मैसूर राज्य एवं आंग्ल-मैसूर युद्ध
हैदर अली से टीपू सुल्तान तक — चार आंग्ल-मैसूर युद्ध और अंग्रेजी विस्तार
मैसूर और अंग्रेजों का संघर्ष
अठारहवीं शताब्दी में दक्षिण भारत में मैसूर अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी के सामने सबसे शक्तिशाली भारतीय प्रतिरोधों में से एक बनकर उभरा। हैदर अली और उसके पुत्र टीपू सुल्तान ने सेना को मजबूत किया, आधुनिक हथियारों और तोपखाने का उपयोग बढ़ाया तथा अंग्रेजों के बढ़ते प्रभाव को चुनौती दी।
1767 से 1799 के बीच अंग्रेजों और मैसूर के बीच चार बड़े युद्ध हुए। इन युद्धों को आंग्ल-मैसूर युद्ध कहा जाता है। अंतिम युद्ध में टीपू सुल्तान की मृत्यु के बाद दक्षिण भारत में अंग्रेजी शक्ति बहुत मजबूत हो गई।
हैदर अली का प्रारंभिक जीवन
Hyder Ali
हैदर अली का जन्म सामान्यतः लगभग 1720 ई. में बुदीकोट में माना जाता है, जो वर्तमान कर्नाटक के कोलार क्षेत्र में स्थित है। कुछ पुरानी परीक्षा पुस्तकों में उसकी जन्मतिथि 1722 ई. भी दी जाती है, लेकिन लगभग 1720 अधिक प्रचलित ऐतिहासिक तिथि है।
हैदर अली किसी शाही राजवंश में पैदा नहीं हुआ था। उसने एक सैनिक के रूप में अपना जीवन शुरू किया और अपनी सैन्य क्षमता, राजनीतिक कुशलता तथा नेतृत्व के बल पर मैसूर राज्य में तेजी से प्रभावशाली बन गया।
उसने विशेष रूप से आधुनिक तोपखाने और यूरोपीय सैन्य तकनीकों में रुचि दिखाई तथा फ्रांसीसी विशेषज्ञों की सहायता से अपनी सेना को मजबूत किया।
📗 परीक्षा-सुरक्षित तथ्य
हैदर अली — जन्म लगभग 1720 — बुदीकोट, कोलार क्षेत्र।
1761 में मैसूर की वास्तविक सत्ता
Rise of Hyder Ali
1761 ई. तक हैदर अली मैसूर राज्य की वास्तविक राजनीतिक और सैन्य सत्ता पर नियंत्रण स्थापित करने में सफल हो गया।
मैसूर में वोडेयार राजवंश का राजा औपचारिक रूप से बना रहा, लेकिन वास्तविक प्रशासनिक और सैन्य शक्ति हैदर अली के हाथों में आ गई। इसलिए हैदर अली को 1761 से मैसूर का वास्तविक या de facto शासक कहना अधिक सटीक है।
हैदर अली ने अपने शासन में सेना का विस्तार किया और मैसूर की सीमाओं को बढ़ाते हुए दक्षिण भारत में एक शक्तिशाली राज्य स्थापित किया।
🎯 Exam Point
1761 — हैदर अली मैसूर का वास्तविक शासक बना।
हैदर अली की सैन्य शक्ति
Military Modernisation
हैदर अली ने मैसूर की सेना को आधुनिक बनाने के लिए यूरोपीय सैन्य तकनीक का उपयोग किया। उसने विशेष रूप से फ्रांसीसी सैनिकों और तकनीकी विशेषज्ञों से प्रशिक्षण और सहायता प्राप्त की।
मैसूर की सेना में घुड़सवार सेना, पैदल सेना, तोपखाना और लोहे की नली वाले युद्ध-रॉकेट महत्वपूर्ण थे। इन्हीं रॉकेटों को आगे टीपू सुल्तान ने और विकसित किया।
मैसूर के इन रॉकेटों ने बाद में अंग्रेजों का भी ध्यान आकर्षित किया और टीपू की पराजय के बाद प्राप्त तकनीक ने ब्रिटेन में Congreve rockets के विकास को प्रभावित किया।
प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध
First Anglo-Mysore War — 1767–1769
प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध 1767 से 1769 के बीच हुआ। इस युद्ध में हैदर अली ने अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी की बढ़ती शक्ति का मुकाबला किया।
युद्ध के प्रारंभ में अंग्रेजों, हैदराबाद के निजाम और मराठों के बीच मैसूर के विरुद्ध गठबंधन बना, लेकिन राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलने के साथ हैदर अली ने अपने विरोधियों को अलग-अलग करने में सफलता प्राप्त की।
