मौर्य साम्राज्य
चंद्रगुप्त मौर्य से अशोक और मौर्य साम्राज्य के पतन तक
मौर्य साम्राज्य का उदय
नंद वंश के अंतिम शासक धनानंद को हटाकर चंद्रगुप्त मौर्य ने लगभग 322–321 ईसा पूर्व में मौर्य वंश की स्थापना की।
मौर्य साम्राज्य भारतीय इतिहास का पहला ऐसा विशाल साम्राज्य था जिसने भारतीय उपमहाद्वीप के बहुत बड़े भाग को एक राजनीतिक सत्ता के अधीन संगठित किया।
चंद्रगुप्त मौर्य, बिंदुसार और अशोक इस वंश के तीन सबसे महत्वपूर्ण शासक थे।
चंद्रगुप्त मौर्य
नंद सत्ता के अंत से विशाल मौर्य साम्राज्य की स्थापना तक
मौर्य वंश की स्थापना
लगभग 322–321 ईसा पूर्व
चंद्रगुप्त मौर्य ने नंद वंश के अंतिम शासक धनानंद को पराजित कर लगभग 322–321 ईसा पूर्व में मगध पर अधिकार किया।
इसी के साथ मौर्य वंश की स्थापना हुई।
345 ईसा पूर्व मौर्य वंश की स्थापना की सही तिथि नहीं है। उस समय चंद्रगुप्त का शासन प्रारंभ भी नहीं हुआ था।
परीक्षा बिंदु
मौर्य वंश की स्थापना — लगभग 322–321 ईसा पूर्व।
संस्थापक — चंद्रगुप्त मौर्य।
चाणक्य और चंद्रगुप्त
नंद सत्ता के विरुद्ध संघर्ष
भारतीय परंपरा में चाणक्य या कौटिल्य को चंद्रगुप्त मौर्य का प्रमुख मार्गदर्शक माना जाता है।
चाणक्य ने नंद शासन को समाप्त करने और चंद्रगुप्त को मगध का शासक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
बाद की परंपरा में चाणक्य को चंद्रगुप्त का महामात्य या प्रमुख मंत्री माना गया है।
अर्थशास्त्र नामक प्रसिद्ध राजशास्त्रीय ग्रंथ कौटिल्य या विष्णुगुप्त से संबंधित है।
इस ग्रंथ में राज्य-व्यवस्था, प्रशासन, कर-प्रणाली, सेना, गुप्तचर व्यवस्था, विदेश नीति और अर्थव्यवस्था का विस्तृत वर्णन मिलता है।
तीन नाम
चाणक्य = कौटिल्य = विष्णुगुप्त
यूनानी लेखकों में चंद्रगुप्त
सैंड्रोकोट्टस
यूनानी और रोमन लेखकों ने चंद्रगुप्त मौर्य के नाम को विभिन्न रूपों में लिखा।
ग्रीक परंपरा में उसका नाम सैंड्रोकोट्टस या सैंड्राकोट्टस जैसे रूपों में मिलता है।
रोमन लेखक जस्टिन ने भी चंद्रगुप्त से संबंधित विवरण दिया है।
18वीं शताब्दी में विलियम जोन्स ने ग्रीक लेखकों के सैंड्रोकोट्टस की पहचान भारतीय चंद्रगुप्त मौर्य से की। इस पहचान ने प्राचीन भारतीय कालक्रम के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
याद रखें
सैंड्रोकोट्टस / सैंड्राकोट्टस = चंद्रगुप्त मौर्य।
उत्तर-पश्चिम भारत पर अधिकार
सिकंदर के बाद की राजनीतिक स्थिति
323 ईसा पूर्व में सिकंदर की मृत्यु के बाद उसके द्वारा उत्तर-पश्चिम भारत में स्थापित सत्ता कमजोर होने लगी।
चंद्रगुप्त मौर्य ने इस स्थिति का लाभ उठाया और उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों पर अपना अधिकार बढ़ाया।
इसके बाद मौर्य साम्राज्य मगध से उत्तर-पश्चिम तक विस्तृत एक बड़ी राजनीतिक शक्ति बन गया।
