कृषि कीमत
न्यूनतम समर्थन मूल्य, सरकारी खरीद, निर्गमन मूल्य और सुरक्षित खाद्यान्न भंडार
कृषि कीमत नीति का अर्थ
भारत में कृषि कीमत नीति का उद्देश्य किसानों को उनकी उपज के लिए उचित और लाभकारी मूल्य उपलब्ध कराना, बाजार में कीमतों की अत्यधिक गिरावट से सुरक्षा देना तथा उपभोक्ताओं के लिए आवश्यक खाद्यान्न की नियमित उपलब्धता बनाए रखना है।
इस व्यवस्था में न्यूनतम समर्थन मूल्य, सरकारी खरीद, निर्गमन मूल्य और सुरक्षित खाद्यान्न भंडार एक-दूसरे से जुड़े महत्वपूर्ण साधन हैं।
न्यूनतम समर्थन मूल्य
न्यूनतम समर्थन मूल्य वह पूर्व-घोषित मूल्य है जिस पर सरकार निर्धारित फसलों के लिए किसानों को बाजार कीमतों में अत्यधिक गिरावट से सुरक्षा देने का प्रयास करती है।
यदि किसी फसल की बाजार कीमत न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे चली जाती है और उस फसल की सरकारी खरीद व्यवस्था उपलब्ध है, तो सरकारी एजेंसियाँ निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुसार उस फसल की खरीद घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कर सकती हैं।
इसका मुख्य उद्देश्य किसानों को अत्यधिक कम कीमत पर फसल बेचने की मजबूरी से बचाना और उन्हें उत्पादन के लिए मूल्य संबंधी सुरक्षा प्रदान करना है।
⚠️ महत्वपूर्ण सावधानी
न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित होने का अर्थ यह नहीं है कि सरकार प्रत्येक किसान की पूरी फसल अनिवार्य रूप से खरीदती है। वास्तविक सरकारी खरीद फसल, क्षेत्र, गुणवत्ता, खरीद व्यवस्था और संबंधित सरकारी नीति पर निर्भर करती है।
न्यूनतम समर्थन मूल्य की शुरुआत
भारत में कृषि मूल्य समर्थन व्यवस्था का विकास 1960 के दशक के मध्य में खाद्यान्न संकट और हरित क्रांति की शुरुआत के समय हुआ।
1966-67 से गेहूँ के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था को प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रारंभिक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में पढ़ा जाता है।
इस नीति का उद्देश्य किसानों को उच्च उपज वाली किस्में, सिंचाई, उर्वरक और नई कृषि तकनीक अपनाने के लिए मूल्य संबंधी विश्वास प्रदान करना था।
कृषि लागत एवं मूल्य आयोग
कृषि लागत एवं मूल्य आयोग न्यूनतम समर्थन मूल्य से संबंधित प्रमुख सलाहकार संस्था है।
यह विभिन्न फसलों की उत्पादन लागत, मांग और आपूर्ति, बाजार मूल्य, घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय कीमतों, किसानों को मिलने वाले लाभ और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव जैसे अनेक कारकों का अध्ययन करता है।
आयोग खरीफ और रबी सहित निर्धारित फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की सिफारिश सरकार को करता है।
आयोग स्वयं न्यूनतम समर्थन मूल्य लागू या घोषित नहीं करता। अंतिम निर्णय केंद्र सरकार द्वारा संबंधित मंत्रालयों और राज्य सरकारों के विचारों सहित अन्य कारकों को ध्यान में रखकर लिया जाता है।
🎯 परीक्षा के लिए
कृषि लागत एवं मूल्य आयोग = सिफारिश
केंद्र सरकार = अंतिम घोषणा
किन फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य?
