जैन धर्म
तीर्थंकर, महावीर, सिद्धांत, संप्रदाय, साहित्य एवं प्रमुख केंद्र
जैन तीर्थंकर
ऋषभदेव से महावीर तक
जैन परंपरा में कुल 24 तीर्थंकर माने जाते हैं।
ऋषभदेव या आदिनाथ जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर माने जाते हैं।
पार्श्वनाथ 23वें तीर्थंकर थे। जैन परंपरा के अनुसार वे काशी के राजा अश्वसेन के पुत्र थे।
पार्श्वनाथ ने लगभग 30 वर्ष की आयु में गृहत्याग किया। उन्होंने अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह के चार व्रतों पर बल दिया।
महावीर स्वामी
24वें तीर्थंकर
जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी थे। उनके बचपन का नाम वर्धमान था।
उनका जन्म वैशाली के निकट कुंडग्राम में हुआ था। उनके पिता सिद्धार्थ ज्ञात्रिक कुल के प्रमुख थे।
उनकी माता त्रिशला थीं, जिनका संबंध लिच्छवि प्रमुख चेटक के परिवार से था।
महावीर की तिथियों के विषय में दो प्रमुख परंपराएँ हैं। एक कालक्रम उन्हें लगभग 540–468 ईसा पूर्व और श्वेतांबर परंपरा 599–527 ईसा पूर्व मानती है।
जैन परंपरा में उनकी पत्नी का नाम यशोदा और पुत्री का नाम प्रियदर्शना या अनोज्जा मिलता है।
महावीर का गृहत्याग और केवलज्ञान
वर्धमान से जिन तक
महावीर ने लगभग 30 वर्ष की आयु में गृहत्याग किया।
जैन परंपरा के अनुसार माता-पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने अपने बड़े भाई नंदिवर्धन की अनुमति से संन्यास ग्रहण किया।
लगभग 12 वर्ष की कठोर साधना के बाद उन्हें ऋजुपालिका नदी के तट पर जृम्भिकग्राम के निकट केवलज्ञान प्राप्त हुआ।
इसके बाद वे जिन अर्थात विजेता, अर्हत अर्थात पूज्य और निर्ग्रंथ अर्थात बंधनों से मुक्त कहलाए।
उनके अनुयायी भी प्रारंभिक साहित्य में निर्ग्रंथ नाम से जाने जाते थे।
महावीर का संघ
गणधर और भिक्षुणियाँ
महावीर ने अपनी शिक्षाएँ जनसामान्य की प्राकृत भाषा-परंपरा में दीं। जैन आगमों की प्रमुख भाषा अर्धमागधी प्राकृत रही।
महावीर के 11 प्रमुख गणधर माने जाते हैं। इनमें इंद्रभूति गौतम सबसे प्रसिद्ध गणधर थे।
जमाली महावीर का दामाद और प्रारंभिक शिष्य था। बाद में उसके मतभेद से जैन संघ में प्रारंभिक विवाद उत्पन्न हुआ।
महावीर के बाद उनकी शिक्षाओं की परंपरा में सुधर्मन का विशेष महत्व रहा।
चंदना या चंदनबाला को महावीर के भिक्षुणी संघ की प्रथम प्रमुख भिक्षुणी माना जाता है। जैन परंपरा में उन्हें चम्पा के राजा दधिवाहन की पुत्री बताया गया है।
नामों में अंतर
इंद्रभूति गौतम — प्रमुख गणधर।
जमाली — महावीर का दामाद और प्रारंभिक शिष्य।
चंदनबाला — प्रथम प्रमुख जैन भिक्षुणी।
जैन धर्म के सिद्धांत
मोक्ष का मार्ग
जैन धर्म किसी एक सर्वशक्तिमान सृष्टिकर्ता ईश्वर को स्वीकार नहीं करता।
जैन दर्शन में जीव या आत्मा की मान्यता है। कर्म के कारण जीव जन्म-मरण के बंधन में रहता है।
जैन धर्म के तीन रत्न हैं — सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र।
महावीर ने पाँच महाव्रत बताए — अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।
जैन धर्म के प्रमुख संरक्षक
राजा और राजवंश
प्राचीन और मध्यकालीन भारत में अनेक शासकों ने जैन धर्म को संरक्षण दिया।
इनमें चंद्रगुप्त मौर्य, कलिंग नरेश खारवेल, राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष तथा वनराज चावड़ा जैसे नाम उल्लेखनीय हैं।
मौर्योत्तर काल में मथुरा जैन धर्म का महत्वपूर्ण केंद्र बना। कंकाली टीला से अनेक जैन पुरावशेष मिले हैं।
खजुराहो में चंदेल शासकों के समय अनेक जैन मंदिरों का निर्माण हुआ।
श्रवणबेलगोला और गोम्मटेश्वर
बाहुबली की विशाल प्रतिमा
कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में गंग वंश के मंत्री और सेनापति चामुंडराय ने लगभग 981 ईस्वी में विशाल गोम्मटेश्वर बाहुबली प्रतिमा स्थापित कराई।
यह एकाश्म प्रतिमा लगभग 17.4 मीटर ऊँची है।
बाहुबली को कायोत्सर्ग मुद्रा में दिखाया गया है।
कल्पसूत्र और महावीर का निर्वाण
जैन साहित्य
कल्पसूत्र जैन धर्म का महत्वपूर्ण ग्रंथ है। परंपरागत रूप से इसे भद्रबाहु से जोड़ा जाता है।
इसमें महावीर, पार्श्वनाथ और ऋषभदेव सहित जैन तीर्थंकरों के जीवन से संबंधित विवरण मिलते हैं।
महावीर ने लगभग 72 वर्ष की आयु में बिहार के पावा या पावापुरी में निर्वाण प्राप्त किया।
उनकी निर्वाण तिथि के विषय में भी 468 ईसा पूर्व तथा 527 ईसा पूर्व की दो प्रमुख परंपराएँ मिलती हैं।
जैन परंपरा महावीर के अंतिम निवास को पावा के राजा हस्तिपाल से संबंधित स्थान से जोड़ती है।
जैन धर्म का अर्थ और स्वरूप
जिन और तीर्थंकर
जैन शब्द की उत्पत्ति जिन शब्द से हुई है। जिन का अर्थ है — वह व्यक्ति जिसने अपनी इंद्रियों, इच्छाओं और सांसारिक आसक्तियों पर विजय प्राप्त कर ली हो।
तीर्थंकर ऐसे महान आध्यात्मिक शिक्षक माने जाते हैं, जो संसार के जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं।
जैन धर्म प्राचीन भारत की श्रमण परंपरा का प्रमुख धर्म था। बौद्ध धर्म की तरह इसने भी कर्मकांड की अपेक्षा नैतिक आचरण, आत्मसंयम और तपस्या पर अधिक बल दिया।
जैन धर्म में मुक्ति व्यक्ति के स्वयं के प्रयास से प्राप्त मानी जाती है।
जैन धर्म के 24 तीर्थंकर
परीक्षा के लिए क्रम
जैन परंपरा के 24 तीर्थंकरों का क्रम इस प्रकार है —
1. ऋषभदेव या आदिनाथ, 2. अजितनाथ, 3. संभवनाथ, 4. अभिनंदननाथ, 5. सुमतिनाथ, 6. पद्मप्रभु, 7. सुपार्श्वनाथ, 8. चंद्रप्रभु, 9. पुष्पदंत या सुविधिनाथ, 10. शीतलनाथ, 11. श्रेयांसनाथ, 12. वासुपूज्य, 13. विमलनाथ, 14. अनंतनाथ, 15. धर्मनाथ, 16. शांतिनाथ, 17. कुंथुनाथ, 18. अरनाथ, 19. मल्लिनाथ, 20. मुनिसुव्रतनाथ, 21. नमिनाथ, 22. नेमिनाथ या अरिष्टनेमि, 23. पार्श्वनाथ और 24. महावीर स्वामी।
प्रतियोगी परीक्षाओं में विशेष रूप से प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव, 23वें पार्श्वनाथ और 24वें महावीर से संबंधित प्रश्न अधिक पूछे जाते हैं।
परीक्षा बिंदु
प्रथम तीर्थंकर — ऋषभदेव।
23वें तीर्थंकर — पार्श्वनाथ।
24वें तीर्थंकर — महावीर स्वामी।
पार्श्वनाथ और महावीर के व्रत
चार व्रत से पाँच महाव्रत
पार्श्वनाथ ने चार प्रमुख व्रतों — अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह पर बल दिया था।
महावीर ने इन चार व्रतों के साथ ब्रह्मचर्य को विशेष रूप से जोड़कर पाँच महाव्रतों की व्यवस्था को प्रमुखता दी।
अहिंसा जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण नैतिक सिद्धांत है। इसमें केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि सभी जीवों के प्रति हिंसा से बचने पर बल दिया गया है।
त्रिरत्न और मोक्ष
सम्यक जीवन का मार्ग
जैन धर्म में मोक्ष प्राप्त करने के लिए त्रिरत्न या रत्नत्रय का पालन आवश्यक माना जाता है।
ये हैं — सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र।
सम्यक दर्शन का अर्थ सत्य के प्रति सही दृष्टिकोण, सम्यक ज्ञान का अर्थ वास्तविकता का सही ज्ञान और सम्यक चरित्र का अर्थ सही आचरण है।
जैन दर्शन के अनुसार कर्म जीव से बंधकर उसे जन्म-मरण के चक्र में बाँधता है। कर्म-बंधन से पूर्ण मुक्ति को मोक्ष कहा जाता है।
अनेकांतवाद और स्यादवाद
जैन दर्शन की विशेषता
जैन दर्शन का प्रसिद्ध सिद्धांत अनेकांतवाद है। इसके अनुसार वास्तविकता के अनेक पक्ष हो सकते हैं और किसी वस्तु को केवल एक दृष्टिकोण से पूरी तरह नहीं समझा जा सकता।
