ज्वालामुखी
संरचना, उद्गार से निकलने वाले पदार्थ, लावा एवं सक्रियता के आधार पर वर्गीकरण
ज्वालामुखी क्या है?
ज्वालामुखी पृथ्वी की सतह पर स्थित ऐसी दरार, छिद्र या निकास है जिसका संबंध पृथ्वी के आंतरिक भाग से होता है। इसके माध्यम से पृथ्वी के भीतर से लावा, ज्वालामुखीय गैसें, जलवाष्प, राख तथा विभिन्न खंडित पदार्थ बाहर निकलते हैं।
जब पृथ्वी के भीतर का मैग्मा ऊपर की ओर बढ़कर किसी दरार या छिद्र के माध्यम से सतह पर पहुँचता है, तब ज्वालामुखीय उद्गार होता है। लगातार होने वाले उद्गारों से लावा और अन्य पदार्थ आसपास जमा होकर ज्वालामुखीय पर्वत या शंकु का निर्माण कर सकते हैं।
ज्वालामुखी की संरचना
Parts of a Volcano
ज्वालामुखी की संरचना में सामान्यतः ज्वालामुखी शंकु, ज्वालामुखी छिद्र, ज्वालामुखी नली और ज्वालामुखी मुख जैसे प्रमुख भाग पाए जाते हैं। पृथ्वी के भीतर मैग्मा जिस मार्ग से ऊपर आता है, वही मार्ग अंततः सतह पर स्थित ज्वालामुखीय छिद्र से जुड़ता है।
प्रत्येक ज्वालामुखी की आकृति एक जैसी नहीं होती। इसका आकार और संरचना लावा की प्रकृति, उद्गार की तीव्रता और उससे निकलने वाले ठोस पदार्थों की मात्रा पर निर्भर करती है।
ज्वालामुखी शंकु
Volcanic Cone
जब ज्वालामुखी से निकलने वाला लावा, राख, शैल-खंड और अन्य ज्वालामुखीय पदार्थ उसके छिद्र के चारों ओर लगातार जमा होने लगते हैं, तब धीरे-धीरे एक शंकु के आकार की स्थलाकृति बनती है, जिसे ज्वालामुखी शंकु कहते हैं।
ज्वालामुखी शंकु की ऊँचाई, ढाल और आकार ज्वालामुखी से निकलने वाले पदार्थों तथा लावा की प्रवाहशीलता पर निर्भर करते हैं।
ज्वालामुखी छिद्र
Volcanic Vent
ज्वालामुखी पर्वत के ऊपरी भाग में वह खुला स्थान जिससे लावा, गैसें, राख और अन्य पदार्थ बाहर निकलते हैं, ज्वालामुखी छिद्र कहलाता है।
मुख्य छिद्र सामान्यतः ज्वालामुखी शंकु के केंद्रीय भाग में पाया जाता है, लेकिन कई ज्वालामुखियों में मुख्य छिद्र के अतिरिक्त किनारों पर छोटे सहायक छिद्र भी बन सकते हैं।
ज्वालामुखी नली
Volcanic Conduit
ज्वालामुखी छिद्र का संबंध धरातल के नीचे स्थित जिस मार्ग या नली से होता है, उसे ज्वालामुखी नली कहते हैं।
पृथ्वी के भीतर का मैग्मा इसी मार्ग से ऊपर उठकर ज्वालामुखी के छिद्र तक पहुँचता है और उसके बाद सतह पर बाहर निकलता है।
यह नली हमेशा बहुत पतली और एकसमान नहीं होती; वास्तविक ज्वालामुखीय तंत्र में इसके साथ शाखाएँ और सहायक मार्ग भी हो सकते हैं।
ज्वालामुखी का मुख
Volcanic Crater
ज्वालामुखी के शीर्ष पर ज्वालामुखी छिद्र के चारों ओर बनने वाला कटोरे या कीप के आकार का अवसाद सामान्यतः क्रेटर अथवा ज्वालामुखी मुख कहलाता है।
