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लॉर्ड लिटन
LORD LYTTON

लॉर्ड लिटन

1876–1880 — दिल्ली दरबार, प्रेस अधिनियम, शस्त्र अधिनियम और द्वितीय आंग्ल-अफगान युद्ध

लॉर्ड लिटन

लॉर्ड लिटन 1876 से 1880 तक भारत का वायसराय रहा। उसका कार्यकाल ब्रिटिश साम्राज्यवादी नीतियों, 1877 के दिल्ली दरबार, वर्नाक्युलर प्रेस अधिनियम 1878, भारतीय शस्त्र अधिनियम 1878, भारतीय सिविल सेवा परीक्षा की अधिकतम आयु में कमी तथा द्वितीय आंग्ल-अफगान युद्ध के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। इसी काल में भारत भीषण अकाल से भी प्रभावित हुआ।

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लॉर्ड लिटन का कार्यकाल

लॉर्ड लिटन 1876 से 1880 तक भारत का वायसराय रहा। वह ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बेंजामिन डिजरायली की साम्राज्यवादी नीति का समर्थक था।

उसके कार्यकाल में एक ओर ब्रिटिश साम्राज्य की प्रतिष्ठा प्रदर्शित करने के लिए विशाल दिल्ली दरबार आयोजित किया गया, वहीं दूसरी ओर भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों को नियंत्रित करने के लिए कठोर प्रेस कानून तथा हथियार रखने पर नियंत्रण के लिए शस्त्र अधिनियम लागू किया गया।

उसके शासनकाल में 1876–78 का भीषण अकाल और 1878–80 का द्वितीय आंग्ल-अफगान युद्ध भी हुआ।

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दिल्ली दरबार — 1877

1 जनवरी 1877 को लॉर्ड लिटन ने दिल्ली में एक भव्य शाही दरबार आयोजित किया। इसका उद्देश्य महारानी विक्टोरिया को भारत की सम्राज्ञी घोषित किए जाने का औपचारिक उत्सव मनाना था।

ब्रिटिश संसद के 1876 के शाही उपाधि अधिनियम के बाद महारानी विक्टोरिया ने “भारत की सम्राज्ञी” की उपाधि धारण की। भारत में इसके लिए प्रचलित अभिव्यक्ति “कैसर-ए-हिंद” थी।

दिल्ली दरबार में भारतीय रियासतों के शासकों और उच्च अधिकारियों ने भाग लिया। इस आयोजन का उद्देश्य ब्रिटिश क्राउन की सर्वोच्चता और साम्राज्य की शक्ति का प्रदर्शन करना भी था।

🎯 परीक्षा में याद रखें

दिल्ली दरबार — 1877 — लॉर्ड लिटन — महारानी विक्टोरिया — भारत की सम्राज्ञी।

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1876–78 का भीषण अकाल

लॉर्ड लिटन के शासनकाल में 1876 से 1878 के बीच भारत के बड़े हिस्से में भीषण अकाल पड़ा। मद्रास, बंबई, मैसूर और दक्कन सहित दक्षिण तथा पश्चिम भारत के अनेक क्षेत्र गंभीर रूप से प्रभावित हुए।

अकाल के दौरान लाखों लोग भुखमरी, कुपोषण और बीमारियों से प्रभावित हुए। इसी कठिन परिस्थिति के बीच 1877 में दिल्ली दरबार का भव्य आयोजन किए जाने के कारण लिटन प्रशासन की आलोचना भी हुई।

अकाल की समस्या और राहत व्यवस्था की समीक्षा के लिए सर रिचर्ड स्ट्रेची की अध्यक्षता में अकाल आयोग नियुक्त किया गया। आयोग ने भविष्य में अकाल राहत और प्रशासन के लिए कई सुझाव दिए।

📗 महत्वपूर्ण जोड़ी

अकाल आयोग — 1878 — सर रिचर्ड स्ट्रेची — लॉर्ड लिटन।

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वर्नाक्युलर प्रेस अधिनियम — 1878

1878 में लॉर्ड लिटन ने वर्नाक्युलर प्रेस अधिनियम लागू किया। इसका मुख्य उद्देश्य भारतीय भाषाओं में प्रकाशित समाचार पत्रों और पत्रिकाओं पर सरकारी नियंत्रण बढ़ाना था।

