प्रथम विश्व युद्ध
(1914–1918)
प्रथम विश्व युद्ध और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन
प्रथम विश्व युद्ध 28 जुलाई 1914 से 11 नवंबर 1918 तक चला। इसकी शुरुआत यूरोप से हुई, लेकिन धीरे-धीरे इसमें दुनिया की अनेक प्रमुख शक्तियाँ शामिल हो गईं और यह एक व्यापक विश्व युद्ध बन गया।
भारत उस समय ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन था, इसलिए भारत को भी स्वतः ब्रिटेन की ओर से युद्ध में सम्मिलित कर लिया गया। भारतीय सैनिकों, संसाधनों और धन का बड़े पैमाने पर ब्रिटिश युद्ध प्रयासों में उपयोग हुआ। युद्ध ने भारतीय अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय राजनीति दोनों पर गहरा प्रभाव डाला।
प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत
प्रथम विश्व युद्ध 28 जुलाई 1914 ई. को प्रारंभ हुआ, जब ऑस्ट्रिया-हंगरी ने सर्बिया के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की।
इसके बाद यूरोप की विभिन्न सैन्य संधियों और राजनीतिक गठबंधनों के कारण जर्मनी, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन सहित अनेक देश तेजी से युद्ध में शामिल हो गए।
कुछ ही समय में यूरोप का क्षेत्रीय संघर्ष एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय युद्ध में बदल गया।
परीक्षा के लिए
प्रथम विश्व युद्ध — 28 जुलाई 1914 से 11 नवंबर 1918 तक।
युद्ध का तात्कालिक कारण
प्रथम विश्व युद्ध का तात्कालिक कारण ऑस्ट्रिया-हंगरी के युवराज आर्कड्यूक फ्रांज फर्डिनेंड और उनकी पत्नी की हत्या थी।
28 जून 1914 को बोस्निया के सारायेवो में सर्ब राष्ट्रवादी विचारों से प्रभावित युवक गैवरिलो प्रिंसिप ने उनकी हत्या कर दी।
ऑस्ट्रिया-हंगरी ने इस घटना के लिए सर्बिया को जिम्मेदार ठहराया और अंततः 28 जुलाई 1914 को उसके विरुद्ध युद्ध घोषित कर दिया।
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28 जून 1914 — फ्रांज फर्डिनेंड की हत्या।
28 जुलाई 1914 — प्रथम विश्व युद्ध प्रारंभ।
प्रथम विश्व युद्ध के प्रमुख कारण
युद्ध के पीछे केवल एक हत्या जिम्मेदार नहीं थी। यूरोपीय देशों के बीच लंबे समय से साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा, उपनिवेशों के लिए संघर्ष और आर्थिक प्रतिद्वंद्विता मौजूद थी।
यूरोपीय शक्तियों ने अपनी सेनाओं और हथियारों में तेजी से वृद्धि की थी। इस सैन्यवाद ने युद्ध की संभावना को और बढ़ाया।
राष्ट्रवाद की तीव्र भावना, विशेषकर बाल्कन क्षेत्र में, विभिन्न जातीय और राजनीतिक संघर्षों का कारण बनी हुई थी।
यूरोप दो विरोधी सैन्य गठबंधनों में विभाजित हो चुका था। इस कारण एक देश का संघर्ष बहुत तेजी से अन्य देशों को भी युद्ध में खींच लाया।
युद्ध के दो प्रमुख गुट
| केंद्रीय शक्तियाँ | मित्र राष्ट्र |
|---|---|
| जर्मनी | ब्रिटेन |
| ऑस्ट्रिया-हंगरी | फ्रांस |
| उस्मानी तुर्की | रूस |
| बुल्गारिया | सर्बिया |
| — | जापान |
| — | इटली |
| — | संयुक्त राज्य अमेरिका |
भ्रम से बचें
इटली 1914 में तुरंत युद्ध में शामिल नहीं हुआ था। वह प्रारंभ में तटस्थ रहा और 1915 में मित्र राष्ट्रों की ओर से युद्ध में आया।
