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भारत की प्रमुख औद्योगिक नीतियाँ
INDUSTRIAL POLICY OF INDIA

भारत की प्रमुख औद्योगिक नीतियाँ

स्वतंत्रता के बाद औद्योगिक विकास, सार्वजनिक क्षेत्र, निजी क्षेत्र और उदारीकरण

भारत में औद्योगिक नीति

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत सरकार ने औद्योगिक विकास को गति देने, रोजगार के अवसर बढ़ाने और आर्थिक आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के उद्देश्य से समय-समय पर विभिन्न औद्योगिक नीतियाँ घोषित कीं।

इन नीतियों के माध्यम से सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों की भूमिका, औद्योगिक लाइसेंसिंग, विदेशी निवेश, छोटे और ग्रामीण उद्योगों, भारी उद्योगों तथा औद्योगिक नियमन से संबंधित व्यवस्था निर्धारित की गई।

भारत की औद्योगिक नीति का स्वरूप समय के साथ बदलता गया। प्रारंभिक चरण में सार्वजनिक क्षेत्र और सरकारी नियमन को अधिक महत्व दिया गया, जबकि 1980 के दशक से आधुनिकीकरण और प्रतिस्पर्धा पर जोर बढ़ा तथा 1991 में व्यापक उदारीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए।

01

औद्योगिक नीति संकल्प, 1948

स्वतंत्र भारत की पहली प्रमुख औद्योगिक नीति

स्वतंत्र भारत की पहली प्रमुख औद्योगिक नीति 6 अप्रैल 1948 को घोषित की गई।

इस नीति का प्रमुख उद्देश्य भारत में ऐसी औद्योगिक व्यवस्था विकसित करना था जिसमें सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों को विकास का अवसर मिले।

इसने भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था की दिशा में प्रारंभिक आधार तैयार किया।

सरकार ने रणनीतिक और राष्ट्रीय महत्व के क्षेत्रों में राज्य की प्रमुख भूमिका स्वीकार की, जबकि अन्य क्षेत्रों में निजी उद्यमों को भी स्थान दिया गया।

उद्योगों का चार श्रेणियों में विभाजन

पहली श्रेणी — राज्य के विशेष एकाधिकार वाले उद्योग: इसमें शस्त्र और गोला-बारूद, परमाणु ऊर्जा तथा रेलवे परिवहन जैसे रणनीतिक क्षेत्र शामिल थे। इन क्षेत्रों में राज्य की विशेष भूमिका निर्धारित की गई।

दूसरी श्रेणी — राज्य द्वारा क्रमशः विकसित किए जाने वाले उद्योग: कोयला, लौह एवं इस्पात, विमान निर्माण, जहाज निर्माण, टेलीफोन तथा अन्य महत्वपूर्ण आधारभूत उद्योगों में नई इकाइयों के विकास में राज्य की प्रमुख भूमिका निर्धारित की गई।

तीसरी श्रेणी — नियंत्रित निजी उद्योग: कुछ महत्वपूर्ण उद्योग निजी क्षेत्र में रह सकते थे, लेकिन उनके विकास और संचालन पर सरकार का नियमन और नियंत्रण रहता था।

चौथी श्रेणी — शेष निजी उद्योग: शेष उद्योग मुख्यतः निजी क्षेत्र के लिए खुले थे। हालांकि राष्ट्रीय हित में आवश्यकता होने पर सरकार इनके संचालन को भी विनियमित कर सकती थी।

📗 परीक्षा के लिए

1948 की नीति = चार श्रेणियाँ + सार्वजनिक एवं निजी दोनों क्षेत्र + मिश्रित अर्थव्यवस्था की दिशा में प्रारंभिक कदम।

02

औद्योगिक नीति संकल्प, 1956

सार्वजनिक क्षेत्र और भारी उद्योगों को प्राथमिकता

30 अप्रैल 1956 को भारत सरकार ने नया औद्योगिक नीति संकल्प घोषित किया। इसे स्वतंत्र भारत की औद्योगिक नीति की महत्वपूर्ण आधारशिलाओं में से एक माना जाता है।

इस नीति पर समाजवादी ढाँचे वाले समाज की अवधारणा और द्वितीय पंचवर्षीय योजना की औद्योगिक रणनीति का स्पष्ट प्रभाव था।

इसका उद्देश्य तीव्र औद्योगीकरण करना, भारी और मशीन निर्माण उद्योगों का विकास करना तथा सार्वजनिक क्षेत्र को अर्थव्यवस्था में प्रमुख भूमिका प्रदान करना था।

