भारत में यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों का आगमन
पुर्तगाली, डच, अंग्रेज और फ्रांसीसी — व्यापारिक केंद्र, संघर्ष और अंग्रेजी प्रभुत्व
भारत की ओर यूरोपीय समुद्री शक्तियों का आगमन
पंद्रहवीं शताब्दी के अंत में यूरोपीय देशों ने एशिया, विशेषकर भारत के मसालों और अन्य बहुमूल्य वस्तुओं तक सीधे पहुँचने के लिए नए समुद्री मार्गों की खोज शुरू की। इस प्रक्रिया में सबसे पहले पुर्तगाली भारत पहुँचे। उनके बाद डच, अंग्रेज और फ्रांसीसी व्यापारिक कंपनियाँ भारत आईं।
शुरुआत में इन यूरोपीय शक्तियों का मुख्य उद्देश्य व्यापार था, लेकिन व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए उन्होंने किले, सेनाएँ और राजनीतिक गठबंधन बनाने शुरू कर दिए। आगे चलकर अंग्रेज और फ्रांसीसी भारत में राजनीतिक प्रभुत्व के लिए आमने-सामने आए और कर्नाटक युद्धों के बाद अंग्रेजों की स्थिति सबसे मजबूत हो गई।
वास्को द गामा और भारत का समुद्री मार्ग
Vasco da Gama — 1498
पुर्तगाली नाविक वास्को द गामा अफ्रीका के दक्षिणी छोर केप ऑफ गुड होप से होकर हिंद महासागर के रास्ते भारत पहुँचा। वह 20 मई 1498 को भारत के पश्चिमी तट पर स्थित कालीकट, वर्तमान कोझिकोड, पहुँचा।
उसकी यात्रा ने यूरोप से भारत तक सीधे समुद्री व्यापारिक मार्ग को व्यावहारिक रूप से स्थापित कर दिया। इससे पहले यूरोप और भारत के बीच व्यापार मुख्यतः पश्चिम एशियाई तथा भूमध्यसागरीय व्यापारिक नेटवर्क के माध्यम से होता था।
पूर्वी अफ्रीका के मालिंदी से भारत आने के लिए वास्को द गामा ने एक अनुभवी स्थानीय पायलट की सहायता ली थी, जिसे समकालीन विवरणों में भारतीय महासागर और मानसूनी हवाओं का अच्छा ज्ञान रखने वाला बताया गया है।
पुरानी परीक्षा-GK में इस पायलट का नाम कभी-कभी अब्दुल मजीद अथवा प्रसिद्ध अरब नाविक अहमद इब्न माजिद से जोड़ा जाता है, लेकिन उसकी निश्चित पहचान ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित नहीं है। इसलिए सुरक्षित तथ्य है—मालिंदी से एक अनुभवी पायलट ने वास्को द गामा को भारत पहुँचने में सहायता की।
🎯 Exam Point
20 मई 1498 — वास्को द गामा — कालीकट — यूरोप से भारत का सीधा समुद्री मार्ग।
पुर्तगालियों की व्यापारिक कोठियाँ
Early Portuguese Factories
वास्को द गामा के बाद पुर्तगालियों ने भारत के पश्चिमी तट पर अपने व्यापारिक केंद्र स्थापित करने शुरू किए। 1500 में पेड्रो अल्वारेस कैब्राल के अभियान के दौरान कालीकट में पहली पुर्तगाली व्यापारिक कोठी स्थापित की गई, लेकिन स्थानीय संघर्ष के कारण यह अधिक समय तक नहीं टिक सकी।
इसके बाद कोचीन में पुर्तगालियों ने एक स्थायी व्यापारिक केंद्र स्थापित किया। इसलिए कालीकट को पहली पुर्तगाली factory और कोचीन को शुरुआती सबसे महत्वपूर्ण एवं स्थायी पुर्तगाली केंद्र के रूप में समझना चाहिए।
पुर्तगालियों ने आगे चलकर कोचीन, कन्नानोर, गोवा, दमन, दीव और अन्य स्थानों पर अपना प्रभाव स्थापित किया।
🧠 Confusion Clear
पहली पुर्तगाली factory — कालीकट, 1500
प्रारंभिक स्थायी महत्वपूर्ण factory — कोचीन
फ्रांसिस्को द अल्मेडा
Francisco de Almeida — 1505
फ्रांसिस्को द अल्मेडा 1505 में भारत आया और वह भारत में पुर्तगालियों का प्रथम वायसराय बना।
अल्मेडा की नीति मुख्य रूप से समुद्र पर पुर्तगाली प्रभुत्व स्थापित करने पर आधारित थी। उसकी इस नीति को सामान्यतः Blue Water Policy अर्थात नीले पानी की नीति कहा जाता है। इसका उद्देश्य हिंद महासागर में पुर्तगाली नौसैनिक शक्ति को मजबूत करना था।
1509 के दीव के नौसैनिक युद्ध में पुर्तगालियों की विजय ने हिंद महासागर क्षेत्र में उनकी नौसैनिक स्थिति को बहुत मजबूत कर दिया।
🎯 High Yield
अल्मेडा — प्रथम पुर्तगाली वायसराय — Blue Water Policy.
