भारतीय वित्त बाजार
मुद्रा बाजार, पूंजी बाजार, विदेशी मुद्रा बाजार और मुद्रा आपूर्ति
भारतीय वित्त बाजार का अर्थ
भारतीय वित्त बाजार वह व्यवस्था है जिसके माध्यम से बचत करने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं से धन उन व्यक्तियों, कंपनियों और सरकारों तक पहुँचता है जिन्हें निवेश या अन्य आर्थिक गतिविधियों के लिए धन की आवश्यकता होती है।
इस बाजार में शेयर, बॉन्ड, सरकारी प्रतिभूतियाँ, ऋण, जमा, अल्पकालिक वित्तीय साधन तथा अन्य वित्तीय परिसंपत्तियों का लेन-देन किया जाता है।
वित्त बाजार बचत को निवेश में बदलने, पूंजी निर्माण को बढ़ावा देने, उद्योगों को वित्त उपलब्ध कराने और देश के आर्थिक विकास में सहायता करता है।
वित्त बाजार के मुख्य भाग
अवधि के आधार पर वर्गीकरण
भारतीय वित्त बाजार को धन की अवधि के आधार पर मुख्यतः मुद्रा बाजार और पूंजी बाजार में बाँटा जाता है।
मुद्रा बाजार मुख्यतः अल्पकालिक वित्तीय साधनों और एक वर्ष तक की निधियों से संबंधित होता है।
पूंजी बाजार मध्यम और दीर्घकालिक वित्त की व्यवस्था से संबंधित होता है। शेयर, डिबेंचर और दीर्घकालिक बॉन्ड इसके महत्वपूर्ण साधन हैं।
📗 सरल अंतर
मुद्रा बाजार = अल्पकालिक धन
पूंजी बाजार = दीर्घकालिक धन
भारतीय मुद्रा बाजार
अल्पकालिक निधियों का बाजार
भारतीय मुद्रा बाजार वह बाजार है जहाँ अल्पकालिक धन और अत्यधिक तरल वित्तीय साधनों का लेन-देन होता है।
इसका उद्देश्य बैंकों, वित्तीय संस्थानों, कंपनियों और सरकार की अल्पकालिक नकदी तथा तरलता संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करना है।
कॉल मनी, नोटिस मनी, टर्म मनी, ट्रेज़री बिल, वाणिज्यिक पत्र, जमा प्रमाणपत्र और रेपो इसके प्रमुख भाग हैं।
भारतीय रिज़र्व बैंक मुद्रा बाजार के विकास, नियमन और बैंकिंग प्रणाली की तरलता प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
⚠️ बहुत महत्वपूर्ण
मुद्रा बाजार को विदेशी मुद्रा बाजार न समझें। डॉलर, यूरो और रुपये जैसी मुद्राओं के बीच विनिमय का लेन-देन विदेशी मुद्रा बाजार में होता है।
विदेशी मुद्रा बाजार
रुपये और विदेशी मुद्राओं का विनिमय
विदेशी मुद्रा बाजार वह बाजार है जहाँ भारतीय रुपये का अमेरिकी डॉलर, यूरो, येन, पाउंड तथा अन्य विदेशी मुद्राओं के साथ विनिमय किया जाता है।
यह बाजार विदेशी व्यापार, अंतरराष्ट्रीय निवेश, विदेशी ऋण, पर्यटन और सीमा-पार भुगतान के लिए आवश्यक है।
विदेशी मुद्रा बाजार में बैंकों और अधिकृत वित्तीय संस्थानों के बीच होने वाले लेन-देन को व्यापक रूप से अंतर-बैंक बाजार कहा जाता है।
व्यक्तियों, कंपनियों और अन्य ग्राहकों के लिए अधिकृत बैंक तथा विदेशी मुद्रा डीलर विदेशी मुद्रा सेवाएँ उपलब्ध कराते हैं।
विदेशी मुद्रा बाजार में तत्काल सौदे तथा भविष्य की निर्धारित तिथि के लिए किए जाने वाले अग्रिम सौदे प्रमुख रूपों में शामिल हैं।
विदेशी मुद्रा बाजार से संबंधित समितियाँ