इसके साथ आर्थिक और सामाजिक असमानता कम करने, क्षेत्रीय संतुलन स्थापित करने, रोजगार बढ़ाने तथा आर्थिक शक्ति के अत्यधिक केंद्रीकरण को रोकने पर भी जोर दिया गया।

उद्योगों का तीन अनुसूचियों में विभाजन

अनुसूची-अ: इसमें 17 उद्योग शामिल थे। इनके भविष्य के विकास की जिम्मेदारी मुख्यतः राज्य की थी। रक्षा उपकरण, परमाणु ऊर्जा, रेलवे परिवहन, लौह-इस्पात, भारी मशीनरी, कोयला, खनिज तेल तथा बिजली जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र इसमें शामिल थे।

रेलवे परिवहन, परमाणु ऊर्जा तथा शस्त्र एवं गोला-बारूद जैसे कुछ क्षेत्रों में राज्य का विशेष नियंत्रण था।

अनुसूची-ब: इसमें 12 उद्योग शामिल थे। इन क्षेत्रों में राज्य अपनी भूमिका क्रमशः बढ़ाने वाला था, लेकिन निजी क्षेत्र को भी अपने स्तर पर या राज्य की भागीदारी के साथ कार्य करने की अनुमति थी।

अनुसूची-स: अनुसूची-अ और अनुसूची-ब में शामिल न होने वाले शेष उद्योग सामान्यतः निजी क्षेत्र द्वारा विकसित किए जाने थे। हालांकि सरकार उन्हें योजना, लाइसेंस और अन्य नीतियों के माध्यम से विनियमित कर सकती थी।

🎯 याद रखें

1956 — अनुसूची-अ = 17 उद्योग | अनुसूची-ब = 12 उद्योग | शेष उद्योग = अनुसूची-स

औद्योगिक लाइसेंस व्यवस्था

1956 की नीति के बाद उद्योगों पर सरकारी नियंत्रण और औद्योगिक लाइसेंस व्यवस्था का प्रभाव अधिक व्यापक हुआ।

हालांकि औद्योगिक लाइसेंसिंग की शुरुआत केवल 1956 की नीति से नहीं हुई थी। इसका महत्वपूर्ण कानूनी आधार उद्योग (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1951 से पहले ही स्थापित हो चुका था।

इस व्यवस्था में अनेक उद्योगों को स्थापित करने, उत्पादन क्षमता बढ़ाने या विस्तार करने के लिए सरकारी अनुमति की आवश्यकता होती थी।

बाद के वर्षों में इसी व्यापक नियंत्रण व्यवस्था को लोकप्रिय रूप से लाइसेंस-कोटा-परमिट राज कहा गया।

1956 की नीति में सामाजिक न्याय, रोजगार सृजन, लघु एवं कुटीर उद्योगों के विकास तथा पिछड़े क्षेत्रों में औद्योगीकरण पर भी जोर दिया गया।

03

औद्योगिक नीति वक्तव्य, 1977

लघु, कुटीर और ग्रामीण उद्योगों को प्राथमिकता

वर्ष 1977 में जनता पार्टी सरकार ने नई औद्योगिक नीति घोषित की।

इस नीति का प्रमुख उद्देश्य औद्योगिक विकास को बड़े औद्योगिक केंद्रों तक सीमित न रखकर लघु, कुटीर और ग्रामीण उद्योगों का तेजी से विकास करना था।

गाँवों और छोटे नगरों में उद्योग स्थापित करके रोजगार के अधिक अवसर पैदा करना तथा औद्योगिक गतिविधियों का विकेंद्रीकरण करना इस नीति की प्रमुख प्राथमिकता थी।

लघु उद्योगों को विशेष प्रोत्साहन दिया गया और गाँव आधारित उद्योगों को संरक्षण प्रदान करने पर जोर दिया गया।

बड़े औद्योगिक घरानों के अत्यधिक विस्तार और आर्थिक शक्ति के केंद्रीकरण पर नियंत्रण रखने की नीति भी जारी रही।

बड़े औद्योगिक घरानों तथा एकाधिकार और प्रतिबंधात्मक व्यापारिक गतिविधियों की निगरानी के लिए एकाधिकार तथा प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार अधिनियम, 1969 महत्वपूर्ण था।

इस नीति में छोटे और अति-लघु उद्योगों की भूमिका पर विशेष जोर दिया गया।

जिला स्तर पर छोटे उद्यमियों को एक ही स्थान पर सहायता उपलब्ध कराने के उद्देश्य से जिला उद्योग केंद्र व्यवस्था को आगे बढ़ाया गया।

