मौलिक अधिकार
भाग–3 : अनुच्छेद 12 से 35 — समानता, स्वतंत्रता, शोषण-विरोध, धर्म, संस्कृति एवं संवैधानिक उपचार
भाग–3 : मौलिक अधिकार
भारतीय संविधान का भाग–3 मौलिक अधिकारों से संबंधित है और यह अनुच्छेद 12 से 35 तक विस्तृत है। मौलिक अधिकार व्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और गरिमा की रक्षा करते हैं तथा राज्य की शक्तियों पर संवैधानिक सीमाएँ लगाते हैं।
वर्तमान में मौलिक अधिकारों को मुख्यतः छह वर्गों में पढ़ा जाता है— समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक अधिकार और संवैधानिक उपचारों का अधिकार।
अनुच्छेद 12–13 : सामान्य प्रावधान
राज्य की परिभाषा और मौलिक अधिकारों के विरुद्ध कानून
अनुच्छेद 12 — राज्य की परिभाषा: मौलिक अधिकारों के संदर्भ में “राज्य” की परिभाषा निर्धारित करता है। इसमें भारत सरकार और संसद, राज्य सरकार और राज्य विधानमंडल तथा भारत के क्षेत्र में या भारत सरकार के नियंत्रण के अधीन स्थानीय एवं अन्य प्राधिकारी शामिल होते हैं।
अनुच्छेद 13 — मौलिक अधिकारों से असंगत या उनका अल्पीकरण करने वाले कानून: यह उन कानूनों से संबंधित है जो मौलिक अधिकारों के विरुद्ध हैं या उन्हें छीनते अथवा कम करते हैं। ऐसे कानून असंगति की सीमा तक शून्य हो सकते हैं।
अनुच्छेद 13 को मौलिक अधिकारों के निलंबन का अनुच्छेद नहीं समझना चाहिए। राष्ट्रीय आपातकाल में मौलिक अधिकारों पर पड़ने वाले विशेष प्रभाव का संबंध मुख्यतः अनुच्छेद 358 और 359 से है।
🎯 याद रखें
12 = राज्य की परिभाषा
13 = मौलिक अधिकारों के विरुद्ध कानून
अनुच्छेद 14–18 : समानता का अधिकार
कानून के समक्ष समानता से उपाधियों के अंत तक
अनुच्छेद 14 — कानून के समक्ष समानता और कानूनों का समान संरक्षण: राज्य भारत के क्षेत्र में किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता अथवा कानूनों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।
अनुच्छेद 14 में दो प्रमुख अवधारणाएँ हैं— कानून के समक्ष समानता और कानूनों का समान संरक्षण।
अनुच्छेद 15 — भेदभाव का निषेध: राज्य केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म-स्थान के आधार पर किसी नागरिक के विरुद्ध भेदभाव नहीं करेगा।
हालाँकि संविधान महिलाओं और बच्चों, सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए विशेष प्रावधानों की अनुमति देता है।
अनुच्छेद 16 — लोक नियोजन में अवसर की समानता: राज्य के अधीन किसी पद पर नियुक्ति या रोजगार के संबंध में सभी नागरिकों को अवसर की समानता प्रदान करता है।
अनुच्छेद 16 में निर्धारित परिस्थितियों में पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों आदि के लिए आरक्षण संबंधी प्रावधान किए जा सकते हैं।
अनुच्छेद 17 — अस्पृश्यता का अंत: अस्पृश्यता को समाप्त करता है और किसी भी रूप में इसके व्यवहार को निषिद्ध करता है। इससे उत्पन्न किसी निर्योग्यता को लागू करना कानून के अनुसार दंडनीय अपराध है।
अनुच्छेद 18 — उपाधियों का अंत: राज्य सैन्य या शैक्षणिक विशिष्टता को छोड़कर कोई उपाधि प्रदान नहीं करेगा। भारत का कोई नागरिक किसी विदेशी राज्य से उपाधि स्वीकार नहीं कर सकता।
📗 समानता का क्रम
14 — समानता → 15 — भेदभाव निषेध → 16 — लोक नियोजन → 17 — अस्पृश्यता का अंत → 18 — उपाधियों का अंत
अनुच्छेद 19–22 : स्वतंत्रता का अधिकार
स्वतंत्रताओं से गिरफ्तारी एवं निरोध तक
अनुच्छेद 19 केवल भारतीय नागरिकों को छह प्रमुख स्वतंत्रताएँ प्रदान करता है। ये स्वतंत्रताएँ पूर्ण या निरपेक्ष नहीं हैं; संविधान निर्धारित आधारों पर इन पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है।
