित प्रस्तावों को महत्व मिला। अगले वर्ष नेतृत्व और इन नीतियों को लागू करने के तरीके को लेकर दोनों गुटों का मतभेद अधिक तीव्र हो गया।
1907 का कांग्रेस अधिवेशन पहले नागपुर में आयोजित होना प्रस्तावित था, लेकिन बाद में इसे सूरत में आयोजित किया गया। अध्यक्ष पद के प्रश्न और आंदोलन की रणनीति को लेकर विवाद इतना बढ़ गया कि अधिवेशन अव्यवस्था के बीच टूट गया और कांग्रेस में नरमपंथी तथा गरमपंथी अलग हो गए।
सूरत अधिवेशन के लिए नरमपंथियों की ओर से रासबिहारी घोष को अध्यक्ष बनाया गया। सूरत विभाजन के बाद कुछ वर्षों तक कांग्रेस में नरमपंथियों का प्रभाव अधिक रहा। बाद में 1916 के लखनऊ अधिवेशन के समय दोनों धाराओं का पुनर्मिलन हुआ।
🎯 अत्यंत महत्वपूर्ण
सूरत विभाजन — 1907 — नरमपंथी बनाम गरमपंथी। इसे बंगाल विभाजन से भ्रमित न करें। बंगाल विभाजन 1905 में ब्रिटिश सरकार द्वारा किया गया प्रशासनिक-राजनीतिक विभाजन था, जबकि सूरत विभाजन 1907 में कांग्रेस के अंदर हुआ विभाजन था।
मार्ले-मिंटो सुधार अधिनियम, 1909
Morley-Minto Reforms, 1909
भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 को सामान्यतः मार्ले-मिंटो सुधार कहा जाता है। उस समय लॉर्ड मिंटो द्वितीय भारत के वायसराय और जॉन मार्ले भारत सचिव थे। इन्हीं दोनों के नाम पर इन सुधारों को मार्ले-मिंटो सुधार कहा गया।
इस अधिनियम द्वारा केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों के आकार में वृद्धि की गई तथा सदस्यों को बजट और सार्वजनिक मामलों पर चर्चा करने एवं प्रश्न पूछने के पहले की तुलना में अधिक अवसर दिए गए।
इस अधिनियम की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था थी। इसके अंतर्गत मुस्लिम मतदाता अपने पृथक प्रतिनिधियों के चुनाव में भाग लेते थे। इस व्यवस्था ने भारतीय चुनावी राजनीति में धार्मिक आधार पर पृथक प्रतिनिधित्व को संस्थागत रूप दिया।
1909 के अधिनियम के अंतर्गत सत्येंद्र प्रसन्न सिन्हा वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में नियुक्त होने वाले प्रथम भारतीय बने। वे कानून सदस्य बनाए गए थे।
मार्ले-मिंटो सुधारों ने भारतीयों की विधान परिषदों में भागीदारी बढ़ाई, लेकिन उत्तरदायी शासन स्थापित नहीं किया। वास्तविक कार्यकारी सत्ता ब्रिटिश शासन के हाथों में ही बनी रही।
🎯 सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा तथ्य
भारतीय परिषद अधिनियम 1909 = मार्ले-मिंटो सुधार = मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल।
लॉर्ड मिंटो द्वितीय के समय की अन्य महत्वपूर्ण घटनाएँ
Other Important Events
लॉर्ड मिंटो द्वितीय का कार्यकाल क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के उभार का भी समय था। बंगाल विभाजन और ब्रिटिश दमनकारी नीतियों के विरुद्ध युवाओं के एक वर्ग में क्रांतिकारी गतिविधियाँ बढ़ीं।
1908 के अलीपुर बम कांड का संबंध बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन से था। इस मुकदमे में अरविंद घोष पर भी अभियोग लगाया गया, लेकिन बाद में वे बरी हो गए।
खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने 1908 में मुजफ्फरपुर में न्यायाधीश किंग्सफोर्ड को निशाना बनाने का प्रयास किया। बम गलत गाड़ी पर गिरा और दो महिलाओं की मृत्यु हुई। बाद में प्रफुल्ल चाकी ने गिरफ्तारी से बचने के लिए आत्महत्या कर ली तथा खुदीराम बोस को गिरफ्तार करके फाँसी दी गई।
इसी दौर में ब्रिटिश सरकार ने राष्ट्रवादी गतिविधियों और प्रेस पर नियंत्रण बढ़ाने के लिए कठोर कदम उठाए। इस प्रकार मिंटो का कार्यकाल एक ओर सीमित संवैधानिक सुधारों और दूसरी ओर बढ़ते औपनिवेशिक दमन तथा राष्ट्रवादी प्रतिरोध से जुड़ा रहा।
घटनाक्रम एक नज़र में
Important Timeline
| वर्ष | प्रमुख घटना | महत्वपूर्ण तथ्य |
|---|---|---|
| 1905 | स्वदेशी आंदोलन | बंगाल विभाजन के विरोध में व्यापक आंदोलन |
| 1906 | शिमला प्रतिनिधिमंडल | आगा खान के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल मिंटो से मिला |
| 1906 | मुस्लिम लीग की स्थापना | 30 दिसंबर, ढाका |
| 1907 | सूरत विभाजन | कांग्रेस में नरमपंथी और गरमपंथी अलग हुए |
| 1908 | मुजफ्फरपुर बम कांड | खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी |
| 1908 | अलीपुर बम मुकदमा | बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन से संबंधित |
| 1909 | मार्ले-मिंटो सुधार | मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल |
परीक्षा के लिए त्वरित क्रम
Quick Revision
⚡ एक क्रम में याद करें
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति
लॉर्ड मिंटो द्वितीय — भारत के वायसराय, 1905–1910।
स्वदेशी आंदोलन — बंगाल विभाजन के विरोध से जुड़ा; आरंभ 1905 में हुआ और मिंटो के कार्यकाल में इसका विस्तार जारी रहा।
बंगाल विभाजन — लॉर्ड कर्जन द्वारा; 16 अक्टूबर 1905 से प्रभावी। इसे मिंटो द्वारा किया गया विभाजन न समझें।
मुस्लिम लीग — 30 दिसंबर 1906, ढाका। नवाब सलीमुल्लाह ने संगठन बनाने का प्रस्ताव रखा; आगा खान इसके प्रमुख प्रारंभिक नेता और प्रथम स्थायी अध्यक्ष बने।
शिमला प्रतिनिधिमंडल — 1 अक्टूबर 1906; आगा खान के नेतृत्व में मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल लॉर्ड मिंटो से मिला।
सूरत विभाजन — 1907; कांग्रेस नरमपंथी और गरमपंथी गुटों में विभाजित हुई।
मार्ले-मिंटो सुधार — भारतीय परिषद अधिनियम, 1909; मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता थी।
सत्येंद्र प्रसन्न सिन्हा — वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में नियुक्त होने वाले प्रथम भारतीय।
1908 — मुजफ्फरपुर बम कांड और अलीपुर बम मुकदमा जैसे महत्वपूर्ण क्रांतिकारी घटनाक्रम भी मिंटो के कार्यकाल से संबंधित हैं।