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आर्थिक भूगोल
ECONOMIC GEOGRAPHY

आर्थिक भूगोल

संसाधन, कृषि, खनिज, ऊर्जा, उद्योग, परिवहन और व्यापार

आर्थिक भूगोल क्या है?

आर्थिक भूगोल मानव की आर्थिक गतिविधियों तथा उनके भौगोलिक वितरण का अध्ययन करता है। इसमें यह समझा जाता है कि किसी क्षेत्र में कृषि, खनन, उद्योग, परिवहन, व्यापार अथवा सेवाओं का विकास क्यों हुआ और उनके स्थान निर्धारण पर प्राकृतिक तथा मानवीय कारकों का क्या प्रभाव पड़ता है।

जलवायु, मिट्टी, स्थलरूप, जल, वन और खनिज जैसे प्राकृतिक तत्वों के साथ जनसंख्या, श्रम, पूँजी, तकनीक, परिवहन, बाजार और सरकारी नीतियाँ आर्थिक गतिविधियों के वितरण को प्रभावित करती हैं।

इस प्रकार आर्थिक भूगोल का मुख्य उद्देश्य केवल यह जानना नहीं है कि कोई वस्तु कहाँ उत्पन्न होती है, बल्कि यह भी समझना है कि वह वहीं क्यों उत्पन्न होती है और उसका अन्य क्षेत्रों से आर्थिक संबंध कैसे बनता है।

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आर्थिक क्रियाओं का वर्गीकरण

उत्पादन से सेवा तक

मानव द्वारा आजीविका कमाने, वस्तुओं का उत्पादन करने और सेवाएँ प्रदान करने के लिए की जाने वाली गतिविधियों को आर्थिक क्रियाएँ कहा जाता है।

आर्थिक गतिविधियों को सामान्यतः प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक, चतुर्थक और पंचमक क्रियाओं में समझा जाता है।

आर्थिक क्रिया मुख्य कार्य उदाहरण
प्राथमिक प्रकृति से सीधे संसाधन प्राप्त करना कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन, वानिकी, खनन
द्वितीयक कच्चे माल को तैयार वस्तु में बदलना उद्योग, विनिर्माण, निर्माण
तृतीयक सेवाएँ प्रदान करना व्यापार, परिवहन, बैंकिंग, पर्यटन, संचार
चतुर्थक ज्ञान और सूचना आधारित सेवाएँ अनुसंधान, सूचना प्रौद्योगिकी, परामर्श
पंचमक उच्च स्तरीय निर्णय और विशेषज्ञ सेवाएँ उच्च प्रशासन, नीति निर्माण, शीर्ष प्रबंधन
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संसाधन

आर्थिक विकास का आधार

पर्यावरण में उपलब्ध वह वस्तु, तत्व या क्षमता जिसका मानव उपयोग कर सकता है और जो आर्थिक अथवा सामाजिक आवश्यकता पूरी करती है, संसाधन कहलाती है।

किसी वस्तु का केवल प्रकृति में उपस्थित होना पर्याप्त नहीं है। उसे संसाधन बनाने में मानवीय ज्ञान, तकनीक, आर्थिक उपयोगिता और उपलब्धता महत्वपूर्ण होती है।

संसाधनों को उत्पत्ति के आधार पर जैव और अजैव, समाप्त होने की क्षमता के आधार पर नवीकरणीय और अनवीकरणीय तथा स्वामित्व के आधार पर व्यक्तिगत, सामुदायिक, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है।

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नवीकरणीय और अनवीकरणीय संसाधन

प्रकृति में पुनः बनने की क्षमता

प्रकार विशेषता उदाहरण
नवीकरणीय संसाधन उचित उपयोग के साथ प्राकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा पुनः उपलब्ध हो सकते हैं सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल, जैव संसाधन
अनवीकरणीय संसाधन निर्माण में अत्यधिक समय लगता है और मानव समयमान पर सीमित हैं कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, धात्विक खनिज
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कृषि

विश्व की प्रमुख प्राथमिक आर्थिक क्रिया

भूमि पर फसल उगाने तथा उससे संबंधित गतिविधियों को व्यापक रूप से कृषि कहा जाता है। पशुपालन, बागवानी और कई अन्य ग्रामीण गतिविधियाँ भी कृषि अर्थव्यवस्था से जुड़ी होती हैं।

कृषि का स्वरूप मुख्यतः तापमान, वर्षा, मिट्टी, स्थलाकृति, सिंचाई, श्रम, पूँजी, बाजार और तकनीक से निर्धारित होता है।

विश्व के विभिन्न भागों में प्राकृतिक तथा सामाजिक परिस्थितियों में अंतर के कारण कृषि की पद्धतियाँ भी अलग-अलग हैं।

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निर्वाह कृषि

परिवार की आवश्यकता केंद्रित उत्पादन

जब कृषि का मुख्य उद्देश्य किसान और उसके परिवार की खाद्य आवश्यकता पूरी करना होता है, तो इसे निर्वाह कृषि कहा जाता है।

इसमें खेतों का आकार सामान्यतः छोटा, पूँजी निवेश कम और स्थानीय श्रम का उपयोग अधिक हो सकता है।