अनुच्छेद 19 की छह स्वतंत्रताएँ
नागरिकों को प्राप्त प्रमुख स्वतंत्रताएँ
| क्रम | स्वतंत्रता |
|---|---|
| 1 | वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता |
| 2 | शांतिपूर्वक और बिना हथियार के एकत्र होने की स्वतंत्रता |
| 3 | संघ, संगठन या सहकारी समितियाँ बनाने की स्वतंत्रता |
| 4 | भारत के पूरे क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से घूमने की स्वतंत्रता |
| 5 | भारत के किसी भी भाग में निवास करने और बसने की स्वतंत्रता |
| 6 | कोई पेशा अपनाने अथवा कोई व्यवसाय, व्यापार या कारोबार करने की स्वतंत्रता |
⚠️ दो महत्वपूर्ण स्पष्टताएँ
“सभा व समूह बनाने की स्वतंत्रता” को एक ही स्वतंत्रता नहीं समझें। शांतिपूर्ण सभा करने की स्वतंत्रता और संघ/संगठन बनाने की स्वतंत्रता दो अलग अधिकार हैं।
अनुच्छेद 19 में छठी स्वतंत्रता को केवल “आजीविका का अधिकार” नहीं कहा जाता। इसका सही संवैधानिक अर्थ पेशा, व्यवसाय, व्यापार या कारोबार करने की स्वतंत्रता है।
अनुच्छेद 20 : अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण
तीन महत्वपूर्ण संवैधानिक सुरक्षा
अनुच्छेद 20 गिरफ्तारी और निरोध का सामान्य अनुच्छेद नहीं है। यह अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में व्यक्ति को तीन महत्वपूर्ण संवैधानिक संरक्षण देता है।
पूर्वव्यापी दंड विधान से संरक्षण: किसी व्यक्ति को ऐसे कार्य के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता जो उस कार्य के समय अपराध नहीं था और उस समय लागू दंड से अधिक दंड नहीं दिया जा सकता।
दोहरे दंड से संरक्षण: एक ही अपराध के लिए किसी व्यक्ति को एक से अधिक बार अभियोजित और दंडित नहीं किया जा सकता।
आत्म-अभिशंसन से संरक्षण: किसी अपराध के आरोपी व्यक्ति को स्वयं अपने विरुद्ध साक्षी बनने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
🎯 अनुच्छेद 20 = तीन सुरक्षा
पूर्वव्यापी दंड नहीं + एक अपराध के लिए दोहरा दंड नहीं + स्वयं के विरुद्ध गवाही के लिए बाध्य नहीं
अनुच्छेद 21 : जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता
मानवीय गरिमा का महत्वपूर्ण आधार
अनुच्छेद 21 के अनुसार किसी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जा सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय ने समय के साथ अनुच्छेद 21 की व्यापक व्याख्या की है और इसे गरिमापूर्ण जीवन से जुड़े अनेक अधिकारों का आधार माना है।
अनुच्छेद 21 का संरक्षण केवल नागरिकों तक सीमित नहीं है; यह सामान्यतः व्यक्तियों को प्राप्त है।
अनुच्छेद 21क : शिक्षा का अधिकार
6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए
अनुच्छेद 21क राज्य को 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को कानून द्वारा निर्धारित रीति से निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराने का दायित्व देता है।
अनुच्छेद 21क को 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा संविधान में जोड़ा गया।
📗 याद रखें
21 = जीवन
21क = 6–14 वर्ष के बच्चों की शिक्षा
अनुच्छेद 22 : गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण
गिरफ्तार व्यक्ति के संवैधानिक अधिकार
अनुच्छेद 22 गिरफ्तारी और निरोध के संबंध में संरक्षण प्रदान करता है। सामान्य गिरफ्तारी की स्थिति में गिरफ्तार व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी यथाशीघ्र दी जानी चाहिए।
उसे अपनी पसंद के विधि-व्यवसायी से परामर्श और प्रतिरक्षा कराने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
