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मुगल साम्राज्य का पतन
DECLINE OF THE MUGHAL EMPIRE

मुगल साम्राज्य का पतन

औरंगजेब की मृत्यु से बहादुर शाह जफर तक — उत्तराधिकारी, विदेशी आक्रमण और अंग्रेजी प्रभुत्व

मुगल साम्राज्य के पतन की शुरुआत

औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य तेजी से कमजोर होने लगा। कमजोर उत्तराधिकारी, लगातार उत्तराधिकार युद्ध, दरबारी गुटबंदी, प्रांतीय शक्तियों का उदय, मराठों का विस्तार, नादिरशाह और अहमद शाह अब्दाली के आक्रमण तथा ईस्ट इंडिया कंपनी की बढ़ती राजनीतिक शक्ति ने मुगल साम्राज्य की केंद्रीय सत्ता को धीरे-धीरे समाप्त कर दिया।

1707 के बाद मुगल बादशाहों का प्रभाव लगातार घटता गया। अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक मुगल बादशाह का वास्तविक अधिकार बहुत सीमित हो गया और 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश शासन ने मुगल राजसत्ता को औपचारिक रूप से भी समाप्त कर दिया।

01

औरंगजेब की मृत्यु

Death of Aurangzeb — 1707

औरंगजेब की मृत्यु 3 मार्च 1707 को अहमदनगर के निकट हुई। उसकी मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य में पुनः उत्तराधिकार का संघर्ष शुरू हो गया।

औरंगजेब के जीवित तीन पुत्र—मुहम्मद मुअज्जम, मुहम्मद आजम और मुहम्मद कामबख्श—सिंहासन प्राप्त करने के लिए संघर्ष करने लगे।

मुअज्जम उस समय उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में था। उसने बहादुर शाह की उपाधि धारण की और अंततः अपने भाइयों को पराजित करके मुगल सिंहासन प्राप्त किया।

02

बहादुर शाह प्रथम

Bahadur Shah I — 1707–1712

मुहम्मद मुअज्जम ने बहादुर शाह की उपाधि धारण की। उसे शाह आलम प्रथम के नाम से भी जाना जाता है।

जाजऊ का युद्ध जून 1707 में मुअज्जम और उसके भाई मुहम्मद आजम के बीच हुआ। इसमें आजम पराजित हुआ और मारा गया। इसके बाद बहादुर शाह ने मुगल सिंहासन पर अपना अधिकार मजबूत किया।

उसका दूसरा भाई कामबख्श दक्षिण भारत में अपनी स्वतंत्र स्थिति बनाने का प्रयास कर रहा था। बहादुर शाह ने उसके विरुद्ध अभियान किया। 1709 में हैदराबाद के निकट हुए संघर्ष में कामबख्श घायल हुआ और बाद में उसकी मृत्यु हो गई।

इस प्रकार बहादुर शाह प्रथम अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी भाइयों को हटाकर मुगल साम्राज्य का निर्विवाद बादशाह बन गया।

उसके शासनकाल में राजपूतों, मराठों और सिखों के साथ संबंध मुगल राजनीति के महत्वपूर्ण विषय बने रहे। सिख नेता बंदा सिंह बहादुर के नेतृत्व में मुगल सत्ता के विरुद्ध संघर्ष भी इसी काल में तेज हुआ।

जोशुआ केटेलार (Josua Ketelaar) के नेतृत्व में एक डच प्रतिनिधिमंडल बहादुर शाह के दरबार से जुड़ा हुआ माना जाता है। केटेलार डच ईस्ट इंडिया कंपनी का अधिकारी था।

इतिहासकार खाफी खान ने बहादुर शाह को “शाह-ए-बेखबर” कहा है। यह उपनाम उसकी शासन-शैली से जुड़ा प्रसिद्ध परीक्षा तथ्य है।

🎯 Exam Point

मुहम्मद मुअज्जम = बहादुर शाह प्रथम = शाह आलम प्रथम

03

जहांदार शाह

Jahandar Shah — 1712–1713

बहादुर शाह प्रथम की मृत्यु के बाद उसके पुत्रों में उत्तराधिकार युद्ध हुआ। इस संघर्ष में जहांदार शाह ने शक्तिशाली अमीर जुल्फिकार खान की सहायता से सिंहासन प्राप्त किया।

सिंहासन प्राप्त करने के बाद जहांदार शाह ने जुल्फिकार खान को वजीर नियुक्त किया। इससे जुल्फिकार खान का मुगल प्रशासन पर अत्यधिक प्रभाव हो गया।

जहांदार शाह का शासन बहुत कम समय तक चला। उसका नाम उसकी प्रिय लाल कुंवर के कारण भी प्रसिद्ध है। उसके विलासपूर्ण जीवन के कारण बाद की कई पुस्तकों में उसे लापरवाह अथवा लंपट शासक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