अफोंसो द अल्बुकर्क
Afonso de Albuquerque
अफोंसो द अल्बुकर्क 1509 में अल्मेडा का उत्तराधिकारी बना। तकनीकी रूप से उसे Governor of Portuguese India कहना अधिक सही है। उसने भारत में पुर्तगाली साम्राज्य को क्षेत्रीय आधार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1510 में अल्बुकर्क ने गोवा पर अधिकार किया। गोवा उस समय बीजापुर की आदिलशाही सत्ता के अधीन था। पुर्तगालियों ने गोवा को आगे चलकर भारत में अपने राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभुत्व का प्रमुख केंद्र बना लिया।
अल्बुकर्क ने केवल समुद्री व्यापार पर निर्भर रहने के बजाय महत्वपूर्ण बंदरगाहों पर स्थायी राजनीतिक नियंत्रण स्थापित करने की नीति अपनाई। इस कारण उसे भारत में पुर्तगाली शक्ति का वास्तविक संस्थापक भी कहा जाता है।
🎯 Exam Point
अल्बुकर्क — गोवा विजय 1510 — भारत में पुर्तगाली साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक।
पुर्तगालियों के अन्य केंद्र
Portuguese Settlements
पुर्तगालियों ने भारत के पश्चिमी तट के साथ-साथ पूर्वी तट पर भी कुछ व्यापारिक और धार्मिक केंद्र विकसित किए। दक्षिण-पूर्वी तट पर उनका प्रमुख केंद्र साओ टोमे या सेंट थॉमस था, जो वर्तमान चेन्नई के मायलापुर क्षेत्र से संबंधित है।
पुर्तगालियों के प्रमुख भारतीय केंद्रों में गोवा, कोचीन, दमन, दीव, बेसिन और साओ टोमे शामिल थे।
समय के साथ डच और अंग्रेजों की बढ़ती समुद्री शक्ति तथा पुर्तगाली संसाधनों की सीमाओं के कारण भारत में पुर्तगाली प्रभाव कमजोर होता गया।
भारत में डचों का आगमन
Dutch Arrival
पुर्तगालियों के बाद एशियाई समुद्री व्यापार में डच एक महत्वपूर्ण यूरोपीय शक्ति के रूप में उभरे। प्रसिद्ध डच नाविक कॉर्नेलिस डी हाउटमैन 1596 में इंडोनेशियाई द्वीपसमूह के क्षेत्र में पहुँचा। उसका अभियान सीधे भारत आने की अपेक्षा दक्षिण-पूर्व एशिया के मसाला व्यापार से अधिक संबंधित था।
इसलिए यह कहना अधिक सही है कि हाउटमैन के अभियान ने डचों के एशियाई समुद्री व्यापार का मार्ग खोला; वह 1596 में भारतीय मुख्यभूमि पर आने वाला पहला डच यात्री नहीं था।
1602 में Dutch East India Company अर्थात VOC की स्थापना हुई। इसके बाद डचों ने भारत के विभिन्न तटीय क्षेत्रों में व्यापारिक केंद्र स्थापित किए।
मसूलीपट्टनम और पुलीकट
Dutch Trading Centres
डचों ने 1605 में मसूलीपट्टनम में अपनी पहली प्रमुख भारतीय व्यापारिक कोठी स्थापित की। इसके बाद उन्होंने कोरोमंडल तट पर कई अन्य केंद्र बनाए।
पुलीकट डचों का अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र बना और सत्रहवीं शताब्दी के प्रारंभ में यह कोरोमंडल तट पर उनकी गतिविधियों का मुख्यालय बन गया। यहाँ उन्होंने फोर्ट गेल्ड्रिया का निर्माण किया।
पुलीकट में डचों ने सिक्के भी ढाले। बाद में नागपट्टनम भी उनका महत्वपूर्ण केंद्र बना और दक्षिण भारत में डच गतिविधियों का केंद्र पुलीकट से नागपट्टनम की ओर स्थानांतरित हुआ।
भारत में डच व्यापार मुख्यतः कपास, वस्त्र, नील, मसाले और शोरा जैसी वस्तुओं से जुड़ा था। उनका सबसे बड़ा व्यापारिक हित भारत की अपेक्षा इंडोनेशियाई मसाला द्वीपों में बना रहा।
डच और वेतनभोगी श्रम संबंधी तथ्य
Historical Caution
कुछ पुरानी सामान्य ज्ञान सामग्री में यह कथन मिलता है कि “भारत में पहली बार औद्योगिक वेतनभोगी डचों ने रखे”। इस कथन का मानक आधुनिक इतिहास ग्रंथों में स्पष्ट और विश्वसनीय समर्थन नहीं मिलता।
डच व्यापारिक प्रतिष्ठानों में निश्चित रूप से स्थानीय कारीगर, मजदूर, बुनकर, गोदाम कर्मचारी और अन्य वेतनभोगी लोग कार्य करते थे, लेकिन भारत में वेतनभोगी या औद्योगिक श्रम की शुरुआत का श्रेय केवल डचों को देना ऐतिहासिक रूप से सुरक्षित नहीं है।
⚠️ Exam Caution
“भारत में प्रथम औद्योगिक वेतनभोगी डचों ने रखे” को प्रमाणित मुख्य इतिहास तथ्य के रूप में याद न करें।
डचों का पतन — बेदरा का युद्ध
Battle of Bedara — 1759
