अकबर (1556–1605 ई.)
द्वितीय पानीपत से साम्राज्य विस्तार, मनसबदारी, राजस्व, धार्मिक नीति, कला और स्थापत्य तक
अकबर का परिचय
जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर मुगल साम्राज्य का तीसरा सम्राट था। उसने 1556 से 1605 ई. तक शासन किया। उसके शासनकाल में मुगल साम्राज्य का व्यापक विस्तार हुआ और प्रशासन, मनसबदारी, भूमि-राजस्व, राजपूत नीति, धार्मिक सहिष्णुता, अनुवाद, चित्रकला तथा स्थापत्य में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। अकबर के प्रारंभिक शासन में बैरम खाँ की भूमिका निर्णायक रही, जबकि बाद के वर्षों में अबुल फजल, टोडरमल, मान सिंह, तानसेन और अनेक अन्य व्यक्तियों ने उसके दरबार को विशिष्ट बनाया।
जन्म और राज्याभिषेक
Birth & Coronation
अकबर का जन्म 15 अक्टूबर 1542 ई. को अमरकोट/उमरकोट में हुआ। उसकी माता हमीदा बानो बेगम थीं। हुमायूँ उस समय निर्वासन में था और अमरकोट के स्थानीय राजपूत शासक ने उसे आश्रय दिया था। अलग स्रोत उस शासक का नाम राणा प्रसाद/वीरसाल जैसे रूपों में देते हैं, इसलिए केवल एक नाम को निर्विवाद मानना उचित नहीं है।
अकबर का पूरा शाही नाम जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर था। “बचपन का नाम केवल जलाल था” कहना अधिक सरल है; जलालुद्दीन उसके नाम का अंग था।
हुमायूँ की मृत्यु के बाद अकबर का राज्याभिषेक 14 फरवरी 1556 ई. को पंजाब के कलानौर में हुआ। उस समय वह लगभग 13 वर्ष का था।
शिक्षा और व्यक्तित्व
Education & Personality
अकबर ने औपचारिक रूप से बहुत अधिक पुस्तक-आधारित शिक्षा नहीं प्राप्त की, लेकिन उसे इतिहास, धर्म, दर्शन, कला, सैन्य संगठन और प्रशासन में गहरी रुचि थी। वह विद्वानों के वाचन और चर्चाओं को ध्यान से सुनता था।
अब्दुल लतीफ क़ज़वीनी/ईरानी को अकबर के शिक्षकों में गिना जाता है। इसलिए आपके मूल बिंदु—“अकबर का शिक्षक अब्दुल लतीफ ईरानी विद्वान था”—का मूल आशय सही है, पर उसे अकबर का अकेला शिक्षक समझना उचित नहीं है।
शाही उपाधि और बैरम खाँ
Bairam Khan as Regent
अकबर ने शाही दस्तावेजों और सिक्कों में जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर बादशाह गाजी जैसे राजकीय नामों और उपाधियों का प्रयोग किया। “गाजी” विजयी इस्लामी शासक की प्रतिष्ठित उपाधि थी।
अकबर के अल्पायु होने के कारण बैरम खाँ ने 1556 से 1560 ई. तक उसके संरक्षक और प्रमुख रीजेंट के रूप में शासन संभाला। बैरम खाँ को खान-ए-खाना की उपाधि भी मिली थी।
पानीपत का द्वितीय युद्ध
5 November 1556
5 नवंबर 1556 ई. को पानीपत का द्वितीय युद्ध मुगल सेना और हेमू/हेमचंद्र विक्रमादित्य की सेना के बीच हुआ। हेमू आदिल शाह सूरी का शक्तिशाली सेनापति और वजीर था और उसने युद्ध से कुछ समय पहले दिल्ली पर अधिकार कर लिया था।