इसे केवल “छिद्र बड़ा होने पर उसका मुख” कहना अधूरा है। ज्वालामुखीय विस्फोट, पदार्थों के निष्कासन और कभी-कभी ज्वालामुखी के ऊपरी भाग के धँसने से यह अवसाद बन सकता है।
🎯 अंतर याद रखें
ज्वालामुखी छिद्र वह खुला मार्ग है जिससे पदार्थ बाहर निकलते हैं, जबकि क्रेटर या ज्वालामुखी मुख शीर्ष पर बना कटोरे जैसा अवसाद होता है।
ज्वालामुखी से निकलने वाले पदार्थ
Volcanic Materials
ज्वालामुखीय उद्गार के समय पृथ्वी के भीतर से कई प्रकार के पदार्थ बाहर निकलते हैं। इन्हें सामान्यतः गैसीय पदार्थ, ठोस या खंडित पदार्थ और लावा के रूप में समझा जाता है।
किसी ज्वालामुखी के उद्गार की प्रकृति इस बात पर निर्भर करती है कि उसके मैग्मा में गैसों की मात्रा कितनी है, सिलिका की मात्रा कितनी है और मैग्मा कितना गाढ़ा या प्रवाहशील है।
ज्वालामुखीय गैसें
Volcanic Gases
ज्वालामुखीय उद्गार के दौरान बड़ी मात्रा में गैसें वायुमंडल में निकल सकती हैं। ज्वालामुखीय गैसों में सामान्यतः जलवाष्प की मात्रा सर्वाधिक होती है।
इसके अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, हाइड्रोजन तथा कम मात्रा में अन्य गैसें भी निकल सकती हैं।
सल्फर डाइऑक्साइड जैसी गैसें वायु प्रदूषण और अम्लीय वर्षा जैसी परिस्थितियों में योगदान कर सकती हैं, जबकि अधिक मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड बंद या निचले क्षेत्रों में खतरनाक हो सकती है।
ठोस ज्वालामुखीय पदार्थ
Tephra
विस्फोटक ज्वालामुखीय उद्गार के दौरान हवा में उछाले गए विभिन्न आकारों के खंडित पदार्थों को सामूहिक रूप से टेफ्रा कहा जाता है।
टेफ्रा में स्थानीय शैलों के खंड, ज्वालामुखी बम, स्कोरिया, लैपिली, ज्वालामुखीय ब्रेसिया, धूल तथा राख जैसे पदार्थ शामिल हो सकते हैं।
इन पदार्थों का आकार बहुत महीन राख के कणों से लेकर बड़े ज्वालामुखीय बमों तक हो सकता है।
| पदार्थ | मुख्य विशेषता |
|---|---|
| राख | अत्यंत महीन ज्वालामुखीय कण |
| लैपिली | राख से बड़े छोटे ज्वालामुखीय टुकड़े |
| ज्वालामुखी बम | उद्गार के समय बाहर निकले बड़े गर्म या अर्ध-पिघले टुकड़े |
| स्कोरिया | गैस-छिद्रों वाली हल्की ज्वालामुखीय चट्टान |
| ब्रेसिया | कोणीय ज्वालामुखीय शैल-खंडों से बनी चट्टान |
मैग्मा और लावा
Magma and Lava
पृथ्वी की सतह के नीचे पाया जाने वाला अत्यधिक गर्म, पिघला या आंशिक रूप से पिघला शैल पदार्थ मैग्मा कहलाता है। इसमें पिघली चट्टानों के साथ क्रिस्टल और घुली हुई गैसें भी हो सकती हैं।
जब यही मैग्मा ज्वालामुखीय उद्गार के माध्यम से पृथ्वी की सतह पर बाहर निकल जाता है, तब उसे लावा कहा जाता है।
लावा सतह पर बहने के बाद धीरे-धीरे ठंडा होकर ठोस ज्वालामुखीय चट्टानों में परिवर्तित हो जाता है।
⚠️ बहुत महत्वपूर्ण सुधार