इस कानून के अंतर्गत स्थानीय प्रशासन को ऐसे भारतीय भाषाई समाचार पत्रों के विरुद्ध कार्रवाई करने की शक्ति दी गई जिनकी सामग्री को सरकार के प्रति असंतोष फैलाने वाली या आपत्तिजनक माना जाता था। प्रकाशकों से जमानत माँगी जा सकती थी और नियमों के उल्लंघन पर उनकी मुद्रण सामग्री जब्त की जा सकती थी।

यह कहना कि इस अधिनियम ने सभी भारतीय भाषा के समाचार पत्रों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था, सही नहीं है। वास्तव में इसका उद्देश्य भारतीय भाषाई प्रेस पर कठोर नियंत्रण स्थापित करना था।

अंग्रेजी भाषा के समाचार पत्र इस कानून के दायरे से बाहर थे। इसी भेदभावपूर्ण स्वरूप के कारण भारतीयों ने इसका तीव्र विरोध किया और इसे प्रेस की स्वतंत्रता पर आघात माना।

🎯 सबसे महत्वपूर्ण तथ्य

वर्नाक्युलर प्रेस अधिनियम — 1878 — लॉर्ड लिटन — भारतीय भाषाई प्रेस पर नियंत्रण।

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अमृत बाजार पत्रिका और प्रेस अधिनियम

अमृत बाजार पत्रिका भारतीय राष्ट्रवादी पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण समाचार पत्र था। वर्नाक्युलर प्रेस अधिनियम के समय यह बंगाली और अंग्रेजी से जुड़ा प्रकाशन था।

इस कानून के प्रभाव से बचने के लिए अमृत बाजार पत्रिका ने स्वयं को अंग्रेजी समाचार पत्र के रूप में प्रकाशित करना शुरू कर दिया। यह घटना वर्नाक्युलर प्रेस अधिनियम के विरोध और उसके भेदभावपूर्ण स्वरूप का प्रसिद्ध उदाहरण बन गई।

बाद में लॉर्ड रिपन ने 1882 में वर्नाक्युलर प्रेस अधिनियम को समाप्त कर दिया।

🧠 क्रम से याद रखें

1878 — लिटन वर्नाक्युलर प्रेस अधिनियम भारतीय भाषाई प्रेस पर नियंत्रण 1882 — रिपन ने समाप्त किया
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भारतीय शस्त्र अधिनियम — 1878

1878 में लॉर्ड लिटन के शासनकाल में भारतीय शस्त्र अधिनियम पारित किया गया। इसके अंतर्गत हथियार रखने, बनाने, बेचने अथवा उनका व्यापार करने के लिए लाइसेंस संबंधी व्यवस्था लागू की गई।

इस कानून ने भारतीयों के हथियार रखने के अधिकार को सरकारी अनुमति और नियंत्रण के अधीन कर दिया। कुछ वर्गों और व्यक्तियों को इसके प्रावधानों से छूट प्राप्त थी, जिसके कारण भारतीयों ने इसे भेदभावपूर्ण कानून माना।

आपके नोट्स में दिए गए “आर्म्स एक्ट 1878” और “भारतीय शस्त्र अधिनियम 1878” वास्तव में एक ही कानून के दो उल्लेख हैं। दोनों का अर्थ एक ही अधिनियम से है।

🎯 सीधा तथ्य

भारतीय शस्त्र अधिनियम — 1878 — लॉर्ड लिटन — हथियारों पर लाइसेंस व्यवस्था।

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सिविल सेवा परीक्षा की आयु में कमी

लॉर्ड लिटन के शासनकाल में भारतीय सिविल सेवा की प्रतियोगी परीक्षा में बैठने की अधिकतम आयु सीमा 21 वर्ष से घटाकर 19 वर्ष कर दी गई।

उस समय यह परीक्षा इंग्लैंड में आयोजित होती थी। भारतीय विद्यार्थियों को इतनी कम उम्र में इंग्लैंड जाकर परीक्षा की तैयारी और उसमें भाग लेने में कठिनाई होती थी। इसलिए आयु सीमा घटाए जाने से भारतीय अभ्यर्थियों के लिए सिविल सेवा में प्रवेश और कठिन हो गया।

