केंद्र-राज्य संबंध
विधायी, प्रशासनिक, वित्तीय संबंध, अंतर्राज्यीय परिषद और प्रमुख आयोग
भारतीय संघवाद
भारतीय संविधान ने केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का संवैधानिक विभाजन किया है। भारत की व्यवस्था में संघीय विशेषताओं के साथ एक सशक्त केंद्र की व्यवस्था भी दिखाई देती है।
इसी कारण अनेक संवैधानिक विद्वान भारतीय संघीय व्यवस्था को संघीय और एकात्मक विशेषताओं का मिश्रण मानते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में इसे प्रायः अर्ध-संघीय या सशक्त केंद्र वाला संघवाद कहा जाता है।
भारतीय संघीय ढाँचे पर कनाडा की संघीय व्यवस्था का महत्वपूर्ण प्रभाव माना जाता है, विशेष रूप से सशक्त केंद्र और अवशिष्ट शक्तियों के संदर्भ में।
केंद्र-राज्य संबंधों को अध्ययन की सुविधा के लिए मुख्यतः विधायी, प्रशासनिक और वित्तीय संबंधों में विभाजित किया जाता है।
केंद्र-राज्य संबंधों के संवैधानिक भाग
भाग 11 और भाग 12
संविधान के भाग 11 में संघ और राज्यों के बीच संबंधों का मुख्य संवैधानिक ढाँचा दिया गया है।
भाग 11 का अध्याय 1 — अनुच्छेद 245 से 255 विधायी संबंधों से संबंधित है।
भाग 11 का अध्याय 2 — अनुच्छेद 256 से 263 प्रशासनिक संबंधों से संबंधित है।
केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संबंधों के महत्वपूर्ण प्रावधान संविधान के भाग 12 में विशेष रूप से अनुच्छेद 268 से आगे दिए गए हैं।
विधायी संबंध
अनुच्छेद 245 से 255
विधायी संबंध यह निर्धारित करते हैं कि संसद और राज्य विधानमंडल किस क्षेत्र और किन विषयों पर कानून बना सकते हैं।
अनुच्छेद 245 संसद और राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाए जाने वाले कानूनों के क्षेत्रीय विस्तार से संबंधित है।
अनुच्छेद 246 सातवीं अनुसूची में दी गई संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची के विषयों पर विधायी अधिकारों का विभाजन करता है।
केंद्र और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का मुख्य विभाजन संविधान की सातवीं अनुसूची में निहित है।
संघ सूची
केवल संसद की प्रमुख विधायी शक्ति
संघ सूची में राष्ट्रीय महत्व के ऐसे विषय रखे गए हैं जिन पर सामान्यतः संसद को कानून बनाने की विशिष्ट शक्ति प्राप्त है।
इसके प्रमुख उदाहरण हैं—रक्षा, विदेश मामले, परमाणु ऊर्जा, मुद्रा, बैंकिंग, रेल, डाक और दूरसंचार।
🎯 याद रखें
राष्ट्रीय महत्व के विषय → संघ सूची → संसद।
राज्य सूची
राज्यों की सामान्य विधायी शक्ति
राज्य सूची में स्थानीय और प्रादेशिक महत्व के विषय रखे गए हैं जिन पर सामान्य परिस्थितियों में राज्य विधानमंडल कानून बनाता है।
प्रमुख उदाहरण हैं—पुलिस, लोक व्यवस्था, सार्वजनिक स्वास्थ्य, कृषि, सिंचाई और स्थानीय शासन।
हालाँकि संविधान में निर्धारित विशेष परिस्थितियों में संसद को राज्य सूची के विषयों पर भी कानून बनाने की शक्ति प्राप्त हो सकती है।
समवर्ती सूची
केंद्र और राज्य दोनों
समवर्ती सूची के विषयों पर संसद और राज्य विधानमंडल दोनों कानून बना सकते हैं।
प्रमुख उदाहरण हैं—शिक्षा, वन, विवाह और तलाक, आपराधिक कानून तथा श्रम से संबंधित अनेक विषय।
यदि समवर्ती सूची के किसी विषय पर संसद और राज्य के कानून में असंगति हो तो सामान्यतः संसद का कानून प्रभावी होता है।
