भरतनाट्यम
उद्भव, विकास, विशेषताएँ एवं प्रमुख कलाकार
भरतनाट्यम का परिचय
भरतनाट्यम भारत की सबसे प्राचीन शास्त्रीय नृत्य परंपराओं में से एक है। इसका प्रमुख संबंध तमिलनाडु से है। यह भारत की प्रमुख शास्त्रीय नृत्य शैलियों में शामिल है और दक्षिण भारत की प्राचीन मंदिर-परंपरा से इसका गहरा संबंध रहा है।
भरतनाट्यम की जड़ें प्राचीन भारतीय नृत्य और नाट्य परंपरा में मिलती हैं। इसके सैद्धांतिक आधार को भरतमुनि के नाट्यशास्त्र से जोड़ा जाता है। नाट्यशास्त्र में नृत्य, अभिनय, भाव, रस, हस्त-मुद्राओं और नाट्य प्रस्तुति के सिद्धांतों का विस्तृत वर्णन मिलता है।
भरतनाट्यम का पुराना प्रचलित नाम सदिर या सदिर अट्टम था। यह विशेष रूप से दक्षिण भारत की मंदिर परंपरा और देवदासी परंपरा से जुड़ा हुआ था। 20वीं शताब्दी में इसके पुनरुत्थान के साथ “भरतनाट्यम” नाम व्यापक रूप से प्रचलित हुआ।
भरतनाट्यम के आधुनिक मंचीय स्वरूप को व्यवस्थित करने में तंजावुर चतुष्टय का महत्वपूर्ण योगदान रहा। तंजावुर चतुष्टय में चिन्नैया, पोन्नैया, शिवानंदम और वडिवेलु शामिल थे।
तंजावुर चतुष्टय ने भरतनाट्यम की प्रस्तुति के क्रम को व्यवस्थित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आधुनिक भरतनाट्यम के पारंपरिक प्रस्तुति-क्रम के विकास में उनका विशेष स्थान है।
आधुनिक काल में रुक्मिणी देवी अरुंडेल ने भरतनाट्यम के पुनरुत्थान तथा इसे सम्मानित मंचीय कला के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने 1936 में कलाक्षेत्र की स्थापना की।
टी. बालासरस्वती ने भरतनाट्यम की पारंपरिक, संगीत एवं अभिनय-प्रधान परंपरा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आधुनिक भरतनाट्यम के विकास में रुक्मिणी देवी अरुंडेल और बालासरस्वती दोनों का विशिष्ट स्थान है।
भरतनाट्यम में नृत्त, नृत्य और नाट्य तीनों का समन्वय मिलता है। इसमें लयबद्ध पद-संचालन, हस्त-मुद्राएँ, मुखाभिनय, शारीरिक मुद्राएँ और भाव-अभिव्यक्ति अत्यंत महत्वपूर्ण होती हैं।
✦ भरतनाट्यम की विशेष पहचान
भरतनाट्यम भारत की सबसे प्राचीन शास्त्रीय नृत्य परंपराओं में से एक है और इसका प्रमुख संबंध तमिलनाडु से है।
परीक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण
भरतनाट्यम — तमिलनाडु की प्रमुख शास्त्रीय नृत्य शैली।
भारत की सबसे प्राचीन शास्त्रीय नृत्य परंपराओं में से एक।
पुराना प्रचलित नाम — सदिर या सदिर अट्टम।
सैद्धांतिक आधार — भरतमुनि का नाट्यशास्त्र।
तंजावुर चतुष्टय — चिन्नैया, पोन्नैया, शिवानंदम और वडिवेलु।
रुक्मिणी देवी अरुंडेल — भरतनाट्यम के पुनरुत्थान की प्रमुख हस्ती।
कलाक्षेत्र की स्थापना — 1936।
भरतनाट्यम के तीन महत्वपूर्ण पक्ष — नृत्त, नृत्य और नाट्य।