सेल्युकस निकेटर से युद्ध
लगभग 305 ईसा पूर्व
सिकंदर की मृत्यु के बाद सेल्युकस प्रथम निकेटर उसके साम्राज्य के पूर्वी क्षेत्रों का शक्तिशाली शासक बना।
लगभग 305 ईसा पूर्व में सेल्युकस ने भारतीय क्षेत्रों पर अपना प्रभाव पुनः स्थापित करने के लिए चंद्रगुप्त मौर्य से युद्ध किया।
इस संघर्ष के बाद दोनों शासकों के बीच संधि हुई।
यूनानी-रोमन स्रोतों में इस संघर्ष और संधि का वर्णन मिलता है। एपियन के विवरण में चंद्रगुप्त और सेल्युकस के संबंध का उल्लेख है।
चंद्रगुप्त–सेल्युकस संधि
क्षेत्र और 500 युद्ध-हाथी
संधि के बाद सेल्युकस ने चंद्रगुप्त की सत्ता को उत्तर-पश्चिम के कुछ क्षेत्रों में स्वीकार किया।
इन क्षेत्रों को सामान्यतः एरिया, अराकोसिया, गेड्रोसिया और परोपमिसादाई से संबंधित माना जाता है, जो आधुनिक अफगानिस्तान और आसपास के क्षेत्रों से जुड़े थे।
इसके बदले चंद्रगुप्त ने सेल्युकस को 500 युद्ध-हाथी दिए।
इन हाथियों ने बाद में सेल्युकस की पश्चिमी युद्धनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
500 हाथियों का विवरण एपियन की परंपरा से स्पष्ट रूप से जुड़ा है। इसे केवल प्लूटार्क के नाम से याद करना ठीक नहीं है।
क्या चंद्रगुप्त ने सेल्युकस की पुत्री से विवाह किया था?
वैवाहिक संबंध का प्रश्न
यूनानी स्रोतों में चंद्रगुप्त और सेल्युकस की संधि के साथ वैवाहिक संबंध या एपिगामिया का उल्लेख मिलता है।
लेकिन सेल्युकस की किसी पुत्री “कार्नेलिया” का नाम विश्वसनीय प्राचीन स्रोतों में चंद्रगुप्त की पत्नी के रूप में प्रमाणित नहीं है।
इसलिए परीक्षा के लिए यह तथ्य याद रखें कि चंद्रगुप्त और सेल्युकस के बीच वैवाहिक संबंध का उल्लेख मिलता है, पर पत्नी का नाम कार्नेलिया निश्चित ऐतिहासिक तथ्य नहीं है।
मेगास्थनीज
चंद्रगुप्त के दरबार में यूनानी राजदूत
संधि के बाद सेल्युकस निकेटर ने मेगास्थनीज को चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में राजदूत के रूप में भेजा।
मेगास्थनीज ने मौर्यकालीन भारत के बारे में इंडिका नामक ग्रंथ लिखा।
इंडिका का मूल ग्रंथ अब उपलब्ध नहीं है, लेकिन उसके अंश बाद के यूनानी-रोमन लेखकों की रचनाओं में सुरक्षित हैं।
क्रम याद रखें
सेल्युकस → मेगास्थनीज → चंद्रगुप्त मौर्य → इंडिका।
चंद्रगुप्त और जैन धर्म
भद्रबाहु और श्रवणबेलगोला
जैन परंपरा के अनुसार जीवन के अंतिम चरण में चंद्रगुप्त मौर्य ने जैन धर्म अपनाया।
उसका संबंध जैन आचार्य भद्रबाहु से जोड़ा जाता है।
परंपरा के अनुसार भद्रबाहु और चंद्रगुप्त दक्षिण भारत गए और कर्नाटक के श्रवणबेलगोला क्षेत्र में रहे।
श्रवणबेलगोला की चंद्रगिरि पहाड़ी पर चंद्रगुप्त से संबंधित जैन परंपरा आज भी प्रसिद्ध है।
यह विवरण मुख्यतः बाद की जैन परंपरा से प्राप्त होता है।