जहांदार शाह के शासनकाल में जुल्फिकार खान ने राजपूतों और मराठों के प्रति अपेक्षाकृत समझौतावादी नीति अपनाने का प्रयास किया।

04

फर्रूखसियर का उदय

Farrukhsiyar — 1713–1719

बहादुर शाह प्रथम के पुत्र अजीम-उश-शान का पुत्र फर्रूखसियर मुगल सिंहासन का दावेदार बना। उसे शक्तिशाली सैयद बंधुओं का सहयोग प्राप्त हुआ।

सैयद बंधु थे—सैयद अब्दुल्ला खान और सैयद हुसैन अली खान। उनकी सैनिक और राजनीतिक सहायता से फर्रूखसियर ने जहांदार शाह को पराजित किया। 1713 में जहांदार शाह की हत्या कर दी गई और फर्रूखसियर मुगल बादशाह बना।

फर्रूखसियर के सिंहासनारोहण में सैयद बंधुओं की निर्णायक भूमिका के कारण उनका दरबार पर अत्यधिक प्रभाव हो गया। बाद में दोनों भाइयों को मुगल राजनीति में “King Makers” अर्थात राजा बनाने वाले के रूप में प्रसिद्धि मिली।

🧠 याद रखें

सैयद अब्दुल्ला खान + सैयद हुसैन अली खान = सैयद बंधु = King Makers

05

1717 का फर्रूखसियर का फरमान

East India Company & Surman Embassy

ईस्ट इंडिया कंपनी ने मुगल दरबार से अपनी व्यापारिक सुविधाएँ बढ़ाने के लिए एक प्रतिनिधिमंडल भेजा, जिसे John Surman Embassy के नाम से जाना जाता है। इस प्रतिनिधिमंडल में डॉ. विलियम हैमिल्टन नामक शल्य चिकित्सक भी शामिल था।

डॉ. हैमिल्टन द्वारा बादशाह फर्रूखसियर के उपचार से जुड़ी प्रसिद्ध घटना के बाद कंपनी को महत्वपूर्ण व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त हुईं।

1717 में फर्रूखसियर द्वारा जारी फरमान ईस्ट इंडिया कंपनी के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण था। इससे कंपनी को विशेष रूप से बंगाल में अनेक व्यापारिक रियायतें मिलीं।

बंगाल में कंपनी को लगभग 3,000 रुपये वार्षिक भुगतान के बदले अपने व्यापार पर महत्वपूर्ण सीमा-शुल्क सुविधाएँ प्राप्त हुईं। कंपनी को कलकत्ता के आसपास अतिरिक्त गाँव किराए पर लेने जैसी सुविधाएँ भी मिलीं।

आगे चलकर कंपनी के अधिकारियों ने दस्तक तथा शुल्क-मुक्त व्यापार की सुविधाओं का निजी व्यापार में भी दुरुपयोग किया। यही प्रश्न बाद में बंगाल के नवाबों और कंपनी के बीच टकराव का एक महत्वपूर्ण कारण बना।

🎯 High Yield

1717 — फर्रूखसियर का फरमान — ईस्ट इंडिया कंपनी को महत्वपूर्ण व्यापारिक रियायतें।

06

फर्रूखसियर और सैयद बंधु

Conflict with the King Makers

फर्रूखसियर सिंहासन प्राप्त करने के बाद सैयद बंधुओं के अत्यधिक प्रभाव से मुक्त होना चाहता था। इसके कारण बादशाह और सैयद बंधुओं के बीच संघर्ष बढ़ता गया।

दूसरी ओर सैयद बंधुओं ने मराठों से समझौता किया। पेशवा बालाजी विश्वनाथ के दिल्ली आगमन और 1719 के मुगल-मराठा समझौते ने तत्कालीन राजनीति में मराठों की भूमिका को और महत्वपूर्ण बना दिया।

अंततः सैयद बंधुओं ने अपने समर्थकों और मराठा सहयोग की सहायता से 1719 में फर्रूखसियर को पदच्युत कर दिया। उसे अंधा किया गया और बाद में उसकी हत्या कर दी गई।

फर्रूखसियर को कुछ इतिहासकारों ने उसके अस्थिर और षड्यंत्रकारी राजनीतिक व्यवहार के कारण “घृणित कायर” जैसे कठोर शब्दों से संबोधित किया है। इसे इतिहासकारों का मूल्यांकन समझना चाहिए, न कि उसकी औपचारिक उपाधि।

07

रफी-उद-दराजात

Short Reign of 1719

फर्रूखसियर को हटाने के बाद सैयद बंधुओं ने रफी-उद-दराजात को मुगल बादशाह बनाया। वास्तविक राजनीतिक शक्ति सैयद बंधुओं के हाथों में रही।

रफी-उद-दराजात का शासन केवल कुछ महीनों तक चला। इसलिए उसे सबसे कम समय शासन करने वाले मुगल बादशाहों में गिना जाता है।

उसके बाद रफी-उद-दौला, जिसे शाहजहाँ द्वितीय कहा गया, बादशाह बनाया गया; उसका शासन भी बहुत अल्पकालिक रहा।

