स्वराज पार्टी
(1923)
स्वराज पार्टी
असहयोग आंदोलन की समाप्ति के बाद कांग्रेस के सामने यह प्रश्न उत्पन्न हुआ कि राष्ट्रीय आंदोलन को आगे किस प्रकार बढ़ाया जाए। इसी प्रश्न को लेकर कांग्रेस के नेताओं में दो अलग-अलग विचारधाराएँ सामने आईं।
चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू का विचार था कि राष्ट्रवादियों को ब्रिटिश शासन द्वारा स्थापित विधान परिषदों में प्रवेश करना चाहिए और परिषदों के भीतर से सरकार की नीतियों का विरोध करके औपनिवेशिक शासन के कामकाज में बाधा उत्पन्न करनी चाहिए।
इसी विचारधारा ने आगे चलकर स्वराज पार्टी को जन्म दिया।
असहयोग आंदोलन के बाद कांग्रेस
चौरी-चौरा कांड के बाद महात्मा गांधी ने फरवरी 1922 में असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया। आंदोलन की समाप्ति के बाद कांग्रेस में आगे की रणनीति को लेकर मतभेद उभरने लगे।
एक वर्ग का मानना था कि विधान परिषदों का बहिष्कार जारी रखने के बजाय उनमें प्रवेश करके सरकार का विरोध किया जाना चाहिए।
इस विचारधारा के प्रमुख सूत्रधार चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू थे।
विधान परिषदों में प्रवेश का समर्थन करने वाले नेताओं को परिवर्तनवादी या स्वराजवादी कहा गया।
उनका उद्देश्य विधान परिषदों में प्रवेश करके ब्रिटिश सरकार की नीतियों का विरोध करना, सरकारी प्रस्तावों और बजट को चुनौती देना तथा औपनिवेशिक शासन की कमजोरियों को जनता के सामने उजागर करना था।
परिवर्तनवादी और अपरिवर्तनवादी
| वर्ग | प्रमुख नेता | नीति |
|---|---|---|
| परिवर्तनवादी | सी. आर. दास, मोतीलाल नेहरू | विधान परिषदों में प्रवेश करके सरकार का विरोध करना |
| अपरिवर्तनवादी | वल्लभभाई पटेल, राजेंद्र प्रसाद, सी. राजगोपालाचारी आदि | विधान परिषदों के बहिष्कार और गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रम को जारी रखना |
याद रखें
परिवर्तनवादी → परिषदों में प्रवेश
अपरिवर्तनवादी → परिषदों के बहिष्कार की नीति जारी रखना
गया अधिवेशन — 1922
दिसंबर 1922 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन गया में आयोजित हुआ। इस अधिवेशन की अध्यक्षता चित्तरंजन दास ने की।
सी. आर. दास और मोतीलाल नेहरू ने कांग्रेस के सामने विधान परिषदों में प्रवेश करके सरकार का भीतर से विरोध करने की नीति का समर्थन किया।
लेकिन गया अधिवेशन में विधान परिषदों में प्रवेश का प्रस्ताव पराजित हो गया।
इसके बाद सी. आर. दास ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। मोतीलाल नेहरू भी उनके साथ नई राजनीतिक रणनीति के प्रमुख समर्थक बने।
इसलिए यह लिखना सही नहीं होगा कि गया अधिवेशन में सी. आर. दास और मोतीलाल नेहरू दोनों ने कांग्रेस की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया था। उनका संघर्ष मुख्यतः कांग्रेस के भीतर अपनाई जाने वाली राजनीतिक रणनीति को लेकर था।
परीक्षा में भ्रम न करें
गया अधिवेशन — 1922 → अध्यक्ष सी. आर. दास → परिषद प्रवेश का प्रस्ताव पराजित → सी. आर. दास ने कांग्रेस अध्यक्ष पद छोड़ा।
स्वराज पार्टी की स्थापना
गया अधिवेशन के बाद 1923 में चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू के नेतृत्व में एक नए राजनीतिक संगठन की स्थापना की गई।
इसका मूल नाम कांग्रेस-खिलाफत स्वराज्य पार्टी था, जिसे सामान्यतः स्वराज पार्टी कहा गया।