चंद्रगुप्त की मृत्यु
जैन परंपरा
चंद्रगुप्त मौर्य की मृत्यु लगभग 298 ईसा पूर्व मानी जाती है।
जैन परंपरा के अनुसार उसने श्रवणबेलगोला में सल्लेखना द्वारा जीवन का अंत किया।
सल्लेखना में व्यक्ति आध्यात्मिक अनुशासन के अंतर्गत धीरे-धीरे आहार त्यागता है।
चंद्रगुप्त की श्रवणबेलगोला में मृत्यु का विवरण मुख्यतः जैन परंपरा से मिलता है।
बिंदुसार
चंद्रगुप्त से अशोक के बीच मौर्य साम्राज्य का विस्तार
बिंदुसार का राज्यारोहण
लगभग 298 ईसा पूर्व
चंद्रगुप्त मौर्य के बाद उसका पुत्र बिंदुसार मौर्य साम्राज्य का शासक बना।
उसका राज्यारोहण लगभग 298 ईसा पूर्व माना जाता है।
उसने लगभग 273 ईसा पूर्व तक शासन किया।
बिंदुसार ने चंद्रगुप्त द्वारा स्थापित विशाल साम्राज्य को बनाए रखा और दक्षिण की दिशा में मौर्य प्रभाव का विस्तार किया।
अमित्रघात
बिंदुसार की उपाधि
यूनानी स्रोतों में बिंदुसार के नाम का रूप अमित्रोखेट्स जैसा मिलता है।
इसे संस्कृत अमित्रघात से जोड़ा जाता है।
अमित्रघात का अर्थ है — शत्रुओं का विनाश करने वाला।
याद रखें
बिंदुसार = अमित्रघात = शत्रु-विनाशक।
बिंदुसार के अन्य नाम
पुराण और जैन साहित्य
पुराणिक परंपरा में बिंदुसार के लिए भद्रसार तथा कुछ पाठों में वारिसार जैसे रूप मिलते हैं।
जैन साहित्य की कुछ परंपराओं में बिंदुसार के लिए सिंहसेन नाम मिलता है।
अलग-अलग ग्रंथों में नामों के पाठ-रूप भिन्न होने के कारण बिंदुसार ही उसका सबसे प्रचलित ऐतिहासिक नाम है।
बिंदुसार और आजीवक संप्रदाय
धार्मिक संबंध
कुछ बौद्ध और बाद की परंपराओं में बिंदुसार के दरबार में आजीवक संप्रदाय के प्रभाव का उल्लेख मिलता है।
बिंदुसार को निश्चित रूप से केवल आजीवक धर्म का अनुयायी घोषित करने के लिए स्पष्ट समकालीन प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
मौर्य राजपरिवार के समय बौद्ध, जैन, ब्राह्मण और आजीवक जैसी विभिन्न धार्मिक परंपराएँ सक्रिय थीं।
आजीवक संप्रदाय
मक्खलि गोसाल
आजीवक संप्रदाय के प्रमुख प्रारंभिक आचार्य मक्खलि गोसाल थे।
वे गौतम बुद्ध और महावीर के समकालीन थे।
आजीवक दर्शन में नियति अर्थात नियतिवाद की धारणा का विशेष महत्व था।
बाद में अशोक और उसके उत्तराधिकारी दशरथ द्वारा आजीवकों को गुफाएँ प्रदान किए जाने के अभिलेखीय प्रमाण भी मिलते हैं।
बिंदुसार और यूनानी जगत
डायमेकस और एंटियोकस
बिंदुसार के समय भी मौर्य साम्राज्य के पश्चिमी यूनानी राज्यों से राजनयिक संबंध बने रहे।
सेल्यूकिड शासक एंटियोकस प्रथम ने डायमेकस को बिंदुसार के दरबार में राजदूत के रूप में भेजा।
यूनानी परंपरा में बिंदुसार द्वारा एंटियोकस से मीठी मदिरा, सूखे अंजीर और एक दार्शनिक भेजने की इच्छा से संबंधित प्रसिद्ध प्रसंग भी मिलता है।