हालाँकि अनुच्छेद 254 में राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त कुछ राज्य कानूनों के लिए विशेष व्यवस्था दी गई है।
⚠️ पर्यावरण वाला तथ्य
“पर्यावरण” स्वयं सातवीं अनुसूची में इसी नाम से एक सामान्य समवर्ती प्रविष्टि नहीं है। परीक्षा में सुरक्षित उदाहरण के रूप में वन, शिक्षा, विवाह और तलाक लिखें।
अवशिष्ट शक्तियाँ
सशक्त केंद्र की विशेषता
ऐसे विषय जो संघ सूची, राज्य सूची या समवर्ती सूची में शामिल नहीं हैं, अवशिष्ट विषय कहलाते हैं।
भारत में अवशिष्ट विधायी शक्ति संसद को प्राप्त है।
यह भारतीय संघीय व्यवस्था में केंद्र की मजबूती का एक प्रमुख उदाहरण है और इस व्यवस्था पर कनाडा के संविधान का प्रभाव माना जाता है।
अनुच्छेद 249
राष्ट्रीय हित में राज्य सूची पर संसद का कानून
यदि राज्यसभा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से यह प्रस्ताव पारित करे कि राष्ट्रीय हित में संसद को राज्य सूची के किसी निर्दिष्ट विषय पर कानून बनाना आवश्यक है, तो संसद उस विषय पर कानून बना सकती है।
यह राज्यसभा की महत्वपूर्ण विशेष शक्तियों में से एक है।
🎯 अनुच्छेद 249
राज्यसभा + 2/3 उपस्थित एवं मतदान + राष्ट्रीय हित → संसद राज्य सूची पर कानून बना सकती है।
राज्य सूची पर संसद कब कानून बना सकती है?
महत्वपूर्ण परिस्थितियाँ
अनुच्छेद 249: राज्यसभा के राष्ट्रीय हित वाले विशेष प्रस्ताव पर।
अनुच्छेद 250: राष्ट्रीय आपातकाल लागू रहने के दौरान।
अनुच्छेद 252: दो या अधिक राज्यों द्वारा संसद से कानून बनाने का अनुरोध किए जाने पर।
अनुच्छेद 253: अंतरराष्ट्रीय संधि, समझौते या सम्मेलन को लागू करने के लिए।
अनुच्छेद 356: राष्ट्रपति शासन की संवैधानिक परिस्थिति में संसद संबंधित राज्य की विधायी शक्ति का प्रयोग कर सकती है।
अंतरराष्ट्रीय संधियाँ
अनुच्छेद 253
संसद को किसी अंतरराष्ट्रीय संधि, समझौते या सम्मेलन को लागू करने के लिए भारत के पूरे या किसी भाग के लिए कानून बनाने की शक्ति है।
इस प्रयोजन के लिए संसद राज्य सूची के विषय से संबंधित कानून भी बना सकती है।
ऐसी स्थिति में प्रत्येक राज्य की अलग-अलग सहमति संवैधानिक रूप से आवश्यक नहीं होती।
प्रशासनिक संबंध
अनुच्छेद 256 से 263
संविधान के अनुच्छेद 256 से 263 केंद्र और राज्यों के प्रशासनिक संबंधों का महत्वपूर्ण ढाँचा प्रदान करते हैं।
राज्य की कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग इस प्रकार किया जाना चाहिए कि संसद द्वारा बनाए गए लागू कानूनों तथा राज्य में लागू विद्यमान कानूनों का पालन सुनिश्चित हो।
केंद्र को संविधान में निर्धारित परिस्थितियों में राज्यों को आवश्यक दिशा-निर्देश देने की शक्ति प्राप्त है।
अनुच्छेद 256 और 257
संघ के निर्देश
अनुच्छेद 256 राज्यों द्वारा संसद के कानूनों के अनुपालन तथा संघ की आवश्यक निर्देश देने की शक्ति से संबंधित है।
अनुच्छेद 257 यह सुनिश्चित करता है कि राज्य की कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग संघ की कार्यपालिका शक्ति के प्रयोग में बाधा या प्रतिकूल प्रभाव उत्पन्न करने वाले ढंग से न हो।
इसलिए “केंद्र जब चाहे राज्य प्रशासन में हस्तक्षेप कर सकता है” कहना सही नहीं है; केंद्र की शक्ति संविधान में निर्धारित परिस्थितियों और सीमाओं के अधीन है।
अनुच्छेद 365