“ज्वालामुखी से निकलने वाले तरल पदार्थ को मैग्मा तथा उसके जमने के बाद लावा कहते हैं” सही नहीं है। पृथ्वी के अंदर वह मैग्मा है और सतह पर निकलते ही लावा कहलाता है।
सिलिका के आधार पर लावा
Acidic and Basic Lava
लावा में उपस्थित सिलिका की मात्रा उसकी श्यानता अर्थात गाढ़ेपन और प्रवाहशीलता को प्रभावित करती है। पारंपरिक भूगोल में सिलिका की मात्रा के आधार पर लावा को मुख्यतः अम्लीय लावा और क्षारीय लावा के रूप में समझाया जाता है।
अम्लीय लावा
Acidic Lava
अम्लीय लावा में सिलिका की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है। अधिक सिलिका के कारण यह सामान्यतः अधिक गाढ़ा और कम प्रवाहशील होता है।
यह अपेक्षाकृत शीघ्र ठंडा हो सकता है और आसानी से बहुत अधिक दूरी तक नहीं फैलता। इसके कारण ज्वालामुखीय गैसें आसानी से बाहर नहीं निकल पातीं और विस्फोटक उद्गार की संभावना बढ़ सकती है।
अम्लीय लावा से बनने वाली आकृतियाँ सामान्यतः अधिक तीखी ढाल वाली हो सकती हैं।
क्षारीय लावा
Basic Lava
क्षारीय या बेसिक लावा में सिलिका की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है। इस कारण इसकी श्यानता कम तथा प्रवाहशीलता अधिक होती है।
यह ठोस होने से पहले अपेक्षाकृत अधिक दूरी तक बह सकता है। ऐसे लावा के बार-बार विस्तृत क्षेत्र में फैलने से विशाल लावा मैदान या पठार बन सकते हैं।
बेसाल्टिक लावा इसका प्रमुख उदाहरण है और हवाई द्वीपों के ज्वालामुखियों में अत्यधिक प्रवाहशील बेसाल्टिक लावा प्रसिद्ध है।
| विशेषता | अम्लीय लावा | क्षारीय लावा |
|---|---|---|
| सिलिका | अधिक | कम |
| श्यानता | अधिक | कम |
| प्रवाहशीलता | कम | अधिक |
| दूरी | कम दूरी तक | अधिक दूरी तक |
| उद्गार | अधिक विस्फोटक हो सकता है | अपेक्षाकृत शांत प्रवाही उद्गार सामान्य |
सक्रियता के आधार पर ज्वालामुखी
Classification by Activity
परंपरागत भूगोल और प्रतियोगी परीक्षाओं में ज्वालामुखियों को उनकी सक्रियता के आधार पर मुख्यतः सक्रिय, प्रसुप्त और शांत तीन वर्गों में बाँटा जाता है।
हालाँकि किसी ज्वालामुखी को सक्रिय, प्रसुप्त या शांत घोषित करना हमेशा सरल नहीं होता। बहुत लंबे समय तक शांत रहने वाला ज्वालामुखी भी भविष्य में पुनः सक्रिय हो सकता है। इसलिए आधुनिक ज्वालामुखी विज्ञान में इन शब्दों का प्रयोग कुछ सावधानी के साथ किया जाता है।
सक्रिय ज्वालामुखी
Active Volcanoes
ऐसे ज्वालामुखी जिनमें वर्तमान समय में उद्गार हो रहा हो, हाल के भूवैज्ञानिक समय में उद्गार हुआ हो या जिनमें भविष्य में पुनः उद्गार की स्पष्ट संभावना हो, उन्हें सामान्यतः सक्रिय ज्वालामुखी माना जाता है।