पुराने नोट्स में “वर्नन समिति, 1975” को भारत के विदेशी मुद्रा बाजार सुधारों से जोड़कर दिया जाता है, लेकिन भारतीय रिज़र्व बैंक के मानक वित्तीय बाजार इतिहास में इसे प्रमुख मानक समिति के रूप में नहीं दिया जाता। इसलिए इसे परीक्षा का सुनिश्चित तथ्य नहीं मानना चाहिए।
चक्रवर्ती समिति, 1985 का मुख्य संबंध भारत की मौद्रिक प्रणाली और मौद्रिक नीति के कामकाज की समीक्षा से था, केवल विदेशी मुद्रा बाजार से नहीं।
विदेशी मुद्रा बाजार के विकास और सुधारों में सोडानी समिति अर्थात भारत में विदेशी मुद्रा बाजार पर विशेषज्ञ समूह महत्वपूर्ण था।
इस समिति की सिफारिशों के आधार पर विदेशी मुद्रा बाजार में बैंकों को अधिक परिचालन स्वतंत्रता देने और जोखिम प्रबंधन व्यवस्था में सुधार की दिशा में कदम उठाए गए।
🎯 भ्रम से बचें
चक्रवर्ती समिति → मौद्रिक प्रणाली
सोडानी समिति → विदेशी मुद्रा बाजार
कॉल, नोटिस एवं टर्म मनी बाजार
बैंकों की अल्पकालिक नकदी व्यवस्था
कॉल मनी बिना प्रतिभूति के एक दिन अर्थात रातभर के लिए लिए या दिए जाने वाले अल्पकालिक धन को कहा जाता है।
इस बाजार में निर्धारित ब्याज दर को सामान्यतः कॉल रेट कहा जाता है और यह धन की मांग एवं आपूर्ति के अनुसार बदलती रहती है।
यह बैंकिंग प्रणाली में तत्काल नकदी आवश्यकता और दैनिक तरलता प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
नोटिस मनी एक दिन से अधिक लेकिन सामान्यतः 2 से 14 दिन तक की अवधि के लिए बिना प्रतिभूति के लिए या दिए गए धन को कहा जाता है।
टर्म मनी सामान्यतः 15 दिन से एक वर्ष तक की अवधि के लिए दिए गए अल्पकालिक धन को कहा जाता है।
🎯 अवधि याद रखें
कॉल मनी = 1 दिन
नोटिस मनी = 2 से 14 दिन
टर्म मनी = 15 दिन से 1 वर्ष
ट्रेज़री बिल बाजार
केंद्र सरकार की अल्पकालिक उधारी
ट्रेज़री बिल केंद्र सरकार द्वारा अपनी अल्पकालिक वित्तीय आवश्यकता पूरी करने के लिए जारी किए जाने वाले सरकारी प्रतिभूति साधन हैं।
भारत में नियमित रूप से 91 दिन, 182 दिन और 364 दिन की अवधि वाले ट्रेज़री बिल जारी किए जाते हैं।
ट्रेज़री बिल पर अलग से कूपन ब्याज नहीं दिया जाता।
इन्हें अंकित मूल्य से कम कीमत अर्थात छूट पर जारी किया जाता है और परिपक्वता पर निवेशक को पूरा अंकित मूल्य प्राप्त होता है।
अंतर की राशि निवेशक की आय होती है।
केंद्र सरकार द्वारा जारी होने के कारण ट्रेज़री बिल को अपेक्षाकृत कम ऋण जोखिम वाला अल्पकालिक निवेश साधन माना जाता है।
🎯 अवधि
91 दिन + 182 दिन + 364 दिन
वाणिज्यिक पत्र बाजार
कंपनियों की बिना प्रतिभूति अल्पकालिक उधारी
वाणिज्यिक पत्र एक बिना प्रतिभूति वाला मुद्रा बाजार साधन है जिसे योग्य कंपनियाँ और अन्य अनुमत संस्थाएँ अल्पकालिक निधि जुटाने के लिए जारी कर सकती हैं।
यह सामान्यतः प्रतिज्ञा-पत्र के रूप में जारी किया जाता है।
वाणिज्यिक पत्र की मूल अवधि कम से कम 7 दिन और अधिकतम एक वर्ष हो सकती है।
कंपनियाँ इसका उपयोग कार्यशील पूंजी, अल्पकालिक नकदी आवश्यकता और अन्य अनुमत वित्तीय जरूरतों के लिए कर सकती हैं।