मानसून एशिया के अनेक घनी आबादी वाले क्षेत्रों में गहन निर्वाह कृषि का विकास हुआ है।

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स्थानांतरणशील कृषि

वन क्षेत्र में परंपरागत कृषि

स्थानांतरणशील कृषि में वन या झाड़ी वाले छोटे भूभाग को साफ कर कुछ वर्षों तक खेती की जाती है। मिट्टी की उर्वरता घटने पर उस भूमि को छोड़कर दूसरा क्षेत्र चुना जाता है।

इसे कई क्षेत्रों में काटो और जलाओ कृषि के रूप में जाना जाता है।

भारत के उत्तर-पूर्वी भाग में इसे सामान्यतः झूम कृषि कहा जाता है।

विश्व के विभिन्न भागों में इसके स्थानीय नाम अलग-अलग हैं।

🎯 परीक्षा बिंदु

उत्तर-पूर्व भारत — झूम कृषि।

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बागान कृषि

विशिष्ट वाणिज्यिक फसल उत्पादन

बड़े खेतों या बागानों में बाजार के लिए एक या कुछ विशेष नकदी फसलों की वैज्ञानिक और संगठित खेती को बागान कृषि कहा जाता है।

इसमें बड़ी पूँजी, श्रम, प्रसंस्करण, परिवहन और बाजार की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

चाय, कॉफी, रबर, कोको, केला और गन्ने की कुछ वाणिज्यिक कृषि प्रणालियाँ बागान कृषि से संबंधित हैं।

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वाणिज्यिक अनाज कृषि

विशाल खेत और यंत्रीकृत उत्पादन

विशाल खेतों में मशीनों की सहायता से बाजार के लिए बड़े पैमाने पर गेहूँ, मक्का जैसे अनाजों का उत्पादन वाणिज्यिक अनाज कृषि कहलाता है।

यह कृषि अपेक्षाकृत कम जनसंख्या घनत्व वाले समशीतोष्ण घासभूमि क्षेत्रों में विशेष रूप से विकसित हुई है।

उत्तरी अमेरिका के प्रेयरी, दक्षिण अमेरिका के पम्पास तथा यूरेशिया के स्टेपी क्षेत्रों के कुछ भाग वाणिज्यिक कृषि के लिए प्रसिद्ध हैं।

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मिश्रित कृषि

फसल उत्पादन और पशुपालन का संयोजन

जब एक ही कृषि प्रणाली में फसल उत्पादन के साथ पशुपालन भी किया जाता है, तो इसे मिश्रित कृषि कहा जाता है।

इसमें पशुओं से दूध, मांस और खाद प्राप्त होती है, जबकि कृषि से प्राप्त चारे और फसल अवशेषों का उपयोग पशुओं के लिए किया जा सकता है।

उत्तर-पश्चिमी यूरोप और अन्य विकसित समशीतोष्ण क्षेत्रों में मिश्रित कृषि महत्वपूर्ण है।

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भूमध्यसागरीय कृषि

फल, अंगूर और जैतून की विशिष्ट कृषि

भूमध्यसागरीय जलवायु वाले क्षेत्रों में विकसित कृषि को भूमध्यसागरीय कृषि कहा जाता है।

यहाँ गर्म और शुष्क ग्रीष्म ऋतु तथा हल्की और वर्षायुक्त शीत ऋतु होती है।

अंगूर, जैतून, संतरा, नींबू, अंजीर और अन्य फल इस कृषि की प्रमुख विशेषताएँ हैं।

भूमध्य सागर के आसपास के क्षेत्रों के अलावा कैलिफोर्निया, मध्य चिली, दक्षिण-पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका के केप क्षेत्र में भी भूमध्यसागरीय प्रकार की जलवायु मिलती है।

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प्रमुख खाद्यान्न फसलें

चावल, गेहूँ और मक्का

फसल अनुकूल दशाएँ प्रमुख क्षेत्र
चावल उच्च तापमान, पर्याप्त जल, समतल भूमि मानसूनी एशिया
गेहूँ ठंडी बढ़वार अवधि, पकते समय शुष्क और धूपयुक्त मौसम समशीतोष्ण एवं उपोष्ण क्षेत्रों के मैदान
मक्का गर्म मौसम, पर्याप्त नमी और उपजाऊ मिट्टी अमेरिका, एशिया, दक्षिण अमेरिका सहित अनेक क्षेत्र
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चावल

मानसूनी एशिया की प्रमुख खाद्यान्न फसल

चावल गर्म और आर्द्र जलवायु की प्रमुख खाद्यान्न फसल है। इसकी खेती के लिए बढ़वार अवधि में पर्याप्त तापमान और जल की आवश्यकता होती है।

समतल जलोढ़ मैदान, डेल्टा और सिंचित क्षेत्र इसकी खेती के लिए विशेष रूप से अनुकूल होते हैं।

मानसूनी एशिया विश्व का प्रमुख चावल उत्पादक और उपभोक्ता क्षेत्र है।

भारत में पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, पंजाब, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, छत्तीसगढ़, बिहार, असम और तमिलनाडु सहित अनेक राज्यों में चावल की खेती की जाती है।