🎯 Exam Point

रफी-उद-दराजात — अत्यंत अल्पकालीन मुगल शासक — सैयद बंधुओं द्वारा सिंहासन पर बैठाया गया।

08

मुहम्मद शाह रंगीला

Muhammad Shah — 1719–1748

मुहम्मद शाह 1719 में मुगल बादशाह बना और लगभग तीन दशकों तक शासन किया। उसके शासनकाल में मुगल साम्राज्य का राजनीतिक विघटन बहुत तेजी से बढ़ा।

उसके विलासप्रिय जीवन और संगीत-कला में रुचि के कारण वह “मुहम्मद शाह रंगीला” के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसके समय संगीत और दरबारी संस्कृति को संरक्षण मिला, लेकिन केंद्रीय प्रशासन लगातार कमजोर होता गया।

इसी काल में अनेक शक्तिशाली प्रांत वास्तविक रूप से स्वतंत्र होने लगे और मुगल बादशाह का उन पर नियंत्रण कम होता गया।

09

सैयद बंधुओं का पतन

Fall of the Sayyid Brothers

मुहम्मद शाह सैयद बंधुओं के नियंत्रण से मुक्त होकर स्वयं शासन करना चाहता था। उनके विरोधी मुगल अमीरों ने भी बादशाह का साथ दिया।

1720 में सैयद हुसैन अली खान की हत्या कर दी गई। इसके बाद सैयद अब्दुल्ला खान ने संघर्ष किया, लेकिन वह पराजित होकर बंदी बना लिया गया। बाद में उसकी भी मृत्यु हो गई।

सैयद बंधुओं के विरोधी गुट में निजाम-उल-मुल्क सहित कई शक्तिशाली अमीर थे, लेकिन यह कहना कि निजाम-उल-मुल्क ने अकेले 1722 में दोनों सैयद बंधुओं की हत्या करवाई, सही नहीं है। सैयद बंधुओं का पतन एक व्यापक दरबारी राजनीतिक संघर्ष का परिणाम था।

📗 परीक्षा-सुरक्षित तथ्य

हुसैन अली — 1720 में हत्या; अब्दुल्ला खान — पराजित और बंदी। इसके साथ सैयद बंधुओं का राजनीतिक प्रभुत्व समाप्त हुआ।

10

जज़िया का अंतिम अंत

Jizya in the Later Mughal Period

औरंगजेब ने 1679 में जज़िया कर पुनः लगाया था। उसकी मृत्यु के बाद उत्तरवर्ती मुगल काल में इस कर को लेकर नीति कई बार बदली।

जहांदार शाह के शासनकाल में जुल्फिकार खान के प्रभाव में जज़िया को समाप्त करने की नीति अपनाई गई। फर्रूखसियर के काल में इसकी स्थिति फिर बदली और 1719 में उसके पतन के बाद इसे पुनः समाप्त किया गया।

मुहम्मद शाह के शुरुआती शासनकाल में 1720 के आसपास जज़िया को पुनः लागू करने का प्रयास हुआ, लेकिन विरोध के कारण इसे प्रभावी रूप से हटा दिया गया। इसके बाद यह मुगल शासन में व्यावहारिक रूप से पुनः स्थापित नहीं हो सका।

इसलिए केवल “मुहम्मद शाह ने 1720 में पहली बार जज़िया समाप्त किया” कहना अधूरा है। सही संदर्भ यह है कि उत्तरवर्ती मुगल काल में इसके लागू और समाप्त होने की स्थिति कई बार बदली और मुहम्मद शाह के समय इसका प्रभावी अंत हो गया।

11

निजाम-उल-मुल्क और हैदराबाद

Rise of the Asaf Jahi State

निजाम-उल-मुल्क चिन किलिच खान मुगल साम्राज्य का एक अत्यंत शक्तिशाली अमीर था। उसे आसफ जाह की उपाधि भी मिली।

मुहम्मद शाह के शासनकाल में वह कुछ समय के लिए वजीर भी बना, लेकिन मुगल दरबार की गुटबंदी से असंतुष्ट होकर दक्षिण की ओर चला गया।

1724 में उसने दक्कन में अपनी स्थिति मजबूत की और हैदराबाद में आसफजाही वंश की नींव रखी। नाममात्र के लिए मुगल बादशाह की सर्वोच्चता स्वीकार की जाती रही, लेकिन हैदराबाद व्यवहार में लगभग स्वतंत्र राज्य बन गया।

🎯 Exam Point

निजाम-उल-मुल्क चिन किलिच खान = आसफ जाह प्रथम = हैदराबाद के आसफजाही वंश का संस्थापक।

12

प्रांतीय राज्यों का उदय

Disintegration of Mughal Authority

अठारहवीं शताब्दी में मुगल केंद्रीय सत्ता कमजोर होने के साथ कई प्रांतों के सूबेदारों और स्थानीय शासकों ने लगभग स्वतंत्र शासन स्थापित कर लिया।