अठारहवीं शताब्दी तक भारत में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी की शक्ति तेजी से बढ़ने लगी। बंगाल में अंग्रेज और डच हितों के बीच तनाव के परिणामस्वरूप 1759 में बेदरा या बिदेरा का युद्ध हुआ।
इस संघर्ष में अंग्रेजों ने डचों को पराजित किया। इसके बाद भारत में अंग्रेजों को चुनौती देने वाली राजनीतिक शक्ति के रूप में डचों की संभावनाएँ लगभग समाप्त हो गईं।
हालाँकि डच व्यापारिक उपस्थिति कुछ समय तक बनी रही, लेकिन 1759 का बेदरा युद्ध भारत में डच राजनीतिक महत्व के पतन का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है।
अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना
East India Company — 1600
31 दिसंबर 1600 को इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने अंग्रेज व्यापारियों की एक कंपनी को पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने के लिए राजकीय अधिकार-पत्र अर्थात Royal Charter प्रदान किया। यही संस्था आगे चलकर English East India Company के नाम से प्रसिद्ध हुई।
कंपनी का औपचारिक नाम Governor and Company of Merchants of London Trading into the East Indies था। इसके प्रथम गवर्नर सर थॉमस स्माइथ थे।
कंपनी में शुरुआती निवेशकों या याचिकाकर्ताओं की संख्या अलग विवरणों में 215, 217 या 218 जैसे रूपों में मिलती है। इसलिए ठीक 217 साझीदार को निर्विवाद संख्या के रूप में याद करने की आवश्यकता नहीं है।
🎯 High Yield
31 दिसंबर 1600 — एलिजाबेथ प्रथम — English East India Company — प्रथम गवर्नर सर थॉमस स्माइथ।
प्रारंभिक अंग्रेजी जहाज और कैप्टन हॉकिंस
William Hawkins
अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी के शुरुआती समुद्री अभियानों में कई जहाज शामिल थे। Red Dragon कंपनी की पहली यात्रा के प्रमुख जहाजों में से एक था, लेकिन भारत के सूरत बंदरगाह से जुड़े 1608 के प्रसिद्ध अभियान में Hector नामक जहाज का विशेष महत्व है।
कैप्टन विलियम हॉकिंस 1608 में सूरत पहुँचा और बाद में मुगल दरबार गया। वह अप्रैल 1609 के आसपास सम्राट जहाँगीर के दरबार में पहुँचा।
हॉकिंस इंग्लैंड के राजा जेम्स प्रथम का पत्र लेकर आया था और उसका उद्देश्य अंग्रेजों के लिए व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त करना था। उसे मुगल दरबार में सम्मान मिला, लेकिन पुर्तगालियों के विरोध और दरबारी राजनीति के कारण वह स्थायी व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त करने में पूरी तरह सफल नहीं हो सका।
🧠 Confusion Clear
Red Dragon — शुरुआती East India Company fleet का प्रमुख जहाज।
Hector — 1608 में Hawkins को सूरत लाने से जुड़ा प्रसिद्ध जहाज।
मसूलीपट्टनम और सूरत में अंग्रेज
Early English Factories
अंग्रेजों ने भारत के पूर्वी समुद्री तट पर मसूलीपट्टनम में प्रारंभिक व्यापार शुरू किया। 1611 से यहाँ अंग्रेजी व्यापारिक गतिविधियों का उल्लेख मिलता है; बाद के वर्षों में उनकी नियमित factory अधिक संगठित रूप में विकसित हुई।
पश्चिमी तट पर अंग्रेजों ने 1608 में सूरत में व्यापारिक आधार स्थापित करने का प्रयास किया, लेकिन तत्काल स्थायी अनुमति नहीं मिल सकी।
1612 के स्वाली या सुवाली के नौसैनिक संघर्ष में अंग्रेजों ने पुर्तगालियों को पराजित किया। इसके बाद मुगल प्रशासन का अंग्रेजों के प्रति दृष्टिकोण अधिक अनुकूल हुआ।
1613 में जहाँगीर की अनुमति के बाद सूरत में अंग्रेजों की स्थायी व्यापारिक factory स्थापित हुई, जिससे थॉमस एल्डवर्थ का नाम जुड़ा है।
📗 परीक्षा-सुरक्षित क्रम
1608 — सूरत पहुँचने/प्रयास का चरण
1611 — मसूलीपट्टनम में प्रारंभिक अंग्रेजी व्यापार
1613 — सूरत में मुगल अनुमति के बाद स्थायी factory
सर टॉमस रो
Sir Thomas Roe — 1615–1619
1615 में इंग्लैंड के राजा जेम्स प्रथम ने सर टॉमस रो को अपना आधिकारिक राजदूत बनाकर मुगल सम्राट जहाँगीर के दरबार में भेजा।
रो भारत में लगभग 1615 से फरवरी 1619 तक रहा। उसका उद्देश्य ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापार के लिए अधिक स्थायी सुरक्षा और सुविधाएँ प्राप्त करना था।