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गेहूँ

समशीतोष्ण और उपोष्ण क्षेत्रों की प्रमुख फसल

गेहूँ विश्व की प्रमुख खाद्यान्न फसलों में से एक है। इसकी खेती के लिए बढ़वार के समय ठंडा मौसम तथा पकते समय अपेक्षाकृत शुष्क और साफ मौसम अनुकूल माना जाता है।

विशाल समतल मैदान और यंत्रीकृत कृषि वाले क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर गेहूँ का उत्पादन किया जाता है।

भारत में गेहूँ मुख्यतः रबी फसल है और उत्तर तथा मध्य भारत के सिंचित मैदान इसके प्रमुख उत्पादन क्षेत्र हैं।

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प्रमुख नकदी और पेय फसलें

कपास से कॉफी तक

फसल मुख्य आवश्यकता विशेष तथ्य
कपास गर्म जलवायु, लंबी पाला-मुक्त अवधि काली मिट्टी विशेष रूप से अनुकूल
जूट गर्म, आर्द्र जलवायु और जलोढ़ मिट्टी गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा महत्वपूर्ण
गन्ना गर्म जलवायु और पर्याप्त नमी चीनी उद्योग का प्रमुख कच्चा माल
चाय आर्द्र जलवायु, ढालदार भूमि, अम्लीय मिट्टी असम, दार्जिलिंग, दक्षिण भारत
कॉफी गर्म जलवायु, छायादार ढालें भारत में कर्नाटक प्रमुख क्षेत्र
रबर उच्च तापमान और भारी वर्षा आर्द्र उष्णकटिबंधीय क्षेत्र
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पशुपालन

कृषि अर्थव्यवस्था का प्रमुख अंग

पशुओं को दूध, मांस, ऊन, चमड़ा तथा अन्य उत्पाद प्राप्त करने के लिए पालने की आर्थिक क्रिया पशुपालन कहलाती है।

शुष्क और अर्ध-शुष्क घासभूमियों में विस्तृत पशुपालन तथा घनी आबादी और बाजार वाले क्षेत्रों में डेयरी पशुपालन अधिक विकसित हो सकता है।

प्रेयरी, पम्पास, स्टेपी, वेल्ड और ऑस्ट्रेलियाई घासभूमियाँ विश्व के महत्वपूर्ण पशुपालन क्षेत्रों से संबंधित हैं।

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मत्स्य पालन

समुद्री और अंतर्देशीय संसाधन

समुद्र, महासागर, नदियों, झीलों तथा कृत्रिम जलाशयों से मछली और अन्य जलीय जीवों का उत्पादन मत्स्य पालन कहलाता है।

उथले महाद्वीपीय मग्न तट, पोषक तत्वों से समृद्ध जल तथा गर्म और ठंडी समुद्री धाराओं के मिलने वाले क्षेत्र मत्स्य संसाधनों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

आधुनिक मत्स्य पालन में प्राकृतिक जल से मछली पकड़ने के साथ जलीय कृषि का भी अत्यधिक महत्व है।

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खनिज संसाधन

औद्योगिक विकास का आधार

प्राकृतिक रूप से प्राप्त निश्चित रासायनिक तथा भौतिक गुणों वाले पदार्थों को सामान्यतः खनिज कहा जाता है।

आर्थिक उपयोग के आधार पर खनिजों को धात्विक, अधात्विक और ऊर्जा खनिजों में समझा जा सकता है।

लौह अयस्क, मैंगनीज, ताँबा और बॉक्साइट धात्विक खनिजों के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं, जबकि अभ्रक, चूना पत्थर और जिप्सम अधात्विक खनिजों के उदाहरण हैं।

कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस महत्वपूर्ण पारंपरिक ऊर्जा संसाधन हैं।

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लौह अयस्क

लौह-इस्पात उद्योग का आधार

लौह अयस्क आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था का अत्यंत महत्वपूर्ण खनिज है क्योंकि इससे लोहा और इस्पात तैयार किया जाता है।

भारत में ओडिशा, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और झारखंड के अनेक क्षेत्र लौह अयस्क के लिए महत्वपूर्ण हैं।

लौह अयस्क आधारित इस्पात उद्योग परिवहन, मशीन निर्माण, भवन निर्माण, रेलवे, वाहन और रक्षा उद्योग सहित अनेक क्षेत्रों का आधार है।

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बॉक्साइट

एल्यूमिनियम का प्रमुख अयस्क

बॉक्साइट एल्यूमिनियम प्राप्त करने का प्रमुख अयस्क है।

एल्यूमिनियम हल्का, टिकाऊ और विद्युत का अच्छा चालक होने के कारण विमान, परिवहन, विद्युत, पैकेजिंग और निर्माण उद्योगों में उपयोगी है।

एल्यूमिनियम उत्पादन में बड़ी मात्रा में विद्युत ऊर्जा की आवश्यकता होती है, इसलिए बिजली की उपलब्धता इस उद्योग की अवस्थिति का महत्वपूर्ण कारक है।

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कोयला

औद्योगिक क्रांति का प्रमुख ऊर्जा स्रोत

कोयला जीवाश्म ईंधन है और लंबे समय तक विश्व के औद्योगिक विकास का प्रमुख ऊर्जा आधार रहा है।

