भारत में आर्थिक सुधार
1991 का आर्थिक संकट, उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण एवं सुधारों की पीढ़ियाँ
भारत में आर्थिक सुधार
भारत में आर्थिक सुधार का अर्थ उन नीतिगत और संरचनात्मक परिवर्तनों से है, जिनके माध्यम से अर्थव्यवस्था को अधिक कुशल, प्रतिस्पर्धी, उदार और विश्व अर्थव्यवस्था से जुड़ा बनाने का प्रयास किया गया।
भारत में आर्थिक सुधारों की सबसे महत्वपूर्ण शुरुआत 1991 में मानी जाती है। उस समय देश गंभीर भुगतान-संतुलन और विदेशी मुद्रा संकट का सामना कर रहा था। इसके बाद औद्योगिक नीति, व्यापार, विदेशी निवेश, वित्तीय क्षेत्र, कर व्यवस्था और सार्वजनिक क्षेत्र से संबंधित व्यापक सुधार लागू किए गए।
1991 में आर्थिक सुधारों की शुरुआत
Beginning of Economic Reforms
वर्ष 1991 भारतीय अर्थव्यवस्था के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। उस समय भारत गंभीर भुगतान-संतुलन संकट का सामना कर रहा था।
देश का विदेशी मुद्रा भंडार अत्यंत निम्न स्तर तक पहुँच गया था और स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि आवश्यक आयातों के भुगतान को लेकर भी चिंता उत्पन्न हो गई थी।
विदेशी मुद्रा संकट के साथ-साथ महंगाई का दबाव बढ़ा हुआ था, राजकोषीय स्थिति कमजोर थी और बाहरी भुगतान दायित्वों को पूरा करना कठिन होता जा रहा था।
चालू खाते का घाटा और बाहरी ऋण से जुड़ी समस्याएँ भी अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा रही थीं।
भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय ऋण और बाहरी भुगतान संबंधी दायित्वों को पूरा करना कठिन हो रहा था। इसी संकट की पृष्ठभूमि में भारत ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से वित्तीय सहायता ली।
संकट से निपटने के साथ-साथ सरकार ने अर्थव्यवस्था में व्यापक संरचनात्मक परिवर्तन शुरू किए। इन्हीं नीतिगत परिवर्तनों को सामान्यतः 1991 के आर्थिक सुधार कहा जाता है।
🎯 परीक्षा के लिए
1991 के आर्थिक सुधारों की तत्काल पृष्ठभूमि — भुगतान-संतुलन संकट और विदेशी मुद्रा संकट।
नई आर्थिक नीति
New Economic Policy
1991 में शुरू किए गए व्यापक आर्थिक सुधारों को सामान्यतः नई आर्थिक नीति से जोड़ा जाता है।
इन सुधारों का उद्देश्य अत्यधिक सरकारी नियंत्रण को कम करना, निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ाना, भारतीय उद्योगों को प्रतिस्पर्धी बनाना और भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व अर्थव्यवस्था के साथ अधिक गहराई से जोड़ना था।
नई आर्थिक नीति के तीन प्रमुख आधारों को प्रायः उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के रूप में समझाया जाता है।
🧠 याद रखने का क्रम
उदारीकरण
Liberalisation
उदारीकरण का अर्थ अर्थव्यवस्था पर लगे अनावश्यक सरकारी नियंत्रणों, प्रतिबंधों और प्रक्रियागत बाधाओं को कम करना है।
1991 के बाद व्यापार, निवेश और उद्योगों पर लागू अनेक सरकारी नियंत्रणों को हटाया गया या सरल बनाया गया।
नई औद्योगिक नीति के अंतर्गत अधिकांश उद्योगों में औद्योगिक लाइसेंस की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई। केवल कुछ संवेदनशील और रणनीतिक क्षेत्रों में ही लाइसेंस व्यवस्था जारी रखी गई।
इससे निजी कंपनियों को उत्पादन, निवेश, विस्तार और तकनीकी परिवर्तन से संबंधित निर्णय लेने में पहले की तुलना में अधिक स्वतंत्रता मिली।
📗 सरल अर्थ
उदारीकरण = सरकारी नियंत्रण और प्रतिबंधों में कमी।
निजीकरण
Privatisation
