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सिख धर्म का उदय, सिख शक्ति का विकास एवं आंग्ल-सिख युद्ध

सिख धर्म का उदय, सिख शक्ति का विकास एवं आंग्ल-सिख युद्ध

सिख धर्म और सिख शक्ति का विकास

सिख धर्म का उदय पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में पंजाब में हुआ। इसकी शुरुआत गुरु नानक की शिक्षाओं से हुई और दस सिख गुरुओं की परंपरा में इसका क्रमिक विकास हुआ। गुरु गोविंद सिंह ने 1699 ई. में खालसा पंथ की स्थापना करके सिख समुदाय को एक विशिष्ट धार्मिक, सामाजिक और सैनिक पहचान प्रदान की।

आगे चलकर बंदा सिंह बहादुर, दल खालसा, सिख मिसलों और महाराजा रणजीत सिंह के नेतृत्व में सिख शक्ति एक शक्तिशाली राजनीतिक सत्ता में विकसित हुई। रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद सिख साम्राज्य कमजोर हुआ और दो आंग्ल-सिख युद्धों के बाद 1849 ई. में पंजाब अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया गया।

01

गुरु नानक देव

गुरु नानक देव सिख धर्म के प्रथम गुरु थे। उनका जन्म 1469 ई. में तलवंडी नामक स्थान पर हुआ था। यह स्थान वर्तमान पाकिस्तान में स्थित है और आज ननकाना साहिब के नाम से प्रसिद्ध है।

सिख धर्म की स्थापना और उसके मूल धार्मिक सिद्धांतों के विकास का श्रेय गुरु नानक को दिया जाता है। उन्होंने एक ईश्वर में विश्वास, ईमानदार श्रम, मानव समानता, सेवा, नाम-स्मरण तथा जातिगत भेदभाव से ऊपर उठने पर बल दिया।

गुरु नानक बाबर के समकालीन थे। बाबर के आक्रमणों का उल्लेख गुरु नानक की वाणी में भी मिलता है। हुमायूँ 1530 ई. में मुगल सम्राट बना और गुरु नानक 1539 ई. तक जीवित रहे, इसलिए दोनों का काल भी कुछ वर्षों तक एक-दूसरे से मिलता है।

सिख परंपरा में लंगर की संस्था गुरु नानक से जुड़ी है। उन्होंने सामूहिक भोजन के माध्यम से समानता और सेवा की भावना को बढ़ावा दिया। आगे गुरु अंगद और गुरु अमरदास ने लंगर व्यवस्था को और व्यवस्थित तथा मजबूत किया।

गुरु नानक ने अपने अंतिम वर्ष करतारपुर में बिताए और वहीं 1539 ई. में उनका निधन हुआ।

परीक्षा के लिए

गुरु नानक — प्रथम सिख गुरु — जन्म 1469 ई. — तलवंडी — मृत्यु 1539 ई. — करतारपुर।

02

गुरु अंगद देव

गुरु अंगद सिखों के दूसरे गुरु थे। उनका प्रारंभिक नाम भाई लहणा था। गुरु नानक ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनाया।

गुरमुखी लिपि के वर्तमान स्वरूप के विकास, मानकीकरण और प्रचार में गुरु अंगद का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान था। इसलिए सामान्य परीक्षा में गुरमुखी लिपि के विकास को गुरु अंगद से जोड़ा जाता है।

उन्होंने गुरु नानक द्वारा स्थापित लंगर की परंपरा को आगे बढ़ाया और सिख समुदाय के संगठन को मजबूत किया।

हुमायूँ और गुरु अंगद से जुड़ा प्रसिद्ध परंपरागत प्रसंग भी मिलता है। शेरशाह से पराजित होने के बाद हुमायूँ गुरु अंगद से मिलने पहुँचा था।

03

गुरु अमरदास

गुरु अमरदास सिखों के तीसरे गुरु थे। उन्होंने सिख समुदाय के संगठन और सामाजिक सुधारों पर विशेष बल दिया।

उन्होंने गोइंदवाल को सिख धर्म का महत्वपूर्ण केंद्र बनाया और लंगर व्यवस्था को विशेष महत्व दिया।