गिरफ्तार व्यक्ति को यात्रा के लिए आवश्यक समय को छोड़कर 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत करना आवश्यक है।
अनुच्छेद 22 में निवारक निरोध से संबंधित विशेष प्रावधान भी हैं।
⚠️ अनुच्छेद 20 और 22 को न मिलाएँ
अनुच्छेद 20 — अपराधों के लिए दोषसिद्धि संबंधी संरक्षण
अनुच्छेद 22 — गिरफ्तारी और निरोध संबंधी संरक्षण
अनुच्छेद 23–24 : शोषण के विरुद्ध अधिकार
मानव तस्करी, बेगार और बाल श्रम पर रोक
अनुच्छेद 23 — मानव तस्करी और बेगार का निषेध: मानव तस्करी, बेगार तथा इसी प्रकार के अन्य बलात् श्रम को निषिद्ध करता है। इसका उल्लंघन कानून के अनुसार दंडनीय अपराध है।
राज्य सार्वजनिक प्रयोजन के लिए अनिवार्य सेवा लागू कर सकता है, लेकिन ऐसी सेवा लागू करते समय केवल धर्म, मूलवंश, जाति या वर्ग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता।
अनुच्छेद 24 — बाल श्रम का निषेध: 14 वर्ष से कम आयु के किसी बच्चे को किसी कारखाने या खान में काम पर नहीं लगाया जा सकता और न ही किसी अन्य जोखिमपूर्ण रोजगार में नियोजित किया जा सकता है।
🎯 सरल क्रम
23 — मानव तस्करी, बेगार और बलात् श्रम
24 — 14 वर्ष से कम बच्चों का जोखिमपूर्ण रोजगार
अनुच्छेद 25–28 : धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
अंतरात्मा, धर्म, धार्मिक संस्थाएँ और धार्मिक शिक्षा
अनुच्छेद 25 — अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता: यह स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, सदाचार, स्वास्थ्य तथा संविधान के अन्य प्रावधानों के अधीन है।
अनुच्छेद 26 — धार्मिक मामलों के प्रबंध की स्वतंत्रता: प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी अनुभाग को निर्धारित संवैधानिक सीमाओं के अधीन धार्मिक और धर्मार्थ संस्थाएँ स्थापित करने तथा अपने धार्मिक मामलों का प्रबंध करने का अधिकार देता है।
अनुच्छेद 27 — किसी विशेष धर्म के प्रचार के लिए कर देने से स्वतंत्रता: किसी व्यक्ति को ऐसे कर का भुगतान करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता जिसकी आय विशेष रूप से किसी विशेष धर्म या धार्मिक संप्रदाय के प्रचार या पोषण पर खर्च की जाए।
अनुच्छेद 28 — धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में उपस्थित होने से संबंधित स्वतंत्रता: पूर्णतः राज्य निधि से संचालित शैक्षणिक संस्था में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी।
लेकिन ऐसा शैक्षणिक संस्थान जिसे राज्य संचालित करता हो और जो किसी ऐसे न्यास या विन्यास के अधीन स्थापित हुआ हो जिसमें धार्मिक शिक्षा देना आवश्यक हो, इस सामान्य प्रतिबंध का अपवाद हो सकता है।
राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त या राज्य सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्था में किसी व्यक्ति को उसकी सहमति के बिना धार्मिक शिक्षा या उपासना में भाग लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अवयस्क के मामले में उसके अभिभावक की सहमति आवश्यक होती है।
अनुच्छेद 29–30 : सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक अधिकार
भाषा, लिपि, संस्कृति और अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाएँ
अनुच्छेद 29 — भाषा, लिपि और संस्कृति की रक्षा: भारत के क्षेत्र या उसके किसी भाग में रहने वाले नागरिकों के ऐसे किसी वर्ग को जिसकी अपनी विशिष्ट भाषा, लिपि या संस्कृति है, उसे सुरक्षित रखने का अधिकार है।
