प्रथम गोलमेज सम्मेलन एवं गांधी–इरविन समझौता
संवैधानिक वार्ता से कांग्रेस–सरकार समझौते तक
राष्ट्रीय आंदोलन का नया चरण
1930–31 का समय भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में अत्यंत महत्वपूर्ण था। एक ओर ब्रिटिश सरकार ने भारत की संवैधानिक समस्याओं पर विचार करने के लिए लंदन में गोलमेज सम्मेलनों की शुरुआत की, वहीं दूसरी ओर भारत में महात्मा गांधी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन चल रहा था। प्रथम गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस ने भाग नहीं लिया, लेकिन बाद में राजनीतिक परिस्थितियों और वार्ताओं के परिणामस्वरूप 5 मार्च 1931 को गांधी–इरविन समझौता हुआ।
प्रथम गोलमेज सम्मेलन
लंदन में संवैधानिक विचार-विमर्श
प्रथम गोलमेज सम्मेलन 12 नवंबर 1930 से 19 जनवरी 1931 तक लंदन में आयोजित किया गया। इसका उद्देश्य भारत में भविष्य की संवैधानिक व्यवस्था पर ब्रिटिश सरकार और विभिन्न भारतीय राजनीतिक तथा सामाजिक समूहों के प्रतिनिधियों के बीच विचार-विमर्श करना था।
सम्मेलन का औपचारिक उद्घाटन ब्रिटेन के सम्राट जॉर्ज पंचम ने किया, जबकि इसकी अध्यक्षता ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री रैम्ज़े मैकडोनाल्ड ने की।
भारत से रियासतों, विभिन्न राजनीतिक दलों, धार्मिक समुदायों, उदारवादी नेताओं, दलित वर्गों, व्यापारिक संगठनों तथा अन्य समूहों के प्रतिनिधियों ने इसमें भाग लिया। भारतीय प्रतिनिधियों की संख्या के संबंध में विभिन्न स्रोतों में अलग-अलग आँकड़े मिलते हैं, इसलिए 89 प्रतिनिधियों की संख्या को सभी स्रोतों में समान रूप से स्वीकार किया गया तथ्य नहीं माना जाता।
कुछ पुराने सामान्य ज्ञान स्रोत प्रतिनिधिमंडल की लंदन यात्रा को “वायसराय ऑफ इंडिया” नामक जहाज से जोड़ते हैं, लेकिन यह विवरण मानक आधुनिक इतिहास स्रोतों में प्रमुख और सर्वमान्य तथ्य के रूप में नहीं मिलता। परीक्षा के लिए सम्मेलन की तिथि, अध्यक्षता, उद्घाटन और कांग्रेस की अनुपस्थिति अधिक महत्वपूर्ण हैं।
कांग्रेस ने भाग क्यों नहीं लिया?
सविनय अवज्ञा आंदोलन की पृष्ठभूमि
प्रथम गोलमेज सम्मेलन के समय भारत में सविनय अवज्ञा आंदोलन चल रहा था। महात्मा गांधी सहित कांग्रेस के अनेक प्रमुख नेता ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध आंदोलन में सक्रिय थे और बड़ी संख्या में नेता जेलों में थे।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने प्रथम गोलमेज सम्मेलन में भाग नहीं लिया। कांग्रेस उस समय भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक संस्था थी, इसलिए उसकी अनुपस्थिति के कारण सम्मेलन की प्रतिनिधिकता और राजनीतिक प्रभाव सीमित हो गया।
ब्रिटिश सरकार ने अनुभव किया कि भारत की भावी संवैधानिक व्यवस्था पर कोई प्रभावी समझौता कांग्रेस को साथ लिए बिना कठिन होगा। यही परिस्थिति आगे चलकर कांग्रेस और सरकार के बीच वार्ता का एक महत्वपूर्ण कारण बनी।
🎯 महत्वपूर्ण तथ्य
प्रथम गोलमेज सम्मेलन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भाग नहीं लिया।
प्रथम गोलमेज सम्मेलन के प्रमुख भारतीय प्रतिनिधि
विभिन्न वर्गों और समुदायों का प्रतिनिधित्व
प्रथम गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस उपस्थित नहीं थी, लेकिन भारत के अनेक प्रमुख नेता और विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधि इसमें शामिल हुए। इनमें तेज बहादुर सप्रू, एम. आर. जयकर, वी. एस. श्रीनिवास शास्त्री, डॉ. भीमराव आंबेडकर और मोहम्मद अली जिन्ना जैसे प्रमुख नाम उल्लेखनीय हैं।
डॉ. भीमराव आंबेडकर ने दलित वर्गों के प्रतिनिधि के रूप में सम्मेलन में भाग लिया और उनके राजनीतिक अधिकारों तथा प्रतिनिधित्व से जुड़े प्रश्नों को प्रमुखता से उठाया।