हैदराबाद में निजाम-उल-मुल्क, अवध में सआदत खान और बंगाल में मुर्शिद कुली खान से जुड़े शक्तिशाली प्रांतीय राज्यों का विकास हुआ।

इन राज्यों ने औपचारिक रूप से मुगल बादशाह की सर्वोच्चता को कुछ समय तक स्वीकार किया, लेकिन राजस्व, सेना और प्रशासन पर वास्तविक नियंत्रण स्वयं रखने लगे।

इसी समय मराठा, जाट, सिख और रोहिल्ला जैसी क्षेत्रीय शक्तियों का प्रभाव भी बढ़ता गया। इससे मुगल साम्राज्य का राजनीतिक विघटन और तेज हुआ।

13

नादिरशाह का आक्रमण

Nadir Shah’s Invasion — 1739

नादिरशाह फारस का शक्तिशाली शासक था। मुगल साम्राज्य की कमजोर स्थिति का लाभ उठाकर उसने भारत पर आक्रमण किया।

मुगल बादशाह मुहम्मद शाह की सेना और नादिरशाह की सेना के बीच 24 फरवरी 1739 को करनाल का युद्ध हुआ। इसमें मुगल सेना को निर्णायक पराजय मिली।

मुहम्मद शाह को नादिरशाह के सामने समर्पण करना पड़ा। इसके बाद नादिरशाह दिल्ली पहुँचा और वहाँ भारी लूट हुई।

नादिरशाह के आक्रमण के पीछे राजनीतिक और सामरिक कारण भी थे, लेकिन भारत की अपार संपत्ति उसके लिए बड़ा आकर्षण थी। दिल्ली से वह विशाल धन-संपत्ति लेकर फारस लौटा।

वह प्रसिद्ध मयूर सिंहासन (Peacock Throne / तख्त-ए-ताऊस) अपने साथ ले गया। कोहिनूर हीरा भी नादिरशाह के अधिकार में चला गया।

इस आक्रमण से मुगल साम्राज्य की प्रतिष्ठा को भारी आघात लगा और उसकी सैन्य कमजोरी पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के सामने स्पष्ट हो गई।

🎯 High Yield

करनाल का युद्ध — 24 फरवरी 1739 — नादिरशाह बनाम मुहम्मद शाह — नादिरशाह विजयी।

⚠️ तिथि याद रखें

करनाल का युद्ध 13 फरवरी नहीं, 24 फरवरी 1739 को हुआ था।

14

अहमद शाह और अहमद शाह अब्दाली

Do Not Confuse the Two

अहमद शाह बहादुर मुगल बादशाह था, जबकि अहमद शाह अब्दाली अफगानिस्तान का शासक था। दोनों अलग-अलग व्यक्ति थे और परीक्षा में इनके समान नाम के कारण भ्रम हो सकता है।

मुहम्मद शाह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अहमद शाह बहादुर 1748 में मुगल सिंहासन पर बैठा। उसके शासनकाल में मुगल केंद्रीय सत्ता और अधिक कमजोर हुई।

दूसरी ओर अहमद शाह अब्दाली ने नादिरशाह की मृत्यु के बाद अफगानिस्तान में दुर्रानी साम्राज्य की स्थापना की। उसे अहमद शाह दुर्रानी भी कहा जाता है।

अब्दाली ने उत्तर-पश्चिम भारत में बार-बार हस्तक्षेप किया। उसके आक्रमण मुगल साम्राज्य की कमजोरी और उत्तर भारत में उत्पन्न राजनीतिक शून्य के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।

🧠 Confusion Clear

अहमद शाह बहादुर = मुगल बादशाह
अहमद शाह अब्दाली/दुर्रानी = अफगान शासक

15

अहमद शाह अब्दाली के आक्रमण

Afghan Invasions

अहमद शाह अब्दाली ने 1748 से 1767 के बीच भारत की दिशा में कई सैन्य अभियान किए। अलग-अलग पुस्तकों में इन अभियानों की गिनती करने के तरीके के कारण संख्या में अंतर मिलता है।

पुरानी सामान्य ज्ञान पुस्तकों में उसके भारत पर सात आक्रमण का उल्लेख बहुत प्रचलित है, जबकि कई आधुनिक ऐतिहासिक विवरण उसके भारतीय अभियानों की संख्या आठ या उससे अधिक चरणों में गिनते हैं। इसलिए संख्या पूछे जाने पर निर्धारित परीक्षा-स्रोत की परंपरा को ध्यान में रखना चाहिए।

अहमद शाह बहादुर के शासनकाल में भी अब्दाली ने भारत पर कई बार आक्रमण किया, लेकिन उसके सभी भारतीय अभियान केवल अहमद शाह बहादुर के शासनकाल तक सीमित नहीं थे। बाद के मुगल शासकों के समय भी उसके आक्रमण जारी रहे।