युद्ध के दौरान हेमू की आँख में तीर लगने से वह गंभीर रूप से घायल हुआ और उसकी सेना का संगठन टूट गया। अंततः मुगल सेना विजयी हुई। इस विजय ने दिल्ली और आगरा पर अकबर की सत्ता पुनः स्थापित करने तथा मुगल साम्राज्य को आगे विस्तार देने की नींव मजबूत की।
🎯 Exam Point
पानीपत II — 5 नवंबर 1556 — अकबर की मुगल सेना बनाम हेमू — मुगल विजय।
बैरम खाँ का पतन और मृत्यु
1560–1561 CE
1560 ई. में अकबर ने स्वयं शासन की बागडोर संभालने का निर्णय लिया और बैरम खाँ को पद छोड़ने का आदेश दिया। कुछ समय विद्रोह के बाद बैरम खाँ ने आत्मसमर्पण किया और मक्का की यात्रा पर जाने की अनुमति प्राप्त की।
31 जनवरी 1561 ई. को गुजरात के पाटन के निकट बैरम खाँ की हत्या मुबारक खाँ लोहानी ने कर दी। हत्या व्यक्तिगत प्रतिशोध से जुड़ी मानी जाती है।
साम्राज्य विस्तार
Expansion of the Mughal Empire
अकबर ने मालवा, गोंडवाना, गुजरात, बंगाल, बिहार, कश्मीर, सिंध, कंधार और उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों तक मुगल सत्ता का विस्तार किया। उसके शासनकाल के अंतिम चरण में दक्कन के कुछ भाग भी मुगल प्रभाव में आए।
1561 ई. में मालवा, 1572–73 ई. में गुजरात और 1574–76 ई. में बंगाल-बिहार के अभियानों ने साम्राज्य के विस्तार में बड़ी भूमिका निभाई।
राजपूत नीति
Rajput Policy
अकबर ने अनेक राजपूत राज्यों के साथ युद्ध के बजाय मैत्री, वैवाहिक संबंध और प्रशासन में भागीदारी की नीति अपनाई। आमेर के शासक भारमल के परिवार से वैवाहिक संबंध के बाद कछवाहा राजपूत मुगल प्रशासन और सेना में प्रमुख स्थान पर पहुँचे।
राजा भगवान दास और राजा मान सिंह अकबर के प्रमुख राजपूत सहयोगियों में थे। हालाँकि मेवाड़ जैसे कुछ राज्यों ने मुगल अधीनता स्वीकार नहीं की और लंबे समय तक प्रतिरोध जारी रखा।
हल्दीघाटी का युद्ध
18 June 1576
18 जून 1576 ई. को मेवाड़ के शासक महाराणा प्रताप और मुगल सेना के बीच हल्दीघाटी का प्रसिद्ध युद्ध हुआ। अकबर स्वयं युद्धभूमि में उपस्थित नहीं था। मुगल सेना का मुख्य नेतृत्व राजा मान सिंह कछवाहा ने किया और आसफ खाँ भी प्रमुख मुगल अधिकारियों में था।
युद्ध के बाद मुगल सेना ने युद्धक्षेत्र पर नियंत्रण बनाए रखा, लेकिन महाराणा प्रताप सुरक्षित निकल गए और उनका प्रतिरोध समाप्त नहीं हुआ। इसलिए इसे सीधे “अकबर ने महाराणा प्रताप को पूरी तरह पराजित कर मेवाड़ जीत लिया” कहना सही नहीं है। मुगलों को तत्काल सामरिक लाभ मिला, पर प्रताप ने बाद में मेवाड़ के बड़े भाग पर पुनः नियंत्रण स्थापित कर लिया।
🎯 High Yield
हल्दीघाटी — 1576 — महाराणा प्रताप बनाम मुगल सेना — मुगल नेतृत्व: राजा मान सिंह।
महाराणा प्रताप, चेतक और रामप्रसाद
Mewar Resistance
