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CHAURI CHAURA INCIDENT

चौरी-चौरा कांड
(1922)

चौरी-चौरा कांड

चौरी-चौरा कांड असहयोग आंदोलन के इतिहास की सबसे निर्णायक घटनाओं में से एक था। गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा में आंदोलनकारियों और पुलिस के बीच संघर्ष ने हिंसक रूप ले लिया और प्रदर्शनकारियों ने पुलिस थाने में आग लगा दी।

इस हिंसक घटना ने महात्मा गांधी को गहराई से प्रभावित किया। गांधीजी का संपूर्ण आंदोलन अहिंसा के सिद्धांत पर आधारित था, इसलिए उन्होंने इसके बाद असहयोग आंदोलन को स्थगित करने का निर्णय लिया।

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चौरी-चौरा की घटना

फरवरी 1922 में संयुक्त प्रांत के गोरखपुर जिले में स्थित चौरी-चौरा नामक स्थान पर असहयोग आंदोलन से जुड़े प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच संघर्ष हुआ।

आंदोलनकारी स्थानीय बाजार में जुलूस निकाल रहे थे। पुलिस के साथ उनका टकराव हुआ और पुलिस द्वारा भीड़ पर गोली चलाए जाने के बाद स्थिति हिंसक हो गई।

क्रोधित प्रदर्शनकारियों ने पुलिसकर्मियों का पीछा किया। पुलिसकर्मी चौरी-चौरा पुलिस थाने में चले गए, जिसके बाद भीड़ ने पुलिस थाने को आग लगा दी।

इस घटना में 22 पुलिसकर्मियों की मृत्यु हुई।

परीक्षा के लिए

चौरी-चौरा → गोरखपुर → फरवरी 1922 → पुलिस थाना जलाया गया → 22 पुलिसकर्मियों की मृत्यु।

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घटना की तिथि

चौरी-चौरा कांड की तिथि को लेकर विभिन्न पुस्तकों और परीक्षा-सामग्रियों में 4 फरवरी और 5 फरवरी 1922 दोनों तिथियाँ देखने को मिलती हैं।

ऐतिहासिक विवरणों और गांधीजी से संबंधित प्रामाणिक अभिलेखों में घटना की तिथि 4 फरवरी 1922 मिलती है। अतः विस्तृत इतिहास के लिए 4 फरवरी 1922 को प्राथमिक तिथि के रूप में याद रखना अधिक उचित है।

कुछ प्रतियोगी परीक्षा-सामग्रियों में 5 फरवरी 1922 भी दिया जाता है, इसलिए वस्तुनिष्ठ प्रश्न हल करते समय प्रश्न के स्रोत और दिए गए विकल्पों पर भी ध्यान देना चाहिए।

तिथि में भ्रम न करें

प्रामाणिक ऐतिहासिक तिथि → 4 फरवरी 1922
कुछ परीक्षा पुस्तकों में → 5 फरवरी 1922

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गांधीजी की प्रतिक्रिया

चौरी-चौरा की हिंसक घटना से महात्मा गांधी अत्यंत व्यथित हुए। उनका मानना था कि राष्ट्रीय आंदोलन को हर परिस्थिति में अहिंसक रहना चाहिए।

गांधीजी को लगा कि भारतीय जनता अभी व्यापक स्तर पर अहिंसक अनुशासन बनाए रखने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है।

इसी कारण उन्होंने असहयोग आंदोलन को आगे बढ़ाने के बजाय उसे रोकने का निर्णय किया।

गांधीजी ने चौरी-चौरा की हिंसा के प्रायश्चित के रूप में उपवास भी किया।

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बारदोली की बैठक और आंदोलन की वापसी

चौरी-चौरा की घटना के बाद कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बारदोली में हुई।

12 फरवरी 1922 को गांधीजी के आग्रह पर असहयोग आंदोलन को स्थगित करने का निर्णय लिया गया।

इस प्रकार चौरी-चौरा की हिंसक घटना असहयोग आंदोलन की समाप्ति का तात्कालिक कारण बनी।

असहयोग आंदोलन की वापसी के निर्णय से कांग्रेस के कई नेता निराश हुए। उनका मानना था कि आंदोलन उस समय अपने व्यापक चरण में पहुँच चुका था और उसे अचानक रोकना उचित नहीं था।

तिथि का महत्वपूर्ण सुधार

12 फरवरी 1912 नहीं, 12 फरवरी 1922 को असहयोग आंदोलन स्थगित किया गया था।

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आंदोलन वापस लेने पर प्रतिक्रिया

गांधीजी द्वारा असहयोग आंदोलन वापस लेने का निर्णय राष्ट्रीय आंदोलन के भीतर भी विवाद का विषय बना।

जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू जैसे अनेक नेताओं में इस निर्णय को लेकर निराशा थी।

सुभाष चंद्र बोस ने बाद में आंदोलन को उस समय रोकने के निर्णय की कड़ी आलोचना की, जब जनता का उत्साह अपने उच्च स्तर पर था।

गांधीजी के लिए, हालांकि, आंदोलन की तत्काल राजनीतिक सफलता से अधिक महत्वपूर्ण अहिंसा के सिद्धांत की रक्षा थी।

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गांधीजी की गिरफ्तारी

असहयोग आंदोलन स्थगित होने के कुछ समय बाद ब्रिटिश सरकार ने 10 मार्च 1922 को महात्मा गांधी को गिरफ्तार कर लिया।

उन पर उनके लेखों के आधार पर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया।

यह प्रसिद्ध मुकदमा अहमदाबाद में चला और गांधीजी ने न्यायालय में अपने राजनीतिक कार्यों की जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए ब्रिटिश शासन की नीतियों की आलोचना की।