कोयले का उपयोग ताप विद्युत उत्पादन, लौह-इस्पात उद्योग और अनेक औद्योगिक प्रक्रियाओं में किया जाता है।

कोयले की प्रमुख श्रेणियों को सामान्यतः कार्बन की मात्रा और परिपक्वता के आधार पर पीट, लिग्नाइट, बिटुमिनस और एन्थ्रासाइट के क्रम में समझा जाता है।

🎯 क्रम याद रखें

पीट → लिग्नाइट → बिटुमिनस → एन्थ्रासाइट

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भारत के प्रमुख कोयला क्षेत्र

दामोदर घाटी से गोदावरी तक

भारत के महत्वपूर्ण कोयला क्षेत्र मुख्यतः प्राचीन गोंडवाना शैल समूहों से संबंधित हैं।

झारखंड का झरिया उच्च गुणवत्ता वाले कोकिंग कोयले के लिए प्रसिद्ध है, जबकि बोकारो भी महत्वपूर्ण कोयला क्षेत्र है।

पश्चिम बंगाल का रानीगंज भारत के ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण कोयला क्षेत्रों में से एक है।

ओडिशा का तालचेर, छत्तीसगढ़ का कोरबा तथा तेलंगाना का सिंगरेनी क्षेत्र भी महत्वपूर्ण कोयला क्षेत्रों में गिने जाते हैं।

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पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस

आधुनिक ऊर्जा और पेट्रो-रसायन उद्योग

पेट्रोलियम तरल जीवाश्म ईंधन है, जिसका उपयोग परिवहन ईंधन, पेट्रो-रसायन, प्लास्टिक, सिंथेटिक पदार्थ और अनेक औद्योगिक उत्पादों के निर्माण में होता है।

प्राकृतिक गैस अपेक्षाकृत स्वच्छ जीवाश्म ईंधन है और इसका उपयोग बिजली उत्पादन, उर्वरक उद्योग, घरेलू ईंधन तथा औद्योगिक प्रक्रियाओं में किया जाता है।

भारत के प्रमुख पेट्रोलियम क्षेत्रों में असम, गुजरात, मुंबई अपतटीय क्षेत्र तथा कृष्णा-गोदावरी बेसिन सहित विभिन्न अवसादी बेसिन महत्वपूर्ण हैं।

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ऊर्जा संसाधन

परंपरागत और नवीकरणीय ऊर्जा

ऊर्जा स्रोत प्रकृति मुख्य विशेषता
कोयला अनवीकरणीय ताप विद्युत और उद्योग
पेट्रोलियम अनवीकरणीय परिवहन और पेट्रो-रसायन
प्राकृतिक गैस अनवीकरणीय ईंधन, विद्युत और उर्वरक
जलविद्युत नवीकरणीय बहते या गिरते जल की ऊर्जा
सौर ऊर्जा नवीकरणीय सूर्य से प्राप्त ऊर्जा
पवन ऊर्जा नवीकरणीय तेज और नियमित हवाओं से ऊर्जा
ज्वारीय ऊर्जा नवीकरणीय ज्वार और ज्वारीय धाराओं से ऊर्जा
भू-तापीय ऊर्जा नवीकरणीय पृथ्वी की आंतरिक ऊष्मा
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उद्योग

कच्चे माल से उपयोगी वस्तु का निर्माण

कच्चे माल को प्रसंस्करण द्वारा अधिक उपयोगी और मूल्यवान वस्तु में बदलने वाली आर्थिक गतिविधि उद्योग कहलाती है।

उद्योग द्वितीयक आर्थिक क्रिया का महत्वपूर्ण भाग है और कृषि तथा खनन से प्राप्त कच्चे माल को तैयार वस्तुओं में बदलता है।

औद्योगीकरण से रोजगार, नगरीकरण, परिवहन, व्यापार तथा सहायक सेवाओं का विकास होता है।

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उद्योगों का वर्गीकरण

कच्चा माल, आकार और उत्पाद

आधार प्रकार उदाहरण
कच्चा माल कृषि आधारित सूती वस्त्र, चीनी, खाद्य प्रसंस्करण
कच्चा माल खनिज आधारित लौह-इस्पात, सीमेंट, एल्यूमिनियम
आकार कुटीर, लघु और बड़े उद्योग हस्तशिल्प से विशाल कारखानों तक
उत्पाद मूलभूत उद्योग लौह-इस्पात
उत्पाद उपभोक्ता उद्योग वस्त्र, खाद्य पदार्थ
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उद्योगों की अवस्थिति के कारक

उद्योग कहाँ स्थापित होगा?