📗 मुख्य पहचान

1977 = लघु उद्योग + कुटीर उद्योग + ग्रामीण उद्योग + विकेंद्रीकरण।

04

औद्योगिक नीति वक्तव्य, 1980

आधुनिकीकरण, उत्पादकता और तकनीकी सुधार

23 जुलाई 1980 को इंदिरा गांधी सरकार ने औद्योगिक नीति वक्तव्य घोषित किया।

इस नीति का उद्देश्य उद्योगों की उत्पादन क्षमता का बेहतर उपयोग करना, उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाना तथा औद्योगिक क्षेत्र को अधिक आधुनिक और तकनीकी रूप से सक्षम बनाना था।

उद्योगों के आधुनिकीकरण और प्रौद्योगिकी उन्नयन पर विशेष जोर दिया गया।

देश के भीतर औद्योगिक प्रतिस्पर्धा बढ़ाने, उत्पादों की गुणवत्ता सुधारने और लागत कम करने को भी महत्व दिया गया।

सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों की भूमिका को स्वीकार करते हुए औद्योगिक विकास में अधिक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया गया।

औद्योगिक लाइसेंस और उत्पादन क्षमता से संबंधित कुछ प्रतिबंधों में ढील देने की दिशा में कदम उठाए गए।

इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटर तथा उच्च प्रौद्योगिकी क्षेत्रों को बढ़ावा देने की प्रक्रिया भी 1980 के दशक में तेज हुई।

1980 की नीति का एक उद्देश्य क्षेत्रीय असंतुलन को कम करना, रोजगार बढ़ाना, कृषि आधारित उद्योगों को मजबूत करना तथा निर्यात-उन्मुख उद्योगों को प्रोत्साहित करना भी था।

🎯 मुख्य पहचान

1980 = आधुनिकीकरण + उत्पादकता + प्रौद्योगिकी + प्रतिस्पर्धा।

05

नई औद्योगिक नीति, 1991

औद्योगिक उदारीकरण का महत्वपूर्ण मोड़

भारत की नई औद्योगिक नीति 24 जुलाई 1991 को घोषित की गई। यह पी. वी. नरसिंह राव सरकार द्वारा शुरू किए गए व्यापक आर्थिक सुधारों का महत्वपूर्ण हिस्सा थी।

डॉ. मनमोहन सिंह उस समय भारत के वित्त मंत्री थे और 1991 के आर्थिक सुधारों में उनकी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका थी।

इसलिए 1991 की औद्योगिक नीति को केवल वित्त मंत्री द्वारा प्रस्तुत व्यक्तिगत नीति की बजाय भारत सरकार की नई औद्योगिक नीति के रूप में समझना अधिक सही है।

इस नीति का मुख्य उद्देश्य भारतीय उद्योगों पर अत्यधिक सरकारी नियंत्रण कम करना, निजी क्षेत्र को अधिक स्वतंत्रता देना, विदेशी निवेश आकर्षित करना और भारतीय उद्योगों को अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करना था।

इस नीति ने भारत में चल रही व्यापक उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की प्रक्रिया को मजबूत आधार दिया।

भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व अर्थव्यवस्था के साथ अधिक गहराई से जोड़ना और भारतीय उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ाना इसके महत्वपूर्ण उद्देश्यों में शामिल था।

औद्योगिक लाइसेंस व्यवस्था में परिवर्तन

1991 की नई औद्योगिक नीति के अंतर्गत अधिकांश उद्योगों के लिए औद्योगिक लाइसेंस की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई।

इसके बाद उद्यमियों को अधिकांश उद्योगों में नई इकाई स्थापित करने और उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए पहले जैसी व्यापक सरकारी अनुमति की आवश्यकता नहीं रही।

कुछ सुरक्षा, रणनीतिक, पर्यावरणीय तथा संवेदनशील उद्योगों में औद्योगिक लाइसेंस की व्यवस्था जारी रखी गई।

समय के साथ अनिवार्य औद्योगिक लाइसेंसिंग की सूची में लगातार कमी की गई। इसलिए 1991 की मूल सूची और वर्तमान सूची को अलग-अलग समझना चाहिए।

वर्तमान केंद्रीय व्यवस्था में प्रमुख अनिवार्य लाइसेंस वाले समूहों में इलेक्ट्रॉनिक एयरोस्पेस एवं रक्षा उपकरण, औद्योगिक विस्फोटक, निर्दिष्ट खतरनाक रसायन तथा तंबाकू के कुछ उत्पाद शामिल हैं।

पुरानी परीक्षा पुस्तकों में शराब सहित पाँच उद्योगों की सूची मिल सकती है। शराब और मद्य से संबंधित उत्पादन पर राज्य स्तर की आबकारी और लाइसेंस व्यवस्था अलग से लागू होती है।