महाराणा प्रताप का प्रसिद्ध घोड़ा चेतक था, “चेतन” नहीं। उनके हाथी का नाम रामप्रसाद परंपरागत विवरणों में मिलता है। हल्दीघाटी के बाद महाराणा प्रताप ने अरावली क्षेत्र से संघर्ष जारी रखा और धीरे-धीरे मेवाड़ के अनेक हिस्सों पर पुनः अधिकार किया।
महाराणा प्रताप की मृत्यु 19 जनवरी 1597 ई. को हुई। कठोर धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाते समय लगी अंदरूनी चोट से मृत्यु की कथा लोकप्रिय परंपरा में मिलती है, लेकिन मृत्यु के सटीक चिकित्सकीय कारण का समकालीन निर्णायक प्रमाण सीमित है।
तीर्थ-कर, जजिया और दासता से जुड़े सुधार
Early Social-Religious Measures
अकबर ने 1560 के दशक में ऐसी कई नीतियाँ अपनाईं जिनसे गैर-मुस्लिम प्रजा के प्रति राज्य की नीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया।
1562 ई. में युद्धबंदियों और उनके परिवारों को दास बनाने तथा जबरन धर्मांतरण की प्रथा पर रोक लगाने का आदेश उससे जोड़ा जाता है।
1563 ई. में उसने हिंदू तीर्थयात्रियों पर लगाया जाने वाला तीर्थ-कर समाप्त किया। आपके मूल नोट में 1562 दिया गया था; सुरक्षित परीक्षा तिथि 1563 है।
1564 ई. में अकबर ने जजिया कर समाप्त किया। आपके मूल नोट में 1563 दिया गया था।
📗 क्रम
1562 — युद्धबंदी-दासता/जबरन धर्मांतरण पर रोक | 1563 — तीर्थ-कर समाप्त | 1564 — जजिया समाप्त।
इबादतखाना
Ibadat Khana — 1575 CE
अकबर ने 1575 ई. में फतेहपुर सीकरी में इबादतखाना बनवाया। प्रारंभ में यहाँ मुस्लिम विद्वानों के बीच धार्मिक चर्चा होती थी, लेकिन बाद में हिंदू, जैन, ईसाई, पारसी और अन्य धार्मिक परंपराओं के विद्वानों को भी चर्चा के लिए बुलाया गया।
इन संवादों ने अकबर की धार्मिक सोच को अधिक व्यापक बनाया और आगे उसकी सुलह-ए-कुल की नीति से संबंध स्थापित किया।
महजर और सुलह-ए-कुल
Mahzar & Universal Peace
1579 ई. में जारी महजर ने धार्मिक विवादों में सम्राट की भूमिका को मजबूत किया। इसका अर्थ यह नहीं था कि अकबर ने स्वयं को नया पैगंबर घोषित कर दिया; बल्कि योग्य धार्मिक व्याख्याओं में मतभेद होने पर शासक को राज्यहित में चयन का अधिकार दिया गया।
अकबर की शासन-दृष्टि में सुलह-ए-कुल अर्थात “सर्वजन के साथ शांति/सार्वभौमिक सहिष्णुता” का सिद्धांत महत्वपूर्ण था। प्रशासन में व्यक्ति की धार्मिक पहचान की अपेक्षा निष्ठा और योग्यता को अधिक महत्व देने की दिशा में यह एक व्यापक राजनीतिक विचार था।
दीन-ए-इलाही / तौहीद-ए-इलाही
1582 CE
लगभग 1582 ई. में अकबर ने चुनिंदा निकट सहयोगियों के लिए एक नैतिक-आध्यात्मिक अनुशासन विकसित किया, जिसे बाद के साहित्य में दीन-ए-इलाही और समकालीन संदर्भ में तौहीद-ए-इलाही से जोड़ा गया।