सक्रिय ज्वालामुखी से हर समय धुआँ, राख या लावा निकलना आवश्यक नहीं है। कोई ज्वालामुखी लंबे अंतराल तक शांत रहकर भी सक्रिय ज्वालामुखीय प्रणाली का भाग हो सकता है।
| ज्वालामुखी | स्थान | विशेष तथ्य |
|---|---|---|
| किलाउआ | हवाई द्वीप, अमेरिका | विश्व के अत्यधिक सक्रिय ज्वालामुखियों में प्रमुख |
| कोटोपैक्सी | इक्वाडोर | एंडीज क्षेत्र का प्रसिद्ध सक्रिय ज्वालामुखी |
| माउंट इरेबस | अंटार्कटिका | अंटार्कटिका का प्रसिद्ध सक्रिय ज्वालामुखी |
| बैरन द्वीप | अंडमान सागर, भारत | भारत का एकमात्र ऐतिहासिक रूप से सक्रिय ज्वालामुखी |
| ओजोस डेल सालाडो | चिली–अर्जेंटीना सीमा | समुद्र तल से विश्व का सबसे ऊँचा ज्वालामुखी |
| स्ट्रॉम्बोली | इटली के एओलियन द्वीपसमूह | लगातार ज्वालामुखीय गतिविधि के लिए प्रसिद्ध |
| माउंट एटना | सिसिली, इटली | यूरोप के सर्वाधिक सक्रिय ज्वालामुखियों में एक |
| मौना लोआ | हवाई द्वीप, अमेरिका | विशाल सक्रिय ढाल ज्वालामुखी |
प्रसुप्त ज्वालामुखी
Dormant Volcanoes
ऐसे ज्वालामुखी जिनमें लंबे समय से उद्गार नहीं हुआ है, लेकिन जिनमें भविष्य में पुनः उद्गार होने की संभावना बनी रहती है, उन्हें परंपरागत रूप से प्रसुप्त ज्वालामुखी कहा जाता है।
प्रसुप्त का अर्थ यह नहीं है कि ज्वालामुखी हमेशा के लिए निष्क्रिय हो चुका है। इसी कारण कई ज्वालामुखी जिन्हें सामान्य भूगोल पुस्तकों में प्रसुप्त लिखा जाता है, आधुनिक वैज्ञानिक वर्गीकरण में सक्रिय लेकिन वर्तमान में शांत ज्वालामुखीय प्रणाली माने जा सकते हैं।
| ज्वालामुखी | स्थान | परीक्षा-सावधानी |
|---|---|---|
| विसुवियस | इटली | 1944 में अंतिम प्रमुख उद्गार; भविष्य में पुनः उद्गार की संभावना के कारण सक्रिय ज्वालामुखीय प्रणाली माना जाता है |
| फूजी | जापान | लंबे समय से शांत, लेकिन संभावित रूप से सक्रिय |
| क्राकाटाऊ | इंडोनेशिया | इसे पूर्णतः प्रसुप्त कहना सही नहीं; क्राकाटाऊ प्रणाली में आधुनिक काल में भी सक्रिय ज्वालामुखीय गतिविधि रही है |
| नारकोंडम | अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह | पुरानी भारतीय परीक्षा-पुस्तकों में प्रसुप्त ज्वालामुखी के रूप में प्रसिद्ध उदाहरण |
⚠️ परीक्षा में भ्रम से बचें
क्राकाटाऊ को निश्चित रूप से “प्रसुप्त” लिखना सुरक्षित नहीं है। वर्तमान क्राकाटाऊ ज्वालामुखीय तंत्र में सक्रियता रही है। इसलिए पुराने प्रश्न में प्रसुप्त का विकल्प मिले तो स्रोत के संदर्भ को देखें, लेकिन आधुनिक तथ्य के रूप में इसे सक्रिय ज्वालामुखीय क्षेत्र समझें।
शांत ज्वालामुखी
Extinct Volcanoes
ऐसे ज्वालामुखी जिनमें अत्यंत लंबे समय से उद्गार नहीं हुआ हो और जिनमें भविष्य में पुनः उद्गार की संभावना अत्यंत कम मानी जाती हो, उन्हें परंपरागत रूप से शांत या मृत ज्वालामुखी कहा जाता है।