रो ने जहाँगीर के साथ-साथ राजकुमार खुर्रम, जो आगे चलकर शाहजहाँ बना, से भी संपर्क बनाए। उसे अंग्रेजों के व्यापार के लिए संरक्षण और कुछ व्यावहारिक सुविधाएँ प्राप्त हुईं, हालांकि कोई ऐसा एकल विशाल फरमान नहीं मिला जिसने पूरे मुगल साम्राज्य में पूर्ण शुल्क-मुक्त व्यापार दे दिया हो।
सर टॉमस रो के वृत्तांत जहाँगीरकालीन भारत के इतिहास के महत्वपूर्ण यूरोपीय स्रोत भी हैं।
गोलकुंडा का सुनहरा फरमान
Golden Farman
सत्रहवीं शताब्दी में अंग्रेजों ने गोलकुंडा राज्य के बंदरगाहों पर भी अपना व्यापार बढ़ाया। 1630 के दशक में गोलकुंडा के सुल्तान द्वारा अंग्रेजों को विशेष व्यापारिक सुविधा प्रदान करने वाला फरमान जारी किया गया, जिसे परीक्षा पुस्तकों में Golden Farman अर्थात सुनहरा फरमान कहा जाता है।
इसके अंतर्गत अंग्रेज निश्चित वार्षिक भुगतान के बदले गोलकुंडा के क्षेत्र में अपेक्षाकृत स्वतंत्र रूप से व्यापार कर सकते थे। पुरानी GK पुस्तकों में इसकी राशि 500 पैगोडा वार्षिक दी जाती है।
इस फरमान की exact तिथि कई परीक्षा-स्रोतों में 1632 या 1634 जैसे अलग रूपों में मिलती है, इसलिए यहाँ इसका मुख्य महत्व याद रखना अधिक उपयोगी है—गोलकुंडा में अंग्रेजों को विशेष व्यापारिक सुविधा।
मद्रास और फोर्ट सेंट जॉर्ज
Madras — 1639
1639 में फ्रांसिस डे ने स्थानीय नायक शासकों के प्रतिनिधियों से कोरोमंडल तट पर भूमि प्राप्त की। इस क्षेत्र में आगे चलकर मद्रास, वर्तमान चेन्नई, में अंग्रेजी बस्ती विकसित हुई।
यह भूमि तत्कालीन चंद्रगिरी से जुड़े विजयनगर के नायक शासन के अधिकार क्षेत्र में थी। अंग्रेजों ने यहाँ किलेबंद व्यापारिक केंद्र बनाया जिसे फोर्ट सेंट जॉर्ज कहा गया।
फोर्ट सेंट जॉर्ज आगे चलकर कोरोमंडल तट पर अंग्रेजों का प्रमुख प्रशासनिक और व्यापारिक मुख्यालय बन गया।
🎯 Exam Point
1639 — फ्रांसिस डे — मद्रास; फोर्ट सेंट जॉर्ज — कोरोमंडल तट।
बंबई अंग्रेजों को कैसे मिली?
Bombay — Portuguese to English
1661 की Anglo-Portuguese विवाह संधि के अंतर्गत पुर्तगाली राजकुमारी कैथरीन ऑफ ब्रेगेंजा का विवाह इंग्लैंड के राजा चार्ल्स द्वितीय से तय हुआ। बंबई के द्वीप उसके दहेज का हिस्सा बने और पुर्तगाल ने उन्हें अंग्रेजी राजसत्ता को सौंपने पर सहमति दी।
विवाह 1662 में सम्पन्न हुआ, जबकि बंबई के वास्तविक हस्तांतरण की प्रक्रिया में कुछ समय लगा।
1668 में चार्ल्स द्वितीय ने बंबई को East India Company को लगभग 10 पाउंड वार्षिक किराए पर दे दिया। इसके बाद कंपनी ने बंबई को पश्चिमी भारत में अपने प्रमुख आधार के रूप में विकसित करना शुरू किया।
गेराल्ड औंगियर और बंबई
Gerald Aungier
गेराल्ड औंगियर सूरत का President और बंबई का Governor रहा। उसका कार्यकाल लगभग 1669–1677 से संबंधित है।
उसने व्यापारियों और कारीगरों को बंबई में बसने के लिए प्रोत्साहित किया तथा बंदरगाह, प्रशासन और व्यापारिक व्यवस्था को विकसित किया। इसी कारण कई पुरानी परीक्षा पुस्तकों में उसे “Bombay का संस्थापक” कहा जाता है।
बंबई उससे पहले से विद्यमान द्वीपों और बस्तियों का समूह था, इसलिए औंगियर ने किसी खाली स्थान पर पहली बार शहर नहीं बसाया; उसका वास्तविक महत्व बंबई को अंग्रेजी व्यापारिक नगर के रूप में संगठित और विकसित करने में था।
कंपनी ने 1687 में अपने पश्चिमी तट के प्रशासनिक केंद्र को सूरत से बंबई स्थानांतरित करने का निर्णय लिया। इसके क्रियान्वयन में बाद में कुछ समय लगा, लेकिन धीरे-धीरे बंबई पश्चिमी भारत में कंपनी का प्रमुख केंद्र बन गया।
बंगाल में अंग्रेजों का प्रवेश
Shah Shuja and Bengal
सत्रहवीं शताब्दी के मध्य में अंग्रेजों ने बंगाल में अपना व्यापार बढ़ाया। मुगल सम्राट शाहजहाँ के पुत्र शाह शुजा, जो बंगाल का सूबेदार था, ने अंग्रेजों को व्यापार संबंधी सुविधाएँ प्रदान कीं।
पुरानी परीक्षा पुस्तकों में 1651 को इस प्रक्रिया से जोड़ा जाता है। अंग्रेजों ने इसी काल में हुगली क्षेत्र में अपनी व्यापारिक गतिविधियाँ मजबूत कीं।