अनेकांतवाद से संबंधित अभिव्यक्ति-पद्धति को स्यादवाद कहा जाता है। इसमें किसी कथन को विशेष परिस्थिति, दृष्टिकोण या अपेक्षा के आधार पर सत्य माना जाता है।
स्यादवाद की विस्तृत तार्किक पद्धति को सप्तभंगी न्याय से भी जोड़ा जाता है, जिसमें किसी वस्तु के विषय में सात प्रकार से कथन किया जाता है।
याद रखें
अनेकांतवाद — वास्तविकता के अनेक पक्ष।
स्यादवाद — सापेक्ष दृष्टिकोण से कथन।
जीव, अजीव और कर्म
जैन दर्शन
जैन दर्शन में संसार को मुख्य रूप से जीव और अजीव के रूप में समझाया जाता है।
जीव चेतन तत्व है, जबकि अजीव चेतना रहित तत्वों को कहा जाता है।
प्रत्येक जीव अपने कर्मों के कारण संसार के जन्म-मरण के चक्र में बंधा रहता है।
तपस्या, संयम, सही ज्ञान और सही आचरण द्वारा कर्मों के प्रभाव को समाप्त कर मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।
जैन संघ की संरचना
साधु, साध्वी और गृहस्थ
जैन परंपरा में धार्मिक समुदाय को व्यापक रूप से चार भागों में समझा जाता है — साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका।
साधु पुरुष संन्यासी और साध्वी स्त्री संन्यासिनी होती हैं।
गृहस्थ पुरुष अनुयायी को श्रावक और गृहस्थ स्त्री अनुयायी को श्राविका कहा जाता है।
महावीर ने तपस्वी जीवन के साथ-साथ गृहस्थ अनुयायियों के लिए भी संयम और नैतिक आचरण का मार्ग बताया।
दिगंबर और श्वेतांबर
जैन धर्म के दो प्रमुख संप्रदाय
| आधार | दिगंबर | श्वेतांबर |
|---|---|---|
| नाम का अर्थ | दिशाओं को वस्त्र मानने वाले | श्वेत अर्थात सफेद वस्त्र धारण करने वाले |
| मुनियों की परंपरा | पूर्ण त्याग के आदर्श में नग्नता को महत्व | सफेद वस्त्र धारण करने की परंपरा |
| आगम साहित्य | श्वेतांबर आगम-संग्रह को मूल रूप में स्वीकार नहीं करते | आगम ग्रंथों की परंपरा को सुरक्षित मानते हैं |
| महावीर के गृहस्थ जीवन | कुछ दिगंबर परंपराएँ महावीर को अविवाहित मानती हैं | यशोदा से विवाह की परंपरा स्वीकार करती हैं |
| स्त्री और मोक्ष | परंपरागत दिगंबर मत में अंतिम मोक्ष से पहले पुरुष जन्म आवश्यक माना गया | स्त्री के लिए भी उसी जन्म में मोक्ष की संभावना स्वीकार की जाती है |
परीक्षा में सबसे अधिक पूछा जाने वाला अंतर
दिगंबर — कठोर तप और नग्न मुनि परंपरा।
श्वेतांबर — श्वेत वस्त्रधारी मुनि परंपरा।
जैन साहित्य और आगम
प्रमुख ग्रंथ
जैन धर्म के धार्मिक साहित्य को सामान्यतः आगम साहित्य कहा जाता है।
श्वेतांबर जैन परंपरा के अनेक आगम अर्धमागधी और अन्य प्राकृत भाषाओं में सुरक्षित हुए।
प्रमुख जैन ग्रंथों में आचारांग सूत्र, सूत्रकृतांग, भगवती सूत्र और कल्पसूत्र विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
भगवती सूत्र में प्राचीन भारत के राजनीतिक और धार्मिक जीवन से संबंधित महत्वपूर्ण सामग्री मिलती है। इसी ग्रंथ में सोलह बड़े राज्यों की एक सूची भी मिलती है।
जैन विद्वानों ने आगे चलकर प्राकृत, संस्कृत, अपभ्रंश, कन्नड़ और गुजराती साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
जैन संगीतियाँ
आगम साहित्य का संकलन
जैन परंपरा में महावीर की शिक्षाओं को सुरक्षित रखने के लिए समय-समय पर आचार्यों की सभाएँ आयोजित की गईं। इनसे संबंधित तिथियों और विवरणों में विभिन्न जैन परंपराओं में अंतर मिलता है।
परंपरागत परीक्षा-विवरण में पाटलिपुत्र में आयोजित सभा को प्रारंभिक जैन आगमों के संकलन से जोड़ा जाता है। इससे स्थूलभद्र का नाम संबंधित माना जाता है।
बाद में गुजरात के वल्लभी में हुई सभा श्वेतांबर आगम साहित्य के अंतिम संकलन और लेखन के लिए विशेष प्रसिद्ध है। इससे देवर्धिगणि क्षमाश्रमण का नाम जुड़ा है।
