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ज्वार-भाटा
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ज्वार-भाटा

कारण, प्रकार, समय, ज्वारीय चक्र और प्रमुख ज्वारीय क्षेत्र

ज्वार-भाटा क्या है?

समुद्र और महासागरों के जलस्तर में नियमित रूप से होने वाली वृद्धि और गिरावट को ज्वार-भाटा कहा जाता है।

जलस्तर के अपने उच्चतम स्तर तक पहुँचने को ज्वार और निम्नतम स्तर तक पहुँचने को भाटा कहा जाता है।

ज्वार-भाटा की उत्पत्ति मुख्यतः चंद्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव तथा पृथ्वी-चंद्रमा प्रणाली की गति से संबंधित है। पृथ्वी के घूर्णन के कारण पृथ्वी के अलग-अलग स्थान समय के साथ ज्वारीय उभारों के सापेक्ष अपनी स्थिति बदलते रहते हैं, जिससे किसी तट पर ज्वार और भाटा क्रमशः अनुभव किए जाते हैं।

ज्वार-भाटा समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र, तटीय क्षेत्रों, बंदरगाहों, नौपरिवहन, मत्स्य पालन तथा ज्वारीय ऊर्जा उत्पादन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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ज्वार-भाटा का प्रमुख कारण

चंद्रमा और सूर्य का गुरुत्वाकर्षण प्रभाव

ज्वार-भाटा की उत्पत्ति में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव की होती है।

सूर्य भी पृथ्वी के समुद्री जल पर गुरुत्वाकर्षण प्रभाव डालता है, लेकिन ज्वार उत्पन्न करने में चंद्रमा का प्रभाव सूर्य की तुलना में अधिक होता है।

इसका कारण केवल खगोलीय पिंड का कुल गुरुत्वाकर्षण बल नहीं, बल्कि पृथ्वी के निकट और दूर वाले भागों पर उसके गुरुत्वाकर्षण प्रभाव में होने वाला अंतर है। चंद्रमा पृथ्वी के बहुत निकट होने के कारण ज्वार उत्पन्न करने की उसकी क्षमता अधिक होती है।

चंद्रमा और सूर्य की पृथ्वी के सापेक्ष स्थिति बदलने पर ज्वार की ऊँचाई और ज्वारीय परास भी बदलती रहती है।

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चंद्रमा का प्रभाव

ज्वार उत्पन्न करने वाला प्रमुख खगोलीय प्रभाव

चंद्रमा पृथ्वी के निकट स्थित होने के कारण समुद्र के जल पर महत्वपूर्ण ज्वारीय प्रभाव डालता है।

पृथ्वी के चंद्रमा की ओर वाले भाग पर समुद्री जल अपेक्षाकृत अधिक आकर्षित होता है और वहाँ ज्वारीय उभार विकसित होता है।

पृथ्वी के विपरीत भाग पर भी पृथ्वी-चंद्रमा प्रणाली की गति और जड़त्वीय प्रभाव के कारण दूसरा ज्वारीय उभार बनता है।

सरल आदर्श स्थिति में पृथ्वी पर एक समय दो विपरीत ज्वारीय उभारों की कल्पना की जाती है।

🎯 याद रखें

ज्वार उत्पन्न करने में चंद्रमा का प्रभाव सूर्य से अधिक महत्वपूर्ण है।

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सूर्य का प्रभाव

ज्वार की ऊँचाई में परिवर्तन

सूर्य भी अपने गुरुत्वाकर्षण प्रभाव के कारण समुद्री ज्वारों को प्रभावित करता है।

सूर्य का आकार और द्रव्यमान चंद्रमा से बहुत अधिक है, लेकिन पृथ्वी से अत्यधिक दूरी पर होने के कारण उसका ज्वार उत्पन्न करने वाला प्रभाव चंद्रमा की तुलना में कम होता है।

सूर्य और चंद्रमा की ज्वारीय शक्तियाँ कभी एक-दूसरे को मजबूत करती हैं और कभी आंशिक रूप से एक-दूसरे के प्रभाव को कम करती हैं।

