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सर जॉर्ज बार्लो
SIR GEORGE BARLOW

सर जॉर्ज बार्लो

1805–1807 — कार्यवाहक गवर्नर-जनरल, अहस्तक्षेप की नीति और वेल्लौर सैनिक विद्रोह

सर जॉर्ज बार्लो का कार्यकाल

सर जॉर्ज बार्लो ने लॉर्ड कार्नवालिस की मृत्यु के बाद 10 अक्टूबर 1805 से 31 जुलाई 1807 ई. तक भारत के कार्यवाहक गवर्नर-जनरल के रूप में शासन किया। उसका कार्यकाल अपेक्षाकृत छोटा था, लेकिन इस अवधि में अंग्रेजों की भारतीय रियासतों के प्रति नीति में विस्तारवाद की जगह संयम और अहस्तक्षेप पर अधिक जोर दिया गया। इसी समय 1806 ई. का वेल्लौर सैनिक विद्रोह हुआ, जो उसके कार्यकाल की सबसे महत्वपूर्ण घटना थी।

01

कार्यवाहक गवर्नर-जनरल

लॉर्ड कार्नवालिस के बाद प्रशासन की जिम्मेदारी

लॉर्ड कार्नवालिस की 5 अक्टूबर 1805 ई. को मृत्यु के बाद सर जॉर्ज बार्लो ने गवर्नर-जनरल का कार्यभार संभाला। वह नियमित रूप से नियुक्त स्थायी गवर्नर-जनरल नहीं था, बल्कि कार्यवाहक गवर्नर-जनरल के रूप में 1807 ई. तक पद पर रहा।

इसके बाद लॉर्ड मिंटो प्रथम ने 1807 ई. में गवर्नर-जनरल का पद संभाला। इसलिए परीक्षा में बार्लो के नाम के साथ कार्यवाहक शब्द याद रखना अधिक सही है।

🎯 परीक्षा में याद रखें

सर जॉर्ज बार्लो — 1805–1807 ई. — कार्यवाहक गवर्नर-जनरल।

02

रियासतों के प्रति अहस्तक्षेप की नीति

विस्तारवाद से दूरी और सीमित हस्तक्षेप

सर जॉर्ज बार्लो भारतीय रियासतों के मामलों में अहस्तक्षेप की नीति का समर्थक था। उसने लॉर्ड वेलेजली की आक्रामक विस्तारवादी नीति से हटकर लॉर्ड कार्नवालिस की अधिक संयमित नीति को आगे बढ़ाया।

उसका उद्देश्य अनावश्यक युद्धों और राजनीतिक हस्तक्षेप को कम करना तथा कंपनी के खर्च को नियंत्रित करना था। इसलिए उसके शासनकाल में भारतीय रियासतों के साथ संबंधों में अपेक्षाकृत शांत और कम विस्तारवादी दृष्टिकोण अपनाया गया।

अहस्तक्षेप की नीति को केवल बार्लो से नहीं जोड़ना चाहिए। इससे पहले सर जॉन शोर भी इस नीति के प्रमुख समर्थक रहे थे। बार्लो का महत्व इस बात में है कि उसने वेलेजली के विस्तारवादी दौर के बाद फिर से अहस्तक्षेप और मितव्ययिता पर जोर दिया।

📗 भ्रम से बचें

सर जॉन शोर और सर जॉर्ज बार्लो — दोनों को अहस्तक्षेप की नीति से जोड़ा जाता है। बार्लो ने विशेष रूप से कार्नवालिस की संयमित नीति को आगे बढ़ाया।

03

वेल्लौर का सैनिक विद्रोह, 1806

अंग्रेजी शासन के विरुद्ध प्रारंभिक सैनिक विद्रोह

10 जुलाई 1806 ई. को मद्रास प्रेसीडेंसी के वेल्लौर किले में भारतीय सिपाहियों ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। यह घटना सर जॉर्ज बार्लो के कार्यवाहक गवर्नर-जनरल रहने के दौरान हुई।

यह विद्रोह मुख्य रूप से भारतीय सैनिकों की धार्मिक और सामाजिक भावनाओं की उपेक्षा से जुड़ा था। सैनिकों के पहनावे और व्यक्तिगत स्वरूप से संबंधित नए सैन्य नियम लागू किए गए, जिनसे हिंदू और मुस्लिम दोनों सैनिकों में असंतोष पैदा हुआ।

सैनिकों को माथे पर धार्मिक या जातीय चिह्न लगाने से रोका गया तथा दाढ़ी-मूंछ और सिर पर पहने जाने वाले वस्त्रों के संबंध में भी नए निर्देश दिए गए। नई टोपी को लेकर भी सैनिकों में यह आशंका फैली कि अंग्रेज उनकी धार्मिक पहचान और परंपराओं में हस्तक्षेप कर रहे हैं।

वेल्लौर किले में टीपू सुल्तान के परिवार के सदस्य भी रह रहे थे। विद्रोह के दौरान मैसूर के पुराने शाही परिवार से जुड़ी भावनाएँ भी सामने आईं और विद्रोही सैनिकों ने टीपू सुल्तान के पुत्रों में से एक को शासक के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया।

