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महासागर एवं महासागरीय नितल
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महासागर एवं महासागरीय नितल

पृथ्वी पर जल-स्थल वितरण, पाँच महासागर एवं महासागरीय नितल के प्रमुख उच्चावच

पृथ्वी पर जल और स्थल का वितरण

पृथ्वी की सतह का लगभग 70.8 प्रतिशत भाग जल तथा लगभग 29.2 प्रतिशत भाग स्थल से घिरा हुआ है। इसी कारण अंतरिक्ष से देखने पर पृथ्वी नीले रंग की दिखाई देती है।

पृथ्वी का अधिकांश जल महासागरों में पाया जाता है और सभी महासागर वास्तव में परस्पर जुड़े हुए एक विशाल विश्व महासागर के भाग हैं। अध्ययन की सुविधा के लिए इसे पाँच प्रमुख महासागरों में बाँटा जाता है।

महासागरीय नितल देखने में भले ही समुद्र के पानी से ढका हो, लेकिन इसकी सतह समतल नहीं है। इसके भीतर विशाल पर्वतमालाएँ, विस्तृत मैदान, ज्वालामुखी, पठार, गहरे गर्त तथा अनेक अन्य स्थलरूप पाए जाते हैं।

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उत्तरी एवं दक्षिणी गोलार्द्ध में जल-स्थल वितरण

उत्तरी गोलार्द्ध की सतह का लगभग 61 प्रतिशत भाग जल तथा लगभग 39 प्रतिशत भाग स्थल है।

दक्षिणी गोलार्द्ध की सतह का लगभग 81 प्रतिशत भाग जल तथा केवल लगभग 19 प्रतिशत भाग स्थल है।

इस प्रकार उत्तरी गोलार्द्ध में दक्षिणी गोलार्द्ध की तुलना में स्थल का अनुपात बहुत अधिक है, जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध में महासागरीय क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत है।

इसी कारण विद्यालयी एवं प्रतियोगी परीक्षा की पुस्तकों में उत्तरी गोलार्द्ध को अक्सर स्थल प्रधान गोलार्द्ध और दक्षिणी गोलार्द्ध को जल प्रधान गोलार्द्ध कहा जाता है।

⚠️ अत्यंत महत्वपूर्ण सुधार

उत्तरी गोलार्द्ध में 61% स्थल और 39% जल नहीं, बल्कि लगभग 61% जल और 39% स्थल है। दक्षिणी गोलार्द्ध में लगभग 81% जल और 19% स्थल है।

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स्थल गोलार्द्ध और जल गोलार्द्ध की स्पष्टता

उत्तरी गोलार्द्ध में पृथ्वी के अधिकांश बड़े भूभाग स्थित होने के कारण इसे सामान्य भूगोल की पुस्तकों में स्थल प्रधान गोलार्द्ध कहा जाता है।

दक्षिणी गोलार्द्ध में जल का अनुपात लगभग 81 प्रतिशत होने के कारण इसे जल प्रधान गोलार्द्ध कहा जाता है।

ध्यान रखना चाहिए कि भूगोल में एक अलग तकनीकी अवधारणा स्थल गोलार्द्ध और जल गोलार्द्ध की भी है, जिसमें पृथ्वी को भूमध्य रेखा के आधार पर उत्तर-दक्षिण में नहीं बल्कि अधिकतम स्थल और अधिकतम जल समाहित करने वाले गोलार्द्धों में बाँटा जाता है। इसलिए परीक्षा में प्रश्न की भाषा ध्यान से पढ़नी चाहिए।

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महासागरों की औसत गहराई और स्थल की ऊँचाई

पारंपरिक भूगोल पुस्तकों में महासागरों की औसत गहराई लगभग 3,800 मीटर दी जाती है। आधुनिक वैश्विक मापन के अनुसार औसत महासागरीय गहराई लगभग 3,682–3,688 मीटर के आसपास मानी जाती है।

इसलिए प्रतियोगी परीक्षाओं में यदि सामान्यीकृत मान पूछा जाए तो लगभग 3.7 से 3.8 किलोमीटर की औसत महासागरीय गहराई याद रखना उपयोगी है।