शाह शुजा द्वारा प्रदान की गई अनुमति को कुछ परीक्षा-स्रोतों में निशान कहा जाता है। मुगल प्रशासन में राजकुमार या उच्च अधिकारी द्वारा जारी आदेश के लिए निशान शब्द प्रयुक्त हो सकता था, जबकि सम्राट के आदेश को सामान्यतः फरमान कहा जाता था।
सूतानुती, कालिकाता और गोविंदपुर
Rise of Calcutta
सत्रहवीं शताब्दी के अंत में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल में सूतानुती, कालिकाता और गोविंदपुर नामक तीन गाँवों के क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत की।
1698 में कंपनी ने इन तीन गाँवों की जमींदारी के अधिकार स्थानीय जमींदारों से प्राप्त किए। पुरानी परीक्षा-GK में इसके बदले लगभग 1,200 रुपये भुगतान का उल्लेख मिलता है।
ध्यान रखें कि गाँव का नाम कालिकाता था, कालीकट नहीं। कालीकट केरल में स्थित वह बंदरगाह था जहाँ 1498 में वास्को द गामा पहुँचा था।
इन तीन गाँवों के आसपास विकसित अंग्रेजी बस्ती आगे चलकर कलकत्ता/कोलकाता का आधार बनी।
🧠 सबसे जरूरी Confusion
कालीकट = कोझिकोड, केरल — वास्को द गामा
कालिकाता = बंगाल का गाँव — बाद के कोलकाता से संबंधित
फोर्ट विलियम और जॉब चार्नॉक
Fort William & Calcutta
बंगाल में अंग्रेजों ने अपनी बस्ती की सुरक्षा के लिए किलेबंदी शुरू की और आगे चलकर यहाँ फोर्ट विलियम विकसित हुआ। इसका नाम इंग्लैंड के राजा William III से जुड़ा था।
चार्ल्स आयर शुरुआती कलकत्ता प्रशासन से जुड़े महत्वपूर्ण कंपनी अधिकारी थे और उन्हें प्रारंभिक Presidency व्यवस्था से भी जोड़ा जाता है।
जॉब चार्नॉक ने 1690 में सूतानुती क्षेत्र में अंग्रेजी व्यापारिक बस्ती को पुनः स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पुरानी पुस्तकों में उसे “कलकत्ता का संस्थापक” कहा जाता रहा है।
लेकिन आधुनिक ऐतिहासिक दृष्टि से कोलकाता का विकास सूतानुती, कालिकाता और गोविंदपुर जैसी पहले से मौजूद बस्तियों के क्रमिक विस्तार से हुआ। इसलिए किसी एक व्यक्ति को शहर का निर्विवाद संस्थापक कहना उचित नहीं है।
भारत में फ्रांसीसियों का आगमन
French East India Company
फ्रांस ने अन्य यूरोपीय शक्तियों की तुलना में भारत के संगठित कंपनी व्यापार में अपेक्षाकृत देर से प्रवेश किया। 1664 में फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना फ्रांस के वित्त मंत्री कोलबेयर के प्रयासों से हुई।
भारत में फ्रांसीसियों की प्रारंभिक व्यापारिक कोठी सूरत में स्थापित हुई। इसका संबंध फ्रांस्वा कैरों से था और सामान्य परीक्षा परंपरा में इसकी स्थापना 1668 के आसपास मानी जाती है।
बाद में फ्रांसीसियों ने मसूलीपट्टनम, पांडिचेरी, चंद्रनगर, माहे और करैकाल जैसे महत्वपूर्ण केंद्र विकसित किए।
फ्रांस्वा मार्टिन और पांडिचेरी
Pondicherry — 1674
1674 में फ्रांस्वा मार्टिन ने दक्षिण भारत में प्राप्त भूमि पर फ्रांसीसी बस्ती के विकास का कार्य शुरू किया। यह स्थान आगे चलकर पांडिचेरी या पुदुचेरी के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
यह क्षेत्र स्थानीय प्रशासन में शेर खान लोदी से जुड़ा था और फ्रांसीसियों ने यहाँ धीरे-धीरे अपना मजबूत व्यापारिक एवं प्रशासनिक केंद्र स्थापित किया।
फ्रांस्वा मार्टिन को पांडिचेरी के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के कारण फ्रांसीसी भारत के प्रमुख प्रारंभिक प्रशासकों में गिना जाता है।
कर्नाटक युद्धों की पृष्ठभूमि
Anglo-French Rivalry
अठारहवीं शताब्दी में भारत में अंग्रेज और फ्रांसीसी केवल व्यापारी प्रतिस्पर्धी नहीं रहे। दक्षिण भारत की राजनीतिक परिस्थितियों और यूरोप में चल रहे युद्धों ने दोनों कंपनियों को सैन्य संघर्ष में उतार दिया।
अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच दक्षिण भारत में हुए तीन प्रमुख संघर्षों को कर्नाटक युद्ध कहा जाता है। इन युद्धों ने यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई कि भारत में कौन-सी यूरोपीय शक्ति राजनीतिक रूप से सबसे प्रभावशाली बनेगी।
प्रथम कर्नाटक युद्ध
First Carnatic War — 1746–1748