वर्तमान व्यवस्था में केंद्र सरकार 22 अनिवार्य कृषि फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करती है।
इनमें 14 खरीफ फसलें, 6 रबी फसलें और 2 वाणिज्यिक फसलें शामिल हैं।
इसके अतिरिक्त गन्ने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य के स्थान पर उचित एवं लाभकारी मूल्य निर्धारित किया जाता है।
खरीफ की 14 फसलें
| क्रम | फसल |
|---|---|
| 1 | धान |
| 2 | ज्वार |
| 3 | बाजरा |
| 4 | मक्का |
| 5 | रागी |
| 6 | अरहर |
| 7 | मूंग |
| 8 | उड़द |
| 9 | मूंगफली |
| 10 | सोयाबीन |
| 11 | सूरजमुखी बीज |
| 12 | तिल |
| 13 | रामतिल |
| 14 | कपास |
रबी और वाणिज्यिक फसलें
| श्रेणी | फसलें |
|---|---|
| रबी की 6 फसलें | गेहूँ, जौ, चना, मसूर, सरसों एवं तोरिया समूह, कुसुम |
| वाणिज्यिक फसलें | जूट और खोपरा |
📗 याद रखने योग्य
22 फसलें = 14 खरीफ + 6 रबी + 2 वाणिज्यिक
गन्ने का मूल्य
गन्ने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित नहीं किया जाता, बल्कि सरकार उचित एवं लाभकारी मूल्य निर्धारित करती है।
इस मूल्य की सिफारिश भी कृषि लागत एवं मूल्य आयोग द्वारा की जाती है और अंतिम निर्णय केंद्र सरकार द्वारा लिया जाता है।
इसलिए परीक्षा में 22 न्यूनतम समर्थन मूल्य वाली फसलें + गन्ने का उचित एवं लाभकारी मूल्य अलग-अलग याद करना चाहिए।
न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करने का समय
न्यूनतम समर्थन मूल्य सामान्यतः फसल की बुआई के मौसम से पहले घोषित किया जाता है ताकि किसान को फसल चयन और उत्पादन संबंधी निर्णय लेने में मूल्य का संकेत मिल सके।
खरीफ और रबी फसलों के लिए अलग-अलग मौसम में न्यूनतम समर्थन मूल्य संबंधी सिफारिशें और घोषणाएँ की जाती हैं।
इसलिए यह कहना अधिक सही है कि कृषि लागत एवं मूल्य आयोग संबंधित फसलों के लिए सिफारिश करता है और सरकार मौसम के अनुसार न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करती है।
न्यूनतम समर्थन मूल्य के उद्देश्य
किसानों को फसल की कीमत में अचानक गिरावट से सुरक्षा प्रदान करना न्यूनतम समर्थन मूल्य का प्रमुख उद्देश्य है।
यह किसानों को उत्पादन के लिए एक न्यूनतम मूल्य संकेत देता है और नई कृषि तकनीक अपनाने के जोखिम को कम करने में सहायता कर सकता है।
सरकार के लिए खाद्यान्न खरीद और सुरक्षित भंडार तैयार करने में भी न्यूनतम समर्थन मूल्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इसके माध्यम से खाद्य सुरक्षा और सार्वजनिक वितरण व्यवस्था के लिए आवश्यक खाद्यान्न उपलब्ध कराया जा सकता है।
खरीद मूल्य
पुरानी कृषि मूल्य व्यवस्था में खरीद मूल्य से आशय उस मूल्य से था जिस पर सरकार किसानों से खाद्यान्न खरीदकर सार्वजनिक भंडार तैयार करती थी।
पारंपरिक परीक्षा पुस्तकों में न्यूनतम समर्थन मूल्य को बुआई से पहले और खरीद मूल्य को फसल तैयार होने के बाद घोषित किए जाने वाले मूल्य के रूप में समझाया जाता है।
ऐतिहासिक व्यवस्था में खरीद मूल्य न्यूनतम समर्थन मूल्य से अधिक भी रखा जा सकता था।
लेकिन वर्तमान व्यवस्था में गेहूँ और धान जैसी प्रमुख खाद्यान्न फसलों की सरकारी खरीद मुख्यतः घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य पर की जाती है।
इसलिए आज के संदर्भ में “खरीद मूल्य हमेशा न्यूनतम समर्थन मूल्य से अधिक होता है” कहना सही नहीं है।
⚠️ पुराना और वर्तमान अंतर
पुरानी पुस्तक: खरीद मूल्य अलग तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य से अधिक हो सकता था।
वर्तमान व्यवस्था: गेहूँ और धान की केंद्रीय खरीद सामान्यतः न्यूनतम समर्थन मूल्य पर की जाती है।
सरकारी खरीद का उद्देश्य
सरकार किसानों से गेहूँ और धान जैसे खाद्यान्न खरीदकर केंद्रीय खाद्यान्न भंडार तैयार करती है।