महाद्वीपीय स्थल का समुद्र तल से औसत ऊँचाई वाला पारंपरिक मान लगभग 840 मीटर दिया जाता है।

🎯 याद रखें

औसत महासागरीय गहराई — लगभग 3.7 किमी
स्थल की औसत ऊँचाई — लगभग 840 मीटर

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विश्व की लंबी तटीय सीमाएँ

पुरानी सामान्य ज्ञान पुस्तकों में विश्व की बड़ी तटीय सीमाओं वाले देशों का क्रम प्रायः कनाडा, नॉर्वे, इंडोनेशिया, रूस, फिलीपींस, जापान, ऑस्ट्रेलिया और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देशों के साथ दिया जाता है।

कनाडा को सामान्यतः विश्व में सबसे लंबी तटरेखा वाला देश माना जाता है।

लेकिन तटरेखा की लंबाई मापना साधारण सीधी रेखा मापने जैसा नहीं है। किसी देश के छोटे-बड़े द्वीपों, खाड़ियों और तटीय मोड़ों को किस स्तर तक मापा गया है, इसके आधार पर तटरेखा की कुल लंबाई और देशों की रैंकिंग बदल सकती है।

इसलिए कनाडा का प्रथम स्थान सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा तथ्य है, जबकि उसके बाद की पूरी क्रम-सूची को स्रोत के अनुसार पढ़ना चाहिए।

⚠️ परीक्षा-सावधानी

कनाडा = विश्व की सबसे लंबी तटरेखा सबसे सुरक्षित तथ्य है। अन्य देशों की क्रम-सूची अलग-अलग स्रोतों और मापन-पद्धतियों में बदल सकती है।

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पृथ्वी के पाँच प्रमुख महासागर

पृथ्वी के सभी महासागर परस्पर जुड़े हुए हैं, फिर भी भौगोलिक अध्ययन के लिए विश्व महासागर को पाँच प्रमुख भागों में बाँटा जाता है—प्रशांत महासागर, अटलांटिक महासागर, हिन्द महासागर, दक्षिणी महासागर और आर्कटिक महासागर

क्षेत्रफल की दृष्टि से इनका सामान्य क्रम प्रशांत → अटलांटिक → हिन्द → दक्षिणी → आर्कटिक है।

महासागरों के क्षेत्रफल में अलग-अलग स्रोतों में थोड़ा अंतर मिल सकता है क्योंकि सीमांत समुद्रों और दक्षिणी महासागर की सीमा को शामिल करने की पद्धति अलग हो सकती है।

प्रशांत अटलांटिक हिन्द दक्षिणी आर्कटिक
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प्रशांत महासागर

प्रशांत महासागर पृथ्वी का सबसे बड़ा और सबसे गहरा महासागर है। विभिन्न सीमा-पद्धतियों के अनुसार इसका क्षेत्रफल लगभग 16.5 से 16.6 करोड़ वर्ग किलोमीटर माना जाता है।

यह एशिया और ऑस्ट्रेलिया के पूर्व तथा उत्तर और दक्षिण अमेरिका के पश्चिम में विस्तृत है। पृथ्वी के महासागरीय क्षेत्र का बहुत बड़ा भाग इसी महासागर में आता है।

विश्व का सबसे गहरा महासागरीय गर्त मैरियाना गर्त पश्चिमी प्रशांत महासागर में स्थित है। इसके भीतर स्थित चैलेंजर डीप पृथ्वी के महासागरों का सबसे गहरा ज्ञात स्थान है।

पुरानी पुस्तकों में इसकी गहराई लगभग 11,034 मीटर दी जाती है, जबकि आधुनिक संशोधित मापन लगभग 10,935 मीटर के आसपास है।

प्रशांत महासागर के चारों ओर अत्यधिक भूकम्प और ज्वालामुखीय गतिविधि वाला विशाल क्षेत्र प्रशांत अग्नि वलय कहलाता है।

🎯 अति महत्वपूर्ण

सबसे बड़ा महासागर — प्रशांत महासागर
सबसे गहरा महासागर — प्रशांत महासागर
सबसे गहरा ज्ञात स्थान — चैलेंजर डीप, मैरियाना गर्त