किसी उद्योग की अवस्थिति का निर्धारण केवल एक कारण से नहीं होता। सामान्यतः कच्चा माल, ऊर्जा, श्रम, पूँजी, परिवहन, जल, भूमि, बाजार, तकनीक और सरकारी नीति मिलकर उद्योग के स्थान को प्रभावित करते हैं।

जिन उद्योगों में कच्चा माल भारी और परिवहन महँगा होता है, वे अक्सर कच्चे माल के स्रोत के निकट स्थापित होते हैं।

बाजार-उन्मुख उद्योग उपभोक्ताओं के निकट विकसित होते हैं, जबकि निर्यात आधारित उद्योगों के लिए बंदरगाह तथा परिवहन सुविधा महत्वपूर्ण हो सकती है।

कच्चा माल ऊर्जा श्रम पूँजी परिवहन बाजार
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लौह-इस्पात उद्योग

आधुनिक उद्योगों की आधारभूत शाखा

लौह-इस्पात उद्योग को आधारभूत उद्योग माना जाता है क्योंकि मशीन, वाहन, रेलवे, भवन, जहाज और अनेक औद्योगिक उपकरणों के निर्माण में इस्पात की आवश्यकता होती है।

इस उद्योग के लिए लौह अयस्क, कोकिंग कोयला, चूना पत्थर, जल, ऊर्जा और परिवहन महत्वपूर्ण होते हैं।

भारत का छोटानागपुर पठार और उसके आसपास का क्षेत्र लौह अयस्क, कोयला तथा अन्य औद्योगिक संसाधनों की निकटता के कारण देश के प्रमुख लौह-इस्पात औद्योगिक क्षेत्रों में विकसित हुआ।

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भारत के प्रमुख लौह-इस्पात केंद्र

खनिज पट्टी से जुड़े औद्योगिक नगर

केंद्र राज्य
जमशेदपुरझारखंड
बोकारोझारखंड
राउरकेलाओडिशा
भिलाईछत्तीसगढ़
दुर्गापुरपश्चिम बंगाल
बर्नपुरपश्चिम बंगाल
विशाखापट्टनमआंध्र प्रदेश
सलेमतमिलनाडु
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सूती वस्त्र उद्योग

कृषि आधारित प्रमुख उद्योग

सूती वस्त्र उद्योग का मुख्य कच्चा माल कपास है। भारत के औद्योगीकरण में इस उद्योग की ऐतिहासिक भूमिका रही है।

प्रारंभिक समय में मुंबई क्षेत्र में कपास उत्पादन, बंदरगाह, बाजार, पूँजी, श्रम और नम समुद्री जलवायु की उपलब्धता ने सूती वस्त्र उद्योग के विकास को सहायता दी।

बाद में यह उद्योग अहमदाबाद, सूरत, कोयंबटूर, कानपुर और देश के अनेक अन्य केंद्रों में फैल गया।

🎯 प्रमुख उपनाम

अहमदाबाद को ऐतिहासिक रूप से भारत का मैनचेस्टर कहा जाता है, जबकि कोयंबटूर को दक्षिण भारत का मैनचेस्टर कहा जाता है।

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जूट उद्योग

हुगली नदी के किनारे उद्योग का संकेंद्रण

भारत का जूट उद्योग मुख्यतः पश्चिम बंगाल में हुगली नदी के दोनों किनारों पर केंद्रित रहा है।

इस क्षेत्र में जूट उत्पादक डेल्टा की निकटता, जल, श्रम, कोलकाता बंदरगाह, परिवहन तथा बाजार की उपलब्धता ने उद्योग के विकास में योगदान दिया।

जूट से बोरे, रस्सियाँ, पैकिंग सामग्री तथा अनेक विविध उत्पाद बनाए जाते हैं।

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चीनी उद्योग

गन्ना आधारित उद्योग

चीनी उद्योग का मुख्य कच्चा माल गन्ना है। गन्ना भारी और शीघ्र खराब होने वाला कच्चा माल है, इसलिए चीनी मिलें सामान्यतः गन्ना उत्पादक क्षेत्रों के निकट स्थापित की जाती हैं।

भारत में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और अन्य गन्ना उत्पादक राज्यों में चीनी उद्योग विकसित है।

गन्ने से चीनी के अलावा गुड़, शीरा और एथेनॉल जैसे उपयोगी उत्पाद भी प्राप्त किए जाते हैं।

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भारत के प्रमुख औद्योगिक प्रदेश

उद्योगों का क्षेत्रीय संकेंद्रण

औद्योगिक क्षेत्र प्रमुख आधार
मुंबई–पुणे क्षेत्र वस्त्र, इंजीनियरिंग, रसायन, पेट्रो-रसायन, वाहन
हुगली क्षेत्र जूट, इंजीनियरिंग, रसायन, बंदरगाह आधारित उद्योग
छोटानागपुर क्षेत्र कोयला, लौह अयस्क, लौह-इस्पात और भारी उद्योग
अहमदाबाद–वडोदरा क्षेत्र वस्त्र, रसायन, पेट्रो-रसायन, इंजीनियरिंग
बेंगलुरु–तमिलनाडु क्षेत्र इंजीनियरिंग, वस्त्र, वाहन, इलेक्ट्रॉनिक्स और तकनीकी उद्योग
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र उपभोक्ता, इंजीनियरिंग, वाहन, इलेक्ट्रॉनिक्स और सेवा उद्योग
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विश्व के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र

ऐतिहासिक औद्योगिक संकेंद्रण

विश्व में औद्योगिक विकास विशेष रूप से उत्तरी अमेरिका, पश्चिमी और मध्य यूरोप, पूर्वी एशिया तथा कुछ अन्य नगरीकृत क्षेत्रों में केंद्रित रहा है।