संघ के निर्देशों का पालन न करना
यदि कोई राज्य संविधान के अंतर्गत संघ द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन करने या उन्हें प्रभावी करने में विफल रहता है तो अनुच्छेद 365 के अंतर्गत राष्ट्रपति के लिए यह मानना विधिसम्मत हो सकता है कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसमें राज्य की सरकार संविधान के अनुसार नहीं चलाई जा सकती।
यह स्थिति अनुच्छेद 356 की कार्रवाई से जुड़ सकती है।
⚠️ बहुत महत्वपूर्ण
अनुच्छेद 365 का उल्लंघन होते ही राष्ट्रपति शासन स्वतः नहीं लग जाता। यह राष्ट्रपति को संवैधानिक निष्कर्ष तक पहुँचने का आधार प्रदान कर सकता है।
अखिल भारतीय सेवाएँ
अनुच्छेद 312
यदि राज्यसभा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से राष्ट्रीय हित में प्रस्ताव पारित करे तो संसद कानून बनाकर संघ और राज्यों के लिए एक या अधिक नई अखिल भारतीय सेवाओं का सृजन कर सकती है।
भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा अखिल भारतीय सेवाओं के प्रमुख उदाहरण हैं।
🎯 249 और 312
दोनों में राज्यसभा का विशेष प्रस्ताव और 2/3 उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का बहुमत महत्वपूर्ण है।
अंतर्राज्यीय परिषद
अनुच्छेद 263
संविधान का अनुच्छेद 263 राष्ट्रपति को सार्वजनिक हित में अंतर्राज्यीय परिषद स्थापित करने की शक्ति देता है।
सरकारिया आयोग की सिफारिश के बाद 28 मई 1990 के राष्ट्रपति आदेश द्वारा अंतर्राज्यीय परिषद स्थापित की गई।
अंतर्राज्यीय परिषद मुख्यतः एक परामर्शदात्री और समन्वयकारी निकाय है।
इसका उद्देश्य केंद्र और राज्यों तथा राज्यों के बीच सामान्य हित के विषयों पर विचार-विमर्श, समन्वय और सहयोग बढ़ाना है।
अंतर्राज्यीय परिषद की संरचना
प्रधानमंत्री अध्यक्ष
भारत का प्रधानमंत्री अंतर्राज्यीय परिषद का अध्यक्ष होता है।
सभी राज्यों के मुख्यमंत्री इसके सदस्य होते हैं।
विधानसभा वाले संघ राज्यक्षेत्रों के मुख्यमंत्री तथा बिना विधानसभा वाले संघ राज्यक्षेत्रों के प्रशासक भी निर्धारित व्यवस्था के अनुसार शामिल होते हैं।
प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्रिमंडल के मंत्री भी इसके सदस्य होते हैं।
राष्ट्रपति शासन वाले राज्य के राज्यपाल को भी परिषद की संरचना में आवश्यकतानुसार शामिल किया जाता है।
⚠️ प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति
परीक्षा में सुरक्षित तथ्य “प्रधानमंत्री अंतर्राज्यीय परिषद का अध्यक्ष है” है। प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति में किसी मंत्री द्वारा अध्यक्षता को संविधान के अनुच्छेद 263 की स्थायी मूल व्यवस्था न मानें।
अंतर्राज्यीय परिषद की पहली बैठक
10 अक्टूबर 1990
अंतर्राज्यीय परिषद की पहली बैठक 10 अक्टूबर 1990 को हुई।
उस समय भारत के प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह थे और बैठक उनकी अध्यक्षता में हुई।
इस बैठक में सरकारिया आयोग की केंद्र-राज्य संबंधों से संबंधित सिफारिशों पर भी विचार किया गया।
अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद
अनुच्छेद 262
संविधान का अनुच्छेद 262 अंतर्राज्यीय नदियों या नदी घाटियों के जल के उपयोग, वितरण या नियंत्रण से संबंधित विवादों के निर्णय के लिए संसद को कानून बनाने की शक्ति देता है।