हैदर अली तेजी से आगे बढ़ते हुए मद्रास के निकट पहुँच गया। अंग्रेजों को शांति के लिए बातचीत करनी पड़ी।
मद्रास की संधि
Treaty of Madras — 1769
प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध का अंत 1769 की मद्रास की संधि से हुआ।
इस संधि में दोनों पक्षों ने जीते हुए अधिकांश क्षेत्र वापस करने और एक-दूसरे पर बाहरी आक्रमण की स्थिति में सहायता करने का समझौता किया।
बाद में जब मराठों ने हैदर अली पर हमला किया तो अंग्रेजों ने अपेक्षित सहायता नहीं की। इससे हैदर अली और अंग्रेजों के संबंध और खराब हुए तथा यह भविष्य के संघर्ष का एक कारण बना।
🎯 याद रखें
प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध → 1767–69 → मद्रास की संधि, 1769
प्रथम युद्ध के समय वेरेल्स्ट
Governor — Not Governor-General
प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध के समय हैरी वेरेल्स्ट बंगाल का Governor था। पुरानी परीक्षा-सारणियों में इस युद्ध के सामने उसका नाम दिया जाता है।
लेकिन उसे Governor-General कहना सही नहीं है, क्योंकि भारत में Governor-General of Bengal का पद 1773 के Regulating Act के बाद अस्तित्व में आया और प्रथम Governor-General Warren Hastings बना।
इसलिए परीक्षा में यदि सामान्य “Governor” पूछा जाए तो प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध के साथ Verelst का नाम मिलता है।
द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध
Second Anglo-Mysore War — 1780–1784
द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध 1780 से 1784 के बीच हुआ। इस समय भारत का Governor-General वारेन हेस्टिंग्स था।
अंग्रेजों द्वारा फ्रांसीसी बस्ती माहे पर अधिकार करना युद्ध के महत्वपूर्ण कारणों में से एक था। माहे हैदर अली के प्रभाव क्षेत्र में था और फ्रांसीसी सहायता प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण बंदरगाह था।
हैदर अली ने अंग्रेजों के विरुद्ध बड़ी सेना के साथ कर्नाटक पर आक्रमण किया और प्रारंभिक चरण में कई महत्वपूर्ण सफलताएँ प्राप्त कीं।
पोलिलूर का युद्ध
Battle of Pollilur — 1780
1780 के पोलिलूर के युद्ध में हैदर अली और टीपू की सेनाओं ने अंग्रेजी सेना को बड़ी पराजय दी।
इस युद्ध में अंग्रेज अधिकारी कर्नल विलियम बैली की सेना पराजित हुई और बड़ी संख्या में अंग्रेज सैनिक बंदी बनाए गए।
मैसूर की सेना द्वारा लोहे की नली वाले युद्ध-रॉकेटों का उपयोग इस संघर्ष की प्रमुख विशेषताओं में था।
हैदर अली की मृत्यु
Death of Hyder Ali — 1782
द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध जारी रहने के दौरान 7 दिसंबर 1782 को हैदर अली की मृत्यु हो गई।
उसकी मृत्यु कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से हुई मानी जाती है। मृत्यु के समय भी अंग्रेजों और मैसूर के बीच युद्ध जारी था।
हैदर अली की मृत्यु के बाद उसका पुत्र टीपू सुल्तान मैसूर की सत्ता का उत्तराधिकारी बना और उसने अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध जारी रखा।
🎯 High Yield
1782 — द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के दौरान हैदर अली की मृत्यु → उत्तराधिकारी टीपू सुल्तान।
टीपू सुल्तान
Tipu Sultan — Tiger of Mysore
टीपू सुल्तान हैदर अली का पुत्र और उत्तराधिकारी था। पिता की मृत्यु के बाद उसने द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध का नेतृत्व जारी रखा।