इसे संगठित जनधर्म की तरह समझना सही नहीं है। इसका कोई व्यापक धर्मग्रंथ, जनसंगठन या अलग पुरोहित वर्ग नहीं था। इसलिए “अकबर इसका प्रधान पुरोहित था” कहना सही नहीं है। अकबर इसका केंद्रीय प्रेरक था।
बीरबल इसके कुछ ज्ञात हिंदू अनुयायियों में सबसे प्रसिद्ध था। उसे “दीन-ए-इलाही स्वीकार करने वाला प्रथम और अंतिम हिंदू शासक” कहना गलत है—बीरबल स्वयं कोई स्वतंत्र राजा नहीं, बल्कि अकबर का उच्च दरबारी और मनसबदार था।
मनसबदारी प्रथा
Mansabdari System
अकबर की प्रशासनिक व्यवस्था की प्रमुख विशेषताओं में मनसबदारी प्रथा थी। प्रत्येक उच्च अधिकारी को एक मनसब अर्थात पद/रैंक दिया जाता था। यह उसकी प्रशासनिक प्रतिष्ठा, वेतन और सैन्य दायित्व से जुड़ा होता था।
बाद में मनसब के दो महत्वपूर्ण घटक जात और सवार बने। जात व्यक्ति की व्यक्तिगत रैंक और वेतन से जुड़ा था, जबकि सवार उसके द्वारा रखे जाने वाले घुड़सवारों की संख्या से संबंधित था।
मनसबदारों में तुर्क, ईरानी, अफगान, भारतीय मुसलमान और राजपूत सहित विभिन्न समूह शामिल थे। इस प्रणाली ने मुगल सैन्य और नागरिक प्रशासन को एकीकृत करने में बड़ी भूमिका निभाई।
जब्ती और दहसाला व्यवस्था
Revenue Administration
अकबर के शासनकाल में भूमि-राजस्व प्राप्ति के लिए जब्ती प्रणाली महत्वपूर्ण थी। भूमि की माप, फसल की उत्पादकता और औसत कीमत के आधार पर राज्य की मांग तय की जाती थी।
अकबर के वित्तीय प्रशासन से जुड़े प्रसिद्ध अधिकारी राजा टोडरमल ने 1580 ई. के आसपास दहसाला या दस-वर्षीय बंदोबस्त को व्यवस्थित रूप दिया। इसमें पिछले दस वर्षों की औसत उपज और कीमतों के आधार पर नकद राजस्व दर निर्धारित की जाती थी।
भूमि को उत्पादकता और खेती की निरंतरता के आधार पर पोलज, परौती, चाचर और बंजर जैसी श्रेणियों में भी वर्गीकृत किया गया।
🎯 Exam Point
टोडरमल — दहसाला/दस-वर्षीय बंदोबस्त — जब्ती प्रणाली।
गुजरात विजय
1572–1573 CE
अकबर ने 1572–1573 ई. में गुजरात पर विजय प्राप्त की। गुजरात के बंदरगाहों और समुद्री व्यापार ने मुगल साम्राज्य को हिंद महासागर के व्यापारिक संसार से सीधे जोड़ा।
गुजरात अभियान के दौरान अकबर का पुर्तगालियों से प्रत्यक्ष संपर्क हुआ और उसने पश्चिमी समुद्री तट तथा समुद्र को निकट से देखा। “जीवन में पहली बार समुद्र देखा” जैसी पंक्ति सामान्य इतिहास-GK में मिलती है, लेकिन इसे अत्यधिक निश्चित व्यक्तिगत तथ्य के रूप में नहीं लिखना चाहिए।
गुजरात में विद्रोह की सूचना पर अकबर ने फतेहपुर सीकरी से अत्यंत तीव्र गति से अभियान किया। इतिहासकार विन्सेंट ए. स्मिथ ने इस तेज अभियान की विशेष प्रशंसा की है; सामान्य GK में इसे इतिहास के अत्यंत द्रुतगामी अभियानों में गिना जाता है।
फतेहपुर सीकरी और इलाही संवत
Capital & Calendar