परीक्षा बिंदु
पाटलिपुत्र — स्थूलभद्र।
वल्लभी — देवर्धिगणि क्षमाश्रमण; श्वेतांबर आगमों का महत्वपूर्ण संकलन।
जैन धर्म का प्रसार
पूर्वी भारत से पश्चिम और दक्षिण भारत तक
जैन धर्म का प्रारंभिक प्रभाव मगध, वैशाली और पूर्वी भारत के क्षेत्रों में विशेष रूप से रहा।
समय के साथ इसका प्रसार मथुरा, राजस्थान, गुजरात और कर्नाटक तक हुआ और ये क्षेत्र जैन धर्म के प्रमुख केंद्र बने।
व्यापारी समुदायों ने भी जैन धर्म के प्रसार और जैन मंदिरों तथा धार्मिक संस्थानों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पश्चिमी और दक्षिण भारत में जैन विद्वानों ने साहित्य, दर्शन, स्थापत्य और कला के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
चंद्रगुप्त मौर्य और भद्रबाहु
जैन परंपरा
जैन परंपरा के अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य अपने जीवन के अंतिम चरण में जैन आचार्य भद्रबाहु से जुड़े।
परंपरा उन्हें दक्षिण भारत के श्रवणबेलगोला से भी जोड़ती है।
श्रवणबेलगोला स्थित चंद्रगिरि पहाड़ी पर चंद्रगुप्त मौर्य से संबंधित जैन परंपराएँ प्रसिद्ध हैं।
इस संबंध को मुख्यतः जैन परंपरागत साहित्य और परंपरा के आधार पर पढ़ना चाहिए।
खारवेल और जैन धर्म
कलिंग में संरक्षण
कलिंग के प्रसिद्ध शासक खारवेल को जैन धर्म का महत्वपूर्ण संरक्षक माना जाता है।
ओडिशा के उदयगिरि और खंडगिरि की गुफाएँ जैन परंपरा से विशेष रूप से संबंधित हैं।
खारवेल के शासन की जानकारी का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत हाथीगुम्फा अभिलेख है।
यह अभिलेख उदयगिरि पहाड़ी पर स्थित है और प्राचीन कलिंग के इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत है।
जैन कला और स्थापत्य
गुफाएँ, मंदिर और प्रतिमाएँ
जैन धर्म ने भारतीय कला और स्थापत्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
प्रमुख जैन कला-केंद्रों में मथुरा का कंकाली टीला, उदयगिरि-खंडगिरि, श्रवणबेलगोला, दिलवाड़ा के जैन मंदिर, रणकपुर और खजुराहो विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
राजस्थान के माउंट आबू स्थित दिलवाड़ा जैन मंदिर अपनी अत्यंत सूक्ष्म संगमरमर नक्काशी के लिए प्रसिद्ध हैं।
राजस्थान का रणकपुर जैन मंदिर आदिनाथ अर्थात ऋषभदेव को समर्पित प्रसिद्ध जैन मंदिर है।
जैन धर्म और बौद्ध धर्म में प्रमुख अंतर
परीक्षा के लिए उपयोगी तुलना
| आधार | जैन धर्म | बौद्ध धर्म |
|---|---|---|
| आत्मा | जीव या आत्मा को स्वीकार करता है | स्थायी आत्मा को स्वीकार नहीं करता; अनात्मवाद |
| तपस्या | कठोर तप और संयम को विशेष महत्व | अत्यधिक तपस्या से हटकर मध्यम मार्ग |
| प्रमुख मार्ग | त्रिरत्न एवं पंचमहाव्रत | चार आर्य सत्य एवं अष्टांगिक मार्ग |
| अहिंसा | अत्यंत कठोर और व्यापक रूप में | महत्वपूर्ण नैतिक सिद्धांत |
| सृष्टिकर्ता ईश्वर | सर्वशक्तिमान सृष्टिकर्ता ईश्वर को स्वीकार नहीं करता | सृष्टिकर्ता ईश्वर को मुक्ति का आवश्यक आधार नहीं मानता |
जैन धर्म — अंतिम परीक्षा पुनरावृत्ति
कुल तीर्थंकर — 24।
प्रथम तीर्थंकर — ऋषभदेव या आदिनाथ।
23वें तीर्थंकर — पार्श्वनाथ।
24वें तीर्थंकर — महावीर स्वामी।
महावीर का बचपन का नाम — वर्धमान।
जन्म — कुंडग्राम, वैशाली के निकट।
पिता — सिद्धार्थ; माता — त्रिशला।
गृहत्याग — लगभग 30 वर्ष की आयु में।
साधना — लगभग 12 वर्ष।
ज्ञान — केवलज्ञान।
प्रमुख गणधर — इंद्रभूति गौतम।
प्रथम प्रमुख भिक्षुणी — चंदनबाला।
त्रिरत्न — सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र।
पंचमहाव्रत — अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।
प्रमुख दार्शनिक सिद्धांत — अनेकांतवाद और स्यादवाद।