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अटलांटिक महासागर

अटलांटिक महासागर क्षेत्रफल की दृष्टि से प्रशांत महासागर के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा महासागर है। अलग-अलग सीमा-पद्धतियों में इसका क्षेत्रफल अलग मिलता है; सीमांत समुद्रों सहित इसे लगभग 10.6 करोड़ वर्ग किलोमीटर तक दिया जाता है।

यह पूर्व में यूरोप और अफ्रीका तथा पश्चिम में उत्तर और दक्षिण अमेरिका के बीच स्थित है।

इस महासागर के मध्य भाग से एक विशाल जलमग्न पर्वत प्रणाली गुजरती है, जिसे मध्य-अटलांटिक पर्वतमाला कहा जाता है।

यह वैश्विक मध्य-महासागरीय पर्वतमाला प्रणाली का भाग है। यहाँ विवर्तनिक प्लेटें एक-दूसरे से दूर होती हैं और नई महासागरीय भूपर्पटी का निर्माण होता है।

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हिन्द महासागर

हिन्द महासागर विश्व का तीसरा सबसे बड़ा महासागर है। इसका क्षेत्रफल विभिन्न सीमा-पद्धतियों के अनुसार लगभग 7 करोड़ वर्ग किलोमीटर से कुछ अधिक माना जाता है। सामान्य पुस्तकों में लगभग 7.12 करोड़ वर्ग किलोमीटर का मान भी मिलता है।

यह पश्चिम में अफ्रीका, उत्तर में एशिया तथा पूर्व में ऑस्ट्रेलिया से घिरा है। इसके उत्तर में भारतीय उपमहाद्वीप प्रमुख रूप से स्थित है।

हिन्द महासागर अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। पश्चिम एशिया से निकलने वाले पेट्रोलियम संसाधनों के अनेक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग इसी महासागर से होकर गुजरते हैं।

इस महासागर का उत्तरी भाग भारतीय मानसून प्रणाली से गहराई से जुड़ा है। मौसमी पवनों के कारण यहाँ महासागरीय धाराओं की दिशा में भी महत्वपूर्ण मौसमी परिवर्तन दिखाई देता है।

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दक्षिणी महासागर

दक्षिणी महासागर अंटार्कटिका महाद्वीप को चारों ओर से घेरने वाला महासागरीय क्षेत्र है। इसे अंटार्कटिक महासागर भी कहा जाता है।

इसका क्षेत्रफल लगभग 2 करोड़ वर्ग किलोमीटर से कुछ अधिक है। पुरानी पुस्तकों में लगभग 2.03 करोड़ वर्ग किलोमीटर जैसे आँकड़े मिलते हैं; सीमा-परिभाषा के अनुसार इसमें थोड़ा अंतर हो सकता है।

वर्तमान अंतरराष्ट्रीय जलमापीय परिभाषा में इसकी उत्तरी सीमा सामान्यतः 60° दक्षिण अक्षांश मानी जाती है और दक्षिण में यह अंटार्कटिका के तट तक विस्तृत है।

यह अत्यंत ठंडे जल वाला महासागरीय क्षेत्र है। इसके चारों ओर प्रवाहित होने वाली शक्तिशाली अंटार्कटिक परिध्रुवीय धारा विश्व की महासागरीय परिसंचरण व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

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आर्कटिक महासागर

आर्कटिक महासागर विश्व के पाँच प्रमुख महासागरों में सबसे छोटा महासागर है। इसका क्षेत्रफल लगभग 1.55–1.56 करोड़ वर्ग किलोमीटर है।

यह उत्तरी ध्रुव के आसपास स्थित है और उत्तरी अमेरिका, ग्रीनलैंड, यूरोप तथा एशिया के उत्तरी भागों से घिरा है।

आर्कटिक महासागर की औसत गहराई लगभग 1,205 मीटर है, इसलिए यह प्रमुख महासागरों में सबसे उथला भी है।

इसके बड़े क्षेत्र पर वर्ष के अधिकांश समय समुद्री बर्फ पाई जाती है। हालांकि बर्फ का विस्तार ऋतु और वर्ष के अनुसार बदलता रहता है।

🎯 याद रखें

विश्व का सबसे छोटा महासागर — आर्कटिक महासागर
विश्व का सबसे उथला प्रमुख महासागर — आर्कटिक महासागर