इसी प्रकार उस्मानी तुर्की भी 28 जुलाई 1914 को युद्ध शुरू होते ही सक्रिय पक्ष नहीं था; वह बाद में 1914 में केंद्रीय शक्तियों के साथ युद्ध में शामिल हुआ।
भारत और प्रथम विश्व युद्ध
प्रथम विश्व युद्ध के समय भारत स्वतंत्र देश नहीं था, बल्कि ब्रिटिश शासन के अधीन था।
ब्रिटेन के युद्ध में प्रवेश करते ही भारत को भी ब्रिटिश साम्राज्य के हिस्से के रूप में युद्ध में सम्मिलित माना गया। भारतीय जनता या भारतीय नेताओं से इसके लिए अलग राजनीतिक सहमति नहीं ली गई।
भारतीय सैनिकों को यूरोप, पश्चिम एशिया और अन्य युद्ध क्षेत्रों में भेजा गया तथा भारत से धन, भोजन, घोड़े, कपड़े और अन्य युद्ध सामग्री ब्रिटिश युद्ध प्रयासों के लिए उपलब्ध कराई गई।
इस कारण प्रथम विश्व युद्ध का भारत की अर्थव्यवस्था और राजनीति दोनों पर व्यापक प्रभाव पड़ा।
कांग्रेस का प्रारंभिक दृष्टिकोण
युद्ध के प्रारंभिक चरण में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उदारवादी नेतृत्व और अनेक प्रमुख भारतीय नेताओं ने ब्रिटिश युद्ध प्रयासों का सहयोग किया।
इन नेताओं की आशा थी कि युद्ध के कठिन समय में भारत की सहायता और निष्ठा के बदले ब्रिटिश सरकार भारत को अधिक राजनीतिक अधिकार और स्वशासन की दिशा में महत्वपूर्ण सुधार प्रदान करेगी।
लेकिन सभी राष्ट्रवादी ब्रिटिश सरकार को बिना शर्त समर्थन देने के पक्ष में नहीं थे। युद्ध आगे बढ़ने के साथ भारतीय राजनीति में स्वशासन की मांग और अधिक तेज होती गई।
इसी राजनीतिक वातावरण में आगे होमरूल आंदोलन और अधिक अधिकारों की मांग ने गति पकड़ी।
परीक्षा के लिए
प्रथम विश्व युद्ध के प्रारंभ में कांग्रेस के उदारवादी नेतृत्व ने ब्रिटेन के युद्ध प्रयासों का समर्थन किया और बदले में राजनीतिक सुधारों की आशा की।
गांधीजी और प्रथम विश्व युद्ध
प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने के समय महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के मार्ग में थे और अगस्त 1914 में इंग्लैंड पहुँचे।
उस समय गांधीजी ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति पूर्ण असहयोग की नीति पर नहीं पहुँचे थे। उनका मानना था कि संकट के समय सहयोग करने से भारतीयों को भविष्य में ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर समान अधिकार प्राप्त करने की नैतिक स्थिति मजबूत होगी।
इसलिए उन्होंने युद्ध के दौरान सीधे हथियार उठाने के बजाय चिकित्सा और राहत कार्यों में सहयोग का रास्ता अपनाया।
लंदन में भारतीय एम्बुलेंस टुकड़ी
1914 ई. में लंदन में गांधीजी ने भारतीय स्वयंसेवी एम्बुलेंस टुकड़ी का संगठन किया।
इसमें उस समय इंग्लैंड में रहने वाले भारतीय, विशेषकर विद्यार्थी, शामिल हुए।
इन स्वयंसेवकों को घायल सैनिकों की सहायता, उन्हें स्ट्रेचर से ले जाने और चिकित्सा सेवा से संबंधित कार्यों के लिए प्रशिक्षित किया गया।
इसलिए गांधीजी के बारे में सही तथ्य यह है कि उन्होंने घायल सैनिकों की सेवा के लिए स्वयंसेवी एम्बुलेंस दल बनाया था।