कई शांत ज्वालामुखियों के पुराने क्रेटर में वर्षा या अन्य स्रोतों से पानी भर जाने पर क्रेटर झील बन सकती है। लेकिन ज्वालामुखी को शांत घोषित करने के लिए उसके मुख में जल भरना आवश्यक शर्त नहीं है।
⚠️ महत्वपूर्ण सुधार
“मुख में जल भर जाने पर वह शांत ज्वालामुखी हो जाता है” सही परिभाषा नहीं है। जल भरने से क्रेटर झील बन सकती है; शांत होने का संबंध मुख्यतः उसके भविष्य में उद्गार की संभावना से है।
शांत ज्वालामुखियों के उदाहरण
Traditional Examples
| ज्वालामुखी | स्थान | महत्वपूर्ण स्पष्टता |
|---|---|---|
| पोपा | म्यांमार | बहुत प्राचीन ज्वालामुखीय गतिविधि वाला ज्वालामुखी; अंतिम ज्ञात उद्गार हजारों वर्ष पूर्व का माना जाता है |
| अकोंकागुआ | एंडीज, अर्जेंटीना | पुरानी भूगोल पुस्तकों में शांत ज्वालामुखी के उदाहरण के रूप में दिया जाता है; आधुनिक भूविज्ञान में इसे वर्तमान सक्रिय ज्वालामुखी नहीं माना जाता |
| किलिमंजारो | तंजानिया | इसे सीधे मृत कहना सुरक्षित नहीं; सामान्यतः सुप्त ज्वालामुखीय पर्वत के रूप में वर्णित किया जाता है |
| कोह-ए-सुल्तान | ईरान–पाकिस्तान क्षेत्र से संबंधित पुरानी परीक्षा-सूचियों में उल्लेख | नाम और स्थान संबंधी पुरानी पुस्तकों में भ्रम मिलता है; आधुनिक मानचित्रण में कोह-ए-सुल्तान पाकिस्तान के बलूचिस्तान क्षेत्र से जुड़ा है |
⚠️ विशेष परीक्षा-सावधानी
पुरानी पुस्तकों में दिए गए किलिमंजारो, अकोंकागुआ और कोह-ए-सुल्तान जैसे उदाहरणों को आधुनिक ज्वालामुखी-वर्गीकरण से मिलाते समय सावधानी रखें। सक्रिय–प्रसुप्त–शांत वर्गीकरण हमेशा पूर्णतः निश्चित वैज्ञानिक श्रेणी नहीं होता।
बैरन द्वीप और नारकोंडम
Volcanoes of India
बैरन द्वीप अंडमान सागर में स्थित भारत का प्रसिद्ध सक्रिय ज्वालामुखी है। यह अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह का भाग है और भारत के भूगोल में अत्यंत महत्वपूर्ण परीक्षा तथ्य है।
यह भारत का एकमात्र ऐतिहासिक रूप से सक्रिय ज्वालामुखी माना जाता है। इसके आधुनिक काल में भी कई बार उद्गार दर्ज किए गए हैं।
नारकोंडम भी अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह में स्थित एक ज्वालामुखीय द्वीप है। पुरानी भारतीय प्रतियोगी परीक्षा पुस्तकों में इसे प्रसुप्त ज्वालामुखी के उदाहरण के रूप में पढ़ाया जाता रहा है।
🎯 भारत से सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न
भारत का सक्रिय ज्वालामुखी — बैरन द्वीप।
स्थान — अंडमान सागर, अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह।
ओजोस डेल सालाडो
Ojos del Salado
ओजोस डेल सालाडो दक्षिण अमेरिका के एंडीज पर्वतीय क्षेत्र में चिली और अर्जेंटीना की सीमा पर स्थित है।