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पाँच महासागर — एक नज़र में

महासागर लगभग क्षेत्रफल मुख्य विशेषता
प्रशांत लगभग 16.5–16.6 करोड़ वर्ग किमी सबसे बड़ा और सबसे गहरा
अटलांटिक सीमा-पद्धति के अनुसार लगभग 8.2–10.6 करोड़ वर्ग किमी दूसरा सबसे बड़ा; मध्य-अटलांटिक पर्वतमाला
हिन्द लगभग 7 करोड़ वर्ग किमी मानसून और व्यापारिक मार्गों के लिए महत्वपूर्ण
दक्षिणी लगभग 2 करोड़ वर्ग किमी से अधिक अंटार्कटिका को घेरे हुए
आर्कटिक लगभग 1.56 करोड़ वर्ग किमी सबसे छोटा और सबसे उथला

⚠️ क्षेत्रफल में अंतर क्यों मिलता है?

महासागरों की सीमाएँ प्राकृतिक दीवारों जैसी स्पष्ट नहीं हैं। सीमांत समुद्रों को शामिल करने तथा दक्षिणी महासागर की सीमा निर्धारित करने की अलग पद्धतियों के कारण विभिन्न स्रोतों में क्षेत्रफल के आँकड़े थोड़ा अलग हो सकते हैं।

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महासागरीय नितल के उच्चावच

महासागरीय नितल की सतह पूर्णतः समतल नहीं होती। इसके भीतर स्थल भाग की तरह पर्वत, पठार, मैदान, घाटियाँ और अत्यंत गहरे गर्त पाए जाते हैं।

इन स्थलरूपों के निर्माण में मुख्य रूप से प्लेट विवर्तनिकी, ज्वालामुखीय गतिविधि, भूकम्पीय क्रियाएँ, तलछट का निक्षेपण और अपरदन जैसी प्रक्रियाएँ भूमिका निभाती हैं।

महासागरीय नितल की प्रमुख संरचनाओं में महाद्वीपीय मग्न तट, महाद्वीपीय ढाल, महाद्वीपीय उत्थान, गहरे सागरीय मैदान, मध्य-महासागरीय पर्वतमाला, महासागरीय गर्त, समुद्री पर्वत, गाइओट तथा ऐटोल प्रमुख हैं।

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महाद्वीपीय मग्न तट

महाद्वीपीय मग्न तट समुद्र के किनारे स्थित महाद्वीप का जलमग्न और अपेक्षाकृत कम ढाल वाला विस्तार है। इसे महाद्वीपीय किनारे का सबसे उथला भाग माना जाता है।

तट से समुद्र की ओर बढ़ने पर यह धीरे-धीरे गहरा होता जाता है और अंत में एक स्पष्ट ढाल वाले क्षेत्र में समाप्त होता है।

इसकी बाहरी सीमा सामान्यतः लगभग 100 से 200 मीटर की जल-गहराई के आसपास पाई जा सकती है, लेकिन इसकी चौड़ाई और गहराई सभी स्थानों पर समान नहीं होती।

यह क्षेत्र मत्स्य पालन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि सूर्य का प्रकाश अपेक्षाकृत अधिक पहुँचता है और पोषक पदार्थों की उपलब्धता अच्छी होती है।

महाद्वीपीय मग्न तट में पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस तथा अन्य खनिज संसाधनों का भी व्यापक आर्थिक महत्व है।

🎯 परीक्षा में याद रखें

महाद्वीपीय मग्न तट — महाद्वीप का समुद्र में डूबा हुआ उथला एवं कम ढाल वाला विस्तार।

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महाद्वीपीय ढाल

महाद्वीपीय मग्न तट के समाप्त होने के बाद समुद्र तल में अचानक ढाल बढ़ जाती है। इस अधिक ढाल वाले भाग को महाद्वीपीय ढाल कहा जाता है।

यह उथले महाद्वीपीय मग्न तट और गहरे महासागरीय भाग के बीच संक्रमण क्षेत्र का काम करता है।

सामान्यीकृत रूप से यह लगभग 200 मीटर के आसपास की गहराई से कई हजार मीटर की गहराई की ओर उतरता है। कई पुस्तकों में लगभग 200 से 3,000 मीटर तक का सामान्य मान दिया जाता है।