इसी कारण महाज्वार और नीप ज्वार जैसी स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं।

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पृथ्वी के घूर्णन की भूमिका

ज्वार के समय और स्थान में परिवर्तन

पृथ्वी अपनी धुरी पर निरंतर घूमती है। इसके साथ पृथ्वी के अलग-अलग तटीय स्थान ज्वारीय उभारों के सापेक्ष अपनी स्थिति बदलते रहते हैं।

इस कारण किसी स्थान पर जलस्तर समय के साथ बढ़ता और घटता दिखाई देता है।

पृथ्वी का घूर्णन ज्वार की मूल गुरुत्वीय शक्ति उत्पन्न नहीं करता, लेकिन किसी स्थान पर ज्वार और भाटा के क्रम तथा समय को समझने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

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ज्वार

समुद्री जल का उच्चतम स्तर

जब किसी स्थान पर समुद्र का जलस्तर बढ़ते-बढ़ते अपने स्थानीय उच्चतम स्तर पर पहुँचता है, तो उसे ज्वार कहा जाता है।

ज्वार के समय समुद्र का जल तट की ओर अधिक ऊपर तक पहुँच सकता है।

बंदरगाहों और उथले समुद्री मार्गों में उच्च ज्वार बड़े जहाजों के प्रवेश और निकास में उपयोगी हो सकता है।

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भाटा

समुद्री जल का निम्नतम स्तर

जब समुद्र का जलस्तर घटते-घटते अपने स्थानीय निम्नतम स्तर पर पहुँचता है, तो उसे भाटा कहा जाता है।

भाटा के समय समुद्र का जल तट से पीछे हट जाता है और कई तटीय क्षेत्रों में समुद्र तल का कुछ भाग दिखाई देने लगता है।

ज्वार और भाटा के जलस्तरों के बीच ऊँचाई के अंतर को ज्वारीय परास कहा जाता है।

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महाज्वार

अमावस्या और पूर्णिमा का प्रबल ज्वार

जब सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा लगभग एक सीध में स्थित होते हैं, तब सूर्य और चंद्रमा के ज्वारीय प्रभाव एक-दूसरे को मजबूत करते हैं।

इस समय सामान्य की तुलना में उच्च ज्वार अधिक ऊँचा और निम्न ज्वार अधिक नीचा हो सकता है। इससे ज्वारीय परास बढ़ जाता है।

इस स्थिति को महाज्वार कहा जाता है।

महाज्वार सामान्यतः अमावस्या और पूर्णिमा के आसपास आता है।

इसके नाम का वसंत ऋतु से कोई संबंध नहीं है। यह वर्ष के प्रत्येक मौसम में हो सकता है।

🎯 अत्यंत महत्वपूर्ण

अमावस्या + पूर्णिमा → सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा लगभग एक सीध में → अधिक ज्वारीय परास → महाज्वार।

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नीप ज्वार

प्रथम और तृतीय चतुर्थांश का कमजोर ज्वार

जब पृथ्वी से देखने पर सूर्य और चंद्रमा की दिशाएँ लगभग 90° के कोण पर होती हैं, तब सूर्य और चंद्रमा के ज्वारीय प्रभाव एक-दूसरे को आंशिक रूप से कम करते हैं।

इस समय उच्च ज्वार सामान्य की अपेक्षा कम ऊँचा और निम्न ज्वार कम नीचा होता है। परिणामस्वरूप ज्वारीय परास कम हो जाता है।

इस स्थिति को नीप ज्वार कहा जाता है।

यह चंद्रमा के प्रथम और तृतीय चतुर्थांश के समय आता है, जो भारतीय चंद्र पक्ष की गणना में लगभग शुक्ल तथा कृष्ण पक्ष की सप्तमी-अष्टमी के आसपास पड़ता है।

🎯 भ्रम से बचें

नीप ज्वार त्रयोदशी के समय नहीं होता। इसे चंद्रमा के प्रथम और तृतीय चतुर्थांश अर्थात लगभग अष्टमी के आसपास याद करें।

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महाज्वार और नीप ज्वार में अंतर

