विदेशों में भारतीय
क्रांतिकारी गतिविधियाँ
विदेशों में भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन केवल भारत तक सीमित नहीं रहा। लंदन, पेरिस, जर्मनी, संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और अफगानिस्तान जैसे स्थानों पर भी भारतीय क्रांतिकारियों ने संगठन बनाए और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय समर्थन प्राप्त करने का प्रयास किया।
इस विदेशी क्रांतिकारी आंदोलन से श्यामजी कृष्ण वर्मा, विनायक दामोदर सावरकर, मदनलाल ढींगरा, मैडम भीकाजी कामा, लाला हरदयाल, सोहन सिंह भकना, राजा महेंद्र प्रताप और मौलाना बरकतुल्लाह जैसे अनेक महत्वपूर्ण नाम जुड़े हैं।
श्यामजी कृष्ण वर्मा
विदेशों में भारतीय क्रांतिकारी गतिविधियों के प्रारंभिक प्रमुख नेताओं में श्यामजी कृष्ण वर्मा का महत्वपूर्ण स्थान था।
उन्होंने इंग्लैंड में रहकर भारत के लिए स्वशासन और स्वतंत्रता के पक्ष में राजनीतिक प्रचार किया तथा भारतीय विद्यार्थियों और राष्ट्रवादियों को संगठित करने का प्रयास किया।
1905 ई. में उन्होंने लंदन में इंडियन होमरूल सोसाइटी की स्थापना की।
इस संस्था का उद्देश्य ब्रिटेन में भारत के लिए स्वशासन की मांग का प्रचार करना और भारतीय राष्ट्रवादी गतिविधियों को संगठित आधार प्रदान करना था।
परीक्षा के लिए
श्यामजी कृष्ण वर्मा → 1905 → लंदन → इंडियन होमरूल सोसाइटी।
इंडिया हाउस
श्यामजी कृष्ण वर्मा ने 1905 में लंदन के हाईगेट क्षेत्र में इंडिया हाउस स्थापित किया।
प्रारंभ में इसका उद्देश्य भारतीय विद्यार्थियों को आवास और सहायता प्रदान करना था, लेकिन शीघ्र ही यह ब्रिटेन में भारतीय राष्ट्रवादी और क्रांतिकारी गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।
आगे विनायक दामोदर सावरकर, मदनलाल ढींगरा और अनेक युवा भारतीय राष्ट्रवादी इंडिया हाउस से जुड़े।
इंडिया हाउस में भारतीय इतिहास, राष्ट्रवाद और ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता से संबंधित विचारों पर चर्चा होती थी।
याद रखें
इंडिया हाउस → लंदन → श्यामजी कृष्ण वर्मा → 1905।
इंडियन सोशियोलॉजिस्ट
श्यामजी कृष्ण वर्मा ने भारतीय राष्ट्रवादी विचारों के प्रचार के लिए इंडियन सोशियोलॉजिस्ट नामक पत्र भी प्रकाशित किया।
इस पत्र के माध्यम से उन्होंने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की आलोचना की और भारत के स्वशासन के पक्ष में विचार प्रस्तुत किए।
यह पत्र विदेश में भारतीय राष्ट्रवादी प्रचार का महत्वपूर्ण माध्यम बन गया।
मदनलाल ढींगरा और कर्जन वायली की हत्या
मदनलाल ढींगरा लंदन में सक्रिय भारतीय क्रांतिकारी थे और वे इंडिया हाउस के क्रांतिकारी वातावरण से प्रभावित हुए।
1 जुलाई 1909 ई. को लंदन में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान मदनलाल ढींगरा ने ब्रिटिश अधिकारी सर विलियम हट कर्जन वायली को गोली मार दी।
कर्जन वायली की घटनास्थल पर मृत्यु हो गई। इस घटना ने ब्रिटेन और भारत दोनों में अत्यधिक राजनीतिक प्रतिक्रिया उत्पन्न की।