यहाँ ढाल अधिक होने के कारण उपसमुद्री भूस्खलन, गाद का तीव्र प्रवाह तथा अवसादों का नीचे की ओर परिवहन हो सकता है।

महाद्वीपीय ढाल को भूगर्भीय दृष्टि से महाद्वीपीय भूपर्पटी से महासागरीय भूपर्पटी की ओर संक्रमण से भी जोड़ा जाता है।

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महाद्वीपीय उत्थान

महाद्वीपीय ढाल के आधार पर कई निष्क्रिय महाद्वीपीय किनारों में ढाल अचानक समाप्त नहीं होती, बल्कि उसके नीचे तलछटों के व्यापक जमाव से एक हल्की ढाल वाला क्षेत्र बन जाता है जिसे महाद्वीपीय उत्थान कहा जाता है।

नदियों और महाद्वीपीय ढाल से नीचे आए अवसाद लंबे समय तक यहाँ जमा होते रहते हैं। इसके बाद यह क्षेत्र धीरे-धीरे गहरे महासागरीय मैदान में मिल जाता है।

सक्रिय प्लेट सीमाओं पर महाद्वीपीय उत्थान के स्थान पर सीधे गहरे महासागरीय गर्त भी मिल सकते हैं।

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गहरे सागरीय मैदान

गहरे महासागरों के भीतर स्थित अत्यंत विस्तृत और लगभग समतल तल को गहरे सागरीय मैदान कहा जाता है। यह पृथ्वी की सबसे समतल प्राकृतिक सतहों में से एक है।

ये सामान्यतः लगभग 3,000 से 6,000 मीटर की गहराई में पाए जाते हैं।

इनकी मूल महासागरीय भूपर्पटी पूरी तरह समतल नहीं होती, लेकिन लाखों वर्षों तक जमा होने वाली महीन मिट्टी, जैविक अवशेष और अन्य तलछट छोटे-छोटे उतार-चढ़ावों को ढक देती है। इससे सतह अत्यंत समतल दिखाई देती है।

पुरानी पुस्तकों में गहरे सागरीय मैदानों को महासागरीय तल के लगभग 40 प्रतिशत भाग से जोड़कर बताया जाता है। वास्तविक अनुपात इस बात पर निर्भर करता है कि महासागरीय तल की अलग-अलग भू-आकृतियों की सीमाएँ किस प्रकार निर्धारित की गई हैं।

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मध्य-महासागरीय पर्वतमाला

मध्य-महासागरीय पर्वतमाला महासागरों के भीतर फैली हुई अत्यंत लंबी जलमग्न पर्वत प्रणाली है। इसकी विभिन्न शाखाएँ मिलकर पृथ्वी की सबसे विस्तृत पर्वतीय प्रणालियों में से एक बनाती हैं।

इनका निर्माण मुख्यतः उन स्थानों पर होता है जहाँ दो विवर्तनिक प्लेटें एक-दूसरे से दूर हटती हैं

प्लेटों के अलग होने पर नीचे से मैग्मा ऊपर उठता है। मैग्मा ठंडा होकर नई महासागरीय भूपर्पटी बनाता है। इस प्रक्रिया को समुद्री तल प्रसार कहा जाता है।

मध्य-अटलांटिक पर्वतमाला इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है। यह अटलांटिक महासागर के मध्य से उत्तर-दक्षिण दिशा में विस्तृत है।

प्लेटें दूर होती हैं मैग्मा ऊपर उठता है नई भूपर्पटी बनती है समुद्री तल प्रसार
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गहरे समुद्री गर्त

गहरे समुद्री गर्त महासागरीय तल पर स्थित अत्यंत गहरे, लंबे और संकरे अवसाद होते हैं। ये महासागरों के सबसे गहरे भागों का निर्माण करते हैं।

इनका निर्माण मुख्यतः अभिसारी प्लेट सीमाओं पर होता है, जहाँ एक विवर्तनिक प्लेट दूसरी प्लेट के नीचे धँसती है। इस प्रक्रिया को अधोगमन कहा जाता है।