वाणिज्यिक पत्र पर बैंक ऋण की तुलना में लागत कम हो सकती है, लेकिन यह जारीकर्ता की साख और बाजार परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
भारत में वाणिज्यिक पत्र को वर्ष 1989 में मुद्रा बाजार के विस्तार के लिए शुरू किया गया।
जमा प्रमाणपत्र बाजार
बैंकों द्वारा जारी परक्राम्य जमा साधन
जमा प्रमाणपत्र एक परक्राम्य मुद्रा बाजार साधन है जो निर्धारित अवधि के लिए बैंक में जमा की गई राशि के विरुद्ध जारी किया जाता है।
बैंक अपनी अल्पकालिक निधि आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जमा प्रमाणपत्र जारी कर सकते हैं।
बैंकों द्वारा जारी जमा प्रमाणपत्र की अवधि कम से कम 7 दिन और अधिकतम एक वर्ष होती है।
यह सामान्य सावधि जमा की तुलना में बाजार में हस्तांतरणीय या व्यापार योग्य वित्तीय साधन होता है।
भारत में जमा प्रमाणपत्र को वर्ष 1989 में शुरू किया गया।
📗 अंतर
वाणिज्यिक पत्र → कंपनियाँ जारी करती हैं
जमा प्रमाणपत्र → बैंक/पात्र वित्तीय संस्थाएँ जारी करते हैं
रेपो एवं रिवर्स रेपो बाजार
प्रतिभूति के विरुद्ध अल्पकालिक धन
रेपो अर्थात पुनर्खरीद समझौता ऐसा लेन-देन है जिसमें एक पक्ष प्रतिभूतियाँ बेचता है और साथ ही भविष्य की निर्धारित तिथि पर उन्हें तय मूल्य पर वापस खरीदने का समझौता करता है।
आर्थिक दृष्टि से यह प्रतिभूति के बदले अल्पकालिक धन उधार लेने जैसा होता है।
जिस पक्ष के लिए लेन-देन धन उधार लेने वाला रेपो है, उसी लेन-देन को धन देने वाले पक्ष की दृष्टि से रिवर्स रेपो कहा जाता है।
रेपो बाजार बैंकों और अन्य पात्र संस्थाओं के अल्पकालिक तरलता प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
भारतीय रिज़र्व बैंक भी बैंकिंग प्रणाली में तरलता और अल्पकालिक ब्याज दरों को प्रभावित करने के लिए विभिन्न तरलता उपकरणों का उपयोग करता है।
⚠️ याद रखें
रेपो और रिवर्स रेपो मूलतः एक ही लेन-देन के दो पक्ष हैं—एक के लिए उधार लेना, दूसरे के लिए उधार देना।
बैंकर्स एक्सेप्टेंस
व्यापारिक भुगतान की बैंक स्वीकृति
बैंकर्स एक्सेप्टेंस ऐसा अल्पकालिक व्यापारिक वित्त साधन है जिसमें बैंक किसी बिल या भुगतान दायित्व को स्वीकार करके निर्धारित तिथि पर भुगतान करने का दायित्व स्वीकार करता है।
इसका उपयोग विशेष रूप से घरेलू और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक लेन-देन में किया जा सकता है।
आयात-निर्यात व्यापार में बैंक की स्वीकृति होने से विक्रेता को भुगतान का अतिरिक्त भरोसा मिलता है।
हालांकि भारत के संगठित मुद्रा बाजार की मानक सूची में कॉल मनी, ट्रेज़री बिल, रेपो, वाणिज्यिक पत्र और जमा प्रमाणपत्र की तुलना में बैंकर्स एक्सेप्टेंस को प्रमुख स्वतंत्र बाजार खंड के रूप में कम महत्व दिया जाता है।
इंट्रा-डे एडवांस
स्वतंत्र मुद्रा बाजार नहीं
पुराने नोट्स में “अडवांस मार्केट” या “इंट्रा-डे एडवांस मार्केट” को मुद्रा बाजार का अलग उप-बाजार बताया जाता है, लेकिन इसे भारत के मानक मुद्रा बाजार का स्वतंत्र प्रमुख खंड मानना उचित नहीं है।