अब्दाली का सबसे प्रसिद्ध भारतीय सैन्य संघर्ष 1761 का पानीपत का तृतीय युद्ध था।

16

आलमगीर द्वितीय

Alamgir II — 1754–1759

आलमगीर द्वितीय 1754 में मुगल सिंहासन पर बैठा। इस समय तक मुगल बादशाह की वास्तविक शक्ति अत्यंत सीमित हो चुकी थी और शक्तिशाली दरबारी तथा क्षेत्रीय शक्तियाँ राजनीति को नियंत्रित कर रही थीं।

अहमद शाह अब्दाली के आक्रमणों के कारण दिल्ली और उत्तर भारत की राजनीतिक स्थिति अत्यंत अस्थिर हो गई।

1759 में आलमगीर द्वितीय की हत्या कर दी गई। इसके बाद उसका पुत्र अली गौहर आगे चलकर शाह आलम द्वितीय के नाम से मुगल बादशाह बना।

17

शाह आलम द्वितीय

Shah Alam II — 1759–1806

शाह आलम द्वितीय का मूल नाम अली गौहर था। उसके लंबे शासनकाल में मुगल बादशाह की वास्तविक शक्ति अत्यंत सीमित हो गई और दिल्ली की राजनीति पर अलग-अलग बाहरी शक्तियों का प्रभाव बढ़ता गया।

उसके शासनकाल में दो अत्यंत महत्वपूर्ण घटनाएँ हुईं—1761 का पानीपत का तृतीय युद्ध और 1764 का बक्सर का युद्ध

शाह आलम द्वितीय के समय ईस्ट इंडिया कंपनी एक व्यापारिक संस्था से आगे बढ़कर भारत की प्रमुख राजनीतिक शक्तियों में बदलने लगी।

18

पानीपत का तृतीय युद्ध

Third Battle of Panipat — 1761

14 जनवरी 1761 को पानीपत का तृतीय युद्ध मुख्य रूप से मराठों और अहमद शाह अब्दाली की सेनाओं के बीच हुआ।

अब्दाली के पक्ष में रोहिल्ला अफगान तथा अवध के नवाब शुजाउद्दौला सहित अन्य सहयोगी शक्तियाँ थीं। मराठा सेना का प्रमुख नेतृत्व सदाशिवराव भाऊ कर रहे थे।

इस युद्ध में मराठों की निर्णायक पराजय हुई। इससे उत्तर भारत में मराठों के तत्काल विस्तार को बड़ा झटका लगा, हालांकि बाद में मराठों ने उत्तर भारत में अपना प्रभाव फिर से स्थापित किया।

यह युद्ध शाह आलम द्वितीय के शासनकाल में हुआ, लेकिन मुगल बादशाह स्वयं इस युद्ध का मुख्य युद्धरत पक्ष नहीं था।

🎯 Exam Point

14 जनवरी 1761 — तृतीय पानीपत — मराठा बनाम अहमद शाह अब्दाली — अब्दाली की विजय।

19

बक्सर का युद्ध

Battle of Buxar — 1764

22 अक्टूबर 1764 को बक्सर का युद्ध ईस्ट इंडिया कंपनी और भारतीय शक्तियों की संयुक्त सेना के बीच हुआ।

भारतीय पक्ष में मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय, अवध का नवाब शुजाउद्दौला और बंगाल का अपदस्थ नवाब मीर कासिम शामिल थे।

ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना का नेतृत्व हेक्टर मुनरो ने किया। कंपनी की सेना ने संयुक्त भारतीय सेना को निर्णायक रूप से पराजित किया।

बक्सर की विजय ने बंगाल और उत्तर भारत में कंपनी की राजनीतिक तथा सैन्य स्थिति को बहुत मजबूत कर दिया। प्लासी की तुलना में बक्सर की विजय ने कंपनी को अधिक व्यापक राजनीतिक अधिकार प्राप्त करने का मार्ग दिया।

🧠 बक्सर — तीन भारतीय शक्तियाँ

मीर कासिम+ शुजाउद्दौला+ शाह आलम द्वितीय
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इलाहाबाद की संधि

Treaty of Allahabad — 1765

बक्सर में कंपनी की विजय के बाद 1765 में इलाहाबाद की संधि हुई। इस व्यवस्था में ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से रॉबर्ट क्लाइव की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

शाह आलम द्वितीय ने ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी अर्थात राजस्व वसूली का अधिकार प्रदान किया।

इसके बदले कंपनी ने मुगल बादशाह को वार्षिक धनराशि देने की व्यवस्था स्वीकार की। इस घटना ने बंगाल की वास्तविक आर्थिक शक्ति कंपनी के हाथों में पहुँचाने में निर्णायक भूमिका निभाई।

इस प्रकार बक्सर का युद्ध और उसके बाद की इलाहाबाद की संधि भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के राजनीतिक प्रभुत्व के विकास में एक बड़ा मोड़ साबित हुई।

🎯 High Yield

1765 — शाह आलम द्वितीय → कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी।