प्रथम कर्नाटक युद्ध 1746 से 1748 के बीच हुआ। यह भारत में अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच संघर्ष था और इसकी पृष्ठभूमि यूरोप के War of Austrian Succession अर्थात ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार युद्ध से जुड़ी थी।
फ्रांसीसियों ने इस युद्ध में मद्रास पर कब्जा कर लिया था। फ्रांसीसी गवर्नर डुप्ले ने दक्षिण भारतीय राजनीति में फ्रांसीसी प्रभाव बढ़ाने का प्रयास किया।
1748 की Aix-la-Chapelle अर्थात ए-ला-शापेल की संधि से यूरोप का ऑस्ट्रिया उत्तराधिकार युद्ध समाप्त हुआ और इसी समझौते के आधार पर भारत में प्रथम कर्नाटक युद्ध भी समाप्त हो गया।
संधि के परिणामस्वरूप मद्रास अंग्रेजों को वापस मिला।
द्वितीय कर्नाटक युद्ध
Second Carnatic War — 1749–1754
द्वितीय कर्नाटक युद्ध 1749 से 1754 के बीच मुख्य रूप से हैदराबाद और कर्नाटक के उत्तराधिकार विवादों से जुड़ा था। अंग्रेज और फ्रांसीसी अलग-अलग भारतीय दावेदारों का समर्थन कर रहे थे।
फ्रांसीसी गवर्नर डुप्ले ने भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप करके फ्रांसीसी प्रभाव बढ़ाने की महत्वाकांक्षी नीति अपनाई। प्रारंभिक चरण में उसे काफी सफलता मिली।
अंग्रेजी पक्ष में रॉबर्ट क्लाइव का नाम विशेष रूप से प्रसिद्ध हुआ। 1751 में अर्काट पर क्लाइव का अधिकार अंग्रेजों के लिए एक महत्वपूर्ण सफलता थी।
लंबे संघर्ष के बाद फ्रांसीसी सरकार ने डुप्ले को वापस बुला लिया और उसकी जगह चार्ल्स गोडेहू को भेजा गया।
गोडेहू और अंग्रेजों के बीच हुए समझौते से युद्ध विराम हुआ। इसे सामान्यतः पांडिचेरी की संधि कहा जाता है। समझौता 1754 में तैयार हुआ और उससे जुड़ी औपचारिक प्रक्रिया 1755 के आरंभ तक चली, इसलिए कुछ पुस्तकों में जनवरी 1755 की तिथि भी मिलती है।
तृतीय कर्नाटक युद्ध
Third Carnatic War
यूरोप में 1756 से 1763 तक सप्तवर्षीय युद्ध चला। उसका प्रभाव भारत पर भी पड़ा और अंग्रेजों तथा फ्रांसीसियों के बीच संघर्ष फिर शुरू हो गया।
इस कारण कुछ पुस्तकों में तृतीय कर्नाटक युद्ध की अवधि 1756–1763 दी जाती है, जबकि भारत में प्रत्यक्ष प्रमुख सैन्य संघर्षों के आधार पर 1758–1763 की अवधि भी व्यापक रूप से प्रयुक्त होती है।
फ्रांस ने काउंट डी लैली को भारत भेजा। दूसरी ओर अंग्रेज अपनी सैन्य और आर्थिक स्थिति को तेजी से मजबूत कर चुके थे।
📗 Date Note
Seven Years’ War — 1756–1763
Third Carnatic War in India — सामान्यतः 1758–1763; कुछ GK स्रोत 1756–1763 लिखते हैं।
वांडीवाश का युद्ध
Battle of Wandiwash — 1760
22 जनवरी 1760 को अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच वांडीवाश का निर्णायक युद्ध हुआ।
अंग्रेजी सेना का नेतृत्व सर आयर कूट ने किया, जबकि फ्रांसीसी पक्ष से काउंट डी लैली की सेनाएँ संघर्ष में थीं।
इस युद्ध में अंग्रेजों ने फ्रांसीसियों को निर्णायक रूप से पराजित किया। वांडीवाश की हार के बाद भारत में फ्रांस की राजनीतिक और सैन्य महत्वाकांक्षाओं को बहुत बड़ा झटका लगा।
🎯 High Yield
1760 — वांडीवाश — सर आयर कूट — अंग्रेजों की निर्णायक विजय।
पांडिचेरी पर अंग्रेजी अधिकार
Fall of Pondicherry — 1761
वांडीवाश की पराजय के बाद फ्रांसीसियों की स्थिति तेजी से कमजोर हुई। 1761 में अंग्रेजों ने पांडिचेरी पर अधिकार कर लिया।
इस घटना ने दक्षिण भारत में फ्रांसीसी सैन्य शक्ति को लगभग समाप्त कर दिया। इसके बाद फ्रांसीसी भारत में अंग्रेजों की बराबरी की राजनीतिक शक्ति के रूप में फिर स्थापित नहीं हो सके।
पेरिस की संधि
Treaty of Paris — 1763
1763 की पेरिस संधि से सप्तवर्षीय युद्ध समाप्त हुआ और भारत में तृतीय कर्नाटक युद्ध का भी अंत हो गया।
संधि के बाद फ्रांस को पांडिचेरी और चंद्रनगर सहित उसके कई व्यापारिक केंद्र वापस मिले, लेकिन उन पर राजनीतिक और सैन्य गतिविधियों से संबंधित महत्वपूर्ण प्रतिबंध लगाए गए।
इसलिए यह कहना सही नहीं है कि अंग्रेजों ने चंद्रनगर को छोड़कर बाकी सभी क्षेत्र लौटाए। वास्तव में चंद्रनगर भी फ्रांसीसी व्यापारिक प्रतिष्ठानों में शामिल रहा।