चंद्र अवस्थाओं के आधार पर

आधार महाज्वार नीप ज्वार
खगोलीय स्थिति सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा लगभग एक सीध में सूर्य और चंद्रमा पृथ्वी से लगभग 90° पर
चंद्र अवस्था अमावस्या और पूर्णिमा प्रथम और तृतीय चतुर्थांश
उच्च ज्वार सामान्यतः अधिक ऊँचा सामान्यतः अपेक्षाकृत कम
निम्न ज्वार सामान्यतः अधिक नीचा सामान्यतः अपेक्षाकृत कम नीचा
ज्वारीय परास अधिक कम
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दैनिक ज्वार-भाटा चक्र

चंद्र-दिवस और ज्वार का समय

चंद्रमा पृथ्वी की परिक्रमा भी कर रहा है। इसलिए पृथ्वी के किसी स्थान को चंद्रमा के सापेक्ष फिर उसी स्थिति में आने में केवल 24 घंटे नहीं, बल्कि लगभग 24 घंटे 50 मिनट लगते हैं। इसे चंद्र-दिवस के रूप में समझा जाता है।

अर्धदैनिक ज्वारीय व्यवस्था वाले क्षेत्रों में एक चंद्र-दिवस के दौरान सामान्यतः दो उच्च ज्वार और दो निम्न ज्वार आते हैं।

दो क्रमिक उच्च ज्वारों के बीच औसतन लगभग 12 घंटे 25 मिनट का अंतर होता है।

एक उच्च ज्वार और उसके बाद आने वाले निम्न ज्वार के बीच आदर्श औसत अंतर लगभग 6 घंटे 12 मिनट होता है।

लेकिन ये औसत मान हैं। वास्तविक तटीय ज्वार का समय स्थानीय समुद्री परिस्थितियों के कारण इससे आगे-पीछे हो सकता है।

📗 समय याद रखें

चंद्र-दिवस ≈ 24 घंटे 50 मिनट

उच्च ज्वार → अगला उच्च ज्वार ≈ 12 घंटे 25 मिनट

उच्च ज्वार → अगला निम्न ज्वार ≈ 6 घंटे 12 मिनट

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ज्वार के समय का उदाहरण

आदर्श अर्धदैनिक चक्र

यदि किसी आदर्श अर्धदैनिक ज्वारीय क्षेत्र में सुबह 6:00 बजे उच्च ज्वार आता है, तो लगभग 6 घंटे 12 मिनट बाद करीब 12:12 बजे निम्न ज्वार हो सकता है।

इसके बाद लगभग 18:25 बजे अगला उच्च ज्वार तथा लगभग 00:37 बजे अगला निम्न ज्वार माना जा सकता है।

यह केवल औसत ज्वारीय अंतराल को समझाने वाला उदाहरण है। किसी वास्तविक बंदरगाह या समुद्र तट के लिए ज्वार का सही समय स्थानीय ज्वार-सारणी से निर्धारित किया जाता है।

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क्या हर स्थान पर दो ज्वार आते हैं?

दैनिक, अर्धदैनिक और मिश्रित ज्वार

विश्व के प्रत्येक तट पर प्रतिदिन ठीक दो समान उच्च ज्वार और दो समान निम्न ज्वार आना आवश्यक नहीं है।

अर्धदैनिक ज्वार में एक चंद्र-दिवस में सामान्यतः दो उच्च और दो निम्न ज्वार आते हैं तथा दोनों उच्च ज्वारों की ऊँचाई लगभग समान हो सकती है।

दैनिक ज्वार में एक चंद्र-दिवस में सामान्यतः एक उच्च और एक निम्न ज्वार प्रमुख होता है।

मिश्रित ज्वार में दो उच्च और दो निम्न ज्वार हो सकते हैं, लेकिन उनकी ऊँचाइयों में स्पष्ट अंतर रहता है।

वास्तविक ज्वारीय स्वरूप तट की आकृति, महासागरीय बेसिन, जल की गहराई और अन्य स्थानीय परिस्थितियों से प्रभावित होता है।