एंटियोकस ने वस्तुएँ भेजने की बात स्वीकार की, लेकिन यूनानी कानून के कारण दार्शनिक को बेचना संभव नहीं बताया।
सम्राट अशोक
राज्याभिषेक, कलिंग युद्ध, धम्म और अभिलेख
अशोक का राज्यारोहण
राज्यारोहण और राज्याभिषेक
बिंदुसार की मृत्यु के बाद अशोक मौर्य साम्राज्य का शासक बना।
उसका राज्यारोहण सामान्यतः लगभग 273 ईसा पूर्व माना जाता है।
उसका औपचारिक राज्याभिषेक लगभग 269–268 ईसा पूर्व में हुआ।
इसी कारण कुछ पुस्तकों में अशोक के शासनारंभ के लिए 273 ईसा पूर्व और कुछ में 269 ईसा पूर्व की तिथि मिलती है।
दो तिथियाँ अलग रखें
राज्यारोहण — लगभग 273 ईसा पूर्व।
राज्याभिषेक — लगभग 269–268 ईसा पूर्व।
अशोक का परिवार
माता और प्रारंभिक जीवन
बौद्ध ग्रंथ अशोकावदान की परंपरा में अशोक की माता का नाम सुभद्रांगी मिलता है।
श्रीलंकाई बौद्ध परंपरा में उसकी माता के लिए धम्मा नाम भी मिलता है।
इसलिए सुभद्रांगी अशोक की माता का प्रचलित पारंपरिक नाम है।
अशोक और अवन्ति
उज्जयिनी का राज्यपाल
बौद्ध परंपराओं के अनुसार सम्राट बनने से पहले अशोक को अवन्ति क्षेत्र का राज्यपाल बनाया गया था।
उसका प्रमुख प्रशासनिक केंद्र उज्जयिनी था।
कुछ परंपराएँ उसे तक्षशिला में विद्रोह शांत करने से भी जोड़ती हैं।
अशोक के नाम और उपाधियाँ
देवानांप्रिय और प्रियदर्शी
अशोक के अधिकांश अभिलेखों में उसका नाम सीधे “अशोक” नहीं मिलता। वह स्वयं को प्रायः देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा कहता है।
देवानांप्रिय का अर्थ है देवताओं का प्रिय और प्रियदर्शी का अर्थ प्रिय अथवा सुंदर दृष्टि वाला माना जाता है।
मास्की, गुज्जरा, निट्टूर और उदेगोलम जैसे कुछ लघु शिलालेखों में अशोक का व्यक्तिगत नाम मिलता है।
भाब्रू या बैराट अभिलेख में “मगध के राजा प्रियदर्शी” के रूप में उसका उल्लेख मिलता है।
अशोकवर्धन
पुराणिक परंपरा
पुराणिक परंपरा में अशोक के लिए अशोकवर्धन नाम भी मिलता है।
बौद्ध साहित्य में उसे अशोक, जबकि उसके अपने अभिलेखों में देवानांप्रिय प्रियदर्शी के रूप में अधिक देखा जाता है।
कलिंग युद्ध
अशोक के जीवन का निर्णायक मोड़
अशोक के शासन के लगभग आठवें वर्ष कलिंग युद्ध हुआ। इसकी तिथि सामान्यतः लगभग 261 ईसा पूर्व मानी जाती है।
कलिंग वर्तमान ओडिशा और उसके आसपास के क्षेत्र से संबंधित था।
अशोक के तेरहवें प्रमुख शिलालेख में कलिंग युद्ध और उसके बाद हुए पश्चाताप का विस्तृत वर्णन मिलता है।
अभिलेख के अनुसार बड़ी संख्या में लोग मारे गए, बंदी बनाए गए और अपने घरों से विस्थापित हुए।
युद्ध के विनाश से अशोक अत्यंत दुखी हुआ और उसने सैन्य विजय की अपेक्षा धम्म-विजय को अधिक महत्व देना शुरू किया।
बहुत महत्वपूर्ण
कलिंग युद्ध — लगभग 261 ईसा पूर्व।
वर्णन — तेरहवाँ प्रमुख शिलालेख।
अशोक ने बौद्ध धर्म कब अपनाया?