इंट्रा-डे तरलता से आशय दिन के दौरान भुगतान और निपटान की आवश्यकता पूरी करने के लिए उपलब्ध अल्पकालिक धन सुविधा से है।
बैंकों और भुगतान प्रणाली के प्रतिभागियों को दिन के भीतर नकदी प्रवाह संतुलित करने की आवश्यकता हो सकती है।
इसे कॉल मनी, ट्रेज़री बिल या वाणिज्यिक पत्र की तरह अलग मानक मुद्रा बाजार साधन न समझें।
अंतर-बैंक जमा बाजार
बैंकों के बीच निधि व्यवस्था
बैंक एक-दूसरे के पास जमा रख सकते हैं और अपनी परिसंपत्ति-देयता तथा नकदी प्रबंधन आवश्यकताओं के अनुसार अंतर-बैंक निधि लेन-देन कर सकते हैं।
लेकिन “इंटरबैंक डिपॉज़िट मार्केट” को कॉल, नोटिस और टर्म मनी बाजार से पूरी तरह अलग प्रमुख भारतीय मुद्रा बाजार खंड के रूप में याद करना आवश्यक नहीं है।
बैंकों के बीच बिना प्रतिभूति वाली अल्पकालिक उधारी का मानक वर्गीकरण कॉल, नोटिस और टर्म मनी के रूप में अधिक महत्वपूर्ण है।
भारतीय मुद्रा बाजार का विकास
समितियाँ और नए साधन
1980 के दशक से पहले भारतीय मुद्रा बाजार में वित्तीय साधनों की संख्या सीमित थी और बाजार अपेक्षाकृत कम विकसित था।
एस. चक्रवर्ती समिति का गठन 1985 में मौद्रिक प्रणाली के कामकाज की समीक्षा के लिए किया गया था।
समिति की सिफारिशों ने मौद्रिक नीति और मुद्रा प्रबंधन की आगे की दिशा पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाला।
1980 के दशक के उत्तरार्ध में मुद्रा बाजार को गहरा और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए कई सुधार किए गए।
वर्ष 1988 में डिस्काउंट एंड फाइनेंस हाउस ऑफ इंडिया ने कार्य शुरू किया।
वर्ष 1989 में जमा प्रमाणपत्र और वाणिज्यिक पत्र जैसे नए मुद्रा बाजार साधन शुरू किए गए।
इसके बाद वित्तीय क्षेत्र के उदारीकरण के साथ ब्याज दरों, बाजार सहभागियों, ट्रेडिंग और निपटान व्यवस्था में क्रमिक सुधार किए गए।
मुद्रा का स्टॉक
मुद्रा आपूर्ति का मापन
अर्थव्यवस्था में किसी निश्चित समय पर उपलब्ध मुद्रा की कुल मात्रा को सामान्य रूप से मुद्रा स्टॉक या मुद्रा आपूर्ति कहा जाता है।
भारत में मुद्रा आपूर्ति के आँकड़ों का संकलन और प्रकाशन भारतीय रिज़र्व बैंक करता है।
अप्रैल 1977 से भारतीय रिज़र्व बैंक ने मुद्रा आपूर्ति के लिए M1, M2, M3 और M4 जैसे विस्तृत मापों की नई श्रृंखला प्रकाशित करना शुरू किया।
इन मापों में मुख्य अंतर विभिन्न प्रकार की जमाओं की तरलता और उपलब्धता का है।
🎯 महत्वपूर्ण
1977 से परंपरागत मुद्रा आपूर्ति माप — M1, M2, M3 और M4।
M0 — रिज़र्व मनी
मौद्रिक आधार
M0 को सामान्यतः रिज़र्व मनी या मौद्रिक आधार कहा जाता है।
इसमें मुख्य रूप से प्रचलन में मुद्रा + भारतीय रिज़र्व बैंक के पास बैंकरों की जमा + भारतीय रिज़र्व बैंक के पास अन्य जमा शामिल होती हैं।
यह केंद्रीय बैंक द्वारा निर्मित मौद्रिक आधार को दर्शाता है, जिस पर बैंकिंग प्रणाली आगे ऋण और जमा के माध्यम से व्यापक मुद्रा का निर्माण कर सकती है।
इसे M1, M2, M3 और M4 की श्रृंखला में सबसे छोटा माप समझना सही नहीं है, क्योंकि रिज़र्व मनी की संरचना मुद्रा आपूर्ति के इन परंपरागत मापों से अलग है।