अकबर ने सूफी संत शेख सलीम चिश्ती से जुड़े सीकरी क्षेत्र को विकसित कर फतेहपुर सीकरी नामक विशाल शाही नगर बनाया। लगभग 1571 ई. से यह उसका प्रमुख शाही केंद्र और कुछ समय के लिए राजधानी बना।
इलाही संवत/तारीख-ए-इलाही अकबर ने 1584 ई. में शुरू कराया, लेकिन इसकी गणना उसके राज्यारोहण वर्ष 1556 से की गई। इसलिए आपके मूल नोट का “1583” सुरक्षित तिथि नहीं है।
शेख सलीम चिश्ती
Contemporary Sufi Saint
प्रसिद्ध चिश्ती सूफी संत शेख सलीम चिश्ती अकबर के समकालीन थे और सीकरी में रहते थे। अकबर उनके प्रति गहरी श्रद्धा रखता था।
अकबर के पुत्र सलीम—जो आगे चलकर जहाँगीर बना—का नाम भी शेख सलीम चिश्ती के सम्मान में रखा गया माना जाता है। फतेहपुर सीकरी में उनका संगमरमर का मकबरा मुगल स्थापत्य का प्रसिद्ध स्मारक है।
तानसेन
Music at Akbar’s Court
अकबर के दरबार का सबसे प्रसिद्ध संगीतज्ञ तानसेन था। उसका संबंध ग्वालियर की संगीत परंपरा और संत-संगीतज्ञ स्वामी हरिदास से जोड़ा जाता है।
तानसेन के जन्म-वर्ष के रूप में 1500 या लगभग 1506 ई. जैसी अलग तिथियाँ मिलती हैं; इसलिए 1506 को निर्विवाद तिथि नहीं माना जाना चाहिए। उसके मूल नाम के रूप में रामतनु पांडे/मिश्र जैसे रूप लोकप्रिय परंपरा में मिलते हैं, पर इनके विवरण भी एकरूप नहीं हैं।
अकबर ने उसे अत्यंत सम्मान दिया और वह दरबार की संगीत संस्कृति का प्रमुख नाम बना।
स्वामी हरिदास
Bhakti & Music Tradition
स्वामी हरिदास अकबर-काल के महान भक्त-संत और संगीतज्ञ थे। वे वृंदावन की कृष्ण-भक्ति परंपरा से जुड़े थे और उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।
तानसेन को उनका शिष्य माना जाने की प्रसिद्ध परंपरा है। इसलिए अकबर-काल की संगीत संस्कृति में तानसेन और स्वामी हरिदास दोनों के नाम महत्वपूर्ण हैं, यद्यपि हरिदास अकबर के नियमित दरबारी संगीतज्ञ नहीं थे।
बीरबल की मृत्यु
Yusufzai Campaign — 1586 CE
अकबर के प्रसिद्ध दरबारी राजा बीरबल का वास्तविक नाम महेश दास था। वह साहित्यिक प्रतिभा, हास्य-बुद्धि और अकबर के निकट सहयोगी के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
1586 ई. में उत्तर-पश्चिमी सीमा पर यूसुफजई अफगानों के विरुद्ध अभियान के दौरान बीरबल मारा गया। यह घटना अकबर के लिए व्यक्तिगत रूप से भी बहुत दुखद मानी जाती है।
अबुल फजल
Historian & Court Intellectual
अबुल फजल अकबर का प्रमुख दरबारी विद्वान, इतिहासकार और राजनीतिक विचारक था। उसने अकबरनामा की रचना की। इसका तीसरा भाग आइने-अकबरी कहलाता है, जिसमें मुगल प्रशासन, राजस्व, सेना, दरबार, प्रांतों और समाज से संबंधित विस्तृत जानकारी मिलती है।
अबुल फजल अकबर की धार्मिक और राजनीतिक सोच का निकट सहयोगी था, लेकिन उसे “दीन-ए-इलाही का मुख्य पुरोहित” कहना सही नहीं है, क्योंकि दीन-ए-इलाही का कोई औपचारिक पुरोहित वर्ग नहीं था।