टीपू ने शासन, सेना, व्यापार और तकनीक को मजबूत करने का प्रयास किया। उसने फ्रांस सहित विदेशी शक्तियों से संपर्क बनाए रखा और अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी को अपने राज्य के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती माना।
टीपू सुल्तान को सामान्यतः “मैसूर का शेर” या “Tiger of Mysore” कहा जाता है।
मंगलौर की संधि
Treaty of Mangalore — 1784
हैदर अली की मृत्यु के बाद टीपू सुल्तान ने अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध जारी रखा। दोनों पक्ष निर्णायक विजय प्राप्त नहीं कर सके और अंततः समझौते की स्थिति बनी।
11 मार्च 1784 को मंगलौर की संधि के साथ द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध समाप्त हुआ।
संधि के अनुसार दोनों पक्षों ने युद्ध में जीते गए क्षेत्रों और बंदियों को बड़े पैमाने पर वापस करने पर सहमति जताई तथा युद्ध-पूर्व स्थिति बहाल की गई।
🎯 याद रखें
द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध → 1780–84 → मंगलौर की संधि, 1784
टीपू और पादशाह की उपाधि
Padshah — 1787
1787 के आसपास टीपू सुल्तान ने “पादशाह” की उपाधि धारण की और अपनी संप्रभु राजसत्ता को अधिक स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया।
श्रीरंगपट्टनम टीपू की राजधानी तथा उसके शासन का प्रमुख राजनीतिक और सैनिक केंद्र था।
टीपू ने स्वतंत्र शासक के रूप में अपनी पहचान स्थापित करने के लिए अपनी मुद्रा, प्रशासनिक प्रतीकों और शासन व्यवस्था में कई परिवर्तन किए। उसने अपने शासन में एक नया मौलूदी कैलेंडर भी प्रचलित किया।
🎯 Exam Point
1787 — टीपू सुल्तान — पादशाह की उपाधि।
टीपू का बाघ प्रतीक
Tiger Motif
टीपू सुल्तान ने बाघ को अपनी राजसत्ता और वीरता का महत्वपूर्ण प्रतीक बनाया था। उसके हथियारों, राजकीय वस्तुओं, सिंहासन से संबंधित सजावट और अनेक banners पर बाघ तथा बाघ की धारियों जैसे bubri motifs का व्यापक प्रयोग मिलता है।
इसलिए पुरानी परीक्षा पुस्तकों में यह लिखा मिलता है कि टीपू के राजसी झंडे पर शेर या बाघ का चित्र होता था। अधिक सटीक तथ्य यह है कि टीपू के राजकीय प्रतीकों और कई ध्वजों में बाघ तथा tiger-stripe motif प्रमुख था।
इसी प्रतीकात्मक संबंध के कारण टीपू को Tiger of Mysore कहा जाना अत्यंत प्रसिद्ध हुआ।
🧠 Confusion Clear
टीपू से जुड़ा प्रमुख पशु-प्रतीक बाघ था। हिंदी GK में कभी-कभी “शेर-ए-मैसूर” कहा जाता है, लेकिन अंग्रेजी उपनाम Tiger of Mysore है।
Tree of Liberty और Jacobin Club
French Revolutionary Connection
टीपू सुल्तान ने अंग्रेजों के विरुद्ध सहायता प्राप्त करने के लिए फ्रांस से घनिष्ठ संपर्क बनाने का प्रयास किया। फ्रांसीसी क्रांति के बाद मैसूर और फ्रांसीसी गणतांत्रिक प्रतिनिधियों के संबंध भी चर्चा में आए।
पुरानी परीक्षा-GK और अनेक इतिहास पुस्तकों में यह प्रसिद्ध तथ्य मिलता है कि श्रीरंगपट्टनम में “Tree of Liberty” अर्थात स्वतंत्रता का वृक्ष लगाया गया और टीपू Jacobin Club से जुड़ा तथा “Citizen Tipu” कहलाया।
आधुनिक ऐतिहासिक शोध में इस Jacobin Club की वास्तविक प्रकृति और टीपू की औपचारिक सदस्यता को लेकर मतभेद हैं। इसलिए परीक्षा में इसे प्रचलित ऐतिहासिक/GK तथ्य के रूप में याद रखना उचित है, जबकि इसका विस्तृत राजनीतिक स्वरूप विवादरहित नहीं है।
🎯 Exam-GK
टीपू सुल्तान — श्रीरंगपट्टनम — Tree of Liberty — Jacobin Club से जुड़ा प्रसिद्ध तथ्य।
तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध
Third Anglo-Mysore War — 1790–1792
तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध 1790 से 1792 तक चला। इस समय भारत का Governor-General लॉर्ड कॉर्नवालिस था।
इस युद्ध की तत्काल पृष्ठभूमि टीपू सुल्तान द्वारा त्रावणकोर पर आक्रमण से बनी। त्रावणकोर अंग्रेजों का सहयोगी राज्य था।
अंग्रेजों ने टीपू के विरुद्ध हैदराबाद के निजाम और मराठों के साथ गठबंधन बनाया। इस प्रकार टीपू को एक साथ कई शक्तियों का सामना करना पड़ा।
अंततः कॉर्नवालिस की सेनाएँ श्रीरंगपट्टनम तक पहुँच गईं और टीपू को समझौता करना पड़ा।
श्रीरंगपट्टनम की संधि
Treaty of Seringapatam — 1792
1792 की श्रीरंगपट्टनम की संधि के साथ तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध समाप्त हुआ।
इस संधि के कारण टीपू को अपने राज्य का लगभग आधा क्षेत्र अंग्रेजों तथा उनके सहयोगियों को देना पड़ा।
टीपू को भारी युद्ध-क्षतिपूर्ति देने के लिए भी सहमत होना पड़ा। भुगतान की गारंटी के रूप में उसके दो पुत्रों को कुछ समय के लिए अंग्रेजों के पास बंधक रखा गया।
इस संधि ने मैसूर की शक्ति को काफी कमजोर कर दिया, लेकिन टीपू की स्वतंत्र सत्ता अभी समाप्त नहीं हुई थी।
🎯 High Yield
तृतीय युद्ध → 1790–92 → श्रीरंगपट्टनम की संधि → आधा राज्य खोया + दो पुत्र बंधक।
चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध
Fourth Anglo-Mysore War — 1799
चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध 1799 में हुआ। उस समय भारत का Governor-General लॉर्ड वेलेजली था।
वेलेजली टीपू के फ्रांस से संबंधों को अंग्रेजी शक्ति के लिए गंभीर खतरा मानता था। यूरोप में फ्रांस और ब्रिटेन की प्रतिद्वंद्विता का प्रभाव भारतीय राजनीति पर भी पड़ रहा था।
अंग्रेजों ने हैदराबाद के निजाम के सहयोग से मैसूर पर आक्रमण किया और टीपू की राजधानी श्रीरंगपट्टनम को घेर लिया।
टीपू सुल्तान की मृत्यु
Fall of Seringapatam — 4 May 1799
4 मई 1799 को अंग्रेजों ने श्रीरंगपट्टनम पर निर्णायक हमला किया। टीपू सुल्तान ने किले की रक्षा करते हुए युद्ध किया और इसी संघर्ष में उसकी मृत्यु हो गई।
टीपू ने आत्मसमर्पण करने की बजाय युद्ध जारी रखा। उसकी मृत्यु के साथ हैदर अली द्वारा स्थापित मैसूर की वास्तविक सुल्तानी सत्ता का अंत हो गया।
चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध की विजय ने दक्षिण भारत में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थिति अत्यंत मजबूत कर दी।
🎯 याद रखें
4 मई 1799 — श्रीरंगपट्टनम — टीपू सुल्तान युद्ध करते हुए मारा गया।
1799 के बाद मैसूर
Restoration of the Wodeyars
टीपू सुल्तान की मृत्यु के बाद उसके राज्य का बड़ा हिस्सा अंग्रेजों और उनके सहयोगियों के बीच बाँट दिया गया।
मैसूर के एक छोटे भाग में पुराने वोडेयार राजवंश को पुनः स्थापित किया गया और बालक कृष्णराज वोडेयार तृतीय को शासक बनाया गया।
नया मैसूर राज्य अंग्रेजों के प्रभाव में आ गया। इस प्रकार 1799 के बाद मैसूर अंग्रेजों के लिए पहले जैसा स्वतंत्र और शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी नहीं रहा।
चारों आंग्ल-मैसूर युद्ध
Complete Exam Table
| युद्ध | वर्ष | संबंधित प्रमुख अधिकारी | अंत/संधि |
|---|---|---|---|
| प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध | 1767–1769 | हैरी वेरेल्स्ट — बंगाल का Governor | मद्रास की संधि, 1769 |
| द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध | 1780–1784 | Governor-General Warren Hastings | मंगलौर की संधि, 1784 |
| तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध | 1790–1792 | Governor-General Cornwallis | श्रीरंगपट्टनम की संधि, 1792 |
| चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध | 1799 | Governor-General Wellesley | टीपू की मृत्यु; मैसूर की पराजय |
⚠️ Important
प्रथम युद्ध के समय वेरेल्स्ट को Governor-General न लिखें। वह बंगाल का Governor था। Governor-General का पद बाद में 1773 के Regulating Act के बाद आया।
संधियों का क्रम
Easy Revision
🧠 1 → 2 → 3 याद रखें
वांडीवाश का युद्ध
Battle of Wandiwash — 1760
22 जनवरी 1760 को वांडीवाश का युद्ध अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच हुआ था। यह मैसूर युद्ध नहीं बल्कि तृतीय कर्नाटक युद्ध का निर्णायक संघर्ष था।
अंग्रेजी सेना का नेतृत्व सर आयर कूट ने किया, जबकि फ्रांसीसी सेना का प्रमुख नेतृत्व काउंट डी लैली से जुड़ा था।
इस युद्ध में अंग्रेजों ने फ्रांसीसियों को निर्णायक रूप से पराजित किया। इससे भारत में फ्रांसीसी राजनीतिक और सैन्य महत्वाकांक्षा को बहुत बड़ा झटका लगा।
वांडीवाश का संबंध सीधे Anglo-Mysore Wars से नहीं है, लेकिन यह समझना महत्वपूर्ण है क्योंकि बाद में हैदर अली और टीपू सुल्तान फ्रांसीसियों से सैन्य और राजनीतिक सहयोग प्राप्त करने का प्रयास करते रहे।
🧠 Confusion Clear
वांडीवाश 1760 = अंग्रेज बनाम फ्रांसीसी = तृतीय कर्नाटक युद्ध
यह आंग्ल-मैसूर युद्ध नहीं था।
सर आयर कूट — दो अलग प्रसंग
Eyre Coote
सर आयर कूट का नाम दो महत्वपूर्ण दक्षिण भारतीय संघर्षों में मिलता है।
1760 के वांडीवाश युद्ध में उसने फ्रांसीसी सेना को पराजित किया था।
इसके लगभग दो दशक बाद द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध में भी आयर कूट ने अंग्रेजी सेना का नेतृत्व किया और हैदर अली के विरुद्ध Porto Novo जैसे युद्धों में लड़ाई लड़ी।
इसलिए आयर कूट को केवल फ्रांसीसियों या केवल मैसूर के संघर्ष से जोड़कर न पढ़ें; उसका नाम दोनों प्रसंगों में आता है।
हैदर अली और टीपू — एक नजर में
Father and Son
| आधार | हैदर अली | टीपू सुल्तान |
|---|---|---|
| सत्ता | 1761 से वास्तविक शासक | 1782 में उत्तराधिकारी |
| अंग्रेजों से युद्ध | प्रथम और द्वितीय Anglo-Mysore War | द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ Anglo-Mysore War |
| मृत्यु | 1782, द्वितीय युद्ध के दौरान | 4 मई 1799, चतुर्थ युद्ध में |
| विशेष | मैसूर की सैन्य शक्ति का विस्तार | Tiger motif, rockets, फ्रांसीसी संपर्क |
महत्वपूर्ण तिथियाँ
Important Dates
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| लगभग 1720 | हैदर अली का जन्म — बुदीकोट |
| 1760 | वांडीवाश — आयर कूट ने फ्रांसीसियों को हराया |
| 1761 | हैदर अली मैसूर का वास्तविक शासक |
| 1767–1769 | प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध |
| 1769 | मद्रास की संधि |
| 1780–1784 | द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध |
| 1780 | पोलिलूर में अंग्रेजों की बड़ी पराजय |
| 1782 | हैदर अली की मृत्यु; टीपू उत्तराधिकारी |
| 1784 | मंगलौर की संधि |
| 1787 | टीपू द्वारा पादशाह की उपाधि धारण करने से जुड़ी तिथि |
| 1790–1792 | तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध |
| 1792 | श्रीरंगपट्टनम की संधि |
| 1799 | चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध |
| 4 मई 1799 | श्रीरंगपट्टनम में टीपू सुल्तान की मृत्यु |