गुरु अमरदास ने सिख धर्म के प्रचार और संगठन के लिए मंजी व्यवस्था को विकसित किया। इसके माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों में सिख धर्म के प्रचार की जिम्मेदारी प्रतिनिधियों को दी गई।

उन्होंने सती प्रथा और पर्दा जैसी सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया तथा स्त्रियों की सामाजिक स्थिति सुधारने पर बल दिया।

मुगल सम्राट अकबर ने गोइंदवाल जाकर गुरु अमरदास से भेंट की थी।

बीबी भानी गुरु अमरदास की पुत्री थीं और उनका विवाह भाई जेठा से हुआ था, जो आगे चलकर गुरु रामदास बने।

महत्वपूर्ण

सिख विवाह में पढ़ी जाने वाली चार लावाँ की रचना गुरु अमरदास ने नहीं, बल्कि गुरु रामदास ने की थी।

04

गुरु रामदास

गुरु रामदास सिखों के चौथे गुरु थे। उनका प्रारंभिक नाम भाई जेठा था और वे गुरु अमरदास की पुत्री बीबी भानी के पति थे।

गुरु रामदास ने एक नए नगर का विकास किया, जिसे प्रारंभ में रामदासपुर कहा गया। आगे चलकर यही नगर अमृतसर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

उन्होंने पवित्र अमृत सरोवर की खुदाई का कार्य प्रारंभ कराया। बाद में गुरु अर्जुन के समय इस धार्मिक केंद्र का और विकास हुआ।

सिख विवाह में प्रयुक्त चार लावाँ की रचना गुरु रामदास ने की थी।

05

गुरु अर्जुन देव

गुरु अर्जुन देव सिखों के पाँचवें गुरु थे।

उन्होंने पहले सिख गुरुओं की वाणी तथा कबीर, नामदेव, रविदास, शेख फरीद जैसे विभिन्न संतों और भक्तों की वाणी को संकलित करवाकर आदि ग्रंथ तैयार कराया। इसका संकलन 1604 ई. में पूर्ण हुआ।

आदि ग्रंथ को अमृतसर स्थित हरमंदिर साहिब में प्रतिष्ठित किया गया और बाबा बुद्ध को इसका प्रथम ग्रंथी बनाया गया।

अमृतसर के पवित्र सरोवर के मध्य स्थित हरमंदिर साहिब के निर्माण और विकास में गुरु अर्जुन की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

मुगल सम्राट जहाँगीर के शासनकाल में 1606 ई. में गुरु अर्जुन की मृत्यु हुई। जहाँगीर के विद्रोही पुत्र खुसरो से गुरु अर्जुन की भेंट और उसे आशीर्वाद देने का प्रसंग इस टकराव से जुड़ा महत्वपूर्ण कारण था, लेकिन घटना का राजनीतिक और धार्मिक संदर्भ इससे व्यापक था।

याद रखें

गुरु अर्जुन देव को सिख परंपरा का प्रथम शहीद गुरु माना जाता है।

06

गुरु हरगोविंद

गुरु हरगोविंद सिखों के छठे गुरु और गुरु अर्जुन देव के पुत्र थे।

उन्होंने सिख समुदाय को सैनिक रूप से संगठित किया और आत्मरक्षा के लिए शस्त्र धारण करने पर बल दिया।

गुरु हरगोविंद ने मीरी और पीरी की अवधारणा को प्रमुखता दी। मीरी सांसारिक अथवा राजनीतिक सत्ता और पीरी आध्यात्मिक सत्ता का प्रतीक थी।

उन्होंने अमृतसर में अकाल तख्त की स्थापना की। अकाल तख्त का अर्थ अकाल पुरुष का सिंहासन माना जाता है।

07

गुरु हरराय

गुरु हरराय सिखों के सातवें गुरु थे। उन्होंने गुरु हरगोविंद द्वारा विकसित सिख संगठन को बनाए रखा और धार्मिक प्रचार तथा सेवा पर बल दिया।

