संगम काल एवं दक्षिण भारत के प्रारंभिक राज्य
संगम साहित्य • चेर • चोल • पांड्य • समाज • व्यापार एवं संस्कृति
संगम काल का परिचय
प्राचीन दक्षिण भारत के इतिहास की जानकारी के लिए संगम साहित्य अत्यंत महत्वपूर्ण स्रोत है। संगम युग मुख्यतः वर्तमान तमिलनाडु और केरल के प्राचीन इतिहास से संबंधित है। इस काल में दक्षिण भारत में चेर, चोल और पांड्य तीन प्रमुख राजवंश थे।
अशोक के अभिलेखों में चोल, पांड्य, केरलपुत्र और सत्यपुत्र जैसी दक्षिण भारतीय शक्तियों का उल्लेख मिलता है। इन क्षेत्रों पर अशोक का प्रत्यक्ष शासन नहीं था।
संगम साहित्य के अतिरिक्त यूनानी-रोमन विवरण, अभिलेख, सिक्के और पुरातात्त्विक अवशेष भी प्रारंभिक दक्षिण भारत के इतिहास की महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं।
संगम का अर्थ एवं परंपरा
तमिल विद्वानों और कवियों की साहित्यिक परंपरा
संगम का अर्थ विद्वानों अथवा कवियों की सभा या परिषद से है। तमिल परंपरा में संगम उन साहित्यिक सभाओं को कहा गया है जिनमें कवियों और विद्वानों की रचनाओं को संरक्षण मिला।
तमिल साहित्यिक परंपरा में तीन संगमों का उल्लेख मिलता है। इन तीनों संगमों से संबंधित लंबे कालक्रम और हजारों वर्षों तक चलने की कथाएँ बाद की साहित्यिक परंपरा का हिस्सा हैं। ऐतिहासिक अध्ययन के लिए उपलब्ध संगम साहित्य मुख्यतः प्रारंभिक ऐतिहासिक दक्षिण भारत को समझने का स्रोत है।
परंपरा के अनुसार प्रथम संगम मदुरै के दक्षिण में स्थित एक प्राचीन नगर में आयोजित हुआ, जिसके समुद्र में डूब जाने की कथा मिलती है।
द्वितीय संगम का संबंध कपाटपुरम् से जोड़ा जाता है।
तृतीय संगम का आयोजन मदुरै में माना जाता है। उपलब्ध संगम साहित्य को मुख्यतः इसी साहित्यिक परंपरा से संबंधित माना जाता है।
संगम साहित्य प्राचीन तमिल भाषा में रचा गया। इससे तत्कालीन दक्षिण भारत के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन की महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है।
प्रमुख संगम साहित्य
तमिल साहित्य के प्राचीन स्रोत
संगम साहित्य के प्रमुख संग्रहों में एट्टुत्तोकै अर्थात आठ संकलन और पत्तुप्पाट्टु अर्थात दस गीत विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।
तोलकाप्पियम प्राचीन तमिल व्याकरण और काव्यशास्त्र का प्रसिद्ध ग्रंथ है। इसके रचयिता के रूप में तोलकाप्पियर का नाम मिलता है।
तोलकाप्पियम केवल व्याकरण की जानकारी नहीं देता, बल्कि तत्कालीन समाज, साहित्यिक परंपराओं और जीवन के विभिन्न पक्षों पर भी प्रकाश डालता है।
शिलप्पदिकारम् तमिल साहित्य का प्रसिद्ध महाकाव्य है। इसके रचयिता इलंगो अडिगल माने जाते हैं।
शिलप्पदिकारम् की कथा कोवलन और कन्नगी से संबंधित है। इससे चेर, चोल और पांड्य क्षेत्रों के नगरों, व्यापार और सामाजिक जीवन की भी जानकारी मिलती है।
मणिमेखलै के रचयिता सीत्तलै सत्तनार माने जाते हैं। यह बौद्ध प्रभाव वाला तमिल महाकाव्य है।
शिलप्पदिकारम् और मणिमेखलै उत्तर-संगम कालीन तमिल महाकाव्य माने जाते हैं। इन्हें मूल संगम काव्य-संग्रहों में नहीं रखा जाता, लेकिन संगम युग के बाद के दक्षिण भारतीय समाज को समझने के लिए ये अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
| ग्रंथ | रचयिता/विशेषता |
|---|---|
| तोलकाप्पियम | तोलकाप्पियर — तमिल व्याकरण एवं काव्यशास्त्र |