⚠️ परीक्षा-सावधानी

“वर्तमान में पाँच उद्योगों के लिए ही लाइसेंस अनिवार्य है” को बिना वर्ष और स्रोत के स्थायी तथ्य न मानें। औद्योगिक लाइसेंसिंग की सूची समय के साथ बदली है।

विदेशी पूंजी निवेश

1991 की नई औद्योगिक नीति में विदेशी पूंजी और आधुनिक तकनीक को आकर्षित करने के लिए विदेशी प्रत्यक्ष निवेश संबंधी नियमों को उदार बनाया गया।

उच्च प्राथमिकता वाले ऐसे उद्योग जिनमें अधिक पूंजी और आधुनिक प्रौद्योगिकी की आवश्यकता थी, उनमें 51 प्रतिशत तक विदेशी हिस्सेदारी के स्वतः अनुमोदन की व्यवस्था की गई।

इसका उद्देश्य प्रत्येक निवेश के लिए लंबी सरकारी स्वीकृति प्रक्रिया पर निर्भरता कम करना और विदेशी निवेश को आकर्षित करना था।

बाद के दशकों में विदेशी निवेश के नियमों और निवेश सीमाओं में व्यापक परिवर्तन हुए। आज अधिकांश क्षेत्रों में विदेशी निवेश नीति 1991 की मूल व्यवस्था से काफी अलग है।

इसलिए 1991 की नीति में दी गई विदेशी निवेश व्यवस्था और वर्तमान विदेशी निवेश नीति को एक ही तथ्य के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए।

लॉटरी व्यवसाय तथा जुआ और सट्टेबाजी जैसी गतिविधियाँ विदेशी निवेश के लिए प्रतिबंधित क्षेत्रों में रही हैं।

परमाणु ऊर्जा जैसे ऐसे क्षेत्र जिनमें निजी भागीदारी की अनुमति ही नहीं है, उनमें विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की भी अनुमति नहीं होती।

पुराने नियमों में खुदरा व्यापार पर व्यापक प्रतिबंध थे। बाद में एकल-ब्रांड और बहु-ब्रांड खुदरा व्यापार के लिए अलग-अलग विदेशी निवेश नियम विकसित किए गए। इसलिए “एकल-ब्रांड को छोड़कर पूरा खुदरा व्यापार विदेशी निवेश के लिए प्रतिबंधित है” को वर्तमान स्थायी तथ्य नहीं समझना चाहिए।

एकाधिकार संबंधी नियंत्रण में ढील

1991 की नई औद्योगिक नीति में बड़े औद्योगिक घरानों पर लागू एकाधिकार तथा प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार अधिनियम से संबंधित कई पूर्व-प्रवेश नियंत्रणों में महत्वपूर्ण ढील दी गई।

नई इकाइयों की स्थापना, विस्तार, विलय, समामेलन तथा अधिग्रहण जैसे मामलों में केवल कंपनी की परिसंपत्ति सीमा के आधार पर केंद्र सरकार से पहले जैसी पूर्व अनुमति लेने की आवश्यकता समाप्त कर दी गई।

इस परिवर्तन का उद्देश्य बड़े उद्योगों को केवल उनके आकार के आधार पर नियंत्रित करने की बजाय वास्तविक एकाधिकारवादी और अनुचित व्यापार व्यवहार पर ध्यान केंद्रित करना था।

बाद में भारत की प्रतिस्पर्धा नीति को आधुनिक बनाने के लिए राघवन समिति का गठन किया गया। समिति ने पुराने एकाधिकार कानून के स्थान पर आधुनिक प्रतिस्पर्धा कानून की आवश्यकता पर जोर दिया।

इसके बाद प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 बनाया गया।

इसी अधिनियम के अंतर्गत भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग की स्थापना वर्ष 2003 में की गई।

पुराने एकाधिकार तथा प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार अधिनियम को बाद में समाप्त कर प्रतिस्पर्धा अधिनियम आधारित व्यवस्था अपनाई गई।

🎯 क्रम याद रखें

एकाधिकार अधिनियम, 1969 राघवन समिति प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 प्रतिस्पर्धा आयोग, 2003

फेरा के स्थान पर फेमा

भारत में विदेशी मुद्रा से संबंधित पुरानी व्यवस्था विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973 पर आधारित थी।

यह व्यवस्था विदेशी मुद्रा के कठोर नियंत्रण और संरक्षण पर अधिक केंद्रित थी।

आर्थिक उदारीकरण के बाद इस कठोर नियंत्रण आधारित व्यवस्था को अधिक प्रबंधन-उन्मुख व्यवस्था में बदलने की आवश्यकता महसूस हुई।