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1914 — लंदन — गांधीजी — भारतीय स्वयंसेवी एम्बुलेंस टुकड़ी।
गांधीजी का भारत आगमन
महात्मा गांधी लंबे समय तक दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने के बाद जनवरी 1915 में भारत लौटे।
भारत लौटने के बाद गोपालकृष्ण गोखले की सलाह पर उन्होंने भारतीय राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों को समझने के लिए देश के विभिन्न क्षेत्रों का दौरा किया।
कुछ वर्षों के भीतर चंपारण, अहमदाबाद और खेड़ा के आंदोलनों ने उन्हें भारतीय राष्ट्रीय राजनीति के प्रमुख नेताओं में स्थापित कर दिया।
युद्ध का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
प्रथम विश्व युद्ध के कारण भारत सरकार का रक्षा व्यय बहुत तेजी से बढ़ा।
इस अतिरिक्त खर्च को पूरा करने के लिए सरकार ने करों में वृद्धि की और भारतीय जनता पर आर्थिक बोझ बढ़ा।
युद्धकाल में आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में तेजी से वृद्धि हुई, जिससे सामान्य जनता के जीवन पर गंभीर प्रभाव पड़ा।
युद्ध के लिए भारत से बड़ी मात्रा में वस्तुओं और संसाधनों की मांग होने से कई वस्तुओं की उपलब्धता और कीमत प्रभावित हुई।
इन आर्थिक कठिनाइयों ने ब्रिटिश शासन के प्रति जनता के असंतोष को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
युद्ध और भारतीय राष्ट्रवाद
युद्ध के दौरान भारतीय नेताओं में यह धारणा मजबूत हुई कि यदि भारत ब्रिटिश साम्राज्य के लिए सैनिक, धन और संसाधन उपलब्ध करा रहा है तो भारतीयों को भी शासन में अधिक अधिकार मिलने चाहिए।
इसी कारण युद्धकाल में स्वशासन की मांग अधिक तेज हुई।
बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट से संबंधित होमरूल आंदोलन इसी युद्धकालीन वातावरण में विकसित हुआ।
1916 में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच लखनऊ समझौता भी भारतीय राजनीति की महत्वपूर्ण घटना बनी।
होमरूल आंदोलन से संबंध
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार पर दबाव बनाने और भारत के लिए स्वशासन की मांग को मजबूत करने के उद्देश्य से होमरूल आंदोलन विकसित हुआ।
बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट इसके दो सबसे महत्वपूर्ण नेता थे।
होमरूल का अर्थ ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर भारत के लिए स्वशासन प्राप्त करना था।
इस आंदोलन ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान राष्ट्रीय राजनीतिक गतिविधियों में नई ऊर्जा उत्पन्न की और आगे गांधी युग के जन-आंदोलनों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया।
मॉन्टेग्यू घोषणा — 1917
युद्ध के दौरान बढ़ती भारतीय राजनीतिक मांगों के बीच ब्रिटिश सरकार ने 20 अगस्त 1917 को भारत के संबंध में एक महत्वपूर्ण घोषणा की।
भारत सचिव एडविन मॉन्टेग्यू की इस घोषणा में भारतीयों को प्रशासन की प्रत्येक शाखा में अधिक भागीदारी देने और भारत में क्रमिक रूप से उत्तरदायी शासन के विकास की नीति स्वीकार की गई।