फ्रांसीसियों को व्यापार करने की अनुमति थी, लेकिन भारत में अंग्रेजों के समान राजनीतिक-सैन्य साम्राज्य खड़ा करने की उनकी संभावना समाप्त हो गई।
पांडिचेरी, करैकाल, माहे, यानम और चंद्रनगर जैसे फ्रांसीसी क्षेत्र आगे अलग-अलग समय पर फ्रांसीसी नियंत्रण में बने रहे और स्वतंत्र भारत में उनका अंतिम विलय बीसवीं शताब्दी के मध्य में हुआ।
⚠️ Common Error
1763 में चंद्रनगर फ्रांस को वापस नहीं मिला — गलत।
पेरिस संधि के बाद चंद्रनगर और पांडिचेरी सहित फ्रांसीसी व्यापारिक प्रतिष्ठान वापस मिले, लेकिन फ्रांसीसी राजनीतिक-सैन्य महत्वाकांक्षा पर रोक लग गई।
यूरोपीय कंपनियों का आगमन — सही क्रम
Chronological Order
🧠 याद रखने का क्रम
पुर्तगाली भारत के समुद्री मार्ग से पहुँचने वाली पहली प्रमुख यूरोपीय शक्ति थे।
इसके बाद डच एशियाई मसाला व्यापार में शक्तिशाली बने।
अंग्रेजी East India Company की स्थापना 1600 में हुई और धीरे-धीरे भारत में उसकी व्यापारिक तथा राजनीतिक शक्ति बढ़ी।
फ्रांसीसी East India Company 1664 में स्थापित हुई और उसने अंग्रेजों को दक्षिण भारत में गंभीर चुनौती दी।
प्रमुख यूरोपीय कंपनियाँ — एक नजर में
European Companies at a Glance
| यूरोपीय शक्ति | मुख्य प्रारंभ | भारत का प्रमुख केंद्र | महत्वपूर्ण तथ्य |
|---|---|---|---|
| पुर्तगाली | 1498 | गोवा | वास्को द गामा; अल्मेडा; अल्बुकर्क |
| डच | VOC — 1602 | पुलीकट / बाद में नागपट्टनम | मसूलीपट्टनम 1605; बेदरा 1759 |
| अंग्रेज | EIC — 1600 | सूरत, मद्रास, बंबई, कलकत्ता | हॉकिंस, टॉमस रो, फोर्ट सेंट जॉर्ज |
| फ्रांसीसी | 1664 | पांडिचेरी | डुप्ले; कर्नाटक युद्ध; वांडीवाश |
प्रमुख अंग्रेजी केंद्र
English Presidencies
मद्रास
फोर्ट सेंट जॉर्ज — कोरोमंडल तट पर अंग्रेजी मुख्यालय।
बंबई
पुर्तगाल से अंग्रेजी Crown और फिर 1668 में East India Company को।
कलकत्ता
सूतानुती + कालिकाता + गोविंदपुर — फोर्ट विलियम।
सबसे महत्वपूर्ण Confusing Facts
Do Not Confuse
कालीकट और कालिकाता एक स्थान नहीं हैं। कालीकट वर्तमान कोझिकोड, केरल है; कालिकाता बंगाल के उन तीन गाँवों में से एक था जिनसे कलकत्ता विकसित हुआ।
वास्को द गामा भारत 1498 में पहुँचा; पेड्रो अल्वारेस कैब्राल ने 1500 में कालीकट में पहली पुर्तगाली factory स्थापित की।
अल्मेडा प्रथम पुर्तगाली वायसराय था; अल्बुकर्क उसका उत्तराधिकारी Governor था और उसने 1510 में गोवा जीता।
हॉकिंस जहाँगीर के दरबार में 1609 में पहुँचा; सर टॉमस रो 1615 में James I का आधिकारिक राजदूत बनकर आया।
मसूलीपट्टनम में अंग्रेजी गतिविधियाँ 1611 से जुड़ी हैं, जबकि सूरत में स्थायी अंग्रेजी factory मुगल अनुमति के बाद 1613 में विकसित हुई।
Red Dragon East India Company की शुरुआती fleet का प्रसिद्ध जहाज था; Hector 1608 में Hawkins के सूरत आगमन से जुड़ा था।
अहमद इब्न माजिद/अब्दुल मजीद को वास्को द गामा का निश्चित पायलट मानना सुरक्षित नहीं; केवल मालिंदी से अनुभवी पायलट की सहायता प्रमाणित रूप में लिखना बेहतर है।
Third Carnatic War के लिए 1758–1763 मानक भारतीय सैन्य chronology है; 1756–1763 सप्तवर्षीय युद्ध की व्यापक अवधि के कारण कुछ पुस्तकों में मिलता है।
महत्वपूर्ण तिथियाँ
Important Dates
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1498 | वास्को द गामा कालीकट पहुँचा |
| 1500 | कालीकट में पहली पुर्तगाली factory |
| 1505 | अल्मेडा प्रथम पुर्तगाली वायसराय |
| 1509 | अल्बुकर्क Governor; दीव में पुर्तगाली विजय |
| 1510 | गोवा पर पुर्तगाली अधिकार |
| 1600 | English East India Company की स्थापना |
| 1602 | Dutch East India Company — VOC |
| 1605 | डच factory — मसूलीपट्टनम |
| 1608 | Hawkins का सूरत आगमन |
| 1609 | Hawkins जहाँगीर के दरबार में |
| 1611 | मसूलीपट्टनम में अंग्रेजी व्यापारिक गतिविधि |
| 1613 | सूरत में स्थायी अंग्रेजी factory |
| 1615 | Sir Thomas Roe भारत आया |
| 1639 | Francis Day — मद्रास |