भारतीय देशी रियासतों के प्रतिनिधियों ने भी सम्मेलन में भाग लिया। भविष्य में भारत के लिए प्रस्तावित संघीय व्यवस्था में ब्रिटिश भारतीय प्रांतों तथा देशी रियासतों को सम्मिलित करने के विचार पर विशेष चर्चा हुई।
प्रथम गोलमेज सम्मेलन का परिणाम
संघीय व्यवस्था पर सहमति की दिशा
प्रथम गोलमेज सम्मेलन में भारत के लिए संघीय शासन व्यवस्था की दिशा में विचार आगे बढ़ा। प्रस्तावित संघ में ब्रिटिश भारत के प्रांतों और देशी रियासतों को शामिल करने की योजना पर चर्चा की गई।
अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व, प्रांतीय स्वायत्तता, संघीय व्यवस्था और उत्तरदायी शासन जैसे विषय सम्मेलन की चर्चाओं के केंद्र में रहे। हालांकि इन विषयों पर तत्काल कोई अंतिम संवैधानिक समाधान नहीं निकल सका।
कांग्रेस की अनुपस्थिति के कारण ब्रिटिश सरकार के लिए व्यापक राजनीतिक सहमति प्राप्त करना कठिन रहा। इसलिए सम्मेलन समाप्त होने के बाद कांग्रेस और सरकार के बीच समझौते की संभावनाओं को तलाशने का प्रयास तेज हुआ।
गांधी और इरविन के बीच वार्ता
समझौते की ओर बढ़ते कदम
प्रथम गोलमेज सम्मेलन के बाद ब्रिटिश सरकार यह समझ चुकी थी कि कांग्रेस की भागीदारी के बिना भारतीय संवैधानिक समस्या पर कोई स्थायी समाधान निकालना कठिन होगा। इसी समय सविनय अवज्ञा आंदोलन के कारण भारत में राजनीतिक तनाव भी बना हुआ था।
तेज बहादुर सप्रू, एम. आर. जयकर और वी. एस. श्रीनिवास शास्त्री जैसे उदारवादी नेताओं ने सरकार और कांग्रेस के बीच बातचीत का वातावरण तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके प्रयासों से महात्मा गांधी और वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच वार्ता का मार्ग प्रशस्त हुआ।
गांधीजी और लॉर्ड इरविन के बीच फरवरी–मार्च 1931 में कई दौर की बातचीत हुई। अंततः दोनों पक्षों के बीच 5 मार्च 1931 को समझौता हुआ, जो इतिहास में गांधी–इरविन समझौते के नाम से प्रसिद्ध है।
गांधी–इरविन समझौता — 5 मार्च 1931
दिल्ली समझौता
5 मार्च 1931 को महात्मा गांधी और भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ। इसे गांधी–इरविन समझौता तथा दिल्ली समझौता दोनों नामों से जाना जाता है।
यह समझौता कांग्रेस और ब्रिटिश सरकार के बीच अस्थायी राजनीतिक समझौते का प्रयास था। इसके माध्यम से सरकार ने कुछ रियायतें देने पर सहमति व्यक्त की, जबकि कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थगित करने और आगामी गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने का निर्णय किया।
🎯 याद रखें
गांधी–इरविन समझौता = 5 मार्च 1931 = दिल्ली समझौता।
समझौते में कांग्रेस की ओर से निर्णय
आंदोलन स्थगन और गोलमेज सम्मेलन
गांधी–इरविन समझौते के अंतर्गत भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थगित करने का निर्णय लिया। यहाँ “स्थगित” शब्द महत्वपूर्ण है; आंदोलन को उस समय स्थायी रूप से समाप्त नहीं किया गया था।
कांग्रेस ने ब्रिटिश सरकार द्वारा आयोजित अगले गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने पर सहमति दी। इसी निर्णय के फलस्वरूप महात्मा गांधी ने बाद में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया।
कांग्रेस ने ब्रिटिश वस्तुओं के शांतिपूर्ण बहिष्कार और धरने से संबंधित अपनी गतिविधियों को समझौते की शर्तों के अनुरूप नियंत्रित करने पर भी सहमति व्यक्त की।
ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई रियायतें
राजनीतिक बंदियों से नमक निर्माण तक
ब्रिटिश सरकार ने सविनय अवज्ञा आंदोलन से संबंधित उन राजनीतिक बंदियों को रिहा करने पर सहमति दी जिन पर हिंसक अपराधों के आरोप नहीं थे। हिंसा से जुड़े मामलों में बंद लोगों की रिहाई इस समझौते का सामान्य हिस्सा नहीं थी।