निजीकरण का अर्थ अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र की भूमिका और भागीदारी को बढ़ाना है।
आर्थिक सुधारों के बाद कई क्षेत्रों को निजी क्षेत्र के लिए खोला गया तथा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में निजी निवेश और भागीदारी बढ़ाने की नीति अपनाई गई।
सरकारी कंपनियों में सरकार की हिस्सेदारी के एक भाग को बेचने की प्रक्रिया को विनिवेश कहा जाता है।
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि विनिवेश और निजीकरण हमेशा एक ही चीज नहीं होते। सरकार द्वारा कुछ हिस्सेदारी बेचने से आवश्यक नहीं कि कंपनी का नियंत्रण निजी क्षेत्र को ही चला जाए।
जब किसी सार्वजनिक उपक्रम में स्वामित्व या प्रबंधन का निर्णायक नियंत्रण निजी क्षेत्र के पास चला जाता है, तब उसे वास्तविक अर्थ में निजीकरण कहा जा सकता है।
⚠️ भ्रम से बचें
विनिवेश = सरकारी हिस्सेदारी की बिक्री, जबकि निजीकरण = निजी क्षेत्र का निर्णायक स्वामित्व या नियंत्रण बढ़ना।
वैश्वीकरण
Globalisation
वैश्वीकरण का अर्थ किसी देश की अर्थव्यवस्था का विश्व की अन्य अर्थव्यवस्थाओं के साथ अधिक गहराई से जुड़ना है।
इसके अंतर्गत वस्तुओं, सेवाओं, पूंजी, निवेश और प्रौद्योगिकी का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आदान-प्रदान बढ़ता है।
1991 के सुधारों के बाद भारत ने विदेशी निवेश के नियमों को अधिक उदार बनाया और विदेशी प्रत्यक्ष निवेश के लिए अनेक क्षेत्रों को खोला।
आयात संबंधी प्रतिबंधों और शुल्कों को धीरे-धीरे कम किया गया तथा भारतीय उद्योगों को अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के लिए अधिक खुला बनाया गया।
इसके परिणामस्वरूप भारतीय अर्थव्यवस्था का वैश्विक बाजार के साथ एकीकरण तेजी से बढ़ा।
📗 सरल अर्थ
वैश्वीकरण = भारतीय अर्थव्यवस्था का विश्व अर्थव्यवस्था से बढ़ता जुड़ाव।
लाइसेंस राज में कमी
Industrial Licensing Reforms
आर्थिक सुधारों से पहले भारत में उद्योग स्थापित करने, उत्पादन क्षमता बढ़ाने और कई औद्योगिक गतिविधियों के लिए अनेक सरकारी अनुमतियों तथा लाइसेंसों की आवश्यकता होती थी।
इस व्यापक नियंत्रण व्यवस्था को सामान्यतः लाइसेंस-कोटा-परमिट राज कहा जाता था।
1991 की नई औद्योगिक नीति के बाद अधिकांश उद्योगों के लिए औद्योगिक लाइसेंस की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई।
इसलिए यह कहना अधिक सही है कि लाइसेंस राज का अधिकांश भाग समाप्त किया गया और औद्योगिक लाइसेंसिंग को बहुत सीमित कर दिया गया, न कि हर प्रकार का लाइसेंस पूरी तरह समाप्त हो गया।
विदेशी निवेश एवं व्यापार सुधार
Foreign Investment & Trade Reforms
1991 के बाद विदेशी निवेश संबंधी नियमों को अधिक उदार बनाया गया और अनेक क्षेत्रों में विदेशी निवेश के लिए अवसर बढ़ाए गए।
विदेशी प्रत्यक्ष निवेश ने पूंजी के साथ-साथ आधुनिक तकनीक, प्रबंधन कौशल और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुँच बढ़ाने में भी भूमिका निभाई।
आयात शुल्कों को धीरे-धीरे कम किया गया और अनेक आयात प्रतिबंधों को हटाया या सरल बनाया गया।
व्यापार नीति में सुधार का उद्देश्य भारतीय उद्योगों को अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा का सामना करने के लिए अधिक सक्षम बनाना तथा निर्यात को प्रोत्साहित करना था।
कर सुधार
Tax Reforms
आर्थिक सुधारों के अंतर्गत भारत की कर व्यवस्था को अधिक सरल, तर्कसंगत और कुशल बनाने के प्रयास किए गए।