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ज्वार के समय को प्रभावित करने वाले कारक

खगोलीय और स्थानीय कारण

चंद्रमा की स्थिति: चंद्रमा की पृथ्वी के सापेक्ष बदलती स्थिति ज्वार के समय और ज्वारीय परास का प्रमुख खगोलीय कारण है।

सूर्य की स्थिति: सूर्य की स्थिति चंद्रमा के ज्वारीय प्रभाव को बढ़ा या आंशिक रूप से कम कर सकती है।

पृथ्वी का घूर्णन: पृथ्वी के घूमने के कारण अलग-अलग स्थान ज्वारीय उभारों के सापेक्ष बदलते रहते हैं।

समुद्र तट की आकृति: संकरी खाड़ियाँ, मुहाने और समुद्री बेसिन ज्वारीय ऊँचाई और समय को काफी बदल सकते हैं।

समुद्र की गहराई: उथले और गहरे जल में ज्वारीय तरंगों का व्यवहार अलग हो सकता है।

द्वीप और जलडमरूमध्य: समुद्री जल के आवागमन को सीमित या निर्देशित करके ये ज्वारीय समय और परास को प्रभावित करते हैं।

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मासिक ज्वार-भाटा चक्र

चंद्रमा की अवस्थाओं के साथ परिवर्तन

लगभग 29.5 दिनों के चंद्र मास में चंद्रमा की पृथ्वी और सूर्य के सापेक्ष स्थिति लगातार बदलती रहती है।

अमावस्या और पूर्णिमा के आसपास सूर्य और चंद्रमा का ज्वारीय प्रभाव मिलकर महाज्वार उत्पन्न करता है।

इसके लगभग एक सप्ताह बाद प्रथम अथवा तृतीय चतुर्थांश के समय सूर्य और चंद्रमा का ज्वारीय प्रभाव एक-दूसरे को आंशिक रूप से कम करता है और नीप ज्वार बनता है।

इस प्रकार सामान्यतः एक चंद्र मास में दो महाज्वार अवधियाँ और दो नीप ज्वार अवधियाँ होती हैं।

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फंडी की खाड़ी

विश्व के सर्वाधिक ज्वारीय परास वाला प्रसिद्ध क्षेत्र

कनाडा के अटलांटिक तट पर स्थित फंडी की खाड़ी विश्व के अत्यधिक ज्वारीय परास के लिए प्रसिद्ध है।

खाड़ी के ऊपरी भागों में उच्च और निम्न ज्वार के जलस्तर के बीच अंतर लगभग 16 मीटर तक पहुँच सकता है।

इस असाधारण ज्वारीय परास का प्रमुख कारण खाड़ी की विशेष आकार-रचना तथा समुद्री जल की प्राकृतिक अनुनाद प्रक्रिया है।

🎯 परीक्षा बिंदु

विश्व के सर्वोच्च ज्वारों के लिए प्रसिद्ध — फंडी की खाड़ी, कनाडा।

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ब्रिटनी तट और ज्वारीय ऊर्जा

फ्रांस की रांस ज्वारीय विद्युत परियोजना

फ्रांस के ब्रिटनी तट पर ज्वारीय ऊर्जा के उपयोग का विश्व प्रसिद्ध उदाहरण मिलता है।

ब्रिटनी में रांस नदी के मुहाने पर स्थित ला रांस ज्वारीय विद्युत संयंत्र समुद्र के ज्वार और भाटा के कारण उत्पन्न जलस्तर अंतर का उपयोग करके बिजली उत्पन्न करता है।

यह संयंत्र 1966 से संचालित है और ज्वारीय ऊर्जा के शुरुआती बड़े व्यावसायिक उदाहरणों में गिना जाता है।

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सुंदरबन डेल्टा

ज्वार प्रभावित मैंग्रोव क्षेत्र

भारत और बांग्लादेश में फैला सुंदरबन डेल्टा बंगाल की खाड़ी से प्रभावित विशाल ज्वारीय क्षेत्र है।

यहाँ ज्वार-भाटा का प्रभाव नदीमुखों, खाड़ियों, ज्वारीय जलमार्गों और मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ता है।