मदनलाल ढींगरा को गिरफ्तार किया गया, उन पर मुकदमा चला और उन्हें मृत्युदंड दिया गया।
17 अगस्त 1909 ई. को लंदन की पेंटनविल जेल में मदनलाल ढींगरा को फाँसी दे दी गई।
बहुत महत्वपूर्ण
1 जुलाई 1909 → लंदन → मदनलाल ढींगरा → सर कर्जन वायली की हत्या।
मैडम भीकाजी कामा
विदेश में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रचार में मैडम भीकाजी कामा की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
उन्होंने यूरोप में रहते हुए भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में प्रचार किया और ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की नीतियों की आलोचना की।
प्रतियोगी परीक्षा साहित्य में उन्हें प्रसिद्ध रूप से “भारतीय क्रांति की माता” कहा जाता है।
उनका नाम विशेष रूप से भारत के प्रारंभिक राष्ट्रवादी ध्वज और 1907 के जर्मनी के स्टुटगार्ट सम्मेलन से जुड़ा है।
स्टुटगार्ट में भारतीय ध्वज — 1907
1907 ई. में जर्मनी के स्टुटगार्ट में आयोजित अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में मैडम भीकाजी कामा ने भारत का एक प्रारंभिक राष्ट्रवादी ध्वज प्रदर्शित किया।
उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की स्वतंत्रता का समर्थन करने की अपील की।
इस कारण भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के ऐतिहासिक विकास में मैडम भीकाजी कामा का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
परीक्षा में महत्वपूर्ण
1907 → स्टुटगार्ट, जर्मनी → मैडम भीकाजी कामा → भारतीय राष्ट्रवादी ध्वज।
गदर पार्टी की स्थापना — 1913
उत्तरी अमेरिका में बसे भारतीय प्रवासियों ने ब्रिटिश शासन को समाप्त करने के उद्देश्य से एक संगठित क्रांतिकारी आंदोलन विकसित किया, जो आगे गदर आंदोलन के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
1913 ई. में संयुक्त राज्य अमेरिका में हिंदुस्तान एसोसिएशन ऑफ द पैसिफिक कोस्ट की स्थापना हुई, जो शीघ्र ही गदर पार्टी के नाम से प्रसिद्ध हो गई।
इसके संगठन में लाला हरदयाल, सोहन सिंह भकना और अन्य प्रवासी भारतीय क्रांतिकारियों की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
सोहन सिंह भकना इसके प्रथम अध्यक्ष बने, जबकि लाला हरदयाल इसके प्रमुख वैचारिक नेता और महामंत्री के रूप में सक्रिय रहे।
इसलिए गदर पार्टी की स्थापना का श्रेय केवल एक व्यक्ति को देने के बजाय इसके सामूहिक संगठन को समझना अधिक सही है।
याद रखें
गदर आंदोलन → 1913 → संयुक्त राज्य अमेरिका → सोहन सिंह भकना + लाला हरदयाल।
गदर पार्टी का मुख्यालय
गदर आंदोलन का प्रमुख केंद्र संयुक्त राज्य अमेरिका का सैन फ्रांसिस्को नगर था।
सैन फ्रांसिस्को में युगांतर आश्रम गदर आंदोलन की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र और मुख्यालय बना।
यहाँ से गदर पार्टी ने भारतीय प्रवासियों को संगठित किया और भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध क्रांति का प्रचार किया।
परीक्षा के लिए
गदर पार्टी का मुख्यालय → युगांतर आश्रम → सैन फ्रांसिस्को।