सरकारी खरीद भारतीय खाद्य निगम और राज्य सरकारों की अधिकृत एजेंसियों के माध्यम से की जाती है।
इस खाद्यान्न का उपयोग सार्वजनिक वितरण व्यवस्था, खाद्य सुरक्षा योजनाओं, अन्य कल्याणकारी योजनाओं और आपातकालीन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किया जाता है।
निर्गमन मूल्य
जिस कीमत पर सरकार केंद्रीय खाद्यान्न भंडार से सार्वजनिक वितरण व्यवस्था अथवा अन्य योजनाओं के लिए खाद्यान्न जारी करती है, उसे निर्गमन मूल्य कहा जाता है।
सामान्य अध्ययन में इसे उस कीमत के रूप में समझा जाता है जिस आधार पर सरकार उचित मूल्य की दुकानों के माध्यम से लाभार्थियों को खाद्यान्न उपलब्ध कराती है।
सरकार खरीद मूल्य और वितरण मूल्य के बीच के अंतर तथा अन्य लागतों का एक बड़ा हिस्सा खाद्य सब्सिडी के रूप में वहन करती है।
वर्तमान वितरण व्यवस्था
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा व्यवस्था के अंतर्गत पहले पात्र लाभार्थियों को चावल, गेहूँ और मोटे अनाज निश्चित रियायती केंद्रीय निर्गमन कीमतों पर उपलब्ध कराए जाते थे।
पहले राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत चावल ₹3 प्रति किलोग्राम, गेहूँ ₹2 प्रति किलोग्राम और मोटा अनाज ₹1 प्रति किलोग्राम की दर से दिया जाता था।
वर्तमान में पात्र राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा लाभार्थियों को खाद्यान्न निःशुल्क उपलब्ध कराया जा रहा है।
1 जनवरी 2024 से निःशुल्क खाद्यान्न वितरण की व्यवस्था को पाँच वर्षों के लिए जारी रखने का निर्णय लिया गया है।
🎯 परीक्षा-सावधानी
₹3, ₹2 और ₹1 वाली दरें पुरानी राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा व्यवस्था की कीमतें थीं। वर्तमान पात्र लाभार्थियों को खाद्यान्न निःशुल्क दिया जा रहा है।
सुरक्षित खाद्यान्न भंडार
सरकार खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विशेष रूप से गेहूँ और चावल का सुरक्षित भंडार बनाए रखती है।
इस भंडार का उद्देश्य सार्वजनिक वितरण व्यवस्था की नियमित आवश्यकताओं को पूरा करना, आपातकालीन परिस्थितियों में खाद्यान्न उपलब्ध कराना और बाजार में अत्यधिक कमी की स्थिति से निपटना है।
केंद्रीय भंडार में सुरक्षित भंडार के साथ-साथ सार्वजनिक वितरण और अन्य योजनाओं की नियमित जरूरत के लिए परिचालन भंडार भी रखा जाता है।
सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम भंडारण मानकों के अनुसार अलग-अलग तिथियों पर आवश्यक गेहूँ और चावल की मात्रा निर्धारित की जाती है।
सुरक्षित भंडार के प्रमुख उद्देश्य
देश में खाद्यान्न की निरंतर उपलब्धता बनाए रखना सुरक्षित भंडार का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य है।
सार्वजनिक वितरण व्यवस्था और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के लिए आवश्यक खाद्यान्न इसी केंद्रीय भंडार से उपलब्ध कराया जाता है।
सूखा, बाढ़, प्राकृतिक आपदा या उत्पादन में कमी जैसी परिस्थितियों में खाद्यान्न की उपलब्धता बनाए रखने में सुरक्षित भंडार महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
आवश्यकता पड़ने पर सरकार अतिरिक्त गेहूँ और चावल खुले बाजार में जारी करके बाजार में उपलब्धता बढ़ाने तथा कीमतों को नियंत्रित करने का प्रयास भी कर सकती है।
भारतीय खाद्य निगम की भूमिका
भारत में खाद्यान्न की सरकारी खरीद, भंडारण और वितरण व्यवस्था में भारतीय खाद्य निगम की प्रमुख भूमिका है।
यह राज्य सरकारों और उनकी एजेंसियों के साथ मिलकर गेहूँ और धान की खरीद व्यवस्था में कार्य करता है।
खरीदा गया खाद्यान्न केंद्रीय भंडार में रखा जाता है और आवश्यकता के अनुसार राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों को सार्वजनिक वितरण एवं कल्याणकारी योजनाओं के लिए आवंटित किया जाता है।