इसकी ऊँचाई लगभग 6,879 मीटर है और इसे समुद्र तल से विश्व का सबसे ऊँचा ज्वालामुखी माना जाता है।
यह एक जटिल ज्वालामुखीय क्षेत्र है तथा इसके आसपास भूतपूर्व ज्वालामुखीय और गैसीय गतिविधियों के प्रमाण मिलते हैं।
🎯 अति महत्वपूर्ण
विश्व का सबसे ऊँचा ज्वालामुखी — ओजोस डेल सालाडो — चिली–अर्जेंटीना सीमा।
ज्वालामुखी और प्लेट विवर्तनिकी
Volcanoes and Plate Tectonics
विश्व के अधिकांश ज्वालामुखी विवर्तनिक प्लेटों की सीमाओं से जुड़े होते हैं। जहाँ प्लेटें एक-दूसरे से दूर जाती हैं या एक प्लेट दूसरी प्लेट के नीचे धँसती है, वहाँ मैग्मा के निर्माण और ऊपर उठने की परिस्थितियाँ बन सकती हैं।
प्रशांत महासागर के चारों ओर अत्यधिक ज्वालामुखीय और भूकम्पीय गतिविधि वाला क्षेत्र प्रशांत अग्नि वलय कहलाता है। विश्व के अनेक सक्रिय ज्वालामुखी इसी क्षेत्र से जुड़े हैं।
सभी ज्वालामुखी प्लेट सीमाओं पर ही नहीं पाए जाते। कुछ ज्वालामुखी हॉटस्पॉट से भी जुड़े होते हैं। हवाई द्वीपों के ज्वालामुखी इसका प्रमुख उदाहरण हैं।
ज्वालामुखी के लाभ
Benefits of Volcanoes
ज्वालामुखी केवल विनाशकारी प्राकृतिक घटना नहीं हैं। ज्वालामुखीय राख और पदार्थों के अपक्षय से कई क्षेत्रों में अत्यंत उपजाऊ मिट्टी का निर्माण होता है।
ज्वालामुखीय क्षेत्रों में भू-तापीय ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है। आइसलैंड जैसे क्षेत्रों में इसका व्यापक उपयोग किया जाता है।
ज्वालामुखीय प्रक्रियाओं से विभिन्न प्रकार के खनिज और धात्विक संसाधन भी बनते हैं।
ज्वालामुखी नई स्थलाकृतियाँ, पर्वत, द्वीप और लावा पठारों का निर्माण भी करते हैं।
ज्वालामुखी के प्रमुख दुष्प्रभाव
Volcanic Hazards
ज्वालामुखीय उद्गार से निकलने वाला लावा अपने मार्ग में आने वाली वनस्पति, भवनों और आधारभूत संरचनाओं को नष्ट कर सकता है।
विस्फोटक उद्गार से बड़ी मात्रा में निकलने वाली राख स्वास्थ्य, कृषि, परिवहन तथा विमानन के लिए गंभीर समस्या पैदा कर सकती है।
कुछ ज्वालामुखियों से अत्यंत गर्म गैस, राख और शैल-खंडों का तीव्र प्रवाह निकल सकता है, जिसे पायरोक्लास्टिक प्रवाह कहा जाता है। यह अत्यंत विनाशकारी होता है।
बर्फ या पानी के साथ ज्वालामुखीय राख और मलबा मिलकर तेज गति का कीचड़ प्रवाह बना सकता है, जिसे लहार कहा जाता है।
भ्रम पैदा करने वाले प्रमुख तथ्य
Important Corrections
गलत: मैग्मा जब धरातल पर जम जाता है तब लावा कहलाता है।
सही: मैग्मा पृथ्वी के भीतर होता है; सतह पर निकलते ही वह लावा कहलाता है।
गलत: सक्रिय ज्वालामुखी से हमेशा धुआँ या लावा निकलता रहता है।
सही: सक्रिय ज्वालामुखी कुछ समय के लिए शांत भी रह सकता है और बाद में पुनः उद्गार कर सकता है।