इसी संवैधानिक आधार पर अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 बनाया गया।
कानून के अनुसार आवश्यक स्थिति में केंद्र सरकार संबंधित जल विवाद के समाधान के लिए न्यायाधिकरण का गठन कर सकती है।
क्षेत्रीय परिषदें
वैधानिक संस्थाएँ
भारत की पाँच क्षेत्रीय परिषदों का सृजन संविधान के अनुच्छेद 263 द्वारा नहीं बल्कि राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के अंतर्गत किया गया।
इसलिए क्षेत्रीय परिषदें वैधानिक संस्थाएँ हैं।
इसके विपरीत अंतर्राज्यीय परिषद का संवैधानिक आधार अनुच्छेद 263 में है।
📗 अंतर
अंतर्राज्यीय परिषद — अनुच्छेद 263।
क्षेत्रीय परिषद — राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956।
वित्तीय संबंध
अनुच्छेद 268 से आगे
संघ और राज्यों के बीच वित्तीय संबंधों में कर लगाने, कर एकत्र करने, करों के वितरण, अनुदान, ऋण तथा वित्त आयोग की महत्वपूर्ण भूमिका है।
इन संबंधों के महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान संविधान के भाग 12 में दिए गए हैं।
कराधान की वास्तविक वर्तमान व्यवस्था को जीएसटी से संबंधित संविधान संशोधनों और संबंधित कानूनों के साथ पढ़ना आवश्यक है।
आयकर और करों का वितरण
कृषि आय का अपवाद
कृषि आय को छोड़कर आय पर कर लगाने का विषय संघ सूची में है।
संविधान के वर्तमान वित्तीय ढाँचे में केंद्र द्वारा लगाए और एकत्र किए जाने वाले विभाज्य केंद्रीय करों के शुद्ध आगम का निर्धारित हिस्सा राज्यों के साथ बाँटा जाता है।
केंद्र और राज्यों के बीच ऐसे कर-वितरण में वित्त आयोग की सिफारिशों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
वित्त आयोग
अनुच्छेद 280
संविधान के अनुच्छेद 280 के अनुसार राष्ट्रपति वित्त आयोग का गठन करता है।
वित्त आयोग में एक अध्यक्ष और चार अन्य सदस्य होते हैं।
वित्त आयोग का गठन संविधान के अनुसार प्रत्येक पाँचवें वर्ष अथवा राष्ट्रपति द्वारा आवश्यक समझे जाने पर उससे पहले किया जा सकता है।
वित्त आयोग संघ और राज्यों के बीच विभाज्य करों के शुद्ध आगम के वितरण तथा राज्यों के बीच उनके हिस्सों के आवंटन पर सिफारिश करता है।
यह राज्यों को भारत की संचित निधि से दिए जाने वाले अनुदानों के सिद्धांतों पर भी सिफारिश करता है।
🎯 अनुच्छेद 280
राष्ट्रपति → वित्त आयोग → प्रत्येक पाँचवें वर्ष या पहले → केंद्र-राज्य कर वितरण।
अनुदान
अनुच्छेद 275 और 282
संविधान राज्यों को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए विभिन्न प्रकार के अनुदानों की व्यवस्था करता है।
अनुच्छेद 275 के अंतर्गत संसद द्वारा निर्धारित राज्यों को भारत की संचित निधि से सहायता-अनुदान दिए जा सकते हैं।
अनुच्छेद 282 संघ या राज्य को किसी सार्वजनिक प्रयोजन के लिए अनुदान देने की अनुमति देता है, भले ही वह विषय उसकी सामान्य विधायी सूची में न हो।
केंद्र और राज्यों की उधारी
अनुच्छेद 292 और 293
अनुच्छेद 292 भारत सरकार की उधारी से संबंधित है।
अनुच्छेद 293 राज्यों की उधारी से संबंधित है।
कुछ परिस्थितियों में, विशेष रूप से जब किसी राज्य पर केंद्र सरकार का ऋण बकाया हो, नए ऋण के लिए केंद्र की सहमति आवश्यक हो सकती है।
विज्ञापनों पर कर
पुराने और वर्तमान ढाँचे में अंतर