1602 ई. में शहजादा सलीम (भविष्य का जहाँगीर) के निर्देश पर बुंदेला सरदार वीर सिंह देव बुंदेला ने दक्षिण से लौटते समय अबुल फजल की हत्या कर दी।
अनुवाद विभाग
Maktab Khana
अकबर ने फतेहपुर सीकरी में संस्कृत और अन्य भारतीय ग्रंथों का फारसी में अनुवाद कराने के लिए एक अनुवाद विभाग/मकतबखाना स्थापित किया। इसका उद्देश्य विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को फारसी-भाषी मुगल दरबार तक पहुँचाना था।
महाभारत का फारसी अनुवाद रज्मनामा अर्थात “युद्धों की पुस्तक” नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस परियोजना में नकीब खाँ, अब्दुल कादिर बदायूँनी और अन्य विद्वानों ने भाग लिया।
रामायण का फारसी अनुवाद भी अकबर के संरक्षण में हुआ और इसमें बदायूँनी सहित कई विद्वानों की भूमिका रही। इसलिए रामायण और महाभारत दोनों के लिए बिल्कुल वही तीन अनुवादक लिख देना उचित नहीं है; अलग परियोजनाओं में विद्वानों की भूमिकाएँ भिन्न थीं।
पंचतंत्र का फारसी रूप
Anvar-i-Suhayli / Iyar-i-Danish
आपके मूल नोट में “पंचतंत्र का फारसी अनुवाद अबुल फजल ने अनवर-ए-सादात नाम से किया” लिखा था। यह सही नहीं है। पंचतंत्र की कथा-परंपरा फारसी में अकबर से पहले भी उपलब्ध थी और अनवार-ए-सुहैली हुसैन वाइज़ काशिफी की पूर्ववर्ती फारसी रचना थी।
अकबर के दरबार में अबुल फजल ने इसी कथा-परंपरा का सरल फारसी रूप ‘इयार-ए-दानिश’ (Iyar-i-Danish) तैयार किया। इसलिए परीक्षा में अबुल फजल — इयार-ए-दानिश याद करना अधिक सही है।
चित्रकला
Mughal Painting
अकबर के शासनकाल में मुगल चित्रकला ने तेज विकास किया। फारसी चित्रकला परंपरा और भारतीय कलाकारों की शैली के मेल से एक विशिष्ट मुगल शैली विकसित हुई।
अब्दुस्समद अकबर के दरबार के प्रमुख चित्रकार और चित्रशाला से जुड़े वरिष्ठ कलाकारों में था। मीर सैयद अली, दशवंत, बसावन आदि भी प्रसिद्ध चित्रकार थे।
हमज़ानामा, अकबरनामा, रज्मनामा जैसी पांडुलिपियों के चित्रण ने अकबर-कालीन चित्रकला को विशेष प्रसिद्धि दी।
अकबरकालीन स्थापत्य
Architecture
अकबर के समय मुगल स्थापत्य में लाल बलुआ पत्थर, भारतीय स्तंभ-बीम परंपरा, मेहराब और इस्लामी स्थापत्य तत्वों का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
उससे जुड़े प्रमुख निर्माणों में आगरा किला, फतेहपुर सीकरी का शाही परिसर, दीवान-ए-खास, पंचमहल, बुलंद दरवाजा, इबादतखाना, इलाहाबाद किला और लाहौर किला शामिल हैं।
फतेहपुर सीकरी में लोकप्रिय रूप से “जोधाबाई का महल” कहलाने वाली इमारत भी है, लेकिन यह आधुनिक प्रचलित नाम है; उसकी मूल ऐतिहासिक पहचान पर विद्वानों में चर्चा है।