अनुच्छेद 29 को केवल “अल्पसंख्यकों का अधिकार” कहना पूरी तरह सही नहीं है। इसके खंड (1) में अधिकार नागरिकों के किसी वर्ग को दिया गया है जिसकी अपनी विशिष्ट भाषा, लिपि या संस्कृति हो।
अनुच्छेद 29(2) के अनुसार राज्य द्वारा संचालित अथवा राज्य से सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्थान में केवल धर्म, मूलवंश, जाति या भाषा के आधार पर किसी नागरिक को प्रवेश से वंचित नहीं किया जा सकता।
अनुच्छेद 30 — अल्पसंख्यकों का शैक्षणिक अधिकार: धर्म या भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद की शैक्षणिक संस्थाएँ स्थापित करने और उनका प्रशासन करने का अधिकार देता है।
⚠️ 29 और 30 का अंतर
29 — विशिष्ट भाषा, लिपि और संस्कृति की रक्षा
30 — धार्मिक या भाषायी अल्पसंख्यकों द्वारा शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना एवं प्रशासन
अनुच्छेद 31 : संपत्ति का अधिकार
पूर्व मौलिक अधिकार — वर्तमान स्थिति
मूल संविधान में अनुच्छेद 31 संपत्ति के अधिकार से संबंधित था और संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकारों में शामिल था।
44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची से हटा दिया गया और अनुच्छेद 31 को निरस्त कर दिया गया।
वर्तमान में संपत्ति का अधिकार अनुच्छेद 300क के अंतर्गत संरक्षित है, जिसके अनुसार किसी व्यक्ति को विधि के प्राधिकार के बिना उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता।
इसलिए संपत्ति का अधिकार अब मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि एक संवैधानिक अधिकार है।
🎯 अत्यंत महत्वपूर्ण
पहले — अनुच्छेद 31 — मौलिक अधिकार
अब — अनुच्छेद 300क — संवैधानिक संपत्ति अधिकार
अनुच्छेद 32 : संवैधानिक उपचारों का अधिकार
मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सर्वोच्च न्यायालय
अनुच्छेद 32 मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सर्वोच्च न्यायालय जाने का अधिकार प्रदान करता है।
सर्वोच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों के संरक्षण के लिए उचित निर्देश, आदेश और पाँच प्रकार की रिट जारी कर सकता है।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने अनुच्छेद 32 को संविधान का “हृदय और आत्मा” कहा था।
| रिट | सरल अर्थ |
|---|---|
| बंदी प्रत्यक्षीकरण | अवैध निरोध से व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा। |
| परमादेश | सार्वजनिक प्राधिकारी को वैधानिक कर्तव्य करने का आदेश। |
| प्रतिषेध | अधीनस्थ न्यायालय या अधिकरण को अधिकार-सीमा से बाहर जाने से रोकना। |
| उत्प्रेषण | अधीनस्थ न्यायालय/अधिकरण की कार्यवाही या आदेश को जाँचकर निरस्त करना। |
| अधिकार-पृच्छा | पूछना कि कोई व्यक्ति सार्वजनिक पद किस अधिकार से धारण कर रहा है। |
📗 तुलना
सर्वोच्च न्यायालय की रिट शक्ति — अनुच्छेद 32
उच्च न्यायालय की रिट शक्ति — अनुच्छेद 226
अनुच्छेद 33 : मौलिक अधिकारों में संशोधन की संसद की शक्ति
सशस्त्र बल एवं अनुशासन से संबंधित विशेष व्यवस्था
अनुच्छेद 33 संसद को यह निर्धारित करने की शक्ति देता है कि सशस्त्र बलों, लोक व्यवस्था बनाए रखने वाले बलों, गुप्तचर या प्रति-गुप्तचर संगठनों तथा उनसे संबंधित दूरसंचार प्रणालियों में कार्यरत व्यक्तियों पर मौलिक अधिकार किस सीमा तक प्रतिबंधित या परिवर्तित किए जाएँ।
इसका उद्देश्य संबंधित सेवाओं में कर्तव्य का उचित निर्वहन और अनुशासन बनाए रखना है।
यह शक्ति संसद को दी गई है, राज्य विधानमंडलों को नहीं।
अनुच्छेद 34 : मार्शल लॉ की स्थिति में अधिकारों पर प्रभाव
जम्मू-कश्मीर का विशेष प्रावधान नहीं