पुरानी संवैधानिक व्यवस्था में राज्य सूची की एक प्रविष्टि विज्ञापनों पर कर से संबंधित थी, जिसमें समाचारपत्रों में प्रकाशित विज्ञापन अलग रखे गए थे।
जीएसटी व्यवस्था लागू होने के साथ 101वें संविधान संशोधन के बाद राज्य सूची की पुरानी विज्ञापन-कर प्रविष्टि हटा दी गई।
इसलिए “रेडियो एवं दूरदर्शन के विज्ञापनों पर कर राज्य सरकार लगाती है” को वर्तमान सार्वभौमिक संवैधानिक तथ्य के रूप में याद नहीं करना चाहिए।
केंद्र-राज्य विवाद और सर्वोच्च न्यायालय
अनुच्छेद 131
संविधान का अनुच्छेद 131 कुछ संघीय विवादों में सर्वोच्च न्यायालय को मूल क्षेत्राधिकार प्रदान करता है।
संघ और एक या अधिक राज्यों के बीच अथवा राज्यों के बीच ऐसे विवाद जिनमें किसी विधिक अधिकार का अस्तित्व या विस्तार प्रश्न में हो, निर्धारित परिस्थितियों में सीधे सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष लाए जा सकते हैं।
इसलिए अनुच्छेद 131 भारतीय संघीय विवाद-निवारण की महत्वपूर्ण न्यायिक व्यवस्था है।
राष्ट्रीय आपातकाल और केंद्र-राज्य संबंध
अनुच्छेद 352
राष्ट्रीय आपातकाल लागू होने पर भारतीय संघीय व्यवस्था में केंद्र की विधायी और कार्यकारी शक्ति का विस्तार होता है।
संसद को राज्य सूची के विषयों पर भी कानून बनाने की शक्ति प्राप्त हो जाती है।
संघ की कार्यपालिका शक्ति भी राज्यों को निर्देश देने के संबंध में व्यापक हो जाती है।
लेकिन केवल राष्ट्रीय आपातकाल लागू होने से राज्य सरकार स्वतः समाप्त नहीं होती और उसकी सभी शक्तियाँ केंद्र द्वारा सीधे अपने हाथ में नहीं ले ली जातीं।
⚠️ 352 और 356 में अंतर
352 — राष्ट्रीय आपातकाल; संघीय शक्ति का विस्तार।
356 — किसी राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल होने की स्थिति में राष्ट्रपति शासन।
राष्ट्रपति शासन
अनुच्छेद 356
यदि राष्ट्रपति को राज्यपाल की रिपोर्ट से या अन्यथा यह संतोष हो कि किसी राज्य की सरकार संविधान के प्रावधानों के अनुसार नहीं चलाई जा सकती तो अनुच्छेद 356 के अंतर्गत घोषणा की जा सकती है।
ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति राज्य सरकार के कुछ या सभी कार्य अपने अधीन ग्रहण करने की घोषणा कर सकता है और राज्य विधानमंडल की शक्तियाँ संसद द्वारा या उसके प्राधिकार से प्रयोग की जा सकती हैं।
वित्तीय आपातकाल
अनुच्छेद 360
यदि भारत या उसके किसी भाग की वित्तीय स्थिरता या साख को खतरा हो तो राष्ट्रपति अनुच्छेद 360 के अंतर्गत वित्तीय आपातकाल की घोषणा कर सकता है।
इस स्थिति में केंद्र राज्यों को वित्तीय औचित्य संबंधी निर्देश दे सकता है।
राज्यों को धन विधेयकों और अन्य वित्तीय विधेयकों को राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रखने से संबंधित निर्देश भी दिए जा सकते हैं।
राजमन्नार समिति
1969 — तमिलनाडु सरकार
तमिलनाडु सरकार ने केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा के लिए 1969 में न्यायमूर्ति पी. वी. राजमन्नार की अध्यक्षता में एक समिति गठित की।
समिति में पी. वी. राजमन्नार के साथ ए. लक्ष्मणस्वामी मुदलियार और पी. चंद्र रेड्डी सदस्य थे।
समिति ने अपनी रिपोर्ट 1971 में तमिलनाडु सरकार को प्रस्तुत की।
इस समिति ने राज्यों को अधिक स्वायत्तता प्रदान करने तथा केंद्र-राज्य शक्तियों के संतुलन में बदलाव से संबंधित अनेक सुझाव दिए।