सबसे महत्वपूर्ण Confusing Facts
Do Not Confuse
हैदर अली का जन्म 1722 कई पुरानी पुस्तकों में मिलता है, लेकिन लगभग 1720, बुदीकोट अधिक स्वीकार्य तथ्य है।
1761 में हैदर अली ने वोडेयार वंश को पूरी तरह समाप्त नहीं किया; वह मैसूर का वास्तविक शासक बना जबकि वोडेयार राजा औपचारिक रूप से मौजूद रहा।
हैदर अली की मृत्यु 1782 में द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के दौरान हुई। उसके बाद टीपू ने युद्ध जारी रखा।
टीपू का प्रमुख पशु-प्रतीक बाघ था; उसके अनेक banners और हथियारों पर tiger/bubri motif मिलता है।
Tree of Liberty और Jacobin Club परीक्षा में टीपू से जुड़े प्रसिद्ध तथ्य हैं, लेकिन Jacobin membership के ऐतिहासिक विवरण पर विद्वानों में मतभेद है।
Verelst प्रथम Anglo-Mysore War के समय Bengal का Governor था, Governor-General नहीं।
वांडीवाश 1760 Anglo-Mysore War नहीं बल्कि अंग्रेज-फ्रांसीसी Third Carnatic War से संबंधित था।
Eyre Coote ने वांडीवाश में फ्रांसीसियों से युद्ध किया और बाद में Second Anglo-Mysore War में हैदर अली के विरुद्ध भी लड़ाई लड़ी।
Quick Revision
SSC / Railway Rapid Recall
⚡ पूरा क्रम
⚡ Final Revision Points
हैदर अली का जन्म लगभग 1720 में बुदीकोट, वर्तमान कोलार क्षेत्र में हुआ माना जाता है।
1761 में हैदर अली मैसूर का वास्तविक शासक बना; वोडेयार राजा औपचारिक रूप से मौजूद रहा।
प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध 1767–1769 — हैदर अली बनाम अंग्रेज — मद्रास की संधि, 1769।
प्रथम युद्ध के समय Verelst बंगाल का Governor था, Governor-General नहीं।
द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध 1780–1784 — Governor-General Warren Hastings।
1780 का पोलिलूर युद्ध मैसूर की बड़ी सैन्य सफलता थी और अंग्रेज अधिकारी William Baillie की सेना पराजित हुई।
7 दिसंबर 1782 को द्वितीय Anglo-Mysore War के दौरान हैदर अली की मृत्यु हुई।
हैदर अली का उत्तराधिकारी उसका पुत्र टीपू सुल्तान बना।
1784 की मंगलौर संधि से द्वितीय Anglo-Mysore War समाप्त हुआ।
1787 के आसपास टीपू ने पादशाह की उपाधि धारण की। उसकी राजधानी श्रीरंगपट्टनम थी।
टीपू ने अपने शासन में बाघ तथा tiger-stripe/bubri motif को व्यापक राजकीय प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया।
टीपू को Tiger of Mysore कहा जाता है।
Tree of Liberty और Jacobin Club टीपू से जुड़े प्रसिद्ध परीक्षा-GK तथ्य हैं, हालांकि Jacobin संबंध के विस्तृत ऐतिहासिक स्वरूप पर मतभेद है।
तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध 1790–1792 — Governor-General Cornwallis।
1792 की श्रीरंगपट्टनम संधि में टीपू को लगभग आधा राज्य छोड़ना पड़ा और उसके दो पुत्र कुछ समय के लिए बंधक दिए गए।
चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध 1799 — Governor-General Wellesley।
4 मई 1799 को श्रीरंगपट्टनम की रक्षा करते हुए टीपू सुल्तान की मृत्यु हुई।
टीपू की मृत्यु के बाद मैसूर के एक हिस्से में वोडेयार वंश पुनः स्थापित किया गया।
22 जनवरी 1760 का वांडीवाश युद्ध अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच था; Sir Eyre Coote ने Count de Lally की फ्रांसीसी सेना को पराजित किया।
वांडीवाश का युद्ध तृतीय कर्नाटक युद्ध से संबंधित था, Anglo-Mysore Wars से नहीं।
चार युद्धों का संधि-क्रम — मद्रास → मंगलौर → श्रीरंगपट्टनम → 1799 में टीपू की मृत्यु।