मुगल उत्तराधिकार संघर्ष के दौरान दारा शिकोह से उनके संपर्क का उल्लेख मिलता है।

08

गुरु हरकिशन

गुरु हरकिशन सिखों के आठवें गुरु थे। वे बहुत कम आयु में गुरु बने।

दिल्ली में चेचक की महामारी के दौरान उन्होंने रोगियों और जरूरतमंद लोगों की सेवा की। इसी अवधि में वे स्वयं भी चेचक से संक्रमित हुए और 1664 ई. में दिल्ली में उनका निधन हो गया।

09

गुरु तेग बहादुर

गुरु तेग बहादुर सिखों के नौवें गुरु थे। वे गुरु हरगोविंद के पुत्र थे।

सिख परंपरा में गुरु तेग बहादुर की शहादत को धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा से जोड़ा जाता है। विशेष रूप से कश्मीरी पंडितों द्वारा सहायता माँगने का प्रसंग प्रसिद्ध है।

गुरु तेग बहादुर को गिरफ्तार करके दिल्ली लाया गया और 1675 ई. में चाँदनी चौक में उनका सिर काटकर मृत्युदंड दिया गया।

दिल्ली में जिस स्थान पर उनकी शहादत हुई, वहाँ आज गुरुद्वारा शीश गंज साहिब स्थित है।

परीक्षा के लिए

गुरु तेग बहादुर को हिंद की चादर भी कहा जाता है।

10

गुरु गोविंद सिंह

गुरु गोविंद सिंह सिखों के दसवें और अंतिम मानव गुरु थे। उनका जन्म 1666 ई. में पटना में हुआ था।

वर्तमान में उनका जन्मस्थान तख्त श्री हरमंदिर जी पटना साहिब सिखों का प्रमुख तीर्थस्थल है।

गुरु गोविंद सिंह ने सिख समुदाय को धार्मिक और सैनिक दोनों रूपों में मजबूत किया।

सिख परंपरा में गुरु गोविंद सिंह की संप्रभु धार्मिक-सामाजिक सत्ता से सच्चा पातशाह जैसी अभिव्यक्ति जुड़ी मिलती है।

11

खालसा पंथ की स्थापना

1699 ई. में बैसाखी के दिन आनंदपुर साहिब में गुरु गोविंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की।

उन्होंने खालसा में दीक्षा की खंडे की पाहुल परंपरा स्थापित की।

खालसा में दीक्षित पुरुषों के लिए सिंह तथा महिलाओं के लिए कौर नाम का प्रयोग स्थापित हुआ।

खालसा के प्रथम पाँच दीक्षित सिख पंज प्यारे कहलाए।

पाँच ककार

केश — कंघा — कड़ा — कृपाण — कच्छेरा

12

जफरनामा

गुरु गोविंद सिंह ने मुगल सम्राट औरंगजेब को फारसी भाषा में जफरनामा लिखा।

जफरनामा का अर्थ विजय-पत्र है। इसमें गुरु गोविंद सिंह ने औरंगजेब की नीतियों और शपथ तोड़ने की आलोचना की।

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गुरु ग्रंथ साहिब को गुरु पद

गुरु गोविंद सिंह ने गुरु तेग बहादुर की वाणी को भी पवित्र ग्रंथ की परंपरा में सम्मिलित कराया।

गुरु गोविंद सिंह ने मानव गुरु की परंपरा समाप्त करते हुए गुरु ग्रंथ साहिब को सिखों का शाश्वत गुरु घोषित किया।

इस प्रकार गुरु नानक से गुरु गोविंद सिंह तक दस मानव गुरुओं की परंपरा रही और उसके बाद गुरु ग्रंथ साहिब को गुरु का स्थान प्राप्त हुआ।

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गुरु गोविंद सिंह की मृत्यु

1708 ई. में नांदेड़ में गुरु गोविंद सिंह पर पठान हमलावरों ने हमला किया।

हमले में उन्हें गंभीर घाव लगा। उपचार के बाद घाव कुछ समय के लिए ठीक हुआ, लेकिन बाद में धनुष की प्रत्यंचा खींचते समय घाव पुनः खुल गया।