अधोगमन क्षेत्रों में गहरे समुद्री गर्तों के साथ प्रायः तीव्र भूकम्प तथा ज्वालामुखीय गतिविधियाँ भी जुड़ी होती हैं।

प्रमुख उदाहरणों में मैरियाना गर्त तथा पेरू–चिली गर्त शामिल हैं।

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मैरियाना गर्त

मैरियाना गर्त पश्चिमी प्रशांत महासागर में मारियाना द्वीपों के निकट स्थित है। यह विश्व का सबसे गहरा ज्ञात महासागरीय गर्त है।

इसके दक्षिणी भाग में स्थित चैलेंजर डीप महासागरीय तल का सबसे गहरा ज्ञात स्थान है।

पुरानी पुस्तकों में इसकी अधिकतम गहराई लगभग 11,034 मीटर दी जाती रही है। आधुनिक उच्च-सटीकता माप में चैलेंजर डीप की गहराई लगभग 10,935 मीटर निर्धारित की गई है।

इसलिए परीक्षा में प्रश्न के स्रोत के अनुसार दोनों आँकड़े दिखाई दे सकते हैं, लेकिन आधुनिक वैज्ञानिक मान के रूप में लगभग 10.9 किलोमीटर याद रखना अधिक सुरक्षित है।

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पेरू–चिली गर्त

पेरू–चिली गर्त दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट के समानांतर प्रशांत महासागर में स्थित है। इसे अटाकामा गर्त भी कहा जाता है।

इसका निर्माण नाज़्का प्लेट के दक्षिण अमेरिकी प्लेट के नीचे धँसने से संबंधित है।

इसी अधोगमन प्रक्रिया के कारण दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी भाग में एंडीज पर्वत, भूकम्प और ज्वालामुखीय गतिविधियाँ विकसित हुई हैं।

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समुद्री पर्वत एवं महासागरीय द्वीप

महासागरीय तल से ऊपर उठे लेकिन समुद्र की सतह तक न पहुँचने वाले जलमग्न पर्वतों को समुद्री पर्वत कहा जाता है। इनमें से बहुत से ज्वालामुखीय उत्पत्ति के होते हैं।

जब ज्वालामुखीय पर्वत इतना ऊँचा हो जाता है कि उसका ऊपरी भाग समुद्र की सतह से ऊपर निकल जाता है, तो वह महासागरीय द्वीप का निर्माण कर सकता है।

हवाई द्वीप समूह महासागरीय ज्वालामुखीय द्वीपों का प्रसिद्ध उदाहरण है। इनका निर्माण प्रशांत प्लेट के नीचे स्थित हॉटस्पॉट ज्वालामुखीय गतिविधि से जुड़ा है।

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गाइओट

गाइओट समुद्र के भीतर स्थित ऐसा ज्वालामुखीय समुद्री पर्वत होता है जिसकी चोटी अपेक्षाकृत समतल होती है।

माना जाता है कि अनेक गाइओट कभी समुद्र की सतह के निकट या उससे ऊपर स्थित ज्वालामुखीय द्वीप रहे होंगे। समुद्री लहरों के दीर्घकालीन अपरदन ने उनकी ऊपरी चोटी को समतल किया।

बाद में महासागरीय भूपर्पटी के धँसने तथा ज्वालामुखीय पर्वत के नीचे जाने से यह समतल चोटी समुद्र की सतह से काफी नीचे पहुँच गई।

🎯 पहचान

गाइओट = समतल चोटी वाला जलमग्न समुद्री पर्वत।

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ऐटोल

ऐटोल सामान्यतः वलयाकार या लगभग वलयाकार प्रवाल भित्ति होती है जिसके मध्य में उथला जल क्षेत्र या लैगून पाया जाता है।

इसके विकास की प्रसिद्ध व्याख्या के अनुसार प्रारंभ में उष्णकटिबंधीय समुद्र में किसी ज्वालामुखीय द्वीप के चारों ओर प्रवाल भित्ति बनती है।

जैसे-जैसे ज्वालामुखीय द्वीप धीरे-धीरे धँसता या अपरदित होता है, प्रवाल ऊपर की ओर बढ़ते रहते हैं। अंततः मुख्य ज्वालामुखीय द्वीप जल के नीचे चला जाता है और उसके चारों ओर वलयाकार प्रवाल भित्ति तथा बीच में लैगून बच सकता है।