संयुक्त राज्य अमेरिका का उत्तर-पूर्वी औद्योगिक क्षेत्र, यूरोप का राइन-रूर क्षेत्र, ब्रिटेन के ऐतिहासिक औद्योगिक क्षेत्र और जापान का प्रशांत तटीय औद्योगिक क्षेत्र विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।

आधुनिक उद्योगों की अवस्थिति में अब केवल कोयला और लौह अयस्क ही निर्णायक नहीं हैं; तकनीक, कुशल श्रम, बाजार, बंदरगाह, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और संचार का महत्व बढ़ गया है।

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राइन-रूर औद्योगिक क्षेत्र

जर्मनी का प्रमुख औद्योगिक प्रदेश

जर्मनी का रूर क्षेत्र यूरोप के प्रसिद्ध पुराने औद्योगिक क्षेत्रों में से एक है।

यह क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से कोयले की उपलब्धता, राइन नदी के परिवहन, बड़े बाजार और विकसित आधारभूत संरचना के कारण लौह-इस्पात तथा भारी उद्योग का प्रमुख केंद्र बना।

समय के साथ इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में आधुनिक विनिर्माण तथा सेवा क्षेत्र का महत्व भी बढ़ा है।

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परिवहन

उत्पादन और बाजार को जोड़ने वाली कड़ी

लोगों और वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने की व्यवस्था को परिवहन कहा जाता है।

परिवहन आर्थिक भूगोल का अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है क्योंकि कच्चे माल, तैयार वस्तु, श्रम और बाजार को जोड़ने के बिना बड़े पैमाने की आर्थिक गतिविधियाँ विकसित नहीं हो सकतीं।

सड़क, रेल, जल, वायु और पाइपलाइन प्रमुख परिवहन माध्यम हैं।

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सड़क परिवहन

लचीला और घर-से-घर परिवहन

सड़क परिवहन कम और मध्यम दूरी के लिए अत्यंत उपयोगी है और यह गाँवों, कस्बों, शहरों तथा उत्पादन केंद्रों को जोड़ता है।

इसकी सबसे बड़ी विशेषता घर-से-घर सेवा तथा मार्ग बदलने की लचीलापन है।

पर्वतीय और दुर्गम क्षेत्रों में सड़क निर्माण महँगा हो सकता है, लेकिन स्थानीय संपर्क के लिए इसका महत्व अत्यधिक है।

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रेल परिवहन

भारी वस्तुओं का स्थलीय परिवहन

रेल परिवहन लंबी दूरी पर बड़ी संख्या में यात्रियों और भारी मात्रा में माल के परिवहन के लिए महत्वपूर्ण है।

कोयला, लौह अयस्क, अनाज, सीमेंट और अन्य भारी वस्तुओं के परिवहन में रेलवे की विशेष भूमिका होती है।

समतल और घनी आबादी वाले क्षेत्रों में रेल नेटवर्क का विकास सामान्यतः अधिक आसान होता है, जबकि अत्यधिक पर्वतीय क्षेत्रों में निर्माण लागत बढ़ जाती है।

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जल परिवहन

भारी माल का सस्ता लंबी दूरी परिवहन

समुद्री तथा अंतर्देशीय जल परिवहन भारी और विशाल मात्रा वाले माल को लंबी दूरी तक ले जाने का महत्वपूर्ण माध्यम है।

अंतरराष्ट्रीय व्यापार में समुद्री परिवहन का विशेष महत्व है क्योंकि जहाज बड़ी मात्रा में माल एक साथ ले जा सकते हैं।

नदियों और नहरों की नौगम्यता, जल की गहराई, बंदरगाह और समुद्री मार्ग जल परिवहन के विकास को प्रभावित करते हैं।

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प्रमुख अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग

विश्व व्यापार की समुद्री धमनियाँ

उत्तर अटलांटिक समुद्री मार्ग उत्तरी अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के अत्यधिक विकसित आर्थिक क्षेत्रों को जोड़ता है और ऐतिहासिक रूप से विश्व के अत्यंत महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्गों में रहा है।

स्वेज नहर भूमध्य सागर को लाल सागर से जोड़ती है और यूरोप तथा एशिया के बीच समुद्री दूरी को काफी कम करती है।

पनामा नहर अटलांटिक और प्रशांत महासागरों के समुद्री मार्गों को जोड़ती है तथा जहाजों को दक्षिण अमेरिका का लंबा चक्कर लगाने से बचाती है।

मलक्का जलडमरूमध्य हिंद महासागर क्षेत्र और दक्षिण चीन सागर के बीच एशिया के महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है।

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वायु परिवहन

सबसे तेज परिवहन माध्यम

वायु परिवहन लंबी दूरी के लिए सबसे तेज परिवहन माध्यम है।

यह यात्रियों, उच्च मूल्य और कम भार वाले सामान, शीघ्र खराब होने वाली वस्तुओं तथा आपातकालीन सामग्री के लिए विशेष रूप से उपयोगी है।

इसकी लागत सड़क, रेल और समुद्री परिवहन की तुलना में सामान्यतः अधिक होती है।

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पाइपलाइन परिवहन

तरल और गैसीय पदार्थों के लिए विशेष माध्यम

पाइपलाइन का उपयोग मुख्यतः पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, पेट्रोलियम उत्पाद और कुछ विशेष पदार्थों के निरंतर परिवहन के लिए किया जाता है।