सविनय अवज्ञा आंदोलन के कारण जब्त की गई ऐसी संपत्ति, जिसे सरकार ने अभी तक किसी अन्य व्यक्ति को न बेचा हो, वापस करने की व्यवस्था पर भी सहमति बनी।
सरकार ने समुद्र तटीय क्षेत्रों के लोगों को अपने उपयोग के लिए नमक बनाने और नमक एकत्र करने की सीमित अनुमति देने पर सहमति दी। इसलिए इसे केवल “सभी भारतीयों को बिना किसी सीमा के नमक बनाने का अधिकार मिल गया” के रूप में समझना सही नहीं है।
सरकार ने शांतिपूर्ण और वैध धरने की अनुमति देने तथा सविनय अवज्ञा आंदोलन से जुड़े अनेक मुकदमों और दंडात्मक कार्रवाइयों में राहत देने की भी बात स्वीकार की।
📌 नमक संबंधी तथ्य
समझौते के बाद नमक कानून पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था। समुद्र तटीय क्षेत्रों के लोगों को निजी उपयोग के लिए नमक बनाने या एकत्र करने की सीमित छूट दी गई थी।
भगत सिंह का प्रश्न
समझौते से जुड़ा महत्वपूर्ण संदर्भ
गांधी–इरविन समझौते के समय भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को मृत्युदंड सुनाया जा चुका था। गांधीजी ने इरविन के सामने उनकी सजा कम करने का प्रश्न उठाया, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने उनकी मृत्युदंड की सजा को समाप्त नहीं किया।
23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को लाहौर जेल में फाँसी दे दी गई। यह घटना गांधी–इरविन समझौते के कुछ ही समय बाद हुई और देश में व्यापक जनभावना तथा असंतोष का कारण बनी।
गांधी–इरविन समझौते में उनकी रिहाई या मृत्युदंड समाप्त करने की कोई शर्त शामिल नहीं थी। इसलिए समझौते की शर्तों और गांधीजी द्वारा व्यक्तिगत रूप से सजा कम करने के लिए किए गए प्रयास को अलग-अलग समझना चाहिए।
कराची अधिवेशन — 1931
गांधी–इरविन समझौते की स्वीकृति
मार्च 1931 में कराची में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन आयोजित हुआ। इसकी अध्यक्षता सरदार वल्लभभाई पटेल ने की। इसी अधिवेशन में कांग्रेस ने गांधी–इरविन समझौते को स्वीकृति प्रदान की।
कराची अधिवेशन केवल गांधी–इरविन समझौते के कारण ही महत्वपूर्ण नहीं था। इस अधिवेशन में कांग्रेस ने मौलिक अधिकारों और राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रम से संबंधित महत्वपूर्ण प्रस्ताव भी पारित किए।
मौलिक अधिकारों से जुड़े प्रस्ताव में अभिव्यक्ति और संगठन की स्वतंत्रता, धर्म की स्वतंत्रता, कानून के समक्ष समानता तथा नागरिक स्वतंत्रताओं जैसे सिद्धांतों पर बल दिया गया। बाद में स्वतंत्र भारत के संवैधानिक विकास में इन विचारों का विशेष महत्व रहा।
📗 महत्वपूर्ण संबंध
कराची अधिवेशन — 1931 — अध्यक्ष सरदार वल्लभभाई पटेल — गांधी–इरविन समझौते की स्वीकृति — मौलिक अधिकार और राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रम।
सरोजिनी नायडू की प्रसिद्ध टिप्पणी
गांधी और इरविन के संदर्भ में
गांधी–इरविन वार्ता से जुड़ी एक प्रसिद्ध टिप्पणी सरोजिनी नायडू से संबंधित बताई जाती है। लोकप्रिय परीक्षा-साहित्य में उल्लेख मिलता है कि उन्होंने गांधीजी और लॉर्ड इरविन को “दो महात्मा” कहा था।
यह कथन सामान्य ज्ञान की पुस्तकों में प्रचलित है, लेकिन इसे गांधी–इरविन समझौते की औपचारिक शर्त या संवैधानिक तथ्य के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए। परीक्षा में यदि कथन आधारित प्रश्न पूछा जाए तो इसे सरोजिनी नायडू से जोड़ा जाता है।
गांधी–इरविन समझौते का महत्त्व
कांग्रेस और ब्रिटिश सरकार के संबंधों में नया चरण