| एट्टुत्तोकै | आठ काव्य-संग्रह |
| पत्तुप्पाट्टु | दस गीतों का संग्रह |
| शिलप्पदिकारम् | इलंगो अडिगल — कोवलन और कन्नगी की कथा |
| मणिमेखलै | सीत्तलै सत्तनार — बौद्ध प्रभाव वाला महाकाव्य |
संगम युग के तीन प्रमुख राज्य
चेर • चोल • पांड्य
संगम युग में तमिल क्षेत्र की तीन प्रमुख राजनीतिक शक्तियाँ चेर, चोल और पांड्य थीं। तमिल साहित्य में इन तीनों राजवंशों को सामूहिक रूप से मूवेंदर, अर्थात तीन मुकुटधारी राजा, कहा गया।
चेर राज्य मुख्यतः वर्तमान केरल और पश्चिमी तमिलनाडु के कुछ भागों में फैला था। चोल राज्य का मुख्य क्षेत्र कावेरी घाटी था, जबकि पांड्य राज्य दक्षिणी तमिलनाडु में केंद्रित था।
| राजवंश | प्रमुख केंद्र | राजचिह्न | प्रमुख बंदरगाह |
|---|---|---|---|
| चेर | वंजी | धनुष-बाण | मुजिरिस |
| चोल | उरैयूर / पुहार | बाघ | कावेरीपट्टिनम् |
| पांड्य | मदुरै | मछली | कोरकई |
चेर राजवंश
पश्चिमी तट की प्रमुख शक्ति
चेर राज्य मुख्यतः वर्तमान केरल तथा तमिलनाडु के पश्चिमी भागों में स्थित था। संगम साहित्य में चेर शासकों के लिए केरलपुत्र से संबंधित परंपराएँ भी महत्वपूर्ण हैं, जबकि अशोक के अभिलेखों में केरलपुत्र नाम मिलता है।
चेरों की राजधानी परंपरागत रूप से वंजी मानी जाती है। इसकी सटीक आधुनिक पहचान को लेकर विद्वानों में मतभेद है।
चेरों का प्रसिद्ध बंदरगाह मुजिरिस था। यह रोमन संसार और पश्चिमी एशिया के साथ समुद्री व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र था।
संगम साहित्य में उदियन चेरलातन प्रारंभिक प्रसिद्ध चेर शासकों में था।
चेर वंश का सबसे प्रसिद्ध संगमकालीन शासक शेनगुट्टुवन था, जिसे लाल चेर भी कहा जाता है।
शिलप्पदिकारम् में शेनगुट्टुवन को कन्नगी या पत्तिनी की उपासना से जोड़ा गया है।
चेर क्षेत्र काली मिर्च और अन्य मसालों के लिए प्रसिद्ध था। इन वस्तुओं की रोमन संसार में बड़ी माँग थी।
चोल राजवंश
कावेरी घाटी की शक्ति
संगमकालीन चोल राज्य का मुख्य क्षेत्र कावेरी नदी की घाटी था।
चोलों के प्रमुख नगरों में उरैयूर और कावेरीपट्टिनम् या पुहार शामिल थे।
उरैयूर अंतर्देशीय राजनीतिक केंद्र था, जबकि कावेरीपट्टिनम् एक महत्वपूर्ण बंदरगाह और व्यापारिक नगर था।
संगमकालीन चोलों का सबसे प्रसिद्ध शासक करिकाल चोल था।
करिकाल की सबसे प्रसिद्ध सैन्य सफलता वेन्नि का युद्ध मानी जाती है, जिसमें उसने अपने प्रतिद्वंद्वियों को पराजित कर अपनी शक्ति मजबूत की।
करिकाल को कावेरी नदी पर निर्मित प्राचीन कल्लणै बाँध से भी जोड़ा जाता है। यह सिंचाई व्यवस्था के विकास का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
कावेरी डेल्टा की उपजाऊ भूमि के कारण चोल क्षेत्र कृषि की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध था। धान यहाँ की प्रमुख फसलों में था।
कावेरीपट्टिनम् के माध्यम से चोल क्षेत्र का विदेशी समुद्री व्यापार भी विकसित हुआ।
पांड्य राजवंश
मदुरै और मोती व्यापार
पांड्य राज्य का प्रमुख केंद्र मदुरै था। मदुरै तमिल साहित्य और संस्कृति का भी महत्वपूर्ण केंद्र बना।
पांड्यों का प्रसिद्ध प्राचीन बंदरगाह कोरकई था। यह विशेष रूप से मोती के व्यापार के लिए प्रसिद्ध था।
यूनानी लेखक मेगास्थनीज के विवरण से संबंधित बाद की परंपरा में दक्षिण भारत के पांड्य राज्य का उल्लेख मिलता है।