एक बार पाइपलाइन स्थापित हो जाने पर बड़ी मात्रा में तरल अथवा गैस का नियमित परिवहन किया जा सकता है।

तेल और प्राकृतिक गैस उद्योग में पाइपलाइन नेटवर्क अत्यंत महत्वपूर्ण आधारभूत संरचना है।

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व्यापार

वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान

वस्तुओं और सेवाओं के क्रय-विक्रय अथवा आदान-प्रदान को व्यापार कहा जाता है।

देश की सीमाओं के भीतर होने वाला व्यापार आंतरिक व्यापार और विभिन्न देशों के बीच होने वाला व्यापार अंतरराष्ट्रीय व्यापार कहलाता है।

जब कोई देश विदेश से वस्तु खरीदता है तो उसे आयात और विदेश को वस्तु बेचता है तो उसे निर्यात कहा जाता है।

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व्यापार संतुलन

निर्यात और आयात का संबंध

किसी निश्चित अवधि में किसी देश के वस्तु-निर्यात और वस्तु-आयात के मूल्य के अंतर को सामान्यतः व्यापार संतुलन कहा जाता है।

यदि निर्यात का मूल्य आयात से अधिक है, तो इसे अनुकूल या व्यापार अधिशेष की स्थिति कहा जाता है।

यदि आयात का मूल्य निर्यात से अधिक है, तो इसे प्रतिकूल या व्यापार घाटा कहा जाता है।

निर्यात > आयातव्यापार अधिशेष
आयात > निर्यातव्यापार घाटा
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बंदरगाहों का आर्थिक महत्व

समुद्री व्यापार के प्रवेश द्वार

बंदरगाह समुद्री परिवहन और स्थलीय परिवहन के बीच संपर्क केंद्र होते हैं। इनके माध्यम से आयात और निर्यात की वस्तुओं का आदान-प्रदान किया जाता है।

प्राकृतिक बंदरगाह, गहरा जल, विस्तृत पृष्ठप्रदेश, सड़क-रेल संपर्क तथा आधुनिक माल प्रबंधन सुविधाएँ किसी बंदरगाह के विकास के महत्वपूर्ण कारक हैं।

बंदरगाह केवल जहाजों के ठहरने के स्थान नहीं होते; उनके आसपास उद्योग, गोदाम, व्यापार, वित्त और परिवहन सेवाओं का व्यापक विकास हो सकता है।

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मानव संसाधन और आर्थिक विकास

जनसंख्या की गुणवत्ता का महत्व

जनसंख्या केवल उपभोक्ता नहीं बल्कि आर्थिक उत्पादन का महत्वपूर्ण संसाधन भी है।

शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल और तकनीकी ज्ञान में सुधार से मानव की उत्पादक क्षमता बढ़ती है और वह मानव संसाधन के रूप में अधिक प्रभावी बनता है।

इसलिए किसी क्षेत्र की आर्थिक प्रगति केवल प्राकृतिक संसाधनों की मात्रा पर निर्भर नहीं करती; मानव कौशल, संस्थाएँ, तकनीक और पूँजी भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।

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सतत आर्थिक विकास

संसाधनों का संतुलित उपयोग

प्राकृतिक संसाधनों का ऐसा उपयोग जिसमें वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताएँ पूरी हों लेकिन भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता प्रभावित न हो, सतत विकास की मूल भावना है।

अनवीकरणीय खनिजों के विवेकपूर्ण उपयोग, ऊर्जा दक्षता, नवीकरणीय ऊर्जा, जल संरक्षण, मृदा संरक्षण, पुनर्चक्रण और प्रदूषण नियंत्रण का सतत आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण स्थान है।

आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण को एक-दूसरे के विरोधी न मानकर संतुलित रूप में आगे बढ़ाना दीर्घकालीन विकास के लिए आवश्यक है।

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महत्वपूर्ण आर्थिक भूगोल जोड़ियाँ

परीक्षा के लिए त्वरित तथ्य

विषय महत्वपूर्ण संबंध
झूम उत्तर-पूर्व भारत की स्थानांतरणशील कृषि
काली मिट्टी कपास के लिए प्रसिद्ध
गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा जूट के लिए अनुकूल क्षेत्र
छोटानागपुर पठार खनिज और भारी उद्योग
झरिया कोकिंग कोयला
बॉक्साइट एल्यूमिनियम
जमशेदपुर लौह-इस्पात उद्योग
हुगली क्षेत्र जूट उद्योग
अहमदाबाद सूती वस्त्र उद्योग का ऐतिहासिक प्रमुख केंद्र
स्वेज नहर भूमध्य सागर–लाल सागर
पनामा नहर अटलांटिक–प्रशांत समुद्री मार्ग
मलक्का जलडमरूमध्य हिंद महासागर क्षेत्र–दक्षिण चीन सागर मार्ग
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आर्थिक क्रियाओं का क्रम