चारों अवधारणाओं का संबंध
| अवधारणा | सरल अर्थ |
|---|---|
| न्यूनतम समर्थन मूल्य | किसानों को मूल्य गिरावट से सुरक्षा देने के लिए सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य |
| सरकारी खरीद | सरकारी एजेंसियों द्वारा किसानों से खाद्यान्न खरीदना |
| निर्गमन मूल्य | केंद्रीय भंडार से वितरण के लिए खाद्यान्न जारी करने की निर्धारित कीमत |
| सुरक्षित भंडार | खाद्य सुरक्षा और आपातकालीन जरूरतों के लिए रखा गया गेहूँ और चावल का भंडार |
महत्वपूर्ण भ्रम और सही तथ्य
भ्रम: न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकार हर किसान की पूरी फसल खरीदती है।
सही: न्यूनतम समर्थन मूल्य मूल्य-सुरक्षा का घोषित स्तर है; वास्तविक खरीद फसल, क्षेत्र, गुणवत्ता और सरकारी खरीद व्यवस्था पर निर्भर करती है।
भ्रम: कृषि लागत एवं मूल्य आयोग न्यूनतम समर्थन मूल्य लागू करता है।
सही: आयोग न्यूनतम समर्थन मूल्य की सिफारिश करता है और अंतिम घोषणा केंद्र सरकार करती है।
भ्रम: खरीद मूल्य हमेशा न्यूनतम समर्थन मूल्य से अधिक होता है।
सही: यह पुरानी कृषि मूल्य व्यवस्था की अवधारणा है; वर्तमान में गेहूँ और धान की सरकारी खरीद सामान्यतः घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य पर होती है।
भ्रम: 22 फसलों के साथ गन्ना भी न्यूनतम समर्थन मूल्य वाली फसल है।
सही: 22 अनिवार्य फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित होता है, जबकि गन्ने के लिए उचित एवं लाभकारी मूल्य निर्धारित किया जाता है।
भ्रम: निर्गमन मूल्य का अर्थ किसान से खरीदने की कीमत है।
सही: किसान से खरीद का संबंध सरकारी खरीद से है; निर्गमन मूल्य का संबंध केंद्रीय भंडार से खाद्यान्न जारी करने से है।
भ्रम: सुरक्षित भंडार केवल सार्वजनिक वितरण के लिए रखा जाता है।
सही: इसका उपयोग सार्वजनिक वितरण के साथ खाद्य सुरक्षा, आपातकालीन जरूरत, अन्य कल्याणकारी योजनाओं और जरूरत पड़ने पर बाजार हस्तक्षेप के लिए भी किया जा सकता है।
त्वरित पुनरावृत्ति
⚡ एक नज़र में
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति बिंदु
न्यूनतम समर्थन मूल्य किसानों को बाजार कीमत में अत्यधिक गिरावट से सुरक्षा देने के लिए घोषित किया जाता है।
न्यूनतम समर्थन मूल्य का अर्थ यह नहीं है कि सरकार प्रत्येक किसान की पूरी उपज अनिवार्य रूप से खरीदती है।
भारत में गेहूँ के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था का प्रारंभिक महत्वपूर्ण चरण 1966-67 से जुड़ा है।
कृषि लागत एवं मूल्य आयोग न्यूनतम समर्थन मूल्य की सिफारिश करता है; अंतिम घोषणा केंद्र सरकार करती है।
सरकार वर्तमान में 22 अनिवार्य फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करती है।
22 फसलें = 14 खरीफ + 6 रबी + 2 वाणिज्यिक फसलें।
गन्ने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य के स्थान पर उचित एवं लाभकारी मूल्य निर्धारित किया जाता है।
पुरानी पुस्तकों में खरीद मूल्य को न्यूनतम समर्थन मूल्य से अलग और अधिक बताया जाता है, लेकिन वर्तमान में गेहूँ और धान की सरकारी खरीद सामान्यतः न्यूनतम समर्थन मूल्य पर होती है।
निर्गमन मूल्य केंद्रीय भंडार से सार्वजनिक वितरण आदि के लिए खाद्यान्न जारी करने से संबंधित कीमत है।
वर्तमान राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा व्यवस्था में पात्र लाभार्थियों को खाद्यान्न निःशुल्क दिया जा रहा है।
सरकार खाद्य सुरक्षा के लिए मुख्यतः गेहूँ और चावल का सुरक्षित तथा परिचालन भंडार बनाए रखती है।
सरकारी खरीद, केंद्रीय भंडारण और सार्वजनिक वितरण व्यवस्था में भारतीय खाद्य निगम की प्रमुख भूमिका है।