⚠️ महत्वपूर्ण सुधार
M1 = M0 + चालू खाते वाला सूत्र सही नहीं है। M0 और M1 अलग अवधारणाएँ हैं।
M1 — संकीर्ण मुद्रा
सबसे अधिक तरल मुद्रा आपूर्ति
M1 को भारत में संकीर्ण मुद्रा कहा जाता है।
इसका सूत्र है: जनता के पास मुद्रा + बैंकिंग प्रणाली में मांग जमा + भारतीय रिज़र्व बैंक के पास अन्य जमा।
मांग जमा में ऐसी बैंक जमाएँ शामिल होती हैं जिन्हें खाताधारक मांग पर निकाल सकता है, जैसे चालू खाते तथा मांग योग्य जमा।
M1 की तरलता बहुत अधिक होती है क्योंकि इसमें शामिल मुद्रा और जमा लेन-देन में जल्दी उपयोग की जा सकती हैं।
ट्रैवलर्स चेक को भारत के RBI M1 सूत्र का अलग मानक घटक नहीं माना जाता।
🎯 सूत्र
M1 = जनता के पास मुद्रा + मांग जमा + RBI में अन्य जमा
M2
M1 से थोड़ा व्यापक माप
M2, M1 की तुलना में व्यापक मुद्रा आपूर्ति माप है।
इसका सूत्र है: M2 = M1 + डाकघर बचत बैंक की बचत जमा।
इसलिए M2 में केवल सामान्य बैंक बचत खाते जोड़ना सही नहीं है। बैंकिंग प्रणाली की संबंधित मांग जमाएँ पहले से M1 के घटकों में शामिल होती हैं।
M3 — व्यापक मुद्रा
भारत में सबसे अधिक प्रयुक्त मुद्रा माप
M3 को सामान्यतः व्यापक मुद्रा कहा जाता है।
इसका सूत्र है: M3 = M1 + बैंकिंग प्रणाली में सावधि जमा।
सावधि जमा में ऐसी जमाएँ शामिल होती हैं जो निश्चित अवधि या निर्धारित शर्तों के अंतर्गत बैंक में रखी जाती हैं।
M3 भारतीय अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति के विश्लेषण में सबसे अधिक प्रयुक्त मापों में से एक है।
इसमें M2 को जोड़ना सही नहीं है। पारंपरिक RBI सूत्र में M3 सीधे M1 में बैंक की सावधि जमाएँ जोड़कर प्राप्त होता है।
🎯 सबसे महत्वपूर्ण सूत्र
M3 = M1 + बैंकों की सावधि जमा
M4 — सर्वाधिक व्यापक परंपरागत माप
डाकघर जमा सहित
M4 परंपरागत भारतीय मुद्रा आपूर्ति मापों में सबसे व्यापक माप है।
इसका सूत्र है: M4 = M3 + डाकघर बचत संगठन की कुल जमा।
इसमें राष्ट्रीय बचत प्रमाणपत्र जैसी गैर-जमा बचत परिसंपत्तियों को सामान्य मुद्रा आपूर्ति घटक की तरह जोड़ना उचित नहीं है।
इसी प्रकार गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की सभी जमाएँ सीधे M4 का मानक घटक नहीं हैं।
⚠️ पुराना गलत सूत्र
M4 = M3 + बचत प्रमाणपत्र + NBFC जमा वाला सामान्यीकृत सूत्र सही RBI परिभाषा नहीं है।
M1 से M4 — एक नजर में
परीक्षा के लिए सूत्र
| माप | सूत्र / अर्थ |
|---|---|
| M0 | प्रचलन में मुद्रा + RBI में बैंकरों की जमा + RBI में अन्य जमा; रिज़र्व मनी |
| M1 | जनता के पास मुद्रा + बैंकों की मांग जमा + RBI में अन्य जमा |
| M2 | M1 + डाकघर बचत बैंक बचत जमा |
| M3 | M1 + बैंकिंग प्रणाली की सावधि जमा |
| M4 | M3 + डाकघर बचत संगठन की कुल जमा |
संकीर्ण और व्यापक मुद्रा
तरलता के आधार पर अंतर
M1 को संकीर्ण मुद्रा कहा जाता है क्योंकि इसके घटक अत्यधिक तरल होते हैं और तत्काल भुगतान तथा लेन-देन में उपयोग किए जा सकते हैं।