इसके लिए विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999 बनाया गया।

यह नया कानून 1 जून 2000 से प्रभावी हुआ और उसी समय पुरानी फेरा व्यवस्था का स्थान फेमा ने ले लिया।

फेमा का प्रमुख उद्देश्य बाहरी व्यापार और भुगतान को सुविधाजनक बनाना तथा भारत में विदेशी मुद्रा बाजार के व्यवस्थित विकास और रखरखाव को बढ़ावा देना है।

इसलिए इसे केवल “2000-01 में फेरा समाप्त हुआ” कहने की बजाय फेमा 1 जून 2000 से लागू हुआ और इसने फेरा का स्थान लिया याद करना अधिक स्पष्ट है।

🎯 परीक्षा सूत्र

फेरा, 1973 → फेमा, 1999 → 1 जून 2000 से प्रभावी

06

औद्योगिक नीतियाँ — एक नजर में

त्वरित तुलना

वर्ष प्रमुख उद्देश्य एवं पहचान
1948 मिश्रित अर्थव्यवस्था की दिशा में आधार; सार्वजनिक एवं निजी दोनों क्षेत्रों की भूमिका; उद्योगों का चार श्रेणियों में विभाजन।
1956 समाजवादी ढाँचे की दिशा; सार्वजनिक क्षेत्र एवं भारी उद्योगों को प्राथमिकता; तीन अनुसूचियाँ।
1977 लघु, कुटीर और ग्रामीण उद्योगों को प्राथमिकता; औद्योगिक विकेंद्रीकरण।
1980 उद्योगों का आधुनिकीकरण, उत्पादकता, प्रौद्योगिकी उन्नयन और प्रतिस्पर्धा।
1991 औद्योगिक लाइसेंसिंग में व्यापक कमी, निजी निवेश, विदेशी निवेश और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा।
07

औद्योगिक नीति का बदलता स्वरूप

1948 से 1991 तक परिवर्तन

🧠 क्रम से समझें

1948 — मिश्रित अर्थव्यवस्था 1956 — सार्वजनिक क्षेत्र 1977 — लघु एवं ग्रामीण उद्योग 1980 — आधुनिकीकरण 1991 — उदारीकरण

⚡ अंतिम पुनरावृत्ति बिंदु

6 अप्रैल 1948 — स्वतंत्र भारत की पहली प्रमुख औद्योगिक नीति; सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों को स्थान दिया गया।

1948 की नीति में उद्योगों को चार श्रेणियों में विभाजित किया गया।

30 अप्रैल 1956 — सार्वजनिक क्षेत्र और भारी उद्योगों को प्राथमिकता देने वाली महत्वपूर्ण औद्योगिक नीति।

1956 में उद्योगों को अनुसूची-अ, अनुसूची-ब और अनुसूची-स में बाँटा गया।

अनुसूची-अ में 17 उद्योग तथा अनुसूची-ब में 12 उद्योग शामिल थे।

औद्योगिक लाइसेंसिंग का महत्वपूर्ण कानूनी आधार उद्योग (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1951 था।

1977 की औद्योगिक नीति का मुख्य जोर लघु, कुटीर एवं ग्रामीण उद्योगों तथा विकेंद्रीकरण पर था।

1980 की नीति का प्रमुख जोर आधुनिकीकरण, उत्पादकता, तकनीकी उन्नयन और प्रतिस्पर्धा पर था।

24 जुलाई 1991 — नई औद्योगिक नीति घोषित की गई।

1991 की नीति में अधिकांश उद्योगों के लिए औद्योगिक लाइसेंस की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई।

उच्च प्राथमिकता वाले कुछ उद्योगों में 51 प्रतिशत तक विदेशी हिस्सेदारी के स्वतः अनुमोदन की व्यवस्था की गई।

1991 के बाद निजी क्षेत्र और विदेशी निवेश के लिए अधिक अवसर उपलब्ध हुए।

एकाधिकार कानून से जुड़े पूर्व-प्रवेश नियंत्रणों में 1991 में व्यापक ढील दी गई।

राघवन समिति → प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 → भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग, 2003

फेरा, 1973 के स्थान पर फेमा, 1999 बनाया गया।

फेमा 1 जून 2000 से प्रभावी हुआ।

भारत की औद्योगिक नीति का व्यापक क्रम याद रखें — 1948 मिश्रित व्यवस्था → 1956 सार्वजनिक क्षेत्र → 1977 लघु उद्योग → 1980 आधुनिकीकरण → 1991 उदारीकरण।

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