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लॉर्ड रिपन
LORD RIPON

लॉर्ड रिपन

1880–1884 — स्थानीय स्वशासन, प्रथम नियमित जनगणना, कारखाना अधिनियम, शिक्षा आयोग और इल्बर्ट बिल

लॉर्ड रिपन का कार्यकाल

लॉर्ड रिपन 1880 से 1884 ई. तक भारत का वायसराय और गवर्नर-जनरल रहा। उसका शासनकाल उदार प्रशासनिक नीतियों, स्थानीय स्वशासन, शिक्षा सुधार, प्रेस की स्वतंत्रता और श्रमिकों की दशा में सुधार के प्रयासों के लिए प्रसिद्ध है। भारतीयों के प्रति उसकी अपेक्षाकृत उदार नीति के कारण वह भारत में लोकप्रिय हुआ। स्थानीय स्वशासन संबंधी प्रस्ताव, 1881 की जनगणना, प्रथम कारखाना अधिनियम, हंटर शिक्षा आयोग तथा इल्बर्ट बिल विवाद उसके शासनकाल की प्रमुख घटनाएँ थीं।

01

भारत का उद्धारक

फ्लोरेंस नाइटिंगेल और लॉर्ड रिपन

प्रसिद्ध समाजसेविका और नर्स फ्लोरेंस नाइटिंगेल ने भारत में रिपन की उदार नीतियों और स्थानीय प्रशासन से संबंधित सुधारों की प्रशंसा की। सामान्य प्रतियोगी-परीक्षा साहित्य में उनके द्वारा रिपन को “भारत का उद्धारक” कहे जाने का उल्लेख मिलता है।

रिपन की लोकप्रियता का मुख्य कारण यह था कि उसने भारतीयों को प्रशासन में अधिक भागीदारी देने, स्थानीय संस्थाओं को मजबूत करने और नस्लीय भेदभाव को कम करने की दिशा में कदम उठाए।

02

स्थानीय स्वशासन का जनक

1882 का स्थानीय स्वशासन प्रस्ताव

लॉर्ड रिपन को भारत में स्थानीय स्वशासन का जनक कहा जाता है। 1882 ई. में उसके शासनकाल में स्थानीय स्वशासन से संबंधित महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया गया। इसका उद्देश्य नगरपालिकाओं और जिला स्तर की स्थानीय संस्थाओं में गैर-सरकारी तथा भारतीय सदस्यों की भागीदारी बढ़ाना था।

रिपन चाहता था कि स्थानीय निकाय केवल सरकारी अधिकारियों के नियंत्रण में न रहें, बल्कि स्थानीय लोग भी अपने क्षेत्र के प्रशासन में भाग लें। इस नीति ने आगे भारत में स्थानीय लोकतांत्रिक संस्थाओं के विकास की आधारभूमि तैयार की।

🎯 परीक्षा में याद रखें

भारत में स्थानीय स्वशासन का जनक — लॉर्ड रिपन; स्थानीय स्वशासन प्रस्ताव — 1882 ई.

03

जनगणना, 1881

भारत की पहली नियमित समकालिक जनगणना

1881 ई. में लॉर्ड रिपन के शासनकाल में भारत की पहली नियमित और समकालिक जनगणना कराई गई। इसके बाद प्रत्येक दस वर्ष पर जनगणना कराने की परंपरा स्थापित हुई।

यहाँ 1872 और 1881 के बीच अंतर याद रखना बहुत महत्वपूर्ण है। 1872 ई. में लॉर्ड मेयो के समय भारत में पहली व्यापक जनगणना का प्रयास हुआ था, लेकिन वह अलग-अलग क्षेत्रों में अलग समय पर हुई थी। 1881 की जनगणना पहली नियमित समकालिक दशकीय जनगणना मानी जाती है।

⚠️ भ्रम से बचें

1872 — पहली व्यापक लेकिन असमकालिक जनगणना; 1881 — पहली नियमित समकालिक दशकीय जनगणना।

04

प्रथम कारखाना अधिनियम, 1881

कारखाना श्रमिकों की दशा सुधारने का प्रारंभिक प्रयास

औद्योगिक कारखानों में श्रमिकों, विशेषकर बच्चों की कठिन कार्य-स्थितियों को देखते हुए रिपन के शासनकाल में प्रथम भारतीय कारखाना अधिनियम, 1881 पारित किया गया। यह भारत में कारखाना श्रम को कानून द्वारा नियंत्रित करने का प्रारंभिक महत्वपूर्ण प्रयास था।

इस कानून का मुख्य ध्यान बाल श्रमिकों की दशा पर था। बहुत छोटे बच्चों के कारखानों में काम करने पर रोक और बच्चों के काम के घंटों पर सीमा जैसी व्यवस्थाएँ की गईं। कारखानों में सुरक्षा संबंधी कुछ प्रावधान भी किए गए।