प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों की दरों तथा संरचना में समय-समय पर परिवर्तन किए गए, कर आधार को व्यापक बनाने का प्रयास हुआ और अनुपालन व्यवस्था में सुधार किया गया।
आगे के दशकों में मूल्य वर्धित कर तथा वस्तु एवं सेवा कर जैसे सुधार इसी व्यापक कर-सुधार प्रक्रिया का हिस्सा बने।
वस्तु एवं सेवा कर 1 जुलाई 2017 से लागू हुआ। इसका उद्देश्य केंद्र और राज्यों के अनेक अप्रत्यक्ष करों को एक अधिक समन्वित व्यवस्था में लाना था।
🎯 महत्वपूर्ण तिथि
वस्तु एवं सेवा कर — 1 जुलाई 2017
बैंकिंग एवं वित्तीय क्षेत्र सुधार
Banking & Financial Sector Reforms
1991 के बाद बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण सुधार किए गए।
इन सुधारों का उद्देश्य बैंकों की कार्यकुशलता बढ़ाना, वित्तीय प्रणाली को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना, जोखिम प्रबंधन सुधारना और बैंकिंग व्यवस्था को मजबूत बनाना था।
इस क्षेत्र में सुधारों के लिए नरसिंहम समिति की सिफारिशें विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
बैंकिंग क्षेत्र में पूंजी पर्याप्तता, आय की पहचान, गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों की पहचान तथा विवेकपूर्ण मानकों जैसे विषयों पर अधिक ध्यान दिया गया।
समय के साथ नए निजी बैंकों को प्रवेश की अनुमति भी दी गई और वित्तीय बाजारों के नियमन को अधिक मजबूत किया गया।
🎯 परीक्षा बिंदु
बैंकिंग सुधार — नरसिंहम समिति।
पूंजी बाजार एवं सेबी
Capital Market & SEBI
आर्थिक सुधारों के दौरान भारतीय पूंजी बाजार को अधिक व्यवस्थित, पारदर्शी और निवेशक-अनुकूल बनाने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए गए।
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड की स्थापना 1988 में एक गैर-वैधानिक निकाय के रूप में की गई थी।
वर्ष 1992 में सेबी अधिनियम लागू होने के बाद इसे वैधानिक दर्जा और अधिक प्रभावी नियामकीय शक्तियाँ प्राप्त हुईं।
सेबी का प्रमुख उद्देश्य प्रतिभूति बाजार में निवेशकों के हितों की रक्षा करना, प्रतिभूति बाजार के विकास को बढ़ावा देना तथा बाजार को विनियमित करना है।
⚠️ तिथि में भ्रम न करें
सेबी की स्थापना — 1988
वैधानिक दर्जा — 1992
आर्थिक सुधारों के प्रमुख परिणाम
Major Outcomes of Reforms
आर्थिक सुधारों के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास क्षमता में वृद्धि हुई और बाद के दशकों में आर्थिक वृद्धि की गति कई अवधियों में तेज हुई।
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में दीर्घकाल में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और बाहरी भुगतान की स्थिति 1991 के संकट की तुलना में काफी मजबूत हुई।
भारतीय उद्योगों को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा। इससे अनेक क्षेत्रों में तकनीकी सुधार, उत्पादकता और गुणवत्ता पर अधिक जोर बढ़ा।
सूचना प्रौद्योगिकी, दूरसंचार, वित्तीय सेवाएँ और अन्य सेवा गतिविधियों का तेजी से विस्तार हुआ तथा सेवा क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।
विदेशी निवेश और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था अधिक खुली हुई और विश्व अर्थव्यवस्था के साथ भारत का आर्थिक एकीकरण बढ़ा।
आर्थिक सुधारों से जुड़ी चुनौतियाँ
Challenges of Economic Reforms
आर्थिक सुधारों से अनेक लाभ हुए, लेकिन इनके साथ कुछ महत्वपूर्ण आर्थिक और सामाजिक चुनौतियाँ भी बनी रहीं।