गदर पत्र
गदर आंदोलन के प्रचार के लिए “गदर” नामक समाचार-पत्र प्रकाशित किया गया।
इस पत्र के माध्यम से भारतीय सैनिकों और प्रवासी भारतीयों से ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह करने का आह्वान किया जाता था।
गदर पत्र को विभिन्न भारतीय भाषाओं में प्रकाशित और वितरित किया गया ताकि इसका संदेश अधिक से अधिक भारतीयों तक पहुँच सके।
प्रथम विश्व युद्ध और गदर आंदोलन
1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने के बाद गदर पार्टी के नेताओं ने इसे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह के लिए अनुकूल अवसर माना।
गदर पार्टी ने विदेशों में रहने वाले भारतीयों से भारत लौटकर ब्रिटिश भारतीय सेना और जनता में विद्रोह की भावना फैलाने का आह्वान किया।
बड़ी संख्या में प्रवासी भारतीय भारत लौटे और 1915 में व्यापक सैनिक विद्रोह की योजना बनाई गई।
ब्रिटिश खुफिया तंत्र को योजना की जानकारी मिल जाने के कारण यह व्यापक विद्रोह सफल नहीं हो सका और अनेक गदर क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया गया।
काबुल में अंतरिम भारत सरकार — 1915
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय क्रांतिकारियों ने ब्रिटेन के विरोधी देशों से सहायता प्राप्त करके भारत को स्वतंत्र कराने का प्रयास किया।
1 दिसंबर 1915 ई. को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में भारतीय क्रांतिकारियों ने भारत की अंतरिम सरकार की स्थापना की।
इस सरकार के राष्ट्रपति राजा महेंद्र प्रताप और प्रधानमंत्री मौलाना बरकतुल्लाह बने।
मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी भी इस क्रांतिकारी सरकार के प्रमुख सदस्यों में थे।
इस प्रयास का उद्देश्य जर्मनी तथा ब्रिटेन-विरोधी अन्य शक्तियों से सहयोग प्राप्त कर भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष को आगे बढ़ाना था।
बहुत महत्वपूर्ण
1 दिसंबर 1915 → काबुल → अंतरिम भारत सरकार → राष्ट्रपति राजा महेंद्र प्रताप → प्रधानमंत्री मौलाना बरकतुल्लाह।
कोमागाटा मारू घटना — 1914
कोमागाटा मारू एक जापानी भाप-जहाज था, जिसका नाम 1914 में भारतीय प्रवासियों के कनाडा प्रवेश से जुड़े एक महत्वपूर्ण संघर्ष से जुड़ा।
इस जहाज को बाबा गुरदित सिंह ने किराए पर लिया था। इसलिए उनका नाम “गुरु दत्त सिंह” लिखना सही नहीं है।
जहाज पर कुल 376 यात्री सवार थे, जिनमें अधिकांश पंजाब से संबंधित भारतीय थे।
इन यात्रियों का उद्देश्य कनाडा पहुँचकर वहाँ बसना था और साथ ही कनाडा के भेदभावपूर्ण आव्रजन नियमों को चुनौती देना भी था।
भ्रम से बचें
कोमागाटा मारू → जापानी जहाज → बाबा गुरदित सिंह → 376 यात्री।
कनाडा में यात्रियों को प्रवेश से रोकना
कोमागाटा मारू 23 मई 1914 को कनाडा के वैंकूवर के निकट पहुँचा।
कनाडा की सरकार ने उस समय एशियाई प्रवासियों को रोकने के लिए कठोर और भेदभावपूर्ण आव्रजन नियम लागू कर रखे थे।
इन्हीं नियमों के आधार पर जहाज के अधिकांश भारतीय यात्रियों को कनाडा की भूमि पर उतरने की अनुमति नहीं दी गई।