प्रमुख भाषा-परंपरा — प्राकृत; जैन आगमों में अर्धमागधी का विशेष महत्व।
दो प्रमुख संप्रदाय — दिगंबर और श्वेतांबर।
महत्वपूर्ण ग्रंथ — कल्पसूत्र, आचारांग सूत्र और भगवती सूत्र।
निर्वाण — पावा/पावापुरी, बिहार।
खारवेल — जैन धर्म का महत्वपूर्ण संरक्षक।
श्रवणबेलगोला — जैन धर्म का प्रमुख दक्षिण भारतीय केंद्र।
गोम्मटेश्वर बाहुबली प्रतिमा — चामुंडराय से संबंधित, लगभग 981 ईस्वी।
जैन धर्म की केंद्रीय नैतिक शिक्षा — अहिंसा।
जैन धर्म
तीर्थंकर, महावीर, सिद्धांत, संप्रदाय, साहित्य एवं प्रमुख केंद्र
जैन तीर्थंकर
ऋषभदेव से महावीर तक
जैन परंपरा में कुल 24 तीर्थंकर माने जाते हैं।
ऋषभदेव या आदिनाथ जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर माने जाते हैं।
पार्श्वनाथ 23वें तीर्थंकर थे। जैन परंपरा के अनुसार वे काशी के राजा अश्वसेन के पुत्र थे।
पार्श्वनाथ ने लगभग 30 वर्ष की आयु में गृहत्याग किया। उन्होंने अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह के चार व्रतों पर बल दिया।
महावीर स्वामी
24वें तीर्थंकर
जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी थे। उनके बचपन का नाम वर्धमान था।
उनका जन्म वैशाली के निकट कुंडग्राम में हुआ था। उनके पिता सिद्धार्थ ज्ञात्रिक कुल के प्रमुख थे।
उनकी माता त्रिशला थीं, जिनका संबंध लिच्छवि प्रमुख चेटक के परिवार से था।
महावीर की तिथियों के विषय में दो प्रमुख परंपराएँ हैं। एक कालक्रम उन्हें लगभग 540–468 ईसा पूर्व और श्वेतांबर परंपरा 599–527 ईसा पूर्व मानती है।
जैन परंपरा में उनकी पत्नी का नाम यशोदा और पुत्री का नाम प्रियदर्शना या अनोज्जा मिलता है।
महावीर का गृहत्याग और केवलज्ञान
वर्धमान से जिन तक
महावीर ने लगभग 30 वर्ष की आयु में गृहत्याग किया।
जैन परंपरा के अनुसार माता-पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने अपने बड़े भाई नंदिवर्धन की अनुमति से संन्यास ग्रहण किया।
लगभग 12 वर्ष की कठोर साधना के बाद उन्हें ऋजुपालिका नदी के तट पर जृम्भिकग्राम के निकट केवलज्ञान प्राप्त हुआ।
इसके बाद वे जिन अर्थात विजेता, अर्हत अर्थात पूज्य और निर्ग्रंथ अर्थात बंधनों से मुक्त कहलाए।
उनके अनुयायी भी प्रारंभिक साहित्य में निर्ग्रंथ नाम से जाने जाते थे।
महावीर का संघ
गणधर और भिक्षुणियाँ
महावीर ने अपनी शिक्षाएँ जनसामान्य की प्राकृत भाषा-परंपरा में दीं। जैन आगमों की प्रमुख भाषा अर्धमागधी प्राकृत रही।
महावीर के 11 प्रमुख गणधर माने जाते हैं। इनमें इंद्रभूति गौतम सबसे प्रसिद्ध गणधर थे।
जमाली महावीर का दामाद और प्रारंभिक शिष्य था। बाद में उसके मतभेद से जैन संघ में प्रारंभिक विवाद उत्पन्न हुआ।
महावीर के बाद उनकी शिक्षाओं की परंपरा में सुधर्मन का विशेष महत्व रहा।
चंदना या चंदनबाला को महावीर के भिक्षुणी संघ की प्रथम प्रमुख भिक्षुणी माना जाता है। जैन परंपरा में उन्हें चम्पा के राजा दधिवाहन की पुत्री बताया गया है।
नामों में अंतर
इंद्रभूति गौतम — प्रमुख गणधर।
जमाली — महावीर का दामाद और प्रारंभिक शिष्य।
चंदनबाला — प्रथम प्रमुख जैन भिक्षुणी।
जैन धर्म के सिद्धांत
मोक्ष का मार्ग
जैन धर्म किसी एक सर्वशक्तिमान सृष्टिकर्ता ईश्वर को स्वीकार नहीं करता।
जैन दर्शन में जीव या आत्मा की मान्यता है। कर्म के कारण जीव जन्म-मरण के बंधन में रहता है।
जैन धर्म के तीन रत्न हैं — सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र।
महावीर ने पाँच महाव्रत बताए — अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।
जैन धर्म के प्रमुख संरक्षक
राजा और राजवंश
प्राचीन और मध्यकालीन भारत में अनेक शासकों ने जैन धर्म को संरक्षण दिया।