इसकी स्थापना के लिए सामान्यतः जनवरी 1923 की तिथि स्वीकार की जाती है और प्रतियोगी परीक्षाओं की अनेक पुस्तकों में 1 जनवरी 1923 दिया जाता है।
चित्तरंजन दास इसके अध्यक्ष बने, जबकि मोतीलाल नेहरू इसके प्रमुख सचिव/महासचिव बने।
एक नजर में
स्वराज पार्टी → 1923
मूल नाम → कांग्रेस-खिलाफत स्वराज्य पार्टी
अध्यक्ष → चित्तरंजन दास
महासचिव → मोतीलाल नेहरू
स्वराज पार्टी का उद्देश्य
स्वराजवादियों का उद्देश्य ब्रिटिश शासन द्वारा बनाई गई विधान परिषदों में प्रवेश करके औपनिवेशिक शासन का समर्थन करना नहीं था, बल्कि उसी व्यवस्था के भीतर से सरकार की नीतियों का विरोध करना था।
वे सरकारी बजट और प्रस्तावों का विरोध करके तथा प्रशासन से संबंधित प्रश्न उठाकर ब्रिटिश सरकार के लिए शासन चलाना कठिन बनाना चाहते थे।
उनका उद्देश्य विधान परिषदों को राजनीतिक संघर्ष का मंच बनाकर स्वशासन और स्वराज की माँग को मजबूत करना था।
इस नीति को सामान्य रूप से परिषदों में प्रवेश करके भीतर से औपनिवेशिक शासन में बाधा उत्पन्न करने की नीति के रूप में समझा जाता है।
1923 के चुनाव और सफलता
स्वराज पार्टी ने 1923 में हुए विधानमंडलीय चुनावों में भाग लिया और उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की।
स्वराजवादी केंद्रीय विधान सभा में सबसे बड़े भारतीय राजनीतिक समूहों में प्रमुख शक्ति बनकर उभरे और कई प्रांतीय विधान परिषदों में भी उनका प्रभाव बढ़ा।
बंगाल और मध्य प्रांत में स्वराज पार्टी का प्रदर्शन विशेष रूप से प्रभावशाली रहा।
विधानमंडलों में स्वराजवादियों ने सरकार के बजट और अनेक नीतियों का विरोध किया तथा ब्रिटिश शासन की आलोचना के लिए परिषदों को राजनीतिक मंच के रूप में इस्तेमाल किया।
विधान परिषदों में भूमिका
स्वराज पार्टी के नेताओं ने विधान परिषदों में औपनिवेशिक सरकार को चुनौती देने के लिए संगठित विपक्ष की भूमिका निभाई।
स्वराजवादियों ने राजनीतिक बंदियों की रिहाई, नागरिक स्वतंत्रता और उत्तरदायी शासन जैसे मुद्दों को विधानमंडलों में उठाया।
स्वराजवादियों की गतिविधियों ने यह दिखाया कि ब्रिटिश सरकार द्वारा स्थापित संवैधानिक संस्थाओं का उपयोग भी औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध राजनीतिक दबाव बनाने के लिए किया जा सकता है।
विट्ठलभाई पटेल
स्वराज पार्टी की संसदीय राजनीति से जुड़ा एक महत्वपूर्ण नाम विट्ठलभाई पटेल का है।
1925 में विट्ठलभाई पटेल केंद्रीय विधान सभा के अध्यक्ष चुने गए।
वे इस पद पर पहुँचने वाले प्रथम भारतीय थे। प्रतियोगी परीक्षाओं में स्वराज पार्टी से संबंधित प्रश्नों में यह तथ्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
महत्वपूर्ण तथ्य
विट्ठलभाई पटेल → 1925 → केंद्रीय विधान सभा के प्रथम भारतीय अध्यक्ष।
सी. आर. दास की मृत्यु और पार्टी का पतन
स्वराज पार्टी के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक चित्तरंजन दास थे। उन्हें लोकप्रिय रूप से देशबंधु कहा जाता था।
16 जून 1925 को सी. आर. दास की मृत्यु हो गई।
उनकी मृत्यु स्वराज पार्टी के लिए एक बड़ा आघात थी। इसके बाद पार्टी का संगठन और राजनीतिक प्रभाव धीरे-धीरे कमजोर होने लगा।
समय के साथ स्वराजवादियों के भीतर भी रणनीति को लेकर मतभेद बढ़े। दूसरी ओर राष्ट्रीय राजनीति में नए आंदोलनों और राजनीतिक परिस्थितियों के उदय से स्वराज पार्टी की स्वतंत्र भूमिका कम होती गई।
याद रखें
16 जून 1925 → सी. आर. दास की मृत्यु → स्वराज पार्टी के कमजोर होने की प्रक्रिया तेज हुई।