देश के विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों में आर्थिक विकास की गति समान नहीं रही, जिससे क्षेत्रीय विकास असंतुलन की समस्या बनी रही।
आय और संपत्ति की असमानता भी एक महत्वपूर्ण चुनौती है। आर्थिक विकास का लाभ सभी वर्गों और क्षेत्रों तक समान रूप से पहुँचाना भारतीय नीति-निर्माण का महत्वपूर्ण विषय बना हुआ है।
रोजगार सृजन, कृषि क्षेत्र की उत्पादकता, श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा, कौशल विकास तथा समावेशी विकास भी आर्थिक सुधारों के आगे के चरणों में महत्वपूर्ण मुद्दे बने।
🎯 याद रखें
आर्थिक सुधारों का मूल्यांकन केवल आर्थिक वृद्धि से नहीं, बल्कि रोजगार, समानता, गरीबी में कमी और समावेशी विकास से भी किया जाता है।
आर्थिक सुधारों की पीढ़ियाँ
Generations of Economic Reforms
भारतीय आर्थिक सुधारों को समझाने के लिए कई पुस्तकों और परीक्षा-सामग्रियों में उन्हें पहली, दूसरी, तीसरी और चौथी पीढ़ी में विभाजित किया जाता है।
यह वर्गीकरण आर्थिक सुधारों की बदलती प्राथमिकताओं को समझने में उपयोगी है, लेकिन इसकी सटीक समय-सीमा सभी पुस्तकों और विशेषज्ञों में समान नहीं मिलती।
इसलिए किसी एक निश्चित वर्ष को प्रत्येक पीढ़ी की सर्वमान्य शुरुआत मानने की बजाय, उस पीढ़ी से जुड़ी प्रमुख सुधार प्राथमिकताओं को समझना अधिक महत्वपूर्ण है।
⚠️ परीक्षा-सावधानी
आर्थिक सुधारों की “पीढ़ियों” की सटीक वर्ष-सीमा सार्वभौमिक रूप से निर्धारित नहीं है। अलग-अलग पुस्तकों में थोड़ा अंतर मिल सकता है।
पहली पीढ़ी के आर्थिक सुधार
First Generation Reforms
पहली पीढ़ी के आर्थिक सुधारों को मुख्यतः 1991 के बाद शुरू हुए व्यापक बाजारोन्मुखी और संरचनात्मक सुधारों से जोड़ा जाता है।
इनमें उदारीकरण, निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ाना और भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक बाजार से जोड़ना प्रमुख था।
लाइसेंस-कोटा-परमिट व्यवस्था में व्यापक कमी की गई और अधिकांश उद्योगों में औद्योगिक लाइसेंस की अनिवार्यता समाप्त की गई।
विदेशी निवेश को बढ़ावा दिया गया और कई क्षेत्रों में विदेशी पूंजी के प्रवेश को अधिक उदार बनाया गया।
आयात शुल्क और व्यापार संबंधी प्रतिबंधों में धीरे-धीरे कमी की गई।
बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र में सुधारों की शुरुआत हुई तथा पूंजी बाजार के नियमन को मजबूत बनाया गया।
कर प्रणाली को अधिक सरल और तार्किक बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम उठाए गए।
📗 पहली पीढ़ी का सार
दूसरी पीढ़ी के आर्थिक सुधार
Second Generation Reforms
दूसरी पीढ़ी के आर्थिक सुधारों को सामान्यतः 1990 के दशक के उत्तरार्ध और उसके बाद के उन सुधारों से जोड़ा जाता है जिनका उद्देश्य केवल बाजार खोलना नहीं, बल्कि संस्थागत और संरचनात्मक बाधाओं को दूर करना था।
इस चरण में श्रम कानूनों और श्रम बाजार से संबंधित सुधारों की आवश्यकता पर अधिक जोर दिया गया।
कृषि क्षेत्र की उत्पादकता, कृषि विपणन और कृषि संबंधी संस्थागत व्यवस्थाओं में सुधार को महत्वपूर्ण माना गया।
बिजली क्षेत्र में उत्पादन, वितरण, नियमन और वित्तीय स्थिति से संबंधित सुधारों पर जोर बढ़ा।
सड़क, बंदरगाह, दूरसंचार और अन्य आधारभूत संरचना क्षेत्रों में निजी निवेश तथा सार्वजनिक-निजी भागीदारी को बढ़ावा दिया गया।
बीमा क्षेत्र को निजी तथा विदेशी भागीदारी के लिए धीरे-धीरे खोला गया और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में विनिवेश की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया में राज्य सरकारों की भूमिका भी बढ़ी, क्योंकि बिजली, भूमि, कृषि, स्थानीय आधारभूत संरचना और अनेक प्रशासनिक विषय राज्यों से सीधे जुड़े हुए हैं।