इनमें राज्यपाल की स्थिति और मंत्रिपरिषद से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों में परिवर्तन के सुझाव भी शामिल थे।
⚠️ वर्ष सही रखें
राजमन्नार समिति गठन — 1969।
रिपोर्ट — 1971।
सरकारिया आयोग
1983
केंद्र सरकार ने 1983 में केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा के लिए न्यायमूर्ति आर. एस. सरकारिया की अध्यक्षता में आयोग का गठन किया।
आयोग का उद्देश्य संविधान के मौजूदा ढाँचे के भीतर केंद्र और राज्यों के बीच संबंधों की कार्यप्रणाली की समीक्षा करना तथा सुधार के सुझाव देना था।
सरकारिया आयोग ने स्थायी अंतर्राज्यीय परिषद की स्थापना की सिफारिश की।
इसी महत्वपूर्ण सिफारिश के बाद 1990 में अंतर्राज्यीय परिषद की स्थापना हुई।
पूंछी आयोग
2007
केंद्र-राज्य संबंधों की बदलती परिस्थितियों की पुनः समीक्षा के लिए केंद्र सरकार ने 2007 में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मदन मोहन पूंछी की अध्यक्षता में आयोग गठित किया।
इस आयोग ने संघवाद, राज्यपाल की भूमिका, आपात प्रावधान, आंतरिक सुरक्षा, स्थानीय स्वशासन और केंद्र-राज्य वित्तीय तथा प्रशासनिक संबंधों सहित अनेक विषयों का अध्ययन किया।
केंद्र-राज्य संबंधों से जुड़े प्रमुख प्रयास
कालक्रम
| वर्ष | समिति / आयोग / प्रस्ताव | महत्व |
|---|---|---|
| 1966 | प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग | प्रशासनिक सुधारों के साथ केंद्र-राज्य प्रशासनिक संबंधों पर भी सुझाव। |
| 1969 | राजमन्नार समिति | तमिलनाडु सरकार द्वारा; अधिक राज्य स्वायत्तता पर जोर। |
| 1973 | आनंदपुर साहिब प्रस्ताव | केंद्र-राज्य शक्तियों और राज्य स्वायत्तता पर राजनीतिक प्रस्ताव। |
| 1983 | सरकारिया आयोग | केंद्र-राज्य संबंधों की व्यापक समीक्षा। |
| 2007 | पूंछी आयोग | बदली परिस्थितियों में केंद्र-राज्य संबंधों की पुनर्समीक्षा। |
⚠️ सभी “आयोग” नहीं हैं
आनंदपुर साहिब प्रस्ताव किसी सरकारी आयोग का नाम नहीं था; यह एक राजनीतिक प्रस्ताव था। इसे आयोगों की सूची में उसी अर्थ में न रखें।
सातवीं अनुसूची और केंद्र-राज्य संबंध
शक्ति-विभाजन का आधार
संविधान की सातवीं अनुसूची में संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची दी गई है।
इसी अनुसूची को केंद्र और राज्यों के बीच विषयगत विधायी शक्ति-विभाजन का प्रमुख आधार माना जाता है।
लेकिन केंद्र-राज्य संबंध केवल सातवीं अनुसूची तक सीमित नहीं हैं; प्रशासनिक, वित्तीय, न्यायिक और आपातकालीन संबंधों के लिए संविधान के अन्य अनेक अनुच्छेद भी महत्वपूर्ण हैं।
महत्वपूर्ण भ्रम और सही तथ्य
परीक्षा में गलती से बचें
गलत: राजमन्नार समिति 1971 में गठित हुई।
सही: गठन 1969 में हुआ; रिपोर्ट 1971 में आई।
गलत: समवर्ती सूची में “पर्यावरण” स्पष्ट स्वतंत्र प्रविष्टि है।
सही: वन जैसे पर्यावरण-संबंधी विषय समवर्ती सूची में हैं; “पर्यावरण” को स्वतंत्र सूची प्रविष्टि की तरह न लिखें।
गलत: अनुच्छेद 365 का पालन न होते ही राष्ट्रपति शासन लग जाता है।
सही: यह राष्ट्रपति के लिए अनुच्छेद 356 से संबंधित संवैधानिक निष्कर्ष का आधार बन सकता है; राष्ट्रपति शासन स्वतः नहीं लगता।
गलत: राष्ट्रीय आपातकाल में राज्य सरकार की सारी शक्तियाँ स्वतः केंद्र ले लेता है।