इसी चोट के कारण 1708 ई. में नांदेड़ में उनका निधन हुआ।

हमलावर का नाम ऐतिहासिक विवरणों में सामान्यतः जमशेद खाँ मिलता है।

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दस सिख गुरु — एक नजर में

क्रम गुरु प्रमुख तथ्य
1 गुरु नानक सिख धर्म के प्रथम गुरु
2 गुरु अंगद गुरमुखी के विकास और प्रचार में योगदान
3 गुरु अमरदास मंजी व्यवस्था, गोइंदवाल
4 गुरु रामदास रामदासपुर, अमृतसर, लावाँ
5 गुरु अर्जुन आदि ग्रंथ का संकलन
6 गुरु हरगोविंद अकाल तख्त, मीरी-पीरी
7 गुरु हरराय सातवें गुरु
8 गुरु हरकिशन 1664 में दिल्ली में निधन
9 गुरु तेग बहादुर 1675 में शहादत
10 गुरु गोविंद सिंह 1699 में खालसा की स्थापना
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बंदा सिंह बहादुर

गुरु गोविंद सिंह की मृत्यु के बाद उनके शिष्य बंदा सिंह बहादुर ने मुगल सत्ता के विरुद्ध सिख संघर्ष का नेतृत्व संभाला।

उनका प्रारंभिक नाम लछमन देव माना जाता है। बाद में वे माधोदास बैरागी के नाम से जाने गए।

1710 ई. में सरहिंद के युद्ध में बंदा सिंह बहादुर ने वजीर खाँ को पराजित किया।

उन्होंने लोहगढ़ को महत्वपूर्ण केंद्र बनाया।

बंदा सिंह बहादुर ने जमींदारी व्यवस्था के विरुद्ध कदम उठाकर कृषकों को भूमि संबंधी अधिकार देने का प्रयास किया।

अंततः मुगलों ने उन्हें पकड़ लिया और 1716 ई. में दिल्ली में फर्रुखसियर के शासनकाल में मृत्युदंड दिया गया।

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दल खालसा और सिख मिसलें

बंदा सिंह बहादुर की मृत्यु के बाद भी सिख शक्ति समाप्त नहीं हुई।

नवाब कपूर सिंह ने सिख सैन्य संगठन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1748 ई. में अमृतसर में सिख जत्थों को अधिक व्यवस्थित रूप देकर दल खालसा का पुनर्गठन किया गया।

आगे सिख शक्ति 12 प्रमुख मिसलों में संगठित हुई।

इनमें भंगी मिसल प्रारंभिक काल की सबसे शक्तिशाली मिसलों में से एक थी।

सुकरचकिया मिसल विशेष रूप से महत्वपूर्ण बनी क्योंकि इसी मिसल से महाराजा रणजीत सिंह संबंधित थे।

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सिखों की 12 प्रमुख मिसलें

सिख शक्ति की प्रमुख मिसलें थीं— अहलूवालिया, भंगी, कन्हैया, रामगढ़िया, सुकरचकिया, नकई, निशानवालिया, शहीद, सिंहपुरिया, दलेवालिया, करोरसिंघिया और फूलकिया।

इनमें सुकरचकिया मिसल का ऐतिहासिक महत्व विशेष रूप से बढ़ा क्योंकि रणजीत सिंह ने इसी शक्ति के आधार पर पंजाब के विभिन्न क्षेत्रों को एकीकृत किया।

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महाराजा रणजीत सिंह

महाराजा रणजीत सिंह का जन्म 1780 ई. में गुजरांवाला में हुआ था।

वे सुकरचकिया मिसल के प्रमुख महान सिंह के पुत्र थे।

पिता की मृत्यु के बाद कम आयु में रणजीत सिंह सुकरचकिया मिसल के प्रमुख बने।

1799 ई. में रणजीत सिंह ने लाहौर पर अधिकार कर लिया। लाहौर आगे उनके साम्राज्य की राजधानी बना।

1801 ई. में उन्होंने महाराजा की उपाधि धारण की और एक शक्तिशाली सिख राज्य की स्थापना की।

रणजीत सिंह ने अमृतसर, मुल्तान, कश्मीर और पेशावर सहित अनेक महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण स्थापित किया।

परीक्षा के लिए

महाराजा रणजीत सिंह को शेर-ए-पंजाब कहा जाता है।

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अमृतसर की संधि — 1809

रणजीत सिंह की बढ़ती शक्ति को देखते हुए अंग्रेजों ने उनके साथ 1809 ई. में अमृतसर की संधि की।