जहाज लगभग दो महीने तक कनाडा के तट के निकट रुका रहा, लेकिन अंततः उसे भारत वापस लौटने के लिए मजबूर कर दिया गया।
शोर कमेटी
कोमागाटा मारू के यात्रियों की सहायता और उनके अधिकारों के लिए कनाडा में रहने वाले भारतीयों ने एक शोर कमेटी का गठन किया।
इस समिति से हुसैन रहीम, सोहनलाल पाठक और बलवंत सिंह सहित कई स्थानीय भारतीय कार्यकर्ता जुड़े थे।
समिति ने यात्रियों के लिए धन जुटाया, भोजन और अन्य सहायता उपलब्ध कराने का प्रयास किया तथा उनके पक्ष में कानूनी लड़ाई भी लड़ी।
इसलिए शोर कमेटी को केवल “सोहनलाल पाठक के नेतृत्व में बनी समिति” लिखना अधूरा है; वे इसके प्रमुख कार्यकर्ताओं में से एक थे।
परीक्षा के लिए
शोर कमेटी → कोमागाटा मारू यात्रियों की सहायता → हुसैन रहीम + सोहनलाल पाठक + बलवंत सिंह आदि।
भारत वापसी और बजबज घटना
कनाडा से प्रवेश न मिलने के बाद कोमागाटा मारू को भारत वापस भेज दिया गया।
सितंबर 1914 में जहाज कलकत्ता के निकट बजबज पहुँचा।
ब्रिटिश अधिकारियों ने यात्रियों को नियंत्रित करने और कई लोगों को पंजाब भेजने का प्रयास किया, जिसके दौरान यात्रियों और पुलिस के बीच संघर्ष हो गया।
इस संघर्ष में कई लोग मारे गए और अनेक यात्रियों को गिरफ्तार कर लिया गया।
कोमागाटा मारू की घटना ने विदेशों में भारतीयों के साथ होने वाले नस्ली भेदभाव और ब्रिटिश साम्राज्य की नीतियों के विरुद्ध भारतीय असंतोष को और बढ़ाया।
प्रमुख संगठन और व्यक्ति
| संगठन / घटना | प्रमुख व्यक्ति | वर्ष / स्थान |
|---|---|---|
| इंडियन होमरूल सोसाइटी | श्यामजी कृष्ण वर्मा | 1905, लंदन |
| इंडिया हाउस | श्यामजी कृष्ण वर्मा | 1905, लंदन |
| स्टुटगार्ट में भारतीय ध्वज | मैडम भीकाजी कामा | 1907, जर्मनी |
| कर्जन वायली की हत्या | मदनलाल ढींगरा | 1909, लंदन |
| गदर आंदोलन | सोहन सिंह भकना, लाला हरदयाल एवं अन्य | 1913, अमेरिका |
| कोमागाटा मारू | बाबा गुरदित सिंह | 1914 |
| भारत की अंतरिम सरकार | राजा महेंद्र प्रताप, मौलाना बरकतुल्लाह | 1915, काबुल |
घटनाओं का सही क्रम
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1905 | श्यामजी कृष्ण वर्मा द्वारा लंदन में इंडियन होमरूल सोसाइटी और इंडिया हाउस |
| 1907 | मैडम भीकाजी कामा द्वारा स्टुटगार्ट में भारतीय राष्ट्रवादी ध्वज का प्रदर्शन |
| 1 जुलाई 1909 | मदनलाल ढींगरा द्वारा कर्जन वायली की हत्या |
| 17 अगस्त 1909 | मदनलाल ढींगरा को फाँसी |
| 1913 | गदर आंदोलन का संगठन |
| 1914 | कोमागाटा मारू घटना |
| 1914 | प्रथम विश्व युद्ध प्रारंभ; गदर आंदोलन ने भारत में विद्रोह की योजना तेज की |
| 1915 | गदर क्रांतिकारियों द्वारा सैनिक विद्रोह का प्रयास |
| 1 दिसंबर 1915 | काबुल में भारत की अंतरिम सरकार की स्थापना |
परीक्षा में भ्रमित करने वाले तथ्य
इंडियन होमरूल सोसाइटी → श्यामजी कृष्ण वर्मा → लंदन → 1905।
इंडिया हाउस → श्यामजी कृष्ण वर्मा → लंदन → 1905।
मदनलाल ढींगरा → 1 जुलाई 1909 → सर कर्जन वायली की हत्या।