सही: संसद की राज्य सूची पर विधायी शक्ति और संघ की निर्देश देने की शक्ति बढ़ती है; यह राष्ट्रपति शासन से अलग व्यवस्था है।
अधूरा: वित्त आयोग हर पाँच वर्ष में ही अनिवार्य रूप से उसी दिन गठित होता है।
सही: प्रत्येक पाँचवें वर्ष या राष्ट्रपति द्वारा आवश्यक समझे जाने पर उससे पहले।
पुराना: रेडियो और दूरदर्शन विज्ञापनों पर अलग कर राज्य सरकार लगाती है।
सही: यह पुरानी कर-व्यवस्था से जुड़ा तथ्य है; जीएसटी के बाद इसे वर्तमान राज्य सूची के सामान्य तथ्य के रूप में न लिखें।
गलत: क्षेत्रीय परिषदें अनुच्छेद 263 के तहत बनी हैं।
सही: पाँच क्षेत्रीय परिषदें राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के अंतर्गत वैधानिक संस्थाएँ हैं।
गलत: अंतर्राज्यीय परिषद स्वयं न्यायालय की तरह बाध्यकारी फैसला देती है।
सही: यह मुख्यतः परामर्शदात्री और समन्वयकारी निकाय है।
अधूरा: अनुच्छेद 131 हर प्रकार के केंद्र-राज्य राजनीतिक विवाद पर लागू होता है।
सही: सर्वोच्च न्यायालय की मूल अधिकारिता के लिए विवाद में विधिक अधिकार के अस्तित्व या विस्तार का प्रश्न होना आवश्यक है।
गलत: केंद्र-राज्य संबंध केवल सातवीं अनुसूची में दिए गए हैं।
सही: सातवीं अनुसूची विधायी विषय-विभाजन का आधार है; प्रशासनिक और वित्तीय संबंध अलग संवैधानिक अनुच्छेदों में भी हैं।
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति
भाग 11 — संघ और राज्यों के बीच संबंध।
245–255 — विधायी संबंध।
256–263 — प्रशासनिक संबंध।
सातवीं अनुसूची — संघ सूची + राज्य सूची + समवर्ती सूची।
245–246 — विधायी शक्ति और विषय-विभाजन का प्रमुख आधार।
अवशिष्ट शक्तियाँ — संसद के पास।
249 — राज्यसभा के विशेष प्रस्ताव पर राष्ट्रीय हित में राज्य सूची पर संसद कानून बना सकती है।
250 — राष्ट्रीय आपातकाल में राज्य सूची पर संसद की शक्ति।
252 — दो या अधिक राज्यों के अनुरोध पर संसद कानून बना सकती है।
253 — अंतरराष्ट्रीय संधि लागू करने के लिए संसद की शक्ति।
256 — राज्यों द्वारा संघीय कानूनों का अनुपालन।
262 — अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद।
263 — अंतर्राज्यीय परिषद।
अंतर्राज्यीय परिषद स्थापना — 28 मई 1990।
अंतर्राज्यीय परिषद अध्यक्ष — प्रधानमंत्री।
पहली बैठक — 10 अक्टूबर 1990 — वी. पी. सिंह।
क्षेत्रीय परिषदें — राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 — वैधानिक निकाय।
280 — वित्त आयोग।
वित्त आयोग — प्रत्येक पाँचवें वर्ष या उससे पहले।
292 — संघ की उधारी।
293 — राज्यों की उधारी।
312 — नई अखिल भारतीय सेवा के लिए राज्यसभा का 2/3 विशेष प्रस्ताव।
365 — संघीय निर्देशों का पालन न करना; अनुच्छेद 356 से जुड़ा संभावित आधार, स्वतः राष्ट्रपति शासन नहीं।
131 — केंद्र-राज्य विधिक विवादों पर सर्वोच्च न्यायालय की मूल अधिकारिता।
352 — राष्ट्रीय आपातकाल।
356 — राष्ट्रपति शासन।
360 — वित्तीय आपातकाल।
राजमन्नार समिति — 1969; रिपोर्ट 1971।
सरकारिया आयोग — 1983।
पूंछी आयोग — 2007।
आनंदपुर साहिब प्रस्ताव — 1973 — राजनीतिक प्रस्ताव, आयोग नहीं।
भारत का संघवाद — संघीय विशेषताएँ + सशक्त केंद्र।
सबसे छोटा क्रम — 245 कानून → 246 तीन सूचियाँ → 249 राज्यसभा → 256 प्रशासन → 262 जल विवाद → 263 अंतर्राज्यीय परिषद → 280 वित्त आयोग → 312 अखिल भारतीय सेवा → 365 संघीय निर्देश।