इनमें चंद्रगुप्त मौर्य, कलिंग नरेश खारवेल, राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष तथा वनराज चावड़ा जैसे नाम उल्लेखनीय हैं।
मौर्योत्तर काल में मथुरा जैन धर्म का महत्वपूर्ण केंद्र बना। कंकाली टीला से अनेक जैन पुरावशेष मिले हैं।
खजुराहो में चंदेल शासकों के समय अनेक जैन मंदिरों का निर्माण हुआ।
श्रवणबेलगोला और गोम्मटेश्वर
बाहुबली की विशाल प्रतिमा
कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में गंग वंश के मंत्री और सेनापति चामुंडराय ने लगभग 981 ईस्वी में विशाल गोम्मटेश्वर बाहुबली प्रतिमा स्थापित कराई।
यह एकाश्म प्रतिमा लगभग 17.4 मीटर ऊँची है।
बाहुबली को कायोत्सर्ग मुद्रा में दिखाया गया है।
कल्पसूत्र और महावीर का निर्वाण
जैन साहित्य
कल्पसूत्र जैन धर्म का महत्वपूर्ण ग्रंथ है। परंपरागत रूप से इसे भद्रबाहु से जोड़ा जाता है।
इसमें महावीर, पार्श्वनाथ और ऋषभदेव सहित जैन तीर्थंकरों के जीवन से संबंधित विवरण मिलते हैं।
महावीर ने लगभग 72 वर्ष की आयु में बिहार के पावा या पावापुरी में निर्वाण प्राप्त किया।
उनकी निर्वाण तिथि के विषय में भी 468 ईसा पूर्व तथा 527 ईसा पूर्व की दो प्रमुख परंपराएँ मिलती हैं।
जैन परंपरा महावीर के अंतिम निवास को पावा के राजा हस्तिपाल से संबंधित स्थान से जोड़ती है।
जैन धर्म का अर्थ और स्वरूप
जिन और तीर्थंकर
जैन शब्द की उत्पत्ति जिन शब्द से हुई है। जिन का अर्थ है — वह व्यक्ति जिसने अपनी इंद्रियों, इच्छाओं और सांसारिक आसक्तियों पर विजय प्राप्त कर ली हो।
तीर्थंकर ऐसे महान आध्यात्मिक शिक्षक माने जाते हैं, जो संसार के जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं।
जैन धर्म प्राचीन भारत की श्रमण परंपरा का प्रमुख धर्म था। बौद्ध धर्म की तरह इसने भी कर्मकांड की अपेक्षा नैतिक आचरण, आत्मसंयम और तपस्या पर अधिक बल दिया।
जैन धर्म में मुक्ति व्यक्ति के स्वयं के प्रयास से प्राप्त मानी जाती है।
जैन धर्म के 24 तीर्थंकर
परीक्षा के लिए क्रम
जैन परंपरा के 24 तीर्थंकरों का क्रम इस प्रकार है —
1. ऋषभदेव या आदिनाथ, 2. अजितनाथ, 3. संभवनाथ, 4. अभिनंदननाथ, 5. सुमतिनाथ, 6. पद्मप्रभु, 7. सुपार्श्वनाथ, 8. चंद्रप्रभु, 9. पुष्पदंत या सुविधिनाथ, 10. शीतलनाथ, 11. श्रेयांसनाथ, 12. वासुपूज्य, 13. विमलनाथ, 14. अनंतनाथ, 15. धर्मनाथ, 16. शांतिनाथ, 17. कुंथुनाथ, 18. अरनाथ, 19. मल्लिनाथ, 20. मुनिसुव्रतनाथ, 21. नमिनाथ, 22. नेमिनाथ या अरिष्टनेमि, 23. पार्श्वनाथ और 24. महावीर स्वामी।
प्रतियोगी परीक्षाओं में विशेष रूप से प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव, 23वें पार्श्वनाथ और 24वें महावीर से संबंधित प्रश्न अधिक पूछे जाते हैं।
पार्श्वनाथ और महावीर के व्रत
चार व्रत से पाँच महाव्रत
पार्श्वनाथ ने चार प्रमुख व्रतों — अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह पर बल दिया था।
महावीर ने इन चार व्रतों के साथ ब्रह्मचर्य को विशेष रूप से जोड़कर पाँच महाव्रतों की व्यवस्था को प्रमुखता दी।
अहिंसा जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण नैतिक सिद्धांत है। इसमें केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि सभी जीवों के प्रति हिंसा से बचने पर बल दिया गया है।
त्रिरत्न और मोक्ष
सम्यक जीवन का मार्ग
जैन धर्म में मोक्ष प्राप्त करने के लिए त्रिरत्न या रत्नत्रय का पालन आवश्यक माना जाता है।
ये हैं — सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र।
सम्यक दर्शन का अर्थ सत्य के प्रति सही दृष्टिकोण, सम्यक ज्ञान का अर्थ वास्तविकता का सही ज्ञान और सम्यक चरित्र का अर्थ सही आचरण है।