21

मुगल बादशाह की घटती शक्ति

Emperor Without an Empire

अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक मुगल बादशाह का वास्तविक अधिकार दिल्ली और उसके आसपास के सीमित क्षेत्र तक सिमट गया था।

शाह आलम द्वितीय को अलग-अलग समय पर अंग्रेजों और मराठों जैसी शक्तियों के संरक्षण पर निर्भर रहना पड़ा।

इसी स्थिति को व्यक्त करने के लिए शाह आलम द्वितीय के बारे में प्रसिद्ध कहावत प्रचलित हुई—“सल्तनत-ए-शाह आलम, अज दिल्ली ता पालम”, अर्थात शाह आलम की सल्तनत दिल्ली से पालम तक सीमित रह गई थी।

यह कथन मुगल साम्राज्य के अत्यधिक राजनीतिक संकुचन को प्रतीकात्मक रूप से व्यक्त करता है।

22

अकबर द्वितीय

Akbar II — 1806–1837

अकबर द्वितीय 1806 में मुगल बादशाह बना। उस समय तक दिल्ली पर ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रभाव स्थापित हो चुका था और मुगल बादशाह की स्थिति मुख्यतः नाममात्र की रह गई थी।

1803 में अंग्रेजों द्वारा दिल्ली पर अधिकार स्थापित किए जाने के बाद मुगल सम्राट कंपनी के संरक्षण और नियंत्रण में आ गया था। इसलिए अकबर द्वितीय का शासन वास्तविक स्वतंत्र साम्राज्य की अपेक्षा ब्रिटिश संरक्षण में चलने वाली नाममात्र की राजसत्ता का उदाहरण था।

अकबर द्वितीय ने प्रसिद्ध समाज सुधारक राममोहन राय को “राजा” की उपाधि प्रदान की।

उसने राममोहन राय को अपने हितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए इंग्लैंड भी भेजा। इसके बाद राममोहन राय राजा राममोहन राय के नाम से व्यापक रूप से प्रसिद्ध हुए।

🎯 Exam Point

राजा की उपाधि — राममोहन राय — अकबर द्वितीय।

23

बहादुर शाह द्वितीय

Bahadur Shah Zafar — 1837–1857

बहादुर शाह द्वितीय मुगल साम्राज्य का अंतिम बादशाह था। वह बहादुर शाह जफर के नाम से प्रसिद्ध है।

“जफर” उसका तखल्लुस अर्थात काव्य-उपनाम था। वह उर्दू का प्रसिद्ध शायर था और उसके दरबार का संबंध उस समय की समृद्ध साहित्यिक संस्कृति से था।

उसके समय तक मुगल बादशाह की वास्तविक राजनीतिक शक्ति लगभग समाप्त हो चुकी थी और उसका प्रभाव मुख्य रूप से लाल किले तथा दिल्ली के सीमित क्षेत्र तक था।

🧠 Confusion Clear

बहादुर शाह प्रथम = मुहम्मद मुअज्जम
बहादुर शाह द्वितीय = बहादुर शाह जफर = अंतिम मुगल बादशाह

24

1857 का विद्रोह और बहादुर शाह जफर

The End of Mughal Rule

1857 के विद्रोह के दौरान मेरठ से आए विद्रोही सैनिक दिल्ली पहुँचे और उन्होंने बहादुर शाह जफर को विद्रोह का प्रतीकात्मक नेता तथा भारत का सम्राट घोषित किया।

बहादुर शाह जफर वृद्ध था और उसके पास अपनी स्वतंत्र शक्तिशाली सेना नहीं थी, फिर भी उसके नाम ने विद्रोहियों को मुगल राजसत्ता के प्रतीक के रूप में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक केंद्र प्रदान किया।

दिल्ली पर पुनः अधिकार करने के बाद अंग्रेजों ने बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार कर लिया। उसके विरुद्ध लाल किले में मुकदमा चलाया गया और उसे भारत से निर्वासित करने का निर्णय लिया गया।

उसे रंगून भेज दिया गया, जो वर्तमान में यांगून, म्यांमार है। वहीं 7 नवंबर 1862 को उसकी मृत्यु हो गई।

बहादुर शाह जफर के निर्वासन के साथ मुगल राजसत्ता का अंतिम प्रतीक भी समाप्त हो गया। 1857 के बाद ब्रिटिश शासन ने भारत की प्रशासनिक व्यवस्था में भी बड़ा परिवर्तन किया।

25

1858 में कंपनी शासन का अंत

Beginning of British Crown Rule

1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश संसद ने Government of India Act, 1858 पारित किया। इसके द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत पर शासन समाप्त कर दिया गया।

भारत का प्रशासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन चला गया। इसी के साथ भारत में कंपनी शासन समाप्त हुआ और ब्रिटिश राज की औपचारिक शुरुआत हुई।