🎯 दूसरी पीढ़ी का केंद्र
श्रम + कृषि + बिजली + आधारभूत संरचना + बीमा + विनिवेश + राज्यों की भागीदारी
तीसरी पीढ़ी के आर्थिक सुधार
Third Generation Reforms
तीसरी पीढ़ी के आर्थिक सुधारों की अवधारणा में आर्थिक वृद्धि के साथ-साथ मानव विकास, सुशासन, समावेशन और सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता पर अधिक जोर दिया गया।
शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश तथा सेवाओं की उपलब्धता और गुणवत्ता बढ़ाने को महत्वपूर्ण माना गया।
ई-गवर्नेंस के माध्यम से सरकारी सेवाओं को अधिक सरल, पारदर्शी और नागरिक-अनुकूल बनाने की दिशा में प्रयास बढ़े।
वित्तीय समावेशन का उद्देश्य बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं को समाज के उन वर्गों तक पहुँचाना है जो पहले औपचारिक वित्तीय प्रणाली से बाहर थे।
डिजिटल भुगतान और डिजिटल वित्तीय सेवाओं के विस्तार ने वित्तीय समावेशन को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कौशल विकास को रोजगार क्षमता बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण माना गया तथा उद्यमिता और नए व्यवसायों के लिए अनुकूल वातावरण बनाने पर भी जोर बढ़ा।
स्टार्टअप और कौशल विकास से संबंधित बड़े सरकारी कार्यक्रम विशेष रूप से बाद के वर्षों में अधिक व्यवस्थित रूप से सामने आए; इसलिए इन्हें केवल 2000 के दशक के मध्य तक सीमित नहीं समझना चाहिए।
📗 तीसरी पीढ़ी का सार
चौथी पीढ़ी के आर्थिक सुधार
Fourth Generation Reforms
चौथी पीढ़ी के आर्थिक सुधारों को कई परीक्षा-सामग्रियों में हाल के वर्षों के डिजिटल, कर, विनिर्माण, उद्यमिता, औपचारिकीकरण और सतत विकास से संबंधित सुधारों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
इस चरण को किसी एक निश्चित वर्ष से शुरू हुआ सर्वमान्य आधिकारिक वर्गीकरण नहीं माना जाना चाहिए, लेकिन 2010 के दशक के मध्य के बाद कई बड़े आर्थिक और संस्थागत सुधार सामने आए।
वस्तु एवं सेवा कर 1 जुलाई 2017 से लागू हुआ। इसके माध्यम से केंद्र और राज्यों के अनेक अप्रत्यक्ष करों को एक अधिक समन्वित अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था में शामिल किया गया।
मेक इन इंडिया पहल का उद्देश्य भारत में विनिर्माण, निवेश और उत्पादन क्षमता को बढ़ावा देना है।
डिजिटल इंडिया के माध्यम से डिजिटल आधारभूत संरचना, डिजिटल सेवाओं और इलेक्ट्रॉनिक शासन को विस्तार देने पर जोर दिया गया।
स्टार्टअप इंडिया के माध्यम से नवाचार, उद्यमिता और नए व्यवसायों के विकास के लिए अनुकूल वातावरण बनाने पर जोर दिया गया।
आत्मनिर्भर भारत पहल 2020 के बाद विशेष रूप से सामने आई। इसका उद्देश्य घरेलू उत्पादन क्षमता, लचीली आपूर्ति शृंखला, स्थानीय उद्योगों और भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धा को मजबूत करना है।
नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, हरित प्रौद्योगिकी और टिकाऊ विकास पर भी आर्थिक नीति में लगातार अधिक जोर दिया जा रहा है।
⚠️ महत्वपूर्ण सुधार
आत्मनिर्भर भारत को 2015 से शुरू हुआ कार्यक्रम न समझें। यह विशेष रूप से 2020 में घोषित पहल से जुड़ा है।
चार पीढ़ियों की तुलना
Comparison of Reform Generations
| पीढ़ी | मुख्य केंद्र | प्रमुख विषय |
|---|---|---|