जैन दर्शन के अनुसार कर्म जीव से बंधकर उसे जन्म-मरण के चक्र में बाँधता है। कर्म-बंधन से पूर्ण मुक्ति को मोक्ष कहा जाता है।
अनेकांतवाद और स्यादवाद
जैन दर्शन की विशेषता
जैन दर्शन का प्रसिद्ध सिद्धांत अनेकांतवाद है। इसके अनुसार वास्तविकता के अनेक पक्ष हो सकते हैं और किसी वस्तु को केवल एक दृष्टिकोण से पूरी तरह नहीं समझा जा सकता।
अनेकांतवाद से संबंधित अभिव्यक्ति-पद्धति को स्यादवाद कहा जाता है। इसमें किसी कथन को विशेष परिस्थिति, दृष्टिकोण या अपेक्षा के आधार पर सत्य माना जाता है।
स्यादवाद की विस्तृत तार्किक पद्धति को सप्तभंगी न्याय से भी जोड़ा जाता है, जिसमें किसी वस्तु के विषय में सात प्रकार से कथन किया जाता है।
जीव, अजीव और कर्म
जैन दर्शन
जैन दर्शन में संसार को मुख्य रूप से जीव और अजीव के रूप में समझाया जाता है।
जीव चेतन तत्व है, जबकि अजीव चेतना रहित तत्वों को कहा जाता है।
प्रत्येक जीव अपने कर्मों के कारण संसार के जन्म-मरण के चक्र में बंधा रहता है।
तपस्या, संयम, सही ज्ञान और सही आचरण द्वारा कर्मों के प्रभाव को समाप्त कर मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।
जैन संघ की संरचना
साधु, साध्वी और गृहस्थ
जैन परंपरा में धार्मिक समुदाय को व्यापक रूप से चार भागों में समझा जाता है — साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका।
साधु पुरुष संन्यासी और साध्वी स्त्री संन्यासिनी होती हैं।
गृहस्थ पुरुष अनुयायी को श्रावक और गृहस्थ स्त्री अनुयायी को श्राविका कहा जाता है।
महावीर ने तपस्वी जीवन के साथ-साथ गृहस्थ अनुयायियों के लिए भी संयम और नैतिक आचरण का मार्ग बताया।
दिगंबर और श्वेतांबर
जैन धर्म के दो प्रमुख संप्रदाय
| आधार | दिगंबर | श्वेतांबर |
|---|---|---|
| नाम का अर्थ | दिशाओं को वस्त्र मानने वाले | श्वेत अर्थात सफेद वस्त्र धारण करने वाले |
| मुनियों की परंपरा | पूर्ण त्याग के आदर्श में नग्नता को महत्व | सफेद वस्त्र धारण करने की परंपरा |
| आगम साहित्य | श्वेतांबर आगम-संग्रह को मूल रूप में स्वीकार नहीं करते | आगम ग्रंथों की परंपरा को सुरक्षित मानते हैं |
| महावीर के गृहस्थ जीवन | कुछ दिगंबर परंपराएँ महावीर को अविवाहित मानती हैं | यशोदा से विवाह की परंपरा स्वीकार करती हैं |
| स्त्री और मोक्ष | परंपरागत दिगंबर मत में अंतिम मोक्ष से पहले पुरुष जन्म आवश्यक माना गया | स्त्री के लिए भी उसी जन्म में मोक्ष की संभावना स्वीकार की जाती है |
जैन साहित्य और आगम
प्रमुख ग्रंथ
जैन धर्म के धार्मिक साहित्य को सामान्यतः आगम साहित्य कहा जाता है।
श्वेतांबर जैन परंपरा के अनेक आगम अर्धमागधी और अन्य प्राकृत भाषाओं में सुरक्षित हुए।
प्रमुख जैन ग्रंथों में आचारांग सूत्र, सूत्रकृतांग, भगवती सूत्र और कल्पसूत्र विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
भगवती सूत्र में प्राचीन भारत के राजनीतिक और धार्मिक जीवन से संबंधित महत्वपूर्ण सामग्री मिलती है।
जैन विद्वानों ने आगे चलकर प्राकृत, संस्कृत, अपभ्रंश, कन्नड़ और गुजराती साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
जैन संगीतियाँ
आगम साहित्य का संकलन
जैन परंपरा में महावीर की शिक्षाओं को सुरक्षित रखने के लिए समय-समय पर आचार्यों की सभाएँ आयोजित की गईं। इनसे संबंधित तिथियों और विवरणों में विभिन्न जैन परंपराओं में अंतर मिलता है।
परंपरागत परीक्षा-विवरण में पाटलिपुत्र में आयोजित सभा को प्रारंभिक जैन आगमों के संकलन से जोड़ा जाता है। इससे स्थूलभद्र का नाम संबंधित माना जाता है।
बाद में गुजरात के वल्लभी में हुई सभा श्वेतांबर आगम साहित्य के अंतिम संकलन और लेखन के लिए विशेष प्रसिद्ध है। इससे देवर्धिगणि क्षमाश्रमण का नाम जुड़ा है।