यह अधिनियम आज के श्रम कानूनों की तुलना में सीमित था, लेकिन भारत में औद्योगिक श्रमिकों की कार्य-दशाओं को कानूनी रूप से नियंत्रित करने की शुरुआत के कारण इसका विशेष महत्व है।

🎯 महत्वपूर्ण युग्म

प्रथम कारखाना अधिनियम — 1881 ई. — लॉर्ड रिपन।

05

हंटर शिक्षा आयोग, 1882

सर विलियम हंटर की अध्यक्षता

1882 ई. में सर विलियम विल्सन हंटर की अध्यक्षता में भारतीय शिक्षा आयोग की नियुक्ति की गई। इसे सामान्यतः हंटर आयोग कहा जाता है।

आयोग का प्रमुख उद्देश्य 1854 के वुड के शिक्षा प्रेषपत्र के बाद शिक्षा की प्रगति की समीक्षा करना था। इसने विशेष रूप से प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के विकास पर ध्यान दिया तथा प्राथमिक शिक्षा के विस्तार में स्थानीय निकायों की भूमिका बढ़ाने पर जोर दिया।

🎯 परीक्षा तथ्य

हंटर शिक्षा आयोग — 1882 — अध्यक्ष: सर विलियम विल्सन हंटर — लॉर्ड रिपन का शासनकाल।

06

देशी भाषा समाचार-पत्र अधिनियम का अंत

1882 ई. में प्रेस को बड़ी राहत

लॉर्ड लिटन के समय 1878 ई. में लागू देशी भाषा समाचार-पत्र अधिनियम भारतीय भाषाओं के समाचार-पत्रों पर कठोर नियंत्रण लगाता था। रिपन ने अपनी उदार नीति के अंतर्गत 1882 ई. में इस अधिनियम को समाप्त कर दिया।

इससे भारतीय भाषाओं के प्रेस को अधिक स्वतंत्रता मिली और रिपन की लोकप्रियता भारतीय शिक्षित वर्ग में और बढ़ी।

🎯 सीधा प्रश्न

देशी भाषा समाचार-पत्र अधिनियम को समाप्त करने वाला वायसराय — लॉर्ड रिपन, 1882 ई.

07

इल्बर्ट बिल विवाद, 1883

न्यायिक समानता और यूरोपीय विरोध

1883 ई. में रिपन की सरकार के विधि सदस्य सर कर्टनी इल्बर्ट ने एक विधेयक प्रस्तुत किया, जिसे इल्बर्ट बिल कहा गया। इसका उद्देश्य वरिष्ठ भारतीय न्यायाधीशों को भी यूरोपीय ब्रिटिश व्यक्तियों के आपराधिक मामलों की सुनवाई का अधिकार देना था।

भारत में यूरोपीय समुदाय ने इसका तीव्र विरोध किया। उनका विरोध नस्लीय श्रेष्ठता की भावना से जुड़ा था और वे भारतीय न्यायाधीशों के अधीन मुकदमा चलाए जाने को स्वीकार नहीं करना चाहते थे। इस विवाद ने ब्रिटिश शासन में मौजूद नस्लीय भेदभाव को खुलकर सामने ला दिया।

तीव्र विरोध के बाद मूल प्रस्ताव में समझौता करना पड़ा और 1884 ई. में संशोधित व्यवस्था स्वीकार की गई। इससे बिल का मूल समानतावादी स्वरूप कमजोर हो गया।

08

क्या इल्बर्ट बिल के कारण रिपन ने इस्तीफा दिया?

महत्वपूर्ण तथ्य-सुधार

“इल्बर्ट बिल विवाद के कारण रिपन को कार्यकाल समाप्त होने से पहले त्यागपत्र देना पड़ा” वाला कथन भ्रामक है। इल्बर्ट बिल विवाद ने उसके शासनकाल को कठिन अवश्य बनाया और यूरोपीय समुदाय से उसका तीखा टकराव हुआ, लेकिन उसके भारत छोड़ने को केवल इसी विवाद के कारण मजबूरन दिया गया इस्तीफा नहीं माना जाना चाहिए।

रिपन ने 1884 ई. में अपना वायसराय कार्यकाल समाप्त कर भारत छोड़ा और उसके बाद लॉर्ड डफरिन वायसराय बना। इसलिए परीक्षा में इल्बर्ट बिल विवाद और रिपन की विदाई को सीधे कारण–परिणाम के रूप में लिखने से बचना चाहिए।

⚠️ महत्वपूर्ण सुधार

इल्बर्ट बिल विवाद — 1883–84; रिपन का भारत से प्रस्थान — 1884। लेकिन यह कहना सही नहीं कि इल्बर्ट बिल के कारण उसे अनिवार्य रूप से कार्यकाल से पहले इस्तीफा देना पड़ा।