भारतीय राजनीतिक नेताओं ने इसका विरोध किया। सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने भारतीय सिविल सेवा परीक्षा की आयु बढ़ाने और परीक्षा भारत में भी आयोजित कराने की माँग को लेकर आंदोलन चलाया।

🎯 याद रखें

सिविल सेवा परीक्षा की अधिकतम आयु — 21 वर्ष से घटाकर 19 वर्ष — लॉर्ड लिटन।

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द्वितीय आंग्ल-अफगान युद्ध — 1878–1880

लॉर्ड लिटन के शासनकाल में 1878 में द्वितीय आंग्ल-अफगान युद्ध प्रारंभ हुआ। इस युद्ध के पीछे मध्य एशिया में ब्रिटेन और रूस की प्रतिद्वंद्विता महत्वपूर्ण कारण थी। ब्रिटेन अफगानिस्तान में रूसी प्रभाव बढ़ने से चिंतित था।

अफगान अमीर शेर अली खान ने रूसी प्रतिनिधिमंडल को काबुल आने दिया, लेकिन ब्रिटिश प्रतिनिधिमंडल को स्वीकार करने से इनकार किया। इसके बाद अंग्रेजों ने नवंबर 1878 में अफगानिस्तान पर आक्रमण कर दिया।

युद्ध के दौरान शेर अली खान की मृत्यु हो गई और उसके पुत्र याकूब खान ने सत्ता संभाली। इसके बाद अंग्रेजों और याकूब खान के बीच 1879 में महत्वपूर्ण संधि हुई।

📗 परीक्षा तथ्य

द्वितीय आंग्ल-अफगान युद्ध — 1878–1880 — लॉर्ड लिटन।

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गंडमक की संधि — 1879

26 मई 1879 को अंग्रेजों और अफगान अमीर याकूब खान के बीच गंडमक की संधि हुई। यह द्वितीय आंग्ल-अफगान युद्ध की महत्वपूर्ण घटना थी।

संधि के अनुसार अफगानिस्तान की विदेश नीति पर ब्रिटिश प्रभाव स्थापित हुआ और काबुल में ब्रिटिश प्रतिनिधि रखने की व्यवस्था स्वीकार की गई। इसके साथ ही कुछ सीमावर्ती क्षेत्रों पर अंग्रेजों का नियंत्रण बढ़ा।

ब्रिटिश प्रतिनिधि सर लुई कैवग्नरी को काबुल भेजा गया, लेकिन सितंबर 1879 में काबुल में उसकी और उसके दल की हत्या कर दी गई। इसके बाद युद्ध फिर तेज हो गया।

युद्ध 1880 तक चला और उसके अंतिम चरण में लॉर्ड लिटन के बाद आए लॉर्ड रिपन के समय अंग्रेजी नीति में परिवर्तन किया गया।

🎯 महत्वपूर्ण संधि

गंडमक की संधि — 1879 — याकूब खान — द्वितीय आंग्ल-अफगान युद्ध।

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मुक्त व्यापार की नीति

लॉर्ड लिटन ब्रिटिश सरकार की मुक्त व्यापार नीति का समर्थक था। उसके शासनकाल में ब्रिटिश वस्तुओं, विशेषकर कपड़ा उद्योग, के हितों को ध्यान में रखते हुए आयात शुल्क संबंधी नीतियों में परिवर्तन किए गए।

1879 में ब्रिटेन से भारत आने वाले सूती कपड़े पर लगे आयात शुल्क को समाप्त किया गया। इससे ब्रिटिश कपड़ा उद्योग को भारतीय बाजार में लाभ मिला, जबकि भारतीय वस्त्र उद्योग के हित प्रभावित हुए।

इस आर्थिक नीति की भारतीयों ने आलोचना की, क्योंकि इसे ब्रिटिश औद्योगिक हितों को प्राथमिकता देने वाली नीति माना गया।

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लिटन के प्रमुख अधिनियम

वर्ष अधिनियम / निर्णय मुख्य प्रभाव
1877 दिल्ली दरबार महारानी विक्टोरिया को भारत की सम्राज्ञी घोषित किए जाने का शाही उत्सव।
1878 वर्नाक्युलर प्रेस अधिनियम भारतीय भाषाई समाचार पत्रों पर कठोर सरकारी नियंत्रण।
1878 भारतीय शस्त्र अधिनियम हथियार रखने और उनके व्यापार पर लाइसेंस व्यवस्था।
1878 द्वितीय आंग्ल-अफगान युद्ध अफगानिस्तान में ब्रिटिश प्रभाव बढ़ाने का प्रयास।
1879 गंडमक की संधि अफगान विदेश नीति पर ब्रिटिश प्रभाव बढ़ा।
1879 सूती कपड़े का आयात शुल्क हटाया ब्रिटिश कपड़ा उद्योग को लाभ मिला।
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लिटन और रिपन — महत्वपूर्ण अंतर