संगमकालीन पांड्य शासकों में नेडुंजेलियन नाम के एक से अधिक शासकों का उल्लेख मिलता है। इनमें तलैयालंगानम् के विजेता नेडुंजेलियन विशेष रूप से प्रसिद्ध था।
पांड्य शासकों ने तमिल कवियों और साहित्यिक गतिविधियों को संरक्षण दिया। मदुरै का संगम परंपरा से गहरा संबंध रहा।
मोती, मछली, नमक और समुद्री व्यापार पांड्य अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण अंग थे।
संगमकालीन प्रशासन
राजा, स्थानीय प्रमुख और सेना
संगम युग की शासन व्यवस्था मुख्यतः राजतंत्रात्मक थी। राजा राज्य और सेना का प्रमुख होता था।
चेर, चोल और पांड्य जैसे बड़े राजाओं के अतिरिक्त अनेक छोटे स्थानीय सरदार भी थे, जिन्हें सामान्य रूप से वेलिर परंपरा से जोड़ा जाता है।
राजा की शक्ति युद्ध में सफलता, भूमि पर नियंत्रण, कर-संग्रह तथा अपने अनुयायियों और कवियों को दिए जाने वाले दान से भी जुड़ी थी।
सेना में पैदल सैनिक, घुड़सवार, रथ और हाथी का उपयोग किया जाता था।
राजस्व के प्रमुख स्रोतों में भूमि से प्राप्त आय, व्यापार तथा बंदरगाहों से मिलने वाले शुल्क शामिल थे।
संगमकालीन समाज
जीवन, स्त्रियाँ और व्यवसाय
संगम साहित्य में समाज का विस्तृत चित्र मिलता है। लोग कृषि, पशुपालन, शिकार, मछली पकड़ने, शिल्प और व्यापार जैसे अनेक व्यवसायों से जुड़े थे।
संगम काव्य में प्राकृतिक क्षेत्र और जीवन-पद्धति को तिणै की अवधारणा से जोड़ा गया। पाँच प्रमुख भौगोलिक-सांस्कृतिक क्षेत्र थे — कुरिंजी, मुल्लै, मरुतम्, नेयटल और पालै।
कुरिंजी पर्वतीय क्षेत्र, मुल्लै वन और चरागाह, मरुतम् कृषि क्षेत्र, नेयटल समुद्रतटीय क्षेत्र तथा पालै शुष्क क्षेत्र से संबंधित था।
स्त्रियों की उपस्थिति संगम साहित्य में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। अव्वैयार जैसी महिला कवयित्री संगम साहित्य की प्रसिद्ध रचनाकारों में थीं।
संगम साहित्य में प्रेम और विवाह से संबंधित कलवु तथा कर्पु जैसी सामाजिक अवधारणाओं का वर्णन मिलता है।
युद्ध में वीरगति प्राप्त करने वाले योद्धाओं की स्मृति में वीरशिला या नडुकल स्थापित करने की परंपरा थी। इन पर वीरों के कार्यों की स्मृति सुरक्षित की जाती थी।
कृषि एवं अर्थव्यवस्था
धान, सिंचाई, शिल्प और बाजार
संगमकालीन अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि था। कावेरी जैसी नदियों की घाटियाँ अत्यंत उपजाऊ थीं।
धान प्रमुख कृषि उपज थी। इसके अतिरिक्त गन्ना, विभिन्न अनाज और अन्य कृषि उत्पादों का भी उत्पादन किया जाता था।
कृषि के साथ पशुपालन, मछली पकड़ना, नमक बनाना, मोती निकालना और वस्त्र निर्माण महत्वपूर्ण आर्थिक गतिविधियाँ थीं।
दक्षिण भारत के सूती वस्त्र, मोती, हाथीदाँत, बहुमूल्य पत्थर और मसाले विदेशी व्यापार में महत्वपूर्ण वस्तुएँ थे।
चेर क्षेत्र विशेष रूप से काली मिर्च के लिए प्रसिद्ध था, जबकि पांड्य क्षेत्र का मोती व्यापार अत्यंत महत्वपूर्ण था।
रोमन साम्राज्य से व्यापार
प्राचीन दक्षिण भारत का समुद्री व्यापार
संगम युग में दक्षिण भारत का रोमन साम्राज्य के साथ व्यापक समुद्री व्यापार था।
तमिल साहित्य में पश्चिम से आने वाले विदेशियों के लिए यवन शब्द का प्रयोग मिलता है।
दक्षिण भारत के विभिन्न पुरास्थलों से बड़ी संख्या में रोमन सिक्के प्राप्त हुए हैं, जो इस व्यापारिक संपर्क का महत्वपूर्ण प्रमाण हैं।
भारत से काली मिर्च, मसाले, मोती, हाथीदाँत, बहुमूल्य रत्न और वस्त्र निर्यात किए जाते थे।