समुद्री खारे जल और नदियों के मीठे जल की पारस्परिक क्रिया के कारण सुंदरबन में विशिष्ट तटीय पारिस्थितिकी विकसित हुई है।

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अन्य ज्वारीय ऊर्जा क्षेत्र

चिली और स्कॉटलैंड सहित समुद्री ऊर्जा संभावनाएँ

विश्व के अनेक तटीय देशों में ज्वार और तेज ज्वारीय धाराओं से ऊर्जा प्राप्त करने की तकनीकों पर कार्य किया गया है।

स्कॉटलैंड के आसपास के समुद्री क्षेत्रों में तेज ज्वारीय धाराओं के कारण ज्वारीय ऊर्जा परियोजनाओं और परीक्षणों का विशेष महत्व है।

चिली के लंबे समुद्री तट और कुछ संकरे समुद्री मार्गों में भी समुद्री तथा ज्वारीय ऊर्जा की संभावनाओं का अध्ययन किया गया है।

ज्वारीय ऊर्जा का उत्पादन स्थान विशेष पर उपलब्ध ज्वारीय परास, ज्वारीय धाराओं की गति, समुद्र तल की बनावट तथा आर्थिक व्यवहार्यता पर निर्भर करता है।

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ज्वार-भाटा का महत्व

नौपरिवहन, पारिस्थितिकी और ऊर्जा

नौपरिवहन: उच्च ज्वार के समय कुछ उथले बंदरगाहों और नदीमुखों में जल की गहराई बढ़ जाती है, जिससे बड़े जहाजों का आवागमन आसान हो सकता है।

बंदरगाहों की सफाई: ज्वारीय धाराएँ कुछ बंदरगाहों और मुहानों से अवसाद तथा प्रदूषक पदार्थों को हटाने में मदद कर सकती हैं।

मत्स्य पालन: ज्वार समुद्री जीवों की गतिविधि, पोषक पदार्थों के वितरण और मछली पकड़ने के समय को प्रभावित करता है।

तटीय पारिस्थितिकी: मैंग्रोव, ज्वारीय दलदल और अंतर-ज्वारीय क्षेत्र ज्वार-भाटा पर अत्यधिक निर्भर होते हैं।

ज्वारीय ऊर्जा: उच्च और निम्न ज्वार के जलस्तर अंतर अथवा ज्वारीय धाराओं की ऊर्जा से विद्युत उत्पन्न की जा सकती है।

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प्रमुख शब्द एक नज़र में

परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण परिभाषाएँ

शब्द अर्थ
ज्वार समुद्री जलस्तर का स्थानीय उच्चतम स्तर
भाटा समुद्री जलस्तर का स्थानीय निम्नतम स्तर
ज्वारीय परास उच्च ज्वार और निम्न ज्वार के जलस्तर का अंतर
महाज्वार अमावस्या और पूर्णिमा के आसपास अधिक ज्वारीय परास
नीप ज्वार प्रथम और तृतीय चतुर्थांश के आसपास कम ज्वारीय परास
चंद्र-दिवस लगभग 24 घंटे 50 मिनट
अर्धदैनिक ज्वार एक चंद्र-दिवस में सामान्यतः दो उच्च और दो निम्न ज्वार
दैनिक ज्वार एक चंद्र-दिवस में सामान्यतः एक उच्च और एक निम्न ज्वार
मिश्रित ज्वार दो उच्च और दो निम्न ज्वार, लेकिन उनकी ऊँचाइयों में अंतर
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भ्रम से बचने वाली बातें

परीक्षा में सही अवधारणा

महाज्वार का अर्थ केवल बहुत ऊँचा उच्च ज्वार नहीं है; इसमें उच्च और निम्न ज्वार के बीच ज्वारीय परास सामान्य से अधिक होता है।

नीप ज्वार का अर्थ ज्वार का समाप्त हो जाना नहीं है; इसमें केवल ज्वारीय परास अपेक्षाकृत कम होता है।