| पहली पीढ़ी | बाजारोन्मुख सुधार | उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण, औद्योगिक एवं वित्तीय सुधार |
| दूसरी पीढ़ी | संस्थागत एवं संरचनात्मक सुधार | श्रम, कृषि, बिजली, आधारभूत संरचना, बीमा, विनिवेश |
| तीसरी पीढ़ी | मानव एवं समावेशी विकास | शिक्षा, स्वास्थ्य, सुशासन, वित्तीय समावेशन, कौशल |
| चौथी पीढ़ी | डिजिटल एवं आधुनिक आर्थिक संरचना | वस्तु एवं सेवा कर, डिजिटल अर्थव्यवस्था, विनिर्माण, स्टार्टअप, आत्मनिर्भरता, हरित विकास |
प्रमुख सुधार — एक नजर में
Reforms at a Glance
| सुधार | मुख्य अर्थ |
|---|---|
| उदारीकरण | सरकारी नियंत्रण एवं प्रतिबंध कम करना |
| निजीकरण | निजी क्षेत्र की भागीदारी और भूमिका बढ़ाना |
| वैश्वीकरण | भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व अर्थव्यवस्था से जोड़ना |
| औद्योगिक सुधार | लाइसेंस व्यवस्था में व्यापक कमी |
| व्यापार सुधार | आयात शुल्क और व्यापार प्रतिबंधों में कमी |
| विदेशी निवेश सुधार | विदेशी पूंजी के लिए अधिक अवसर |
| वित्तीय सुधार | बैंकिंग और पूंजी बाजार को अधिक मजबूत एवं प्रतिस्पर्धी बनाना |
| कर सुधार | कर व्यवस्था को सरल और अधिक कुशल बनाना |
त्वरित पुनरावृत्ति
Quick Revision
⚡ पूरा अध्याय एक क्रम में
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति बिंदु
भारत में व्यापक आर्थिक सुधारों की शुरुआत 1991 में गंभीर भुगतान-संतुलन और विदेशी मुद्रा संकट की पृष्ठभूमि में हुई।
आर्थिक सुधारों के तीन प्रमुख आधार — उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण।
उदारीकरण का अर्थ अनावश्यक सरकारी नियंत्रणों और प्रतिबंधों को कम करना है।
निजीकरण का अर्थ अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र की भूमिका और भागीदारी बढ़ाना है।
वैश्वीकरण का अर्थ भारतीय अर्थव्यवस्था का विश्व अर्थव्यवस्था के साथ अधिक एकीकरण है।
1991 के बाद अधिकांश उद्योगों में औद्योगिक लाइसेंसिंग की अनिवार्यता समाप्त की गई।
विदेशी निवेश के नियम उदार किए गए तथा व्यापार और आयात संबंधी अनेक प्रतिबंध कम किए गए।
आयात शुल्कों को धीरे-धीरे कम किया गया और भारतीय उद्योगों को अधिक अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा।
कर प्रणाली को सरल और तार्किक बनाने की दिशा में लगातार सुधार किए गए।
बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र में सुधारों के लिए नरसिंहम समिति का विशेष महत्व है।
सेबी — स्थापना 1988; वैधानिक दर्जा 1992।
आर्थिक सुधारों के बाद विदेशी मुद्रा भंडार, वैश्विक आर्थिक एकीकरण, प्रतिस्पर्धा और सेवा क्षेत्र का महत्व दीर्घकाल में बढ़ा।
इसके साथ आय असमानता, क्षेत्रीय असंतुलन, रोजगार और समावेशी विकास जैसी चुनौतियाँ भी महत्वपूर्ण बनी रहीं।
पहली पीढ़ी के सुधारों का मुख्य केंद्र बाजार खोलना तथा उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण था।
दूसरी पीढ़ी में श्रम, कृषि, बिजली, आधारभूत संरचना, बीमा और संस्थागत सुधारों पर अधिक जोर दिया गया।
तीसरी पीढ़ी में शिक्षा, स्वास्थ्य, सुशासन, वित्तीय समावेशन और कौशल जैसे विषय अधिक महत्वपूर्ण हुए।
चौथी पीढ़ी की व्याख्या में डिजिटल अर्थव्यवस्था, कर सुधार, विनिर्माण, स्टार्टअप, आत्मनिर्भरता और टिकाऊ विकास जैसे विषय शामिल किए जाते हैं।
वस्तु एवं सेवा कर — 1 जुलाई 2017 से लागू।
आत्मनिर्भर भारत — विशेष रूप से 2020 में घोषित पहल।
आर्थिक सुधारों की अलग-अलग “पीढ़ियों” की सटीक वर्ष-सीमा को सर्वमान्य आधिकारिक वर्गीकरण नहीं समझना चाहिए।