इस संधि के बाद सतलुज नदी दोनों शक्तियों के प्रभाव क्षेत्रों के बीच महत्वपूर्ण सीमा बन गई।

रणजीत सिंह ने सतलुज के पूर्व स्थित सिख रियासतों पर अपना विस्तार रोकने पर सहमति दी।

इसके बाद उन्होंने मुख्यतः उत्तर और पश्चिम की दिशा में अपने साम्राज्य का विस्तार किया।

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रणजीत सिंह का शासन और सेना

रणजीत सिंह ने पंजाब में एक केंद्रीकृत और शक्तिशाली शासन स्थापित किया।

उनके प्रशासन में सिखों के साथ हिंदू और मुस्लिम अधिकारी भी महत्वपूर्ण पदों पर कार्य करते थे।

उन्होंने अपनी सेना को यूरोपीय ढंग पर आधुनिक बनाने के लिए कई यूरोपीय अधिकारियों की सेवाएँ लीं।

पैदल सेना और तोपखाने को विशेष रूप से मजबूत किया गया।

रणजीत सिंह के राज्य को सरकार-ए-खालसा भी कहा जाता था।

1839 ई. में महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के बाद उत्तराधिकार संघर्ष और दरबारी षड्यंत्रों के कारण सिख साम्राज्य कमजोर होने लगा।

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प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध

रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद पंजाब में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी।

प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध 1845–1846 ई. के बीच हुआ।

इसमें मुदकी, फिरोजशाह, अलीवाल और सोबराँ जैसे महत्वपूर्ण युद्ध हुए।

सिख सेना की पराजय के बाद मार्च 1846 में लाहौर की संधि हुई।

इस संधि के बाद पंजाब की राजनीति में अंग्रेजों का हस्तक्षेप बहुत बढ़ गया।

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अमृतसर की संधि — 1846

प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध के बाद की राजनीतिक व्यवस्था से जुड़ी महत्वपूर्ण संधि अमृतसर की संधि, 1846 थी।

इस संधि के माध्यम से अंग्रेजों ने गुलाब सिंह को जम्मू-कश्मीर का महाराजा स्वीकार किया।

इसलिए 1846 की अमृतसर संधि को द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध की संधि नहीं समझना चाहिए।

भ्रम से बचें

1809 की अमृतसर संधि — रणजीत सिंह और अंग्रेज।
1846 की अमृतसर संधि — गुलाब सिंह और जम्मू-कश्मीर।

24

द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध

अंग्रेजी हस्तक्षेप के विरुद्ध पंजाब में असंतोष बढ़ता गया और 1848 ई. में मुल्तान के विद्रोह से संघर्ष की नई स्थिति बनी।

द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध 1848–1849 ई. के बीच हुआ।

इस युद्ध में चिलियाँवाला और गुजरात के युद्ध विशेष रूप से महत्वपूर्ण थे।

1849 के गुजरात के युद्ध में सिख सेना की निर्णायक पराजय हुई।

इसके बाद गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौजी ने 29 मार्च 1849 को पंजाब को अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया।

नाबालिग महाराजा दलीप सिंह को सत्ता से हटा दिया गया और सिख साम्राज्य का अंत हो गया।

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आंग्ल-सिख युद्ध — एक नजर में

युद्ध वर्ष प्रमुख परिणाम
प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध 1845–1846 लाहौर की संधि, 1846
द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध 1848–1849 1849 में पंजाब का अंग्रेजी साम्राज्य में विलय
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परीक्षा में भ्रमित करने वाले तथ्य