महाज्वार अमावस्या और पूर्णिमा के आसपास बनता है।

नीप ज्वार प्रथम और तृतीय चतुर्थांश में बनता है; इसे त्रयोदशी से नहीं जोड़ना चाहिए।

हर समुद्री तट पर प्रतिदिन ठीक दो उच्च और दो निम्न ज्वार आना अनिवार्य नहीं है।

12 घंटे 25 मिनट तथा 6 घंटे 12 मिनट के अंतर आदर्श अर्धदैनिक ज्वारीय चक्र के औसत हैं।

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त्वरित पुनरावृत्ति

एक नज़र में पूरा ज्वार-भाटा

चंद्रमा — प्रमुख ज्वारीय प्रभाव सूर्य — सहायक प्रभाव
जल ऊपर — ज्वार जल नीचे — भाटा
अमावस्या/पूर्णिमा महाज्वार
प्रथम/तृतीय चतुर्थांश नीप ज्वार
दो उच्च ज्वार लगभग 12 घंटे 25 मिनट
फंडी की खाड़ी विश्व प्रसिद्ध उच्च ज्वारीय परास

⚡ अंतिम पुनरावृत्ति बिंदु

समुद्र के जलस्तर में नियमित वृद्धि और गिरावट को ज्वार-भाटा कहा जाता है।

ज्वार-भाटा मुख्यतः चंद्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव से उत्पन्न होता है।

चंद्रमा पृथ्वी के अधिक निकट होने के कारण ज्वार उत्पन्न करने में सूर्य से अधिक प्रभावी है।

समुद्र के जलस्तर के उच्चतम स्तर को ज्वार और निम्नतम स्तर को भाटा कहा जाता है।

उच्च ज्वार और निम्न ज्वार के जलस्तर के अंतर को ज्वारीय परास कहते हैं।

अमावस्या और पूर्णिमा के आसपास सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा लगभग एक सीध में होने से महाज्वार बनता है।

प्रथम और तृतीय चतुर्थांश के समय सूर्य और चंद्रमा लगभग समकोण पर होने से नीप ज्वार बनता है।

नीप ज्वार को भारतीय चंद्र पक्ष में लगभग सप्तमी-अष्टमी के आसपास समझना उचित है; इसे त्रयोदशी से नहीं जोड़ना चाहिए।

महाज्वार में ज्वारीय परास अधिक और नीप ज्वार में ज्वारीय परास कम होता है।

एक चंद्र-दिवस लगभग 24 घंटे 50 मिनट का होता है।

आदर्श अर्धदैनिक ज्वारीय चक्र में दो क्रमिक उच्च ज्वारों के बीच लगभग 12 घंटे 25 मिनट का अंतर होता है।

उच्च ज्वार और उसके अगले निम्न ज्वार के बीच औसत अंतर लगभग 6 घंटे 12 मिनट होता है।

हर स्थान पर प्रतिदिन दो समान उच्च और दो समान निम्न ज्वार नहीं आते; ज्वार दैनिक, अर्धदैनिक और मिश्रित प्रकार के हो सकते हैं।

तट की आकृति, समुद्र की गहराई, खाड़ी, द्वीप और जलडमरूमध्य ज्वार के समय और ऊँचाई को प्रभावित करते हैं।

कनाडा की फंडी की खाड़ी विश्व के सर्वोच्च ज्वारों और अत्यधिक ज्वारीय परास के लिए प्रसिद्ध है।

फंडी की खाड़ी के ऊपरी भाग में ज्वारीय परास लगभग 16 मीटर तक पहुँच सकता है।

फ्रांस के ब्रिटनी क्षेत्र में स्थित ला रांस ज्वारीय विद्युत संयंत्र ज्वारीय ऊर्जा उत्पादन का प्रसिद्ध उदाहरण है।

सुंदरबन डेल्टा भारत-बांग्लादेश का ज्वार प्रभावित महत्वपूर्ण मैंग्रोव पारिस्थितिकी क्षेत्र है।

ज्वार-भाटा नौपरिवहन, बंदरगाह, मत्स्य पालन, तटीय पारिस्थितिकी और ज्वारीय ऊर्जा उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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