हुमायूँ का मकबरा अकबर के शासनकाल में बना, लेकिन इसे सीधे “अकबर ने बनवाया” कहना सही नहीं है। इसका निर्माण हुमायूँ की पत्नी बेगा बेगम/हाजी बेगम की पहल और संरक्षण में कराया गया।
बुलंद दरवाजा
Fatehpur Sikri
फतेहपुर सीकरी का बुलंद दरवाजा अकबर की गुजरात विजय की स्मृति से जोड़ा जाता है। यह जामा मस्जिद परिसर का विशाल प्रवेश-द्वार है और मुगल स्थापत्य का प्रसिद्ध उदाहरण है।
इसके निर्माण की सटीक तिथि के लिए अलग स्रोत 1570 के दशक से 1601–02 तक की तिथियाँ देते हैं; इसलिए परीक्षा में सुरक्षित तथ्य है—बुलंद दरवाजा — अकबर — फतेहपुर सीकरी — गुजरात विजय की स्मृति।
हिंदी साहित्य और राजकीय भाषा
Language & Literature
अकबर के काल में हिंदी और ब्रजभाषा साहित्य का उल्लेखनीय विकास हुआ। तुलसीदास, सूरदास, रहीम, रसखान जैसे महान साहित्यकार व्यापक रूप से इसी 16वीं शताब्दी के सांस्कृतिक वातावरण से जुड़े हैं। इसी कारण सामान्य साहित्यिक इतिहास में अकबर के युग को हिंदी साहित्य, विशेषकर भक्ति काव्य, के उत्कर्ष कालों में गिना जाता है।
हालाँकि “अकबर का पूरा काल ही हिंदी साहित्य का एकमात्र स्वर्णकाल था” एक व्यापक साहित्यिक मूल्यांकन है, न कि कठोर राजनीतिक तथ्य।
मुगल साम्राज्य की प्रमुख राजकीय और प्रशासनिक भाषा फारसी थी। दरबार, इतिहास-लेखन और उच्च प्रशासन में फारसी का व्यापक उपयोग होता था।
चारबाग परंपरा
Important Correction
चारबाग शैली में बगीचे को जल-नालियों और मार्गों द्वारा चार प्रमुख भागों में विभाजित किया जाता था। यह फारसी-मध्य एशियाई उद्यान परंपरा से जुड़ी थी।
आपके मूल नोट में “चारबाग बनाने की परंपरा अकबर के समय शुरू हुई” लिखा था। भारत में मुगल चारबाग परंपरा का आरंभ बाबर के समय से ही दिखाई देता है। अकबर और उसके उत्तराधिकारियों ने इस उद्यान परंपरा को आगे विकसित किया।
अकबर की मृत्यु
27 October 1605
अकबर की मृत्यु 27 अक्टूबर 1605 ई. को आगरा में हुई। आपके मूल नोट में 16 अक्टूबर 1605 दिया गया था, जो मानक तिथि नहीं है।
उसे आगरा के निकट सिकंदरा में दफनाया गया। उसके मकबरे का निर्माण अकबर ने अपने जीवनकाल में शुरू कराया था और बाद में उसके पुत्र जहाँगीर ने उसे पूरा कराया।
अकबर के बाद उसका पुत्र सलीम जहाँगीर की उपाधि के साथ मुगल सिंहासन पर बैठा।
प्रमुख तथ्य — एक नज़र में
Facts at a Glance
| वर्ष/तथ्य | घटना |
|---|---|
| 1542 | अमरकोट में जन्म |
| 1556 | कलानौर में राज्याभिषेक; द्वितीय पानीपत युद्ध |
| 1556–1560 | बैरम खाँ का संरक्षक काल |
| 1563 | तीर्थ-कर समाप्त |
| 1564 | जजिया समाप्त |
| 1571 | फतेहपुर सीकरी प्रमुख शाही केंद्र |
| 1575 | इबादतखाना |
| 1576 | हल्दीघाटी का युद्ध |
| 1579 | महजर |
| 1580 | दहसाला व्यवस्था का संगठन |
| 1582 | तौहीद-ए-इलाही/दीन-ए-इलाही से जुड़ा चरण |