अधूरा: ज्वालामुखी छिद्र बड़ा होने पर वही ज्वालामुखी मुख बन जाता है।
सही: शीर्ष पर बनने वाला कटोरे जैसा अवसाद क्रेटर कहलाता है।
गलत: मुख में पानी भर जाने से ज्वालामुखी शांत हो जाता है।
सही: पानी भरने से क्रेटर झील बन सकती है; शांत या मृत वर्गीकरण का आधार भविष्य की ज्वालामुखीय सक्रियता की संभावना है।
सावधानी: क्राकाटाऊ को केवल प्रसुप्त ज्वालामुखी कहना आधुनिक तथ्य के अनुसार सुरक्षित नहीं है, क्योंकि उसकी ज्वालामुखीय प्रणाली सक्रिय रही है।
सावधानी: किलिमंजारो को निश्चित रूप से मृत ज्वालामुखी लिखने के बजाय सुप्त ज्वालामुखीय पर्वत कहना अधिक सुरक्षित है।
त्वरित पुनरावृत्ति
Quick Revision
⚡ क्रम में याद करें
🎯 सबसे महत्वपूर्ण जोड़ियाँ
भारत का सक्रिय ज्वालामुखी — बैरन द्वीप
विश्व का सबसे ऊँचा ज्वालामुखी — ओजोस डेल सालाडो
हवाई का प्रसिद्ध सक्रिय ज्वालामुखी — किलाउआ
सिसिली का सक्रिय ज्वालामुखी — माउंट एटना
अंटार्कटिका का सक्रिय ज्वालामुखी — माउंट इरेबस
इटली का प्रसिद्ध ज्वालामुखी — विसुवियस
जापान का प्रसिद्ध ज्वालामुखी — माउंट फूजी
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति बिंदु
ज्वालामुखी पृथ्वी की सतह पर स्थित वह दरार या निकास है जिससे लावा, गैसें, राख और अन्य पदार्थ बाहर निकलते हैं।
ज्वालामुखी के प्रमुख अंग — शंकु, छिद्र, नली और क्रेटर।
ज्वालामुखीय गैसों में सामान्यतः जलवाष्प सबसे अधिक होती है।
ज्वालामुखीय उद्गार से निकले खंडित ठोस पदार्थ सामूहिक रूप से टेफ्रा कहलाते हैं।
पृथ्वी के भीतर पिघला पदार्थ — मैग्मा; सतह पर निकलने के बाद — लावा।
अधिक सिलिका वाला लावा — अम्लीय, अधिक गाढ़ा और कम प्रवाहशील।
कम सिलिका वाला लावा — क्षारीय/बेसिक, कम गाढ़ा और अधिक प्रवाहशील।
पारंपरिक सक्रियता वर्गीकरण — सक्रिय, प्रसुप्त और शांत।
किलाउआ — हवाई द्वीप का प्रसिद्ध सक्रिय ज्वालामुखी।
माउंट एटना — सिसिली, इटली का प्रसिद्ध सक्रिय ज्वालामुखी।
स्ट्रॉम्बोली — इटली के एओलियन द्वीपसमूह का सक्रिय ज्वालामुखी।
माउंट इरेबस — अंटार्कटिका का सक्रिय ज्वालामुखी।
बैरन द्वीप — भारत का एकमात्र ऐतिहासिक रूप से सक्रिय ज्वालामुखी।
ओजोस डेल सालाडो — चिली–अर्जेंटीना सीमा; समुद्र तल से विश्व का सबसे ऊँचा ज्वालामुखी।
विसुवियस और फूजी लंबे समय से शांत हैं, लेकिन भविष्य में पुनः सक्रिय हो सकते हैं।
क्राकाटाऊ को आधुनिक दृष्टि से केवल प्रसुप्त कहना सुरक्षित नहीं है; उसका ज्वालामुखीय तंत्र सक्रिय रहा है।
ज्वालामुखी से उपजाऊ मिट्टी, भू-तापीय ऊर्जा, खनिज संसाधन और नई स्थलाकृतियाँ प्राप्त हो सकती हैं, जबकि लावा, राख, पायरोक्लास्टिक प्रवाह और लहार गंभीर प्राकृतिक खतरे उत्पन्न कर सकते हैं।