मुगल बादशाह की उपाधि भी समाप्त कर दी गई और बहादुर शाह जफर के उत्तराधिकारियों को मुगल सम्राट के रूप में मान्यता नहीं दी गई।

26

मुगल साम्राज्य के पतन के प्रमुख कारण

Major Causes of Decline

कारण प्रभाव
कमजोर उत्तराधिकारी औरंगजेब के बाद अधिकांश शासक शक्तिशाली केंद्रीय नेतृत्व देने में असफल रहे।
उत्तराधिकार युद्ध बार-बार होने वाले गृहयुद्धों ने सेना, राजकोष और प्रशासन को कमजोर किया।
दरबारी गुटबंदी सैयद बंधु, तुरानी, ईरानी तथा अन्य गुट सत्ता के लिए संघर्ष करते रहे।
जागीरदारी संकट मनसबदारों और जागीरों से जुड़ी प्रशासनिक तथा आर्थिक समस्याएँ बढ़ीं।
लंबे युद्ध विशेषकर औरंगजेब के दक्कन अभियानों ने राजकोष और सेना पर भारी दबाव डाला।
क्षेत्रीय शक्तियों का उदय मराठा, सिख, जाट और अन्य शक्तियों ने मुगल नियंत्रण को चुनौती दी।
प्रांतों की स्वायत्तता बंगाल, अवध और हैदराबाद जैसे प्रांत लगभग स्वतंत्र हो गए।
नादिरशाह का आक्रमण 1739 में मुगल प्रतिष्ठा और राजकोष को भारी क्षति पहुँची।
अहमद शाह अब्दाली लगातार अफगान आक्रमणों ने उत्तर भारत की राजनीतिक अस्थिरता बढ़ाई।
आर्थिक संकट युद्धों, प्रशासनिक अव्यवस्था और राजस्व व्यवस्था की समस्याओं से केंद्रीय शक्ति कमजोर हुई।
ईस्ट इंडिया कंपनी का उदय कंपनी ने व्यापारिक शक्ति से राजनीतिक और सैन्य शक्ति का रूप ले लिया।
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उत्तरवर्ती मुगल शासक — एक नजर में

Later Mughal Emperors

शासक शासनकाल मुख्य तथ्य
बहादुर शाह प्रथम 1707–1712 मुअज्जम; शाह आलम प्रथम; शाह-ए-बेखबर
जहांदार शाह 1712–1713 जुल्फिकार खान की सहायता से सत्ता
फर्रूखसियर 1713–1719 सैयद बंधु; 1717 का कंपनी फरमान
रफी-उद-दराजात 1719 अत्यंत अल्पकालीन शासन
रफी-उद-दौला / शाहजहाँ II 1719 सैयद बंधुओं के प्रभाव में
मुहम्मद शाह 1719–1748 रंगीला; नादिरशाह का आक्रमण
अहमद शाह बहादुर 1748–1754 अब्दाली के आक्रमणों का काल
आलमगीर द्वितीय 1754–1759 कमजोर केंद्रीय सत्ता
शाह आलम द्वितीय 1759–1806 पानीपत III, बक्सर, इलाहाबाद संधि
अकबर द्वितीय 1806–1837 राजा राममोहन राय को “राजा” की उपाधि
बहादुर शाह द्वितीय 1837–1857 अंतिम मुगल बादशाह; जफर; 1857
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महत्वपूर्ण युद्ध एवं घटनाएँ

Important Battles & Events

वर्ष घटना मुख्य तथ्य
1707 औरंगजेब की मृत्यु उत्तराधिकार युद्ध प्रारंभ
1707 जाजऊ का युद्ध मुअज्जम ने आजम को पराजित किया
1713 फर्रूखसियर का उदय सैयद बंधुओं की सहायता
1717 फर्रूखसियर का फरमान ईस्ट इंडिया कंपनी को व्यापारिक रियायतें
1719 फर्रूखसियर का पतन सैयद बंधुओं द्वारा पदच्युत
1724 हैदराबाद निजाम-उल-मुल्क द्वारा आसफजाही सत्ता की स्थापना
1739 करनाल का युद्ध नादिरशाह ने मुहम्मद शाह को पराजित किया
1761 पानीपत का तृतीय युद्ध अहमद शाह अब्दाली ने मराठों को पराजित किया
1764 बक्सर का युद्ध कंपनी ने संयुक्त भारतीय सेना को पराजित किया
1765 इलाहाबाद की संधि कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी
1803 अंग्रेजों का दिल्ली पर नियंत्रण मुगल बादशाह कंपनी के संरक्षण में
1857 विद्रोह बहादुर शाह जफर प्रतीकात्मक नेता
1858 कंपनी शासन समाप्त भारत ब्रिटिश क्राउन के अधीन
1862 बहादुर शाह जफर की मृत्यु रंगून में मृत्यु
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सबसे महत्वपूर्ण Confusing Pairs