आगे इसी नीति की दिशा में 1919 के मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार और भारत सरकार अधिनियम 1919 आए।
प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति
लगभग चार वर्षों तक चले विनाशकारी युद्ध के बाद केंद्रीय शक्तियाँ कमजोर पड़ने लगीं।
11 नवंबर 1918 ई. को जर्मनी ने युद्धविराम स्वीकार किया और प्रथम विश्व युद्ध की लड़ाई समाप्त हुई।
युद्ध के बाद 1919 में पेरिस शांति सम्मेलन आयोजित हुआ और जर्मनी के साथ वर्साय की संधि की गई।
युद्ध की समाप्ति के बाद भी भारतीयों को अपेक्षित राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं मिली, जिससे ब्रिटिश शासन के प्रति निराशा और असंतोष अधिक बढ़ा।
परीक्षा के लिए
11 नवंबर 1918 — प्रथम विश्व युद्ध की लड़ाई समाप्त।
युद्ध के बाद भारत में बदलती स्थिति
युद्ध में भारत के व्यापक सहयोग के बावजूद ब्रिटिश सरकार ने युद्ध के बाद भारतीयों को तुरंत स्वशासन प्रदान नहीं किया।
इसके विपरीत राजनीतिक गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए आगे रॉलेट एक्ट, 1919 जैसा दमनकारी कानून लागू किया गया।
रॉलेट एक्ट के विरोध और उसी राजनीतिक वातावरण में हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड ने ब्रिटिश शासन के प्रति भारतीय दृष्टिकोण को गहराई से बदल दिया।
इसके बाद भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन अधिक व्यापक जन-आंदोलन की दिशा में बढ़ा और गांधीजी राष्ट्रीय राजनीति के केंद्रीय नेता बन गए।
महत्वपूर्ण तिथियाँ
| तिथि / वर्ष | घटना |
|---|---|
| 28 जून 1914 | आर्कड्यूक फ्रांज फर्डिनेंड की हत्या |
| 28 जुलाई 1914 | ऑस्ट्रिया-हंगरी ने सर्बिया पर युद्ध घोषित किया; प्रथम विश्व युद्ध प्रारंभ |
| 1914 | गांधीजी ने लंदन में भारतीय स्वयंसेवी एम्बुलेंस टुकड़ी संगठित की |
| जनवरी 1915 | गांधीजी भारत लौटे |
| 1916 | होमरूल आंदोलन का विस्तार और लखनऊ समझौता |
| 20 अगस्त 1917 | मॉन्टेग्यू घोषणा |
| 11 नवंबर 1918 | प्रथम विश्व युद्ध की लड़ाई समाप्त |
| 1919 | वर्साय की संधि |
परीक्षा में भ्रमित करने वाले तथ्य
प्रथम विश्व युद्ध — 1914 से 1918।
युद्ध का तात्कालिक कारण — आर्कड्यूक फ्रांज फर्डिनेंड की हत्या।
युद्ध प्रारंभ — 28 जुलाई 1914।
युद्ध की शुरुआत में प्रमुख केंद्रीय शक्तियाँ जर्मनी और ऑस्ट्रिया-हंगरी थीं।
उस्मानी तुर्की बाद में 1914 में केंद्रीय शक्तियों में शामिल हुआ।
इटली 1914 में केंद्रीय शक्तियों की ओर से युद्ध नहीं लड़ा। वह प्रारंभ में तटस्थ रहा और 1915 में मित्र राष्ट्रों की ओर से युद्ध में शामिल हुआ।
प्रमुख मित्र राष्ट्रों में ब्रिटेन, फ्रांस और रूस शामिल थे; आगे जापान, इटली और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देश भी इनके साथ आए।
युद्ध के प्रारंभ में कांग्रेस के उदारवादी नेतृत्व ने ब्रिटिश युद्ध प्रयासों का सहयोग किया और राजनीतिक सुधारों की आशा रखी।
गांधीजी ने 1914 में लंदन में भारतीय स्वयंसेवी एम्बुलेंस टुकड़ी बनाई थी।
यह दल घायल सैनिकों की चिकित्सा-सहायता और उन्हें स्ट्रेचर से पहुँचाने जैसे कार्यों से संबंधित था।