| 1584 | इलाही संवत की शुरुआत |
| 1605 | अकबर की मृत्यु; जहाँगीर उत्तराधिकारी |
Quick Revision
SSC / Railway Rapid Recall
⚡ त्वरित रिविजन
⚡ Final Revision Points
अकबर का जन्म 15 अक्टूबर 1542 को अमरकोट में हमीदा बानो बेगम से हुआ और उसका राज्याभिषेक 14 फरवरी 1556 को कलानौर में हुआ।
अब्दुल लतीफ उसके शिक्षकों में था; बैरम खाँ 1556–1560 तक उसका संरक्षक और रीजेंट रहा।
5 नवंबर 1556 के द्वितीय पानीपत युद्ध में मुगल सेना ने हेमू को पराजित किया।
31 जनवरी 1561 को पाटन में मुबारक खाँ लोहानी ने बैरम खाँ की हत्या कर दी।
18 जून 1576 के हल्दीघाटी युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व राजा मान सिंह ने किया; अकबर स्वयं युद्धक्षेत्र में नहीं था। मुगलों को सामरिक बढ़त मिली, लेकिन महाराणा प्रताप का संघर्ष समाप्त नहीं हुआ।
महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक था और हाथी रामप्रसाद कहलाता था। उनकी मृत्यु 19 जनवरी 1597 को हुई।
अकबर ने 1563 में तीर्थ-कर और 1564 में जजिया समाप्त किया।
दीन-ए-इलाही कोई व्यापक संगठित नया धर्म नहीं था; अकबर उसका प्रेरक था, “प्रधान पुरोहित” नहीं। बीरबल उसके प्रसिद्ध अनुयायियों में था, लेकिन वह कोई स्वतंत्र हिंदू शासक नहीं था।
अकबर के प्रशासन की प्रमुख विशेषताएँ मनसबदारी, जब्ती और टोडरमल की दहसाला व्यवस्था थीं।
गुजरात विजय के दौरान मुगल सत्ता का पश्चिमी समुद्री व्यापार और पुर्तगालियों से सीधा संपर्क बढ़ा।
अकबर ने 1575 में इबादतखाना बनवाया; 1579 में महजर और आगे सुलह-ए-कुल की नीति उसकी धार्मिक-राजनीतिक सोच से जुड़ी रही।
इलाही संवत 1584 में प्रारंभ हुआ और उसकी गणना 1556 से की गई।
तानसेन अकबर का प्रसिद्ध संगीतज्ञ था; स्वामी हरिदास महान भक्त-संगीतज्ञ थे। तानसेन की 1506 जन्म-तिथि और रामतनु पांडे नाम लोकप्रिय परंपरा में मिलते हैं, लेकिन दोनों पूरी तरह निर्विवाद नहीं हैं।
बीरबल 1586 में यूसुफजई अभियान में मारा गया और 1602 में वीर सिंह देव बुंदेला ने शहजादा सलीम के निर्देश पर अबुल फजल की हत्या कर दी।
अबुल फजल — अकबरनामा/आइने-अकबरी; महाभारत का फारसी अनुवाद — रज्मनामा; अबुल फजल ने पंचतंत्र-परंपरा का इयार-ए-दानिश तैयार किया।
अकबर-कालीन प्रमुख स्थापत्य में आगरा किला, फतेहपुर सीकरी, दीवान-ए-खास, पंचमहल, बुलंद दरवाजा, इलाहाबाद किला और लाहौर किला शामिल हैं। हुमायूँ का मकबरा अकबर के काल में बना, लेकिन हाजी बेगम/बेगा बेगम के संरक्षण में।
भारत में मुगल चारबाग परंपरा बाबर से शुरू हुई; अकबर ने इसे आगे विकसित किया। मुगल प्रशासन की प्रमुख राजकीय भाषा फारसी थी।
अकबर की मृत्यु 27 अक्टूबर 1605 को हुई और उसे सिकंदरा में दफनाया गया। उसके बाद जहाँगीर सिंहासन पर बैठा।