अनुच्छेद 34 उस स्थिति से संबंधित है जब भारत के किसी क्षेत्र में मार्शल लॉ लागू रहा हो।
संसद मार्शल लॉ के दौरान व्यवस्था बनाए रखने या पुनर्स्थापित करने के संबंध में किए गए कार्यों के लिए संघ या राज्य की सेवा में किसी व्यक्ति अथवा किसी अन्य व्यक्ति को कानून द्वारा क्षतिपूर्ति प्रदान कर सकती है और ऐसे कार्यों को वैध ठहरा सकती है।
इसलिए अनुच्छेद 34 को “जम्मू-कश्मीर के लिए विशेष प्रावधान” कहना गलत है।
⚠️ परीक्षा में बड़ी गलती से बचें
अनुच्छेद 34 = मार्शल लॉ
यह जम्मू-कश्मीर संबंधी अनुच्छेद नहीं है।
अनुच्छेद 35 : भाग–3 को प्रभावी करने के लिए संसद की शक्ति
कुछ विषयों पर कानून बनाने की विशेष शक्ति
अनुच्छेद 35 भाग–3 के कुछ विशेष प्रावधानों को प्रभावी बनाने के लिए कानून बनाने की शक्ति संसद को प्रदान करता है।
इसमें ऐसे विषय शामिल हैं जिनका उल्लेख अनुच्छेद 16(3), अनुच्छेद 32(3), अनुच्छेद 33 और अनुच्छेद 34 में किया गया है।
संसद को उन कृत्यों के लिए दंड निर्धारित करने का भी अधिकार है जिन्हें भाग–3 के अंतर्गत अपराध घोषित किया गया है।
छह मौलिक अधिकार — एक नज़र में
वर्तमान परीक्षा-सुरक्षित वर्गीकरण
| मौलिक अधिकार | अनुच्छेद |
|---|---|
| समानता का अधिकार | 14–18 |
| स्वतंत्रता का अधिकार | 19–22 |
| शोषण के विरुद्ध अधिकार | 23–24 |
| धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार | 25–28 |
| सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक अधिकार | 29–30 |
| संवैधानिक उपचारों का अधिकार | 32 |
🧠 क्रम याद करें
नागरिकों और सभी व्यक्तियों के अधिकार
परीक्षा में अक्सर पूछा जाने वाला अंतर
सभी मौलिक अधिकार केवल भारतीय नागरिकों को ही प्राप्त नहीं हैं। कुछ अधिकारों का लाभ सभी व्यक्तियों को मिलता है, जबकि कुछ विशेष रूप से नागरिकों को दिए गए हैं।
उदाहरण के लिए अनुच्छेद 14, 20 और 21 में प्रयुक्त संवैधानिक सुरक्षा सामान्यतः व्यक्तियों को प्राप्त है।
इसके विपरीत अनुच्छेद 19 की छह स्वतंत्रताएँ केवल भारत के नागरिकों को प्राप्त हैं।
अक्सर भ्रमित करने वाले अनुच्छेद
महत्वपूर्ण सुधार और अंतर
गलत: भाग–3 = अनुच्छेद 12 से 25।
सही: भाग–3 = अनुच्छेद 12 से 35।
गलत: अनुच्छेद 13 = मौलिक अधिकारों का निलंबन।
सही: अनुच्छेद 13 = मौलिक अधिकारों से असंगत या उनका
अल्पीकरण करने वाले कानून।
अपूर्ण: अनुच्छेद 15 में धर्म, जाति और जन्म-स्थान के आधार पर
भेदभाव निषिद्ध है।
पूरा: धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग और जन्म-स्थान।
अपूर्ण: अनुच्छेद 16 = समानता का अधिकार।
सटीक: अनुच्छेद 16 =
लोक नियोजन के विषय में अवसर की समानता।
गलत: अनुच्छेद 20 = गिरफ्तारी और निरोध।
सही: अनुच्छेद 20 = अपराधों के लिए दोषसिद्धि संबंधी संरक्षण;
अनुच्छेद 22 = गिरफ्तारी और निरोध संबंधी संरक्षण।
गलत: अनुच्छेद 19 का छठा अधिकार = आजीविका का अधिकार।
सही: कोई पेशा अपनाने अथवा व्यवसाय, व्यापार या कारोबार करने की स्वतंत्रता।
अति-सामान्य: अनुच्छेद 24 = 14 वर्ष से कम बच्चों के हर प्रकार के श्रम पर संवैधानिक रोक।
संवैधानिक पाठ: कारखाने, खान या अन्य जोखिमपूर्ण रोजगार में
14 वर्ष से कम बच्चे का नियोजन निषिद्ध है।
अपूर्ण: अनुच्छेद 29 = अल्पसंख्यकों का अधिकार।
सही: अनुच्छेद 29(1) विशिष्ट भाषा, लिपि या संस्कृति वाले
नागरिकों के किसी वर्ग की संस्कृति के संरक्षण से संबंधित है।
पुराना: अनुच्छेद 31 = संपत्ति का मौलिक अधिकार।
वर्तमान: अनुच्छेद 31 निरस्त; संपत्ति का अधिकार
अनुच्छेद 300क के अंतर्गत संवैधानिक अधिकार है।