रोमन संसार से सोना, चाँदी, मदिरा, काँच की वस्तुएँ और अन्य विलासिता की सामग्री भारत आती थी।
मुजिरिस, कावेरीपट्टिनम् और कोरकई जैसे बंदरगाह विदेशी व्यापार के महत्वपूर्ण केंद्र थे।
अरिकामेडु, वर्तमान पुदुचेरी के निकट स्थित एक महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक स्थल है। यहाँ से रोमन संसार से व्यापारिक संपर्क के अनेक पुरातात्त्विक प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी और प्लिनी जैसे यूनानी-रोमन स्रोत भी भारत और रोमन संसार के बीच व्यापार की जानकारी देते हैं।
संगमकालीन धर्म
स्थानीय देवता और उत्तर भारतीय धार्मिक प्रभाव
संगमकालीन धार्मिक जीवन में स्थानीय देवी-देवताओं और प्रकृति से संबंधित उपासना का महत्वपूर्ण स्थान था।
मुरुगन तमिल क्षेत्र के अत्यंत लोकप्रिय देवता थे। उनका संबंध विशेष रूप से पर्वतीय कुरिंजी क्षेत्र से था।
मायोन का संबंध विष्णु-कृष्ण परंपरा से, जबकि कोर्रवई का संबंध युद्ध और विजय की देवी से था।
संगम साहित्य में शिव, विष्णु और इंद्र से संबंधित धार्मिक परंपराओं के भी प्रमाण मिलते हैं।
समय के साथ दक्षिण भारत में ब्राह्मण धर्म, जैन धर्म और बौद्ध धर्म का भी प्रभाव बढ़ा।
मणिमेखलै में बौद्ध प्रभाव स्पष्ट है, जबकि तमिल साहित्य की अन्य रचनाओं में जैन परंपरा का भी प्रभाव दिखाई देता है।
पाँच तिणै
भूगोल, जीवन और देवताओं का संबंध
| तिणै | भौगोलिक क्षेत्र | प्रमुख जीवन/व्यवसाय | संबंधित देवता |
|---|---|---|---|
| कुरिंजी | पर्वतीय क्षेत्र | शिकार | मुरुगन |
| मुल्लै | वन एवं चरागाह | पशुपालन | मायोन |
| मरुतम् | उपजाऊ कृषि क्षेत्र | कृषि | इंद्र |
| नेयटल | समुद्र तट | मछली एवं समुद्री व्यापार | वरुण |
| पालै | शुष्क क्षेत्र | यात्रा एवं युद्ध से जुड़ा जीवन | कोर्रवई |
महत्वपूर्ण परीक्षा तथ्य
त्वरित पुनरावृत्ति
एक नज़र में याद रखें
संगम — तमिल कवियों एवं विद्वानों की सभा की साहित्यिक परंपरा।
प्रमुख संगमकालीन राज्य — चेर, चोल और पांड्य।
चेर — प्रमुख केंद्र वंजी — बंदरगाह मुजिरिस — प्रसिद्ध शासक शेनगुट्टुवन।
चोल — उरैयूर एवं कावेरीपट्टिनम् — प्रसिद्ध शासक करिकाल।
करिकाल — वेन्नि का युद्ध — कल्लणै बाँध।
पांड्य — राजधानी मदुरै — बंदरगाह कोरकई — मोती व्यापार।
तोलकाप्पियम — तोलकाप्पियर — तमिल व्याकरण एवं काव्यशास्त्र।
शिलप्पदिकारम् — इलंगो अडिगल — कोवलन और कन्नगी।
मणिमेखलै — सीत्तलै सत्तनार — बौद्ध प्रभाव।
एट्टुत्तोकै — आठ काव्य-संग्रह।
पत्तुप्पाट्टु — दस गीत।
अव्वैयार — प्रसिद्ध संगमकालीन महिला कवयित्री।
नडुकल — वीरगति प्राप्त योद्धाओं की स्मृति में स्थापित वीरशिला।
मुरुगन — संगमकालीन तमिल क्षेत्र के प्रमुख देवताओं में एक।
अरिकामेडु — रोमन व्यापारिक संपर्क के पुरातात्त्विक प्रमाणों के लिए प्रसिद्ध।
चेर क्षेत्र — काली मिर्च के व्यापार के लिए प्रसिद्ध।
पांड्य क्षेत्र — मोती व्यापार के लिए प्रसिद्ध।
अशोक के अभिलेख — चोल, पांड्य, केरलपुत्र और सत्यपुत्र का उल्लेख।
पाँच तिणै — कुरिंजी, मुल्लै, मरुतम्, नेयटल और पालै।
तीन राजवंशों को ऐसे याद रखें
चेर = पश्चिमी तट + वंजी + मुजिरिस + काली मिर्च + शेनगुट्टुवन
चोल = कावेरी + उरैयूर + पुहार + करिकाल + कल्लणै
पांड्य = मदुरै + कोरकई + मछली + मोती + संगम परंपरा