11 नवंबर 1918 को युद्धविराम के साथ लड़ाई समाप्त हुई।
एक नजर में
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| युद्ध | प्रथम विश्व युद्ध |
| अवधि | 1914–1918 |
| आरंभ | 28 जुलाई 1914 |
| तात्कालिक कारण | फ्रांज फर्डिनेंड की हत्या |
| प्रमुख केंद्रीय शक्तियाँ | जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी, उस्मानी तुर्की, बुल्गारिया |
| प्रमुख मित्र राष्ट्र | ब्रिटेन, फ्रांस, रूस तथा आगे जापान, इटली और अमेरिका |
| गांधीजी का कार्य | 1914 में लंदन में भारतीय स्वयंसेवी एम्बुलेंस टुकड़ी |
| भारतीय राजनीति पर प्रभाव | स्वशासन की मांग और राष्ट्रवादी गतिविधियों में वृद्धि |
| युद्ध समाप्त | 11 नवंबर 1918 |
अंतिम त्वरित पुनरावृत्ति
प्रथम विश्व युद्ध 28 जुलाई 1914 को शुरू हुआ और 11 नवंबर 1918 को युद्धविराम के साथ समाप्त हुआ।
इसका तात्कालिक कारण 28 जून 1914 को ऑस्ट्रिया-हंगरी के युवराज फ्रांज फर्डिनेंड की हत्या थी।
प्रमुख केंद्रीय शक्तियों में जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी, उस्मानी तुर्की और बुल्गारिया शामिल हुए।
प्रमुख मित्र राष्ट्रों में ब्रिटेन, फ्रांस और रूस थे तथा आगे जापान, इटली और संयुक्त राज्य अमेरिका भी इनके साथ आए।
इटली युद्ध के प्रारंभ में तटस्थ था और 1915 में मित्र राष्ट्रों की ओर से युद्ध में शामिल हुआ।
उस्मानी तुर्की भी युद्ध शुरू होने के कुछ समय बाद केंद्रीय शक्तियों के साथ शामिल हुआ।
भारत उस समय ब्रिटिश शासन के अधीन होने के कारण ब्रिटेन की ओर से युद्ध प्रयासों में शामिल हुआ।
युद्ध के प्रारंभ में कांग्रेस के उदारवादी नेतृत्व ने ब्रिटिश युद्ध प्रयासों का समर्थन किया और बदले में भारत के लिए अधिक राजनीतिक अधिकारों की आशा की।
1914 में गांधीजी ने लंदन में भारतीय स्वयंसेवी एम्बुलेंस टुकड़ी बनाई, जिसमें वहाँ रहने वाले अनेक भारतीय और विद्यार्थी शामिल हुए।
इस दल ने घायल सैनिकों को चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने और उन्हें स्ट्रेचर से पहुँचाने जैसे सेवा कार्य किए।
जनवरी 1915 में गांधीजी भारत लौटे।
युद्ध के कारण भारत में रक्षा व्यय, कर और आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ीं, जिससे सामान्य जनता पर आर्थिक दबाव बढ़ा।
युद्धकाल में स्वशासन की मांग तेज हुई और होमरूल आंदोलन का विकास हुआ।
1916 में लखनऊ समझौता भारतीय राजनीति की महत्वपूर्ण घटना बना।
20 अगस्त 1917 को मॉन्टेग्यू घोषणा में भारत में क्रमिक उत्तरदायी शासन के विकास की नीति घोषित की गई।
युद्ध के बाद भारतीयों को अपेक्षित राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं मिली और आगे रॉलेट एक्ट तथा जलियांवाला बाग जैसी घटनाओं ने राष्ट्रीय आंदोलन को और तीव्र किया।
परीक्षा के लिए मुख्य क्रम है — 28 जून 1914 फ्रांज फर्डिनेंड की हत्या → 28 जुलाई 1914 युद्ध प्रारंभ → 1914 गांधीजी की लंदन एम्बुलेंस टुकड़ी → 1915 गांधीजी भारत आए → 1916 होमरूल एवं लखनऊ समझौता → 1917 मॉन्टेग्यू घोषणा → 11 नवंबर 1918 युद्ध समाप्त।