जैन धर्म का प्रसार
पूर्वी भारत से पश्चिम और दक्षिण भारत तक
जैन धर्म का प्रारंभिक प्रभाव मगध, वैशाली और पूर्वी भारत के क्षेत्रों में विशेष रूप से रहा।
समय के साथ इसका प्रसार मथुरा, राजस्थान, गुजरात और कर्नाटक तक हुआ और ये क्षेत्र जैन धर्म के प्रमुख केंद्र बने।
व्यापारी समुदायों ने भी जैन धर्म के प्रसार और जैन मंदिरों तथा धार्मिक संस्थानों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
चंद्रगुप्त मौर्य और भद्रबाहु
जैन परंपरा
जैन परंपरा के अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य अपने जीवन के अंतिम चरण में जैन आचार्य भद्रबाहु से जुड़े।
परंपरा उन्हें दक्षिण भारत के श्रवणबेलगोला से भी जोड़ती है।
श्रवणबेलगोला स्थित चंद्रगिरि पहाड़ी पर चंद्रगुप्त मौर्य से संबंधित जैन परंपराएँ प्रसिद्ध हैं।
खारवेल और जैन धर्म
कलिंग में संरक्षण
कलिंग के प्रसिद्ध शासक खारवेल को जैन धर्म का महत्वपूर्ण संरक्षक माना जाता है।
ओडिशा के उदयगिरि और खंडगिरि की गुफाएँ जैन परंपरा से विशेष रूप से संबंधित हैं।
खारवेल के शासन की जानकारी का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत हाथीगुम्फा अभिलेख है।
जैन कला और स्थापत्य
गुफाएँ, मंदिर और प्रतिमाएँ
जैन धर्म ने भारतीय कला और स्थापत्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
प्रमुख जैन कला-केंद्रों में मथुरा का कंकाली टीला, उदयगिरि-खंडगिरि, श्रवणबेलगोला, दिलवाड़ा के जैन मंदिर, रणकपुर और खजुराहो विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
राजस्थान के माउंट आबू स्थित दिलवाड़ा जैन मंदिर अपनी अत्यंत सूक्ष्म संगमरमर नक्काशी के लिए प्रसिद्ध हैं।
राजस्थान का रणकपुर जैन मंदिर आदिनाथ अर्थात ऋषभदेव को समर्पित प्रसिद्ध जैन मंदिर है।
जैन धर्म और बौद्ध धर्म में प्रमुख अंतर
परीक्षा के लिए उपयोगी तुलना
| आधार | जैन धर्म | बौद्ध धर्म |
|---|---|---|
| आत्मा | जीव या आत्मा को स्वीकार करता है | स्थायी आत्मा को स्वीकार नहीं करता; अनात्मवाद |
| तपस्या | कठोर तप और संयम को विशेष महत्व | अत्यधिक तपस्या से हटकर मध्यम मार्ग |
| प्रमुख मार्ग | त्रिरत्न एवं पंचमहाव्रत | चार आर्य सत्य एवं अष्टांगिक मार्ग |
| अहिंसा | अत्यंत कठोर और व्यापक रूप में | महत्वपूर्ण नैतिक सिद्धांत |
| सृष्टिकर्ता ईश्वर | सर्वशक्तिमान सृष्टिकर्ता ईश्वर को स्वीकार नहीं करता | सृष्टिकर्ता ईश्वर को मुक्ति का आवश्यक आधार नहीं मानता |
जैन धर्म — अंतिम परीक्षा पुनरावृत्ति
कुल तीर्थंकर — 24।
प्रथम तीर्थंकर — ऋषभदेव या आदिनाथ।
23वें तीर्थंकर — पार्श्वनाथ।
24वें तीर्थंकर — महावीर स्वामी।
महावीर का बचपन का नाम — वर्धमान।
जन्म — कुंडग्राम, वैशाली के निकट।
पिता — सिद्धार्थ; माता — त्रिशला।
गृहत्याग — लगभग 30 वर्ष की आयु में।
साधना — लगभग 12 वर्ष।
ज्ञान — केवलज्ञान।
प्रमुख गणधर — इंद्रभूति गौतम।
प्रथम प्रमुख भिक्षुणी — चंदनबाला।
त्रिरत्न — सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र।
पंचमहाव्रत — अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।
प्रमुख दार्शनिक सिद्धांत — अनेकांतवाद और स्यादवाद।
दो प्रमुख संप्रदाय — दिगंबर और श्वेतांबर।
महत्वपूर्ण ग्रंथ — कल्पसूत्र, आचारांग सूत्र और भगवती सूत्र।
निर्वाण — पावा/पावापुरी, बिहार।
खारवेल — जैन धर्म का महत्वपूर्ण संरक्षक।
श्रवणबेलगोला — जैन धर्म का प्रमुख दक्षिण भारतीय केंद्र।
गोम्मटेश्वर बाहुबली प्रतिमा — चामुंडराय से संबंधित, लगभग 981 ईस्वी।
जैन धर्म की केंद्रीय नैतिक शिक्षा — अहिंसा।