इस प्रकार ऐटोल केवल साधारण “प्रवाल से बना द्वीप” नहीं, बल्कि मुख्यतः वलयाकार प्रवाल संरचना और लैगून वाला विशिष्ट स्थलरूप है।

ज्वालामुखीय द्वीप प्रवाल भित्ति द्वीप का धँसना वलयाकार प्रवाल ऐटोल
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महासागरीय नितल का क्रम

⚡ महाद्वीप से गहरे महासागर की ओर

महाद्वीपीय मग्न तट महाद्वीपीय ढाल महाद्वीपीय उत्थान गहरा सागरीय मैदान मध्य-महासागरीय पर्वतमाला
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प्रमुख महासागरीय स्थलरूप — एक नज़र में

स्थलरूप मुख्य विशेषता निर्माण/महत्त्व
महाद्वीपीय मग्न तट उथला एवं कम ढाल वाला मत्स्य पालन और पेट्रोलियम के लिए महत्वपूर्ण
महाद्वीपीय ढाल तेज ढाल वाला क्षेत्र उथले तट से गहरे महासागर की ओर संक्रमण
महाद्वीपीय उत्थान ढाल के आधार पर तलछटी जमाव गहरे सागरीय मैदान से जुड़ता है
गहरा सागरीय मैदान अत्यंत समतल महीन तलछट के निक्षेप से समतल
मध्य-महासागरीय पर्वतमाला विशाल जलमग्न पर्वत प्रणाली अपसारी प्लेट सीमा एवं नई भूपर्पटी
महासागरीय गर्त लंबे, संकरे एवं अत्यंत गहरे अधोगमन क्षेत्र
समुद्री पर्वत जलमग्न पर्वत अधिकतर ज्वालामुखीय
गाइओट समतल चोटी वाला समुद्री पर्वत पुराना अपरदित एवं धँसा ज्वालामुखीय पर्वत
ऐटोल वलयाकार प्रवाल भित्ति मध्य में सामान्यतः लैगून
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भ्रम पैदा करने वाले प्रमुख तथ्य

भ्रम: उत्तरी गोलार्द्ध में 61 प्रतिशत स्थल और 39 प्रतिशत जल है।
सही: उत्तरी गोलार्द्ध में लगभग 61 प्रतिशत जल और 39 प्रतिशत स्थल है।

भ्रम: दक्षिणी गोलार्द्ध में 19 प्रतिशत जल और 81 प्रतिशत स्थल है।
सही: दक्षिणी गोलार्द्ध में लगभग 81 प्रतिशत जल और 19 प्रतिशत स्थल है।

सावधानी: महासागरों की औसत गहराई 3,800 मीटर एक सामान्यीकृत मान है। आधुनिक वैश्विक मापन इसे लगभग 3,682–3,688 मीटर के आसपास रखता है।

सावधानी: विश्व के देशों की तटरेखा की रैंकिंग पूर्णतः स्थिर नहीं है। अलग-अलग मापन-पद्धति के कारण कनाडा के बाद देशों का क्रम बदल सकता है।

सावधानी: मैरियाना गर्त की गहराई 11,034 मीटर पुराना प्रचलित आँकड़ा है। आधुनिक उच्च-सटीकता मापन में चैलेंजर डीप लगभग 10,935 मीटर है।

भ्रम: मध्य-अटलांटिक पर्वतमाला अकेले ही संसार की सबसे लंबी पर्वतमाला है।
सही: यह विशाल वैश्विक मध्य-महासागरीय पर्वतमाला प्रणाली की एक प्रमुख शाखा है।

भ्रम: गाइओट कोई भी समतल समुद्री मैदान है।
सही: गाइओट समतल चोटी वाला जलमग्न समुद्री पर्वत है।

भ्रम: ऐटोल केवल प्रवाल से बना सामान्य द्वीप है।
सही: ऐटोल सामान्यतः वलयाकार प्रवाल भित्ति है जिसके बीच लैगून पाया जाता है।