Do Not Confuse

बहादुर शाह प्रथम और बहादुर शाह द्वितीय अलग शासक थे। बहादुर शाह प्रथम औरंगजेब का पुत्र मुअज्जम था, जबकि बहादुर शाह द्वितीय यानी बहादुर शाह जफर अंतिम मुगल बादशाह था।

शाह आलम प्रथम बहादुर शाह प्रथम का दूसरा नाम था, जबकि शाह आलम द्वितीय वह बादशाह था जिसके शासनकाल में बक्सर का युद्ध हुआ।

अहमद शाह बहादुर मुगल बादशाह था, जबकि अहमद शाह अब्दाली/दुर्रानी अफगानिस्तान का शासक और भारत पर आक्रमणकारी था।

नादिरशाह फारस का शासक था जिसने 1739 में मुहम्मद शाह को करनाल में हराया, जबकि अहमद शाह अब्दाली अफगान शासक था जिसने 1761 में मराठों को पानीपत के तृतीय युद्ध में पराजित किया।

जाजऊ का युद्ध 1707 में औरंगजेब के पुत्रों के उत्तराधिकार संघर्ष से संबंधित था, जबकि करनाल का युद्ध 1739 में नादिरशाह और मुहम्मद शाह से संबंधित था।

पानीपत का तृतीय युद्ध 1761 में मराठों और अब्दाली के बीच था, जबकि बक्सर का युद्ध 1764 में ईस्ट इंडिया कंपनी और मीर कासिम–शुजाउद्दौला–शाह आलम द्वितीय की संयुक्त शक्ति के बीच था।

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Quick Revision

SSC / Railway Rapid Recall

⚡ शासक क्रम

औरंगजेब बहादुर शाह I जहांदार शाह फर्रूखसियर रफी-उद-दराजात शाहजहाँ II मुहम्मद शाह अहमद शाह बहादुर आलमगीर II शाह आलम II अकबर II बहादुर शाह जफर

⚡ Final Revision Points

3 मार्च 1707 — औरंगजेब की मृत्यु; इसके बाद उसके पुत्रों में उत्तराधिकार युद्ध हुआ।

बहादुर शाह प्रथम का मूल नाम मुहम्मद मुअज्जम था; उसे शाह आलम प्रथम भी कहा जाता है।

जाजऊ का युद्ध, 1707 — मुअज्जम ने मुहम्मद आजम को पराजित किया।

खाफी खान ने बहादुर शाह को “शाह-ए-बेखबर” कहा है।

जहांदार शाह जुल्फिकार खान की सहायता से सिंहासन पर बैठा और उसे वजीर बनाया।

फर्रूखसियर सैयद बंधुओं की सहायता से 1713 में बादशाह बना।

सैयद अब्दुल्ला खान और सैयद हुसैन अली खान — प्रसिद्ध सैयद बंधु या King Makers।

1717 का फर्रूखसियर का फरमान — ईस्ट इंडिया कंपनी को महत्वपूर्ण व्यापारिक सुविधाएँ मिलीं; John Surman mission और डॉ. William Hamilton इससे जुड़े हैं।

1719 — फर्रूखसियर को पदच्युत, अंधा और बाद में मार दिया गया।

रफी-उद-दराजात — अत्यंत अल्पकालीन मुगल बादशाह।

मुहम्मद शाह रंगीला के शासनकाल में मुगल साम्राज्य का विघटन तेजी से बढ़ा।

निजाम-उल-मुल्क चिन किलिच खान = आसफ जाह प्रथम; 1724 में हैदराबाद में आसफजाही सत्ता की नींव।

24 फरवरी 1739 — करनाल के युद्ध में नादिरशाह ने मुहम्मद शाह को पराजित किया।

नादिरशाह दिल्ली से भारी धन-संपत्ति, तख्त-ए-ताऊस तथा कोहिनूर अपने अधिकार में लेकर गया।

अहमद शाह बहादुर मुगल बादशाह था; अहमद शाह अब्दाली/दुर्रानी अफगान शासक था।

14 जनवरी 1761 — पानीपत का तृतीय युद्ध — मराठा बनाम अहमद शाह अब्दाली — मराठों की पराजय।

22 अक्टूबर 1764 — बक्सर का युद्ध — हेक्टर मुनरो के नेतृत्व में कंपनी की विजय।

बक्सर में भारतीय पक्ष — मीर कासिम + शुजाउद्दौला + शाह आलम द्वितीय

1765 की इलाहाबाद संधि के बाद कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी मिली।

अकबर द्वितीय ने राममोहन राय को “राजा” की उपाधि प्रदान की।

बहादुर शाह द्वितीय = बहादुर शाह जफर — अंतिम मुगल बादशाह और प्रसिद्ध शायर।

1857 में विद्रोहियों ने बहादुर शाह जफर को अपना प्रतीकात्मक नेता बनाया।

अंग्रेजों ने बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार कर रंगून निर्वासित कर दिया, जहाँ 7 नवंबर 1862 को उसकी मृत्यु हुई।

1858 में ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हुआ और भारत सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन आ गया।

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