मैडम भीकाजी कामा → भारतीय क्रांति की माता के नाम से प्रतियोगी परीक्षा साहित्य में प्रसिद्ध हैं।
1907 → स्टुटगार्ट → मैडम भीकाजी कामा → भारतीय राष्ट्रवादी ध्वज।
गदर पार्टी को केवल “लाला हरदयाल द्वारा स्थापित” लिखना अधूरा है। यह प्रवासी भारतीयों का सामूहिक क्रांतिकारी संगठन था।
सोहन सिंह भकना → गदर संगठन के प्रथम अध्यक्ष।
लाला हरदयाल → गदर आंदोलन के प्रमुख वैचारिक नेता और संगठनकर्ता।
गदर पार्टी का प्रमुख केंद्र → युगांतर आश्रम, सैन फ्रांसिस्को।
काबुल की अंतरिम भारत सरकार → 1915 → राष्ट्रपति राजा महेंद्र प्रताप → प्रधानमंत्री मौलाना बरकतुल्लाह।
कोमागाटा मारू → जापानी जहाज → बाबा गुरदित सिंह, न कि गुरु दत्त सिंह।
कोमागाटा मारू → 376 यात्री → वैंकूवर, कनाडा → अधिकांश यात्रियों को उतरने नहीं दिया गया।
शोर कमेटी से हुसैन रहीम, सोहनलाल पाठक और बलवंत सिंह सहित अनेक भारतीय जुड़े थे।
अंतिम त्वरित पुनरावृत्ति
विदेशों में भारतीय क्रांतिकारी गतिविधियों के प्रमुख केंद्र लंदन, पेरिस, अमेरिका, कनाडा, जर्मनी और अफगानिस्तान थे।
1905 में श्यामजी कृष्ण वर्मा ने लंदन में इंडियन होमरूल सोसाइटी की स्थापना की।
उन्होंने लंदन में इंडिया हाउस भी स्थापित किया, जो आगे भारतीय क्रांतिकारियों का महत्वपूर्ण केंद्र बना।
श्यामजी कृष्ण वर्मा ने इंडियन सोशियोलॉजिस्ट पत्र के माध्यम से राष्ट्रवादी विचारों का प्रचार किया।
1 जुलाई 1909 को इंडिया हाउस से जुड़े मदनलाल ढींगरा ने लंदन में सर कर्जन वायली की हत्या की।
17 अगस्त 1909 को मदनलाल ढींगरा को फाँसी दे दी गई।
मैडम भीकाजी कामा को प्रतियोगी परीक्षा साहित्य में भारतीय क्रांति की माता कहा जाता है।
1907 में स्टुटगार्ट में उन्होंने भारत का एक प्रारंभिक राष्ट्रवादी ध्वज प्रदर्शित किया।
1913 में अमेरिका में गदर आंदोलन संगठित हुआ।
सोहन सिंह भकना इसके प्रथम अध्यक्ष और लाला हरदयाल प्रमुख वैचारिक नेता तथा संगठनकर्ता थे।
गदर आंदोलन का प्रमुख मुख्यालय सैन फ्रांसिस्को का युगांतर आश्रम था।
गदर आंदोलन ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सैनिक विद्रोह की योजना बनाई।
1 दिसंबर 1915 को काबुल में भारत की अंतरिम सरकार स्थापित की गई।
इस सरकार के राष्ट्रपति राजा महेंद्र प्रताप तथा प्रधानमंत्री मौलाना बरकतुल्लाह थे।
कोमागाटा मारू एक जापानी जहाज था जिसे बाबा गुरदित सिंह ने किराए पर लिया था।
जहाज पर 376 भारतीय यात्री सवार थे और कनाडा पहुँचने पर अधिकांश को उतरने की अनुमति नहीं दी गई।
यात्रियों की सहायता के लिए कनाडा में शोर कमेटी बनाई गई, जिसमें हुसैन रहीम, सोहनलाल पाठक और बलवंत सिंह सहित कई कार्यकर्ता सक्रिय थे।
जहाज को भारत वापस भेज दिया गया और कलकत्ता के निकट बजबज में यात्रियों तथा ब्रिटिश अधिकारियों के बीच हिंसक संघर्ष हुआ।
परीक्षा के लिए मुख्य क्रम है — 1905 इंडियन होमरूल सोसाइटी एवं इंडिया हाउस → 1907 भीकाजी कामा और स्टुटगार्ट → 1909 मदनलाल ढींगरा → 1913 गदर आंदोलन → 1914 कोमागाटा मारू → 1915 काबुल की अंतरिम भारत सरकार।