M1 को केवल “जनता को उपलब्ध नकदी” कहना अधूरा है, क्योंकि इसमें जनता के पास मुद्रा के साथ बैंकों की मांग जमा और RBI की अन्य जमा भी शामिल होती हैं।
M3 को व्यापक मुद्रा कहा जाता है क्योंकि इसमें M1 के साथ बैंकिंग प्रणाली की सावधि जमा भी शामिल होती हैं।
M3 अर्थव्यवस्था में कुल मुद्रा और बैंक जमा की स्थिति को समझने तथा मौद्रिक विश्लेषण के लिए महत्वपूर्ण माप है।
M4 परंपरागत चार मापों में M3 से भी व्यापक है, लेकिन व्यवहारिक आर्थिक विश्लेषण और सामान्य परीक्षा प्रश्नों में M3 को “ब्रॉड मनी” के रूप में विशेष महत्व दिया जाता है।
मुद्रा बाजार के साधन — एक नजर में
त्वरित तुलना
| साधन | मुख्य विशेषता |
|---|---|
| कॉल मनी | एक दिन की बिना प्रतिभूति उधारी |
| नोटिस मनी | 2 से 14 दिन |
| टर्म मनी | 15 दिन से 1 वर्ष |
| ट्रेज़री बिल | केंद्र सरकार; 91, 182 और 364 दिन |
| वाणिज्यिक पत्र | कंपनियों की बिना प्रतिभूति अल्पकालिक उधारी |
| जमा प्रमाणपत्र | बैंक द्वारा जारी परक्राम्य जमा साधन |
| रेपो | प्रतिभूति के विरुद्ध अल्पकालिक धन |
त्वरित पुनरावृत्ति
पूरा अध्याय एक क्रम में
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति बिंदु
भारतीय वित्त बाजार के दो मुख्य भाग मुद्रा बाजार और पूंजी बाजार हैं।
मुद्रा बाजार मुख्यतः एक वर्ष तक की अल्पकालिक निधियों से संबंधित होता है।
विदेशी मुद्रा बाजार मुद्रा बाजार से अलग है और इसमें रुपये तथा विदेशी मुद्राओं का विनिमय होता है।
चक्रवर्ती समिति, 1985 का संबंध मौद्रिक प्रणाली की समीक्षा से था।
सोडानी समिति का संबंध विदेशी मुद्रा बाजार के सुधारों से था।
कॉल मनी = 1 दिन।
नोटिस मनी = 2 से 14 दिन।
टर्म मनी = 15 दिन से 1 वर्ष।
ट्रेज़री बिल केंद्र सरकार द्वारा जारी किए जाते हैं और उनकी प्रमुख अवधियाँ 91, 182 और 364 दिन हैं।
ट्रेज़री बिल छूट पर जारी होते हैं और उन पर अलग कूपन ब्याज नहीं होता।
वाणिज्यिक पत्र एक बिना प्रतिभूति वाला मुद्रा बाजार साधन है।
वाणिज्यिक पत्र की अवधि सामान्यतः 7 दिन से 1 वर्ष तक होती है।
बैंकों द्वारा जारी जमा प्रमाणपत्र की अवधि सामान्यतः 7 दिन से 1 वर्ष तक होती है।
भारत में वाणिज्यिक पत्र और जमा प्रमाणपत्र को 1989 में शुरू किया गया।
रेपो में प्रतिभूतियाँ बेचकर उन्हें भविष्य में वापस खरीदने का समझौता किया जाता है।
“इंट्रा-डे एडवांस मार्केट” को मुद्रा बाजार का मानक स्वतंत्र उप-बाजार न समझें।
अप्रैल 1977 से RBI ने M1, M2, M3 और M4 मुद्रा आपूर्ति मापों की नई श्रृंखला शुरू की।
M0 = रिज़र्व मनी या मौद्रिक आधार।
M1 = जनता के पास मुद्रा + मांग जमा + RBI में अन्य जमा।
M2 = M1 + डाकघर बचत बैंक बचत जमा।
M3 = M1 + बैंकिंग प्रणाली की सावधि जमा।
M4 = M3 + डाकघर बचत संगठन की कुल जमा।
M1 = संकीर्ण मुद्रा और M3 = व्यापक मुद्रा।
M1 में M0 को सीधे जोड़ने वाला सूत्र सही नहीं है।
M3 में M2 को जोड़ने वाला सूत्र भी सही नहीं है; M3 = M1 + सावधि जमा।
क्रम याद रखें — M1 → M2 → M3 → M4, लेकिन M0 अलग मौद्रिक आधार है।