18 मार्च 1922 को गांधीजी को छह वर्ष की साधारण कैद की सजा सुनाई गई।

हालाँकि गांधीजी ने पूरे छह वर्ष जेल में नहीं बिताए। स्वास्थ्य संबंधी कारणों से उन्हें 1924 में रिहा कर दिया गया।

परीक्षा के लिए

10 मार्च 1922 → गांधीजी गिरफ्तार
18 मार्च 1922 → राजद्रोह के मुकदमे में 6 वर्ष की सजा
1924 → स्वास्थ्य कारणों से रिहाई

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चौरी-चौरा मुकदमा

चौरी-चौरा की घटना के बाद ब्रिटिश सरकार ने बड़ी संख्या में लोगों को गिरफ्तार किया और उन पर मुकदमा चलाया।

निचली अदालत ने बड़ी संख्या में अभियुक्तों को मृत्युदंड दिया था। बाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपील के बाद अनेक लोगों की सजाएँ कम की गईं और अंततः 19 लोगों की मृत्युदंड की सजा कायम रही।

चौरी-चौरा के अभियुक्तों की कानूनी सहायता में पंडित मदन मोहन मालवीय ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य

चौरी-चौरा अभियुक्तों की पैरवी → मदन मोहन मालवीय।

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ऐतिहासिक महत्व

चौरी-चौरा कांड भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में इसलिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इस एक घटना ने उस समय चल रहे देशव्यापी असहयोग आंदोलन की दिशा बदल दी।

इस घटना ने गांधीजी के लिए यह स्पष्ट किया कि सत्याग्रह केवल राजनीतिक रणनीति नहीं, बल्कि कठोर अहिंसक अनुशासन पर आधारित आंदोलन होना चाहिए।

असहयोग आंदोलन स्थगित होने से तत्कालीन राष्ट्रीय आंदोलन की गति धीमी हुई, लेकिन भारतीय राजनीति में जनभागीदारी की जो व्यापक प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी, वह समाप्त नहीं हुई।

इसके बाद कांग्रेस के भीतर आगे की राजनीतिक रणनीति को लेकर नए विचार उभरे और बाद में स्वराज पार्टी जैसे नए राजनीतिक प्रयास सामने आए।

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महत्वपूर्ण तिथियाँ

तिथि / वर्ष घटना
फरवरी 1922 गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा में हिंसक घटना
12 फरवरी 1922 बारदोली में कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा असहयोग आंदोलन स्थगित करने का निर्णय
10 मार्च 1922 महात्मा गांधी गिरफ्तार
18 मार्च 1922 गांधीजी को राजद्रोह के मुकदमे में छह वर्ष की साधारण कैद
1924 स्वास्थ्य कारणों से गांधीजी की रिहाई
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परीक्षा में भ्रमित करने वाले तथ्य

चौरी-चौरा → गोरखपुर जिला → संयुक्त प्रांत।

घटना में प्रदर्शनकारियों ने पुलिस थाने में आग लगा दी और 22 पुलिसकर्मियों की मृत्यु हुई।

प्रामाणिक ऐतिहासिक विवरणों में घटना की तिथि 4 फरवरी 1922 मिलती है; कुछ प्रतियोगी परीक्षा पुस्तकों में 5 फरवरी 1922 भी दिया जाता है।

चौरी-चौरा कांड → असहयोग आंदोलन की वापसी का तात्कालिक कारण।

12 फरवरी 1922 → बारदोली → असहयोग आंदोलन स्थगित।

इसे 12 फरवरी 1912 नहीं लिखना है।

गांधीजी को केवल सामान्य रूप से “असंतोष फैलाने” के लिए नहीं, बल्कि राजद्रोह के आरोप में मुकदमे के बाद छह वर्ष की सजा सुनाई गई थी।

चौरी-चौरा अभियुक्तों की कानूनी सहायता → मदन मोहन मालवीय।

अंतिम त्वरित पुनरावृत्ति

चौरी-चौरा कांड फरवरी 1922 में गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा में हुआ।

असहयोग आंदोलन से जुड़े प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच संघर्ष के बाद भीड़ ने पुलिस थाने को आग लगा दी, जिसमें 22 पुलिसकर्मियों की मृत्यु हुई।

घटना की मानक ऐतिहासिक तिथि 4 फरवरी 1922 मानी जाती है, जबकि कुछ प्रतियोगी परीक्षा-सामग्रियों में 5 फरवरी भी मिलता है।

गांधीजी इस हिंसा से अत्यंत व्यथित हुए क्योंकि उनका आंदोलन पूरी तरह अहिंसा पर आधारित था।

12 फरवरी 1922 को बारदोली में कांग्रेस कार्यसमिति ने गांधीजी के आग्रह पर असहयोग आंदोलन को स्थगित करने का निर्णय लिया।

इसके बाद 10 मार्च 1922 को गांधीजी गिरफ्तार हुए और 18 मार्च 1922 को राजद्रोह के मुकदमे में उन्हें छह वर्ष की साधारण कैद की सजा सुनाई गई।

स्वास्थ्य संबंधी कारणों से गांधीजी को 1924 में रिहा कर दिया गया।

मुख्य क्रम याद रखें — चौरी-चौरा हिंसा → 22 पुलिसकर्मियों की मृत्यु → गांधीजी का अहिंसा पर जोर → 12 फरवरी 1922 बारदोली में असहयोग आंदोलन स्थगित → मार्च 1922 गांधीजी की गिरफ्तारी और छह वर्ष की सजा।

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