गुरु नानक की मृत्यु — 1539 ई., 1538 नहीं।

गुरु अंगद — भाई लहणा; गुरमुखी के विकास और प्रचार में महत्वपूर्ण योगदान।

लावाँ — गुरु रामदास की रचना; गुरु अमरदास की नहीं।

गुरु अर्जुन — आदि ग्रंथ के संकलनकर्ता

गुरु हरगोविंद — अकाल तख्त + मीरी और पीरी।

गुरु तेग बहादुर — 1675 ई., दिल्ली में शहादत।

गुरु गोविंद सिंह — 1699 ई., खालसा पंथ की स्थापना।

गुरु गोविंद सिंह के बाद — गुरु ग्रंथ साहिब शाश्वत गुरु।

सुकरचकिया मिसल सही नाम है; इसी से रणजीत सिंह संबंधित थे।

1809 की अमृतसर संधि रणजीत सिंह और अंग्रेजों से संबंधित है।

1846 — प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध → लाहौर की संधि।

1846 की अमृतसर संधि गुलाब सिंह और जम्मू-कश्मीर से संबंधित है।

द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध के बाद अमृतसर की संधि नहीं हुई; 1849 में पंजाब का विलय हुआ।

27

महत्वपूर्ण तिथियाँ

वर्ष घटना
1469 गुरु नानक का जन्म
1539 गुरु नानक का निधन
1604 आदि ग्रंथ का संकलन
1606 गुरु अर्जुन की शहादत
1666 गुरु गोविंद सिंह का पटना में जन्म
1675 गुरु तेग बहादुर की शहादत
1699 खालसा पंथ की स्थापना
1708 गुरु गोविंद सिंह का निधन
1716 बंदा सिंह बहादुर को मृत्युदंड
1748 दल खालसा का पुनर्गठन और मिसलों का संगठन
1780 महाराजा रणजीत सिंह का जन्म
1799 रणजीत सिंह का लाहौर पर अधिकार
1801 रणजीत सिंह ने महाराजा की उपाधि धारण की
1809 अंग्रेजों और रणजीत सिंह के बीच अमृतसर की संधि
1839 महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु
1845–46 प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध
1846 लाहौर की संधि और अमृतसर की संधि
1848–49 द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध
29 मार्च 1849 पंजाब का अंग्रेजी साम्राज्य में विलय

अंतिम त्वरित पुनरावृत्ति

गुरु नानक — प्रथम गुरु; जन्म 1469; मृत्यु 1539, करतारपुर।

गुरु अंगद — भाई लहणा; गुरमुखी के विकास और प्रचार से संबंधित।

गुरु अमरदास — गोइंदवाल, मंजी व्यवस्था, सामाजिक सुधार।

गुरु रामदास — रामदासपुर, अमृतसर, अमृत सरोवर और चार लावाँ।

गुरु अर्जुन — 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन; 1606 में शहादत।

गुरु हरगोविंद — मीरी-पीरी, अकाल तख्त और सैन्य संगठन।

गुरु हरराय — सातवें गुरु।

गुरु हरकिशन — आठवें गुरु; 1664 में दिल्ली में निधन।

गुरु तेग बहादुर — नौवें गुरु; 1675 में दिल्ली में शहादत।

गुरु गोविंद सिंह — जन्म 1666 पटना; 1699 खालसा; 1708 नांदेड़ में निधन।

पाँच ककार — केश, कंघा, कड़ा, कृपाण और कच्छेरा।

जफरनामा — गुरु गोविंद सिंह द्वारा औरंगजेब को फारसी में लिखा गया पत्र।

गुरु गोविंद सिंह के बाद — गुरु ग्रंथ साहिब को शाश्वत गुरु का स्थान।

बंदा सिंह बहादुर — 1710 सरहिंद विजय; 1716 दिल्ली में मृत्युदंड।

1748 — दल खालसा का पुनर्गठन और मिसलों का संगठन।

भंगी मिसल — प्रारंभिक दौर की शक्तिशाली मिसलों में से एक।

सुकरचकिया मिसल — महाराजा रणजीत सिंह की मिसल।

1799 — रणजीत सिंह ने लाहौर पर अधिकार किया।

1801 — रणजीत सिंह ने महाराजा की उपाधि धारण की।

1809 — रणजीत सिंह और अंग्रेजों के बीच अमृतसर की संधि।

1839 — रणजीत सिंह की मृत्यु।

1845–46 — प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध → लाहौर की संधि।

1846 की अमृतसर संधि — गुलाब सिंह तथा जम्मू-कश्मीर से संबंधित।

1848–49 — द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध।

29 मार्च 1849 — लॉर्ड डलहौजी द्वारा पंजाब का अंग्रेजी साम्राज्य में विलय।

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