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त्वरित पुनरावृत्ति

🎯 सबसे महत्वपूर्ण जोड़ियाँ

पृथ्वी की सतह — लगभग 70.8% जल और 29.2% स्थल।

उत्तरी गोलार्द्ध — लगभग 61% जल और 39% स्थल।

दक्षिणी गोलार्द्ध — लगभग 81% जल और 19% स्थल।

सबसे बड़ा महासागर — प्रशांत।

सबसे गहरा महासागर — प्रशांत।

दूसरा सबसे बड़ा महासागर — अटलांटिक।

तीसरा सबसे बड़ा महासागर — हिन्द महासागर।

सबसे छोटा महासागर — आर्कटिक।

सबसे उथला प्रमुख महासागर — आर्कटिक।

सबसे गहरा महासागरीय गर्त — मैरियाना गर्त।

सबसे गहरा ज्ञात स्थान — चैलेंजर डीप।

मध्य-अटलांटिक पर्वतमाला — अपसारी प्लेट सीमा से संबंधित।

समुद्री तल प्रसार — नई महासागरीय भूपर्पटी का निर्माण।

गाइओट — समतल चोटी वाला समुद्री पर्वत।

ऐटोल — वलयाकार प्रवाल भित्ति एवं लैगून।

⚡ अंतिम पुनरावृत्ति बिंदु

पृथ्वी की सतह का लगभग 70.8 प्रतिशत जल तथा 29.2 प्रतिशत स्थल है।

उत्तरी गोलार्द्ध में लगभग 61 प्रतिशत जल और 39 प्रतिशत स्थल, जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध में लगभग 81 प्रतिशत जल और 19 प्रतिशत स्थल है।

महासागरों की आधुनिक औसत गहराई लगभग 3,682 मीटर है; सामान्य परीक्षा पुस्तकों में लगभग 3,800 मीटर का मान भी मिलता है।

स्थल की औसत ऊँचाई का पारंपरिक मान लगभग 840 मीटर है।

कनाडा विश्व में सबसे लंबी तटरेखा वाला देश माना जाता है; उसके बाद की रैंकिंग मापन-पद्धति के अनुसार बदल सकती है।

पाँच महासागरों का क्षेत्रफल क्रम — प्रशांत → अटलांटिक → हिन्द → दक्षिणी → आर्कटिक

प्रशांत महासागर विश्व का सबसे बड़ा और सबसे गहरा महासागर है।

मैरियाना गर्त प्रशांत महासागर में स्थित विश्व का सबसे गहरा महासागरीय गर्त है।

चैलेंजर डीप की आधुनिक संशोधित गहराई लगभग 10,935 मीटर है।

अटलांटिक महासागर विश्व का दूसरा सबसे बड़ा महासागर है तथा मध्य-अटलांटिक पर्वतमाला इसके मध्य भाग से गुजरती है।

हिन्द महासागर मानसून और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक मार्गों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

दक्षिणी महासागर अंटार्कटिका को घेरे हुए है और इसकी उत्तरी सीमा सामान्यतः 60° दक्षिण अक्षांश मानी जाती है।

आर्कटिक महासागर विश्व का सबसे छोटा और सबसे उथला प्रमुख महासागर है।

महाद्वीपीय मग्न तट महाद्वीप का समुद्र में डूबा हुआ उथला एवं कम ढाल वाला विस्तार है।

महाद्वीपीय ढाल मग्न तट के बाद तेजी से गहराई की ओर उतरने वाला भाग है।

गहरे सागरीय मैदान महासागरीय तल के अत्यंत समतल भाग होते हैं।

मध्य-महासागरीय पर्वतमाला अपसारी प्लेट सीमाओं पर बनती है और यहाँ नई महासागरीय भूपर्पटी का निर्माण होता है।

गहरे समुद्री गर्त मुख्यतः अधोगमन क्षेत्रों में बनते हैं।

समुद्री पर्वत समुद्र के नीचे स्थित ज्वालामुखीय पर्वत हो सकते हैं; सतह से ऊपर आने पर महासागरीय द्वीप बन सकते हैं।

गाइओट — समतल चोटी वाला जलमग्न समुद्री पर्वत।

ऐटोल — वलयाकार प्रवाल भित्ति जिसके मध्य में सामान्यतः लैगून होता है।

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