09

अफगानिस्तान की नीति

द्वितीय आंग्ल–अफगान युद्ध के बाद संबंध

रिपन ने पद संभालने के बाद लॉर्ड लिटन की आक्रामक अफगान नीति से पीछे हटने की दिशा में कदम बढ़ाया। अब्दुर रहमान खान को अफगानिस्तान का अमीर स्वीकार किया गया और ब्रिटिश सेनाओं ने अफगानिस्तान से वापसी की प्रक्रिया पूरी की। 1881 ई. में कंधार से भी ब्रिटिश सेना वापस हटा ली गई।

इसलिए सामान्य नोट्स में मिलने वाला “अफगानिस्तान से संधि, 1881” कथन बहुत सामान्य है। 1881 को रिपन की अफगान नीति में ब्रिटिश वापसी और अब्दुर रहमान के शासन को स्वीकार करने के संदर्भ में याद करना अधिक स्पष्ट है; इसे 1879 की गंडमक संधि से नहीं मिलाना चाहिए।

📗 भ्रम से बचें

गंडमक की संधि — 1879, लॉर्ड लिटन; रिपन — अफगानिस्तान से ब्रिटिश वापसी और अब्दुर रहमान के साथ व्यावहारिक संबंध।

10

सिविल सेवा की आयु सीमा

19 से 21 वर्ष वाला दावा

लॉर्ड लिटन के समय भारतीय सिविल सेवा की प्रतियोगी परीक्षा में प्रवेश की अधिकतम आयु 21 से घटाकर 19 वर्ष कर दी गई थी, जिसका भारतीयों ने विरोध किया।

रिपन भारतीयों को प्रशासन में अधिक अवसर देने का समर्थक था और सिविल सेवा से जुड़े प्रश्न पर सुधार की दिशा में विचार हुआ, लेकिन “रिपन ने अधिकतम आयु सीधे 19 से बढ़ाकर 21 वर्ष कर दी” को निर्विवाद तथ्य के रूप में लिखना सुरक्षित नहीं है। आयु सीमा में बाद के वर्षों में परिवर्तन हुए। इसलिए परीक्षा में लिटन के साथ 21 से 19 वर्ष की कटौती स्पष्ट रूप से याद रखें और रिपन के नाम से 19 से 21 की वृद्धि तभी लिखें जब संबंधित परीक्षा का आधिकारिक स्रोत ऐसा निर्दिष्ट करे।

⚠️ परीक्षा सावधानी

लिटन — अधिकतम आयु 21 से 19 वर्ष करने से स्पष्ट रूप से संबंधित। रिपन — भारतीयों की प्रशासनिक भागीदारी बढ़ाने का समर्थक; 19 से 21 वर्ष की सीधी वृद्धि वाला दावा संदिग्ध/स्रोत-निर्भर है।

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एक नज़र में

त्वरित परीक्षा पुनरावृत्ति

तथ्यविवरण
लॉर्ड रिपन1880–1884 ई.
प्रसिद्ध उपाधिभारत में स्थानीय स्वशासन का जनक
पहली नियमित समकालिक जनगणना1881 ई.
प्रथम कारखाना अधिनियम1881 ई.
स्थानीय स्वशासन प्रस्ताव1882 ई.
हंटर शिक्षा आयोग1882 ई.; अध्यक्ष — सर विलियम विल्सन हंटर
देशी भाषा समाचार-पत्र अधिनियम समाप्त1882 ई.
इल्बर्ट बिल1883 ई.; विवाद 1883–84
अफगान नीतिअब्दुर रहमान को स्वीकार करना और ब्रिटिश सेना की वापसी
उत्तराधिकारीलॉर्ड डफरिन, 1884 ई.

⚡ अंतिम पुनरावृत्ति

लॉर्ड रिपन — 1880–1884 ई.

भारत में स्थानीय स्वशासन का जनक — लॉर्ड रिपन; स्थानीय स्वशासन प्रस्ताव — 1882 ई.

1881 — पहली नियमित समकालिक दशकीय जनगणना तथा प्रथम कारखाना अधिनियम।

1882 — हंटर शिक्षा आयोग, अध्यक्ष — सर विलियम विल्सन हंटर।

1882 — देशी भाषा समाचार-पत्र अधिनियम समाप्त।

1883 — इल्बर्ट बिल; यूरोपीय समुदाय के तीव्र विरोध के कारण 1884 में समझौता करना पड़ा।

इल्बर्ट बिल विवाद महत्वपूर्ण था, लेकिन यह कहना सही नहीं कि उसी के कारण रिपन को अनिवार्य रूप से कार्यकाल से पहले इस्तीफा देना पड़ा।

रिपन के समय अफगानिस्तान में अब्दुर रहमान के शासन को स्वीकार करते हुए ब्रिटिश सेना की वापसी की नीति अपनाई गई।

सिविल सेवा आयु सीमा 19 से 21 वर्ष करने वाला दावा स्रोत-निर्भर है; लिटन के समय 21 से 19 वर्ष की कटौती स्पष्ट रूप से याद रखें।

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