लॉर्ड लिटन लॉर्ड रिपन
1876–1880 1880–1884
वर्नाक्युलर प्रेस अधिनियम 1878 लागू किया 1882 में इसे समाप्त किया
प्रेस पर नियंत्रण की नीति प्रेस के प्रति अपेक्षाकृत उदार नीति
द्वितीय आंग्ल-अफगान युद्ध प्रारंभ अफगान नीति में परिवर्तन और युद्ध का समापन उसके प्रारंभिक काल में
कठोर साम्राज्यवादी नीतियों से जुड़ा स्थानीय स्वशासन और उदार सुधारों से जुड़ा
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प्रमुख घटनाएँ — एक नजर में

वर्ष घटना
1876 लॉर्ड लिटन भारत का वायसराय बना।
1876–78 भारत के बड़े हिस्से में भीषण अकाल।
1 जनवरी 1877 दिल्ली दरबार का आयोजन।
1878 वर्नाक्युलर प्रेस अधिनियम पारित।
1878 भारतीय शस्त्र अधिनियम पारित।
1878 द्वितीय आंग्ल-अफगान युद्ध प्रारंभ।
1879 गंडमक की संधि।
1879 सूती कपड़े पर आयात शुल्क समाप्त।
1880 लॉर्ड लिटन का कार्यकाल समाप्त; लॉर्ड रिपन उसका उत्तराधिकारी बना।
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परीक्षा के लिए त्वरित क्रम

🧠 एक क्रम में याद रखें

1876 — लिटन 1877 — दिल्ली दरबार 1878 — प्रेस अधिनियम 1878 — शस्त्र अधिनियम 1878 — अफगान युद्ध 1879 — गंडमक

⚡ त्वरित पुनरावृत्ति

लॉर्ड लिटन — 1876 से 1880 तक भारत का वायसराय।

1 जनवरी 1877 — दिल्ली दरबार — महारानी विक्टोरिया को भारत की सम्राज्ञी घोषित किए जाने का उत्सव।

भारत में महारानी विक्टोरिया के लिए “कैसर-ए-हिंद” अभिव्यक्ति प्रचलित हुई।

1876–78 — लिटन के समय भारत में भीषण अकाल।

सर रिचर्ड स्ट्रेची की अध्यक्षता में अकाल आयोग नियुक्त किया गया।

वर्नाक्युलर प्रेस अधिनियम — 1878 — भारतीय भाषाई समाचार पत्रों पर कठोर नियंत्रण।

वर्नाक्युलर प्रेस अधिनियम ने भारतीय भाषाई समाचार पत्रों पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया था; उसने उन पर कठोर सरकारी नियंत्रण स्थापित किया था।

अंग्रेजी समाचार पत्र वर्नाक्युलर प्रेस अधिनियम के दायरे से बाहर थे।

लॉर्ड रिपन ने 1882 में वर्नाक्युलर प्रेस अधिनियम समाप्त किया।

भारतीय शस्त्र अधिनियम — 1878 — हथियार रखने और व्यापार करने के लिए लाइसेंस व्यवस्था।

सिविल सेवा परीक्षा की अधिकतम आयु सीमा 21 वर्ष से घटाकर 19 वर्ष की गई।

द्वितीय आंग्ल-अफगान युद्ध — 1878 से 1880 — लॉर्ड लिटन।

गंडमक की संधि — 1879 — अफगान अमीर याकूब खान और अंग्रेजों के बीच।

1879 में ब्रिटिश सूती कपड़ों पर आयात शुल्क समाप्त किया गया।

लॉर्ड लिटन का शासनकाल मुख्य रूप से दिल्ली दरबार, वर्नाक्युलर प्रेस अधिनियम, शस्त्र अधिनियम, सिविल सेवा आयु में कमी और द्वितीय आंग्ल-अफगान युद्ध के लिए याद किया जाता है।

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