गांधी–इरविन समझौते का सबसे बड़ा राजनीतिक महत्व यह था कि ब्रिटिश सरकार को कांग्रेस के साथ सीधे वार्ता करनी पड़ी। इससे कांग्रेस की भूमिका को भारतीय राजनीति में एक प्रमुख राजनीतिक शक्ति के रूप में और अधिक स्पष्ट मान्यता मिली।
समझौते ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को अस्थायी विराम दिया और कांग्रेस के लिए संवैधानिक वार्ता में भाग लेने का मार्ग खोला। परिणामस्वरूप महात्मा गांधी ने द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस का प्रतिनिधित्व किया।
हालांकि समझौते से भारत को पूर्ण स्वराज नहीं मिला और न ही कांग्रेस की सभी मांगें स्वीकार की गईं। इसलिए इसे पूर्ण राजनीतिक विजय के बजाय तत्कालीन परिस्थितियों में किया गया एक महत्वपूर्ण राजनीतिक समझौता माना जाता है।
घटनाक्रम एक नज़र में
तिथि और घटना को साथ याद करें
| तिथि / वर्ष | घटना | मुख्य तथ्य |
|---|---|---|
| 12 नवंबर 1930 | प्रथम गोलमेज सम्मेलन प्रारंभ | लंदन में आयोजित; कांग्रेस ने भाग नहीं लिया। |
| 19 जनवरी 1931 | प्रथम गोलमेज सम्मेलन समाप्त | संघीय व्यवस्था सहित संवैधानिक प्रश्नों पर चर्चा हुई। |
| 5 मार्च 1931 | गांधी–इरविन समझौता | सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित करने और गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने पर सहमति। |
| 23 मार्च 1931 | भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी | गांधी–इरविन समझौते के कुछ समय बाद यह घटना हुई। |
| मार्च 1931 | कराची अधिवेशन | अध्यक्ष वल्लभभाई पटेल; गांधी–इरविन समझौते की स्वीकृति। |
क्रम से याद करें
राष्ट्रीय आंदोलन की महत्वपूर्ण कड़ी
🧠 घटनाक्रम
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति
प्रथम गोलमेज सम्मेलन 12 नवंबर 1930 से 19 जनवरी 1931 तक लंदन में आयोजित हुआ।
इसका उद्घाटन जॉर्ज पंचम ने किया और अध्यक्षता ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्ज़े मैकडोनाल्ड ने की।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने प्रथम गोलमेज सम्मेलन में भाग नहीं लिया।
प्रथम गोलमेज सम्मेलन में संघीय व्यवस्था, प्रांतीय स्वायत्तता, अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व और उत्तरदायी शासन जैसे विषयों पर चर्चा हुई।
तेज बहादुर सप्रू, एम. आर. जयकर और वी. एस. श्रीनिवास शास्त्री ने कांग्रेस और सरकार के बीच बातचीत का वातावरण बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
5 मार्च 1931 को महात्मा गांधी और लॉर्ड इरविन के बीच गांधी–इरविन समझौता हुआ। इसे दिल्ली समझौता भी कहा जाता है।
समझौते के अंतर्गत कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थगित किया और दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने पर सहमति दी।
सरकार ने हिंसा से संबंधित अपराधों को छोड़कर सविनय अवज्ञा आंदोलन से जुड़े अनेक राजनीतिक बंदियों की रिहाई तथा कुछ जब्त संपत्तियों की वापसी स्वीकार की।
समुद्र तटीय क्षेत्रों में लोगों को निजी उपयोग के लिए नमक बनाने और एकत्र करने की सीमित छूट दी गई; नमक कानून पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था।
कराची अधिवेशन 1931 की अध्यक्षता सरदार वल्लभभाई पटेल ने की और कांग्रेस ने गांधी–इरविन समझौते को स्वीकार किया।
कराची अधिवेशन में मौलिक अधिकार और राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रम से संबंधित महत्वपूर्ण प्रस्ताव भी पारित किए गए।
सरोजिनी नायडू से गांधी और इरविन को “दो महात्मा” कहने की प्रसिद्ध टिप्पणी जोड़ी जाती है।
गांधी–इरविन समझौता → कांग्रेस की द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भागीदारी इस पूरे घटनाक्रम की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक कड़ी थी।