महत्वपूर्ण तथ्य
| तथ्य | उत्तर |
|---|---|
| गया कांग्रेस अधिवेशन | 1922 |
| गया अधिवेशन के अध्यक्ष | चित्तरंजन दास |
| स्वराज पार्टी की स्थापना | 1923 |
| मूल नाम | कांग्रेस-खिलाफत स्वराज्य पार्टी |
| प्रमुख संस्थापक | चित्तरंजन दास एवं मोतीलाल नेहरू |
| अध्यक्ष | चित्तरंजन दास |
| महासचिव | मोतीलाल नेहरू |
| स्वराजवादी | विधान परिषदों में प्रवेश के समर्थक |
| अपरिवर्तनवादी | परिषद बहिष्कार और गांधीवादी रचनात्मक कार्यक्रम के समर्थक |
| सी. आर. दास की मृत्यु | 16 जून 1925 |
| केंद्रीय विधान सभा के प्रथम भारतीय अध्यक्ष | विट्ठलभाई पटेल |
परीक्षा में भ्रमित करने वाले तथ्य
स्वराज पार्टी का जन्म असहयोग आंदोलन की समाप्ति के बाद कांग्रेस के भीतर उत्पन्न रणनीतिक मतभेदों से हुआ।
सी. आर. दास और मोतीलाल नेहरू → परिवर्तनवादी/स्वराजवादी।
परिवर्तनवादियों का उद्देश्य विधान परिषदों में प्रवेश करके सरकार का भीतर से विरोध करना था।
1922 का गया अधिवेशन → अध्यक्ष सी. आर. दास → परिषद प्रवेश का प्रस्ताव पराजित।
गया अधिवेशन के बाद सी. आर. दास ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया था; इसे सी. आर. दास और मोतीलाल नेहरू दोनों द्वारा कांग्रेस की सदस्यता छोड़ना नहीं लिखना चाहिए।
1923 → स्वराज पार्टी की स्थापना → सी. आर. दास एवं मोतीलाल नेहरू।
स्वराज पार्टी का मूल नाम कांग्रेस-खिलाफत स्वराज्य पार्टी था।
सी. आर. दास → अध्यक्ष तथा मोतीलाल नेहरू → महासचिव थे।
1925 → विट्ठलभाई पटेल → केंद्रीय विधान सभा के प्रथम भारतीय अध्यक्ष।
16 जून 1925 → सी. आर. दास की मृत्यु → पार्टी के कमजोर होने की प्रक्रिया तेज।
अंतिम त्वरित पुनरावृत्ति
असहयोग आंदोलन स्थगित होने के बाद कांग्रेस में आगे की रणनीति को लेकर मतभेद पैदा हुए। सी. आर. दास और मोतीलाल नेहरू विधान परिषदों में प्रवेश करके सरकार का विरोध करना चाहते थे।
इन नेताओं को परिवर्तनवादी या स्वराजवादी कहा गया, जबकि परिषदों के बहिष्कार और गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रम को जारी रखने वाले नेताओं को अपरिवर्तनवादी कहा गया।
1922 के गया कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता सी. आर. दास ने की। यहाँ परिषद प्रवेश का प्रस्ताव पराजित होने के बाद दास ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।
इसके बाद 1923 में सी. आर. दास और मोतीलाल नेहरू के नेतृत्व में स्वराज पार्टी की स्थापना हुई। इसका मूल नाम कांग्रेस-खिलाफत स्वराज्य पार्टी था।
सी. आर. दास इसके अध्यक्ष और मोतीलाल नेहरू महासचिव बने।
स्वराजवादियों का उद्देश्य विधान परिषदों में प्रवेश करके सरकारी नीतियों और बजट का विरोध करना तथा औपनिवेशिक शासन पर राजनीतिक दबाव बनाना था।
1923 के चुनावों में स्वराज पार्टी ने उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की और विधानमंडलों में प्रभावशाली विपक्ष की भूमिका निभाई।
1925 में विट्ठलभाई पटेल केंद्रीय विधान सभा के प्रथम भारतीय अध्यक्ष बने।
16 जून 1925 को सी. आर. दास की मृत्यु के बाद स्वराज पार्टी धीरे-धीरे कमजोर होने लगी।
मुख्य क्रम याद रखें — असहयोग आंदोलन स्थगित → कांग्रेस में परिवर्तनवादी-अपरिवर्तनवादी विवाद → गया अधिवेशन 1922 → स्वराज पार्टी 1923 → विधान परिषदों में प्रवेश → 1923 के चुनावों में सफलता → 1925 में सी. आर. दास की मृत्यु → पार्टी का क्रमिक पतन।