| 1661 | Bombay पुर्तगाली दहेज समझौते में अंग्रेजी Crown को |
| 1664 | French East India Company |
| 1668 | Bombay East India Company को; फ्रांसीसी Surat factory |
| 1674 | पांडिचेरी में फ्रांसीसी केंद्र का विकास |
| 1698 | सूतानुती, कालिकाता और गोविंदपुर की जमींदारी |
| 1746–1748 | प्रथम कर्नाटक युद्ध |
| 1749–1754 | द्वितीय कर्नाटक युद्ध |
| 1759 | बेदरा — अंग्रेजों द्वारा डचों की पराजय |
| 1760 | वांडीवाश — अंग्रेजों की निर्णायक विजय |
| 1761 | अंग्रेजों का पांडिचेरी पर अधिकार |
| 1763 | पेरिस की संधि |
Quick Revision
SSC / Railway Rapid Recall
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20 मई 1498 — वास्को द गामा कालीकट पहुँचा और यूरोप से भारत के सीधे समुद्री व्यापारिक मार्ग का नया चरण शुरू हुआ।
वास्को द गामा ने मालिंदी से एक अनुभवी पायलट की सहायता ली थी; उसका नाम निश्चित रूप से अब्दुल मजीद या अहमद इब्न माजिद बताना सुरक्षित नहीं है।
1500 — पेड्रो अल्वारेस कैब्राल से जुड़ी कालीकट की factory भारत में पहली पुर्तगाली factory मानी जाती है; कोचीन प्रारंभिक स्थायी केंद्र बना।
1505 — फ्रांसिस्को द अल्मेडा भारत में प्रथम पुर्तगाली वायसराय।
अल्मेडा — Blue Water Policy; 1509 — दीव का नौसैनिक युद्ध।
अफोंसो द अल्बुकर्क 1509 में Governor बना और 1510 में गोवा पर अधिकार किया।
1602 — Dutch East India Company अर्थात VOC; 1605 — मसूलीपट्टनम में Dutch factory।
पुलीकट कोरोमंडल तट पर डचों का महत्वपूर्ण मुख्यालय बना और यहाँ डचों ने सिक्के ढाले।
1759 — बेदरा का युद्ध — अंग्रेजों ने डचों को पराजित किया।
31 दिसंबर 1600 — एलिजाबेथ प्रथम ने English East India Company को Charter दिया; प्रथम Governor Sir Thomas Smythe था।
1608 — William Hawkins सूरत पहुँचा; 1609 में जहाँगीर के दरबार में गया।
Hawkins के 1608 के अभियान से जुड़ा प्रसिद्ध जहाज Hector था; Red Dragon East India Company की शुरुआती fleet का प्रमुख जहाज था।
1611 — मसूलीपट्टनम में अंग्रेजी व्यापारिक गतिविधि; 1613 — सूरत में स्थायी अंग्रेजी factory।
1615–1619 — Sir Thomas Roe जहाँगीर के दरबार में James I का आधिकारिक राजदूत।
1639 — Francis Day — Madras; यहाँ Fort St. George विकसित हुआ।
1661 की विवाह संधि में Bombay पुर्तगाली राजकुमारी Catherine of Braganza के दहेज से English Crown को मिला; 1668 में Charles II ने इसे East India Company को लगभग £10 वार्षिक किराए पर दिया।
Gerald Aungier ने Bombay को महत्वपूर्ण अंग्रेजी व्यापारिक नगर के रूप में विकसित करने में बड़ी भूमिका निभाई।
शाह शुजा के काल में बंगाल में अंग्रेजों को व्यापारिक सुविधाएँ मिलीं।
1698 — सूतानुती + कालिकाता + गोविंदपुर की जमींदारी कंपनी ने प्राप्त की; इन्हीं क्षेत्रों से कलकत्ता का विकास हुआ।
कालीकट और कालिकाता को कभी confuse न करें।
1664 — French East India Company; 1668 के आसपास Surat में प्रारंभिक French factory।
1674 — François Martin — Pondicherry के विकास से संबंधित।
प्रथम कर्नाटक युद्ध 1746–1748 — Austrian Succession War से संबंधित; Aix-la-Chapelle Treaty से समाप्त।
द्वितीय कर्नाटक युद्ध 1749–1754 — Dupleix, Robert Clive और भारतीय उत्तराधिकार विवादों से संबंधित; Pondicherry समझौते के बाद समाप्त।
तृतीय कर्नाटक युद्ध Seven Years’ War का भारतीय भाग था; भारत में मुख्य संघर्ष सामान्यतः 1758–1763 माना जाता है।
22 जनवरी 1760 — वांडीवाश का युद्ध — Sir Eyre Coote के नेतृत्व में अंग्रेजों ने फ्रांसीसियों को निर्णायक रूप से हराया।
1761 — अंग्रेजों ने पांडिचेरी पर अधिकार किया।
1763 — पेरिस की संधि — फ्रांस को कई व्यापारिक प्रतिष्ठान वापस मिले, लेकिन भारत में फ्रांसीसी राजनीतिक-सैन्य प्रभुत्व की संभावना समाप्त हो गई।
कर्नाटक युद्धों के बाद भारत में यूरोपीय शक्तियों की प्रतिस्पर्धा में अंग्रेजी East India Company सबसे शक्तिशाली शक्ति बनकर उभरी।