प्रकृति से ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था तक

प्राथमिक द्वितीयक तृतीयक चतुर्थक पंचमक

📗 आसान तरीका

प्रकृति से लेना → वस्तु बनाना → सेवा देना → ज्ञान देना → उच्च निर्णय लेना।

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त्वरित पुनरावृत्ति

पूरे आर्थिक भूगोल का सार

कृषि खनन प्राथमिक क्रिया
विनिर्माण द्वितीयक क्रिया
परिवहन व्यापार बैंकिंग तृतीयक क्रिया
लौह अयस्क इस्पात आधारभूत उद्योग
कपास सूती वस्त्र कृषि आधारित उद्योग
निर्यात > आयात व्यापार अधिशेष

⚡ अंतिम पुनरावृत्ति बिंदु

मानव की आर्थिक गतिविधियों तथा उनके स्थानिक वितरण का अध्ययन आर्थिक भूगोल कहलाता है।

कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन, वानिकी और खनन प्राथमिक आर्थिक क्रियाएँ हैं।

कच्चे माल को तैयार वस्तु में बदलने वाली गतिविधियाँ द्वितीयक क्रियाएँ हैं।

परिवहन, व्यापार, बैंकिंग, संचार और पर्यटन तृतीयक क्रियाओं के प्रमुख उदाहरण हैं।

अनुसंधान, सूचना और ज्ञान आधारित गतिविधियों को चतुर्थक क्रियाओं से जोड़ा जाता है।

उच्च स्तरीय नीति निर्माण और निर्णय आधारित सेवाएँ पंचमक क्रियाओं से संबंधित हैं।

कृषि के प्रमुख प्रकारों में निर्वाह कृषि, स्थानांतरणशील कृषि, बागान कृषि, वाणिज्यिक अनाज कृषि, मिश्रित कृषि और भूमध्यसागरीय कृषि शामिल हैं।

उत्तर-पूर्व भारत की स्थानांतरणशील कृषि को झूम कृषि कहा जाता है।

चावल गर्म और आर्द्र जलवायु की तथा गेहूँ अपेक्षाकृत ठंडी बढ़वार अवधि वाली प्रमुख खाद्यान्न फसल है।

काली मिट्टी कपास की खेती के लिए प्रसिद्ध है।

गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा की गर्म, आर्द्र दशाएँ जूट की खेती के लिए अनुकूल हैं।

चाय, कॉफी और रबर महत्वपूर्ण बागान या वाणिज्यिक फसलों में गिने जाते हैं।

लौह अयस्क लौह-इस्पात उद्योग का प्रमुख कच्चा माल है।

बॉक्साइट एल्यूमिनियम का प्रमुख अयस्क है।

कोयले का सामान्य क्रम — पीट → लिग्नाइट → बिटुमिनस → एन्थ्रासाइट

झारखंड का झरिया कोकिंग कोयले के लिए प्रसिद्ध है।

कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस अनवीकरणीय ऊर्जा संसाधन हैं।

सौर, पवन, जल, ज्वारीय और भू-तापीय ऊर्जा नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के प्रमुख उदाहरण हैं।

उद्योग की अवस्थिति में कच्चा माल, ऊर्जा, श्रम, पूँजी, परिवहन, बाजार, जल और सरकारी नीति महत्वपूर्ण होते हैं।

लौह-इस्पात को आधारभूत उद्योग माना जाता है।

छोटानागपुर पठार और आसपास का क्षेत्र खनिज तथा भारी उद्योगों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

जमशेदपुर, बोकारो, राउरकेला, भिलाई और दुर्गापुर भारत के महत्वपूर्ण लौह-इस्पात केंद्र हैं।

पश्चिम बंगाल के हुगली क्षेत्र में जूट उद्योग का प्रमुख संकेंद्रण पाया जाता है।

अहमदाबाद ऐतिहासिक रूप से भारत के प्रमुख सूती वस्त्र केंद्रों में से एक है।

गन्ना भारी तथा शीघ्र खराब होने वाला कच्चा माल है, इसलिए चीनी मिलें सामान्यतः गन्ना उत्पादक क्षेत्रों के निकट स्थापित होती हैं।

सड़क परिवहन की प्रमुख विशेषता घर-से-घर सेवा है।

रेल परिवहन लंबी दूरी पर भारी माल के स्थलीय परिवहन के लिए महत्वपूर्ण है।

समुद्री परिवहन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी मात्रा में माल ढोने का अत्यंत महत्वपूर्ण साधन है।

वायु परिवहन सबसे तेज परिवहन माध्यम है।

पाइपलाइन का उपयोग पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के परिवहन में विशेष रूप से किया जाता है।

स्वेज नहर भूमध्य सागर को लाल सागर से जोड़ती है।

पनामा नहर अटलांटिक और प्रशांत महासागरीय समुद्री मार्गों को जोड़ती है।

मलक्का जलडमरूमध्य हिंद महासागर क्षेत्र और दक्षिण चीन सागर के बीच अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है।

विदेश से वस्तु खरीदना आयात और विदेश को वस्तु बेचना निर्यात कहलाता है।

निर्यात का मूल्य आयात से अधिक होने पर व्यापार अधिशेष और आयात अधिक होने पर व्यापार घाटा होता है।

शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल में सुधार जनसंख्या को अधिक सक्षम मानव संसाधन बनाता है।

प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग, पुनर्चक्रण और नवीकरणीय ऊर्जा का विकास सतत आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है।

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