विद्रोहियों ने कुछ समय के लिए वेल्लौर किले पर अधिकार कर लिया, लेकिन अरकोट से पहुँची अंग्रेजी सेना ने इसे शीघ्र दबा दिया। विद्रोह का दमन बहुत कठोरता से किया गया।

🎯 अत्यंत महत्वपूर्ण

वेल्लौर सैनिक विद्रोह — 10 जुलाई 1806 ई. — सर जॉर्ज बार्लो के कार्यवाहक गवर्नर-जनरल काल में।

04

वेल्लौर विद्रोह के कारण

धार्मिक भावना, सैन्य नियम और टीपू परिवार

कारणविवरण
सैनिक पोशाक में परिवर्तनभारतीय सिपाहियों पर नई पोशाक और नई प्रकार की टोपी से संबंधित नियम लागू किए गए।
धार्मिक चिह्नों पर रोकहिंदू सैनिकों के माथे पर धार्मिक या जातीय चिह्न लगाने पर प्रतिबंध से असंतोष बढ़ा।
दाढ़ी-मूंछ संबंधी नियममुस्लिम सैनिकों सहित अनेक सिपाहियों ने इन नियमों को धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं में हस्तक्षेप माना।
धर्म परिवर्तन की आशंकासैनिकों में यह भय फैल गया कि अंग्रेज धीरे-धीरे उन्हें ईसाई धर्म अपनाने के लिए बाध्य करना चाहते हैं।
टीपू सुल्तान के परिवार की उपस्थितिवेल्लौर किले में टीपू सुल्तान के परिवार के सदस्य मौजूद थे, जिससे मैसूर-विरोधी अंग्रेजी शासन के विरुद्ध राजनीतिक असंतोष को भी बल मिला।
05

बार्लो और विलियम बेंटिंक में अंतर

परीक्षा में बार-बार होने वाला भ्रम

वेल्लौर विद्रोह के समय सर जॉर्ज बार्लो भारत का कार्यवाहक गवर्नर-जनरल था, जबकि विलियम बेंटिंक मद्रास का गवर्नर था। इसलिए दोनों नाम वेल्लौर विद्रोह के संदर्भ में मिल सकते हैं, लेकिन उनके पद अलग थे।

विद्रोह के बाद मद्रास प्रशासन और सैन्य अधिकारियों की नीतियों की आलोचना हुई तथा मद्रास के गवर्नर विलियम बेंटिंक को बाद में वापस बुला लिया गया।

⚠️ परीक्षा में भ्रम न करें

1806 का वेल्लौर विद्रोह — गवर्नर-जनरल के स्तर पर सर जॉर्ज बार्लो; मद्रास के गवर्नर के रूप में विलियम बेंटिंक।

06

वेल्लौर विद्रोह का महत्व

1857 से पहले सैनिक असंतोष का बड़ा संकेत

वेल्लौर का विद्रोह 1857 के व्यापक विद्रोह से लगभग आधी शताब्दी पहले हुआ था। इसने यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीय सैनिकों की धार्मिक और सामाजिक भावनाओं में हस्तक्षेप अंग्रेजी शासन के लिए गंभीर सैन्य संकट पैदा कर सकता है।

इसे 1857 के विद्रोह के समान अखिल भारतीय आंदोलन नहीं माना जाता, लेकिन यह कंपनी की सेना में भारतीय सिपाहियों के असंतोष की एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक घटना थी।

07

एक नज़र में

त्वरित परीक्षा पुनरावृत्ति

तथ्यविवरण
सर जॉर्ज बार्लो1805–1807 ई.
पदकार्यवाहक गवर्नर-जनरल
प्रमुख नीतिभारतीय रियासतों के मामलों में अहस्तक्षेप और संयम
नीति का उद्देश्यअनावश्यक युद्ध और कंपनी का खर्च कम करना
प्रमुख घटनावेल्लौर सैनिक विद्रोह
विद्रोह की तिथि10 जुलाई 1806 ई.
स्थानवेल्लौर किला, वर्तमान तमिलनाडु
मुख्य कारणसैनिक पोशाक, धार्मिक चिह्न और दाढ़ी-मूंछ संबंधी नियमों से असंतोष
मद्रास का गवर्नरविलियम बेंटिंक

⚡ अंतिम पुनरावृत्ति

सर जॉर्ज बार्लो — 1805–1807 ई. — कार्यवाहक गवर्नर-जनरल।

वह भारतीय रियासतों के मामलों में अहस्तक्षेप की नीति का समर्थक था और वेलेजली की विस्तारवादी नीति के बाद अधिक संयमित नीति की ओर लौटा।

10 जुलाई 1806 ई. — वेल्लौर सैनिक विद्रोह उसके कार्यकाल की सबसे महत्वपूर्ण घटना थी।

वेल्लौर विद्रोह का प्रमुख कारण सैनिकों की पोशाक, धार्मिक चिह्नों और व्यक्तिगत स्वरूप से संबंधित नए नियमों के कारण उत्पन्न धार्मिक-सांस्कृतिक असंतोष था।

विद्रोह के समय सर जॉर्ज बार्लो कार्यवाहक गवर्नर-जनरल और विलियम बेंटिंक मद्रास का गवर्नर था।

वेल्लौर विद्रोह 1857 से पहले कंपनी की सेना में भारतीय सिपाहियों के गंभीर असंतोष की एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक घटना थी।

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