गलत: अनुच्छेद 34 = जम्मू-कश्मीर के लिए विशेष प्रावधान।
सही: अनुच्छेद 34 =
मार्शल लॉ लागू क्षेत्र में अधिकारों पर प्रतिबंध से संबंधित प्रावधान।
अनुच्छेद 12 से 35 — त्वरित सारणी
एक ही स्थान पर पूरा क्रम
| अनुच्छेद | विषय |
|---|---|
| 12 | राज्य की परिभाषा |
| 13 | मौलिक अधिकारों से असंगत या उनका अल्पीकरण करने वाले कानून |
| 14 | कानून के समक्ष समानता और कानूनों का समान संरक्षण |
| 15 | धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म-स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध |
| 16 | लोक नियोजन में अवसर की समानता |
| 17 | अस्पृश्यता का अंत |
| 18 | उपाधियों का अंत |
| 19 | छह स्वतंत्रताओं का संरक्षण |
| 20 | अपराधों के लिए दोषसिद्धि संबंधी संरक्षण |
| 21 | जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण |
| 21क | 6–14 वर्ष के बच्चों का शिक्षा का अधिकार |
| 22 | गिरफ्तारी और निरोध संबंधी संरक्षण |
| 23 | मानव तस्करी, बेगार और बलात् श्रम का निषेध |
| 24 | कारखानों, खानों और जोखिमपूर्ण रोजगार में बाल श्रम का निषेध |
| 25 | अंतःकरण और धर्म मानने, आचरण एवं प्रचार की स्वतंत्रता |
| 26 | धार्मिक मामलों के प्रबंध की स्वतंत्रता |
| 27 | विशेष धर्म के प्रचार हेतु कर देने से स्वतंत्रता |
| 28 | धार्मिक शिक्षा और उपासना में उपस्थिति संबंधी स्वतंत्रता |
| 29 | भाषा, लिपि और संस्कृति की रक्षा तथा प्रवेश संबंधी संरक्षण |
| 30 | अल्पसंख्यकों का शैक्षणिक संस्थाएँ स्थापित एवं प्रशासित करने का अधिकार |
| 31 | निरस्त — पूर्व में संपत्ति का अधिकार |
| 32 | मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु संवैधानिक उपचार |
| 33 | कुछ बलों एवं सेवाओं पर मौलिक अधिकारों में संसद द्वारा संशोधन/प्रतिबंध |
| 34 | मार्शल लॉ की स्थिति में अधिकारों से संबंधित प्रावधान |
| 35 | भाग–3 के कुछ प्रावधानों को प्रभावी करने हेतु संसद की विधायी शक्ति |
⚡ अंतिम रिविजन बिंदु
भाग–3 — मौलिक अधिकार — अनुच्छेद 12 से 35।
12 — राज्य की परिभाषा; 13 — मौलिक अधिकारों के विरुद्ध कानून।
14–18 — समानता का अधिकार: 14 समानता, 15 भेदभाव निषेध, 16 लोक नियोजन में अवसर की समानता, 17 अस्पृश्यता का अंत, 18 उपाधियों का अंत।
19–22 — स्वतंत्रता का अधिकार: 19 छह स्वतंत्रताएँ, 20 दोषसिद्धि संबंधी संरक्षण, 21 जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता, 21क शिक्षा, 22 गिरफ्तारी एवं निरोध।
अनुच्छेद 19 — केवल नागरिकों को छह स्वतंत्रताएँ।
अनुच्छेद 20 — पूर्वव्यापी दंड से संरक्षण + दोहरे दंड से संरक्षण + आत्म-अभिशंसन से संरक्षण।
अनुच्छेद 21क — 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा।
23–24 — शोषण के विरुद्ध अधिकार: 23 मानव तस्करी, बेगार और बलात् श्रम; 24 बाल श्रम संबंधी निषेध।
25–28 — धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार।
29–30 — सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक अधिकार।
अनुच्छेद 29 केवल अल्पसंख्यकों तक सीमित नहीं; अनुच्छेद 30 विशेष रूप से धार्मिक और भाषायी अल्पसंख्यकों से संबंधित है।
अनुच्छेद 31 — निरस्त; संपत्ति का अधिकार अब अनुच्छेद 300क के अंतर्गत।
अनुच्छेद 32 — संवैधानिक उपचारों का अधिकार — संविधान का “हृदय और आत्मा”।
अनुच्छेद 33 — सशस्त्र बल आदि के लिए अधिकारों में संसद द्वारा संशोधन/प्रतिबंध।
अनुच्छेद 34 — मार्शल लॉ; जम्मू-कश्मीर नहीं।
अनुच्छेद 35 — भाग–3 के कुछ विषयों पर संसद की विशेष विधायी शक्ति।
वर्तमान मौलिक अधिकारों की मुख्य श्रेणियाँ — 6।