निग्रोध, उपगुप्त और बौद्ध परंपराएँ
अशोक के बौद्ध धर्म ग्रहण करने के विषय में अलग-अलग बौद्ध परंपराओं में अलग विवरण मिलते हैं।
श्रीलंकाई परंपरा में निग्रोध नामक युवा भिक्षु के उपदेश से अशोक के बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित होने का उल्लेख है।
उत्तर भारतीय बौद्ध परंपरा, विशेषकर अशोकावदान में, अशोक का संबंध बौद्ध आचार्य उपगुप्त से जोड़ा गया है।
इसलिए केवल उपगुप्त को अशोक का निश्चित दीक्षा-गुरु कहना सभी परंपराओं से मेल नहीं खाता।
अशोक के अपने अभिलेख यह स्पष्ट करते हैं कि वह व्यक्तिगत रूप से बुद्ध, धम्म और संघ में श्रद्धा रखता था।
अशोक का प्रारंभिक धार्मिक जीवन
शैव परंपरा और बौद्ध धर्म
अशोक के बौद्ध बनने से पहले उसके व्यक्तिगत धार्मिक विश्वासों के विषय में समकालीन प्रमाण बहुत सीमित हैं।
राजतरंगिणी की परंपरा में अशोक को शिव-उपासना से जोड़ा गया है।
लेकिन राजतरंगिणी अशोक के कई शताब्दियों बाद लिखी गई थी। इसी कारण अशोक को प्रारंभ से निश्चित रूप से “शैव” या “ब्राह्मण धर्म का अनुयायी” कहना पूरी तरह प्रमाणित नहीं है।
उसके अभिलेखों से इतना स्पष्ट है कि शासन के कुछ वर्षों बाद वह बौद्ध धर्म से गहराई से जुड़ गया था।
अशोक का व्यक्तिगत बौद्ध विश्वास
लघु शिलालेख और भाब्रू अभिलेख
अशोक के लघु शिलालेखों में वह स्वयं को बौद्ध उपासक के रूप में प्रस्तुत करता है।
लघु शिलालेख प्रथम में वह बताता है कि वह कुछ वर्षों से उपासक था और बाद में संघ के अधिक निकट आया।
मध्य प्रदेश के अहरौरा सहित लघु शिलालेखों की परंपरा अशोक के व्यक्तिगत बौद्ध झुकाव को समझने में महत्वपूर्ण है।
भाब्रू या बैराट अभिलेख में अशोक बुद्ध, धम्म और संघ के प्रति अपनी श्रद्धा स्पष्ट रूप से व्यक्त करता है और कुछ बौद्ध उपदेशों के अध्ययन की अनुशंसा करता है।
अशोक का धम्म
सामाजिक और नैतिक नीति
अशोक का धम्म केवल बौद्ध धर्म का दूसरा नाम नहीं था। यह सामान्य नैतिक और सामाजिक आचरण की नीति थी।
धम्म में माता-पिता का सम्मान, गुरुजनों का आदर, ब्राह्मणों और श्रमणों का सम्मान, सेवकों के प्रति उचित व्यवहार, जीवों के प्रति दया, सत्य और संयम पर बल दिया गया।
अशोक ने विभिन्न धार्मिक संप्रदायों के बीच सहिष्णुता और पारस्परिक सम्मान को बढ़ावा दिया।
उसने धम्म के प्रचार के लिए धम्म महामात्र नामक अधिकारियों की नियुक्ति की।
अशोक और बौद्ध धर्म का प्रचार
भारत से बाहर तक प्रसार
अशोक ने बौद्ध धर्म और अपने धम्म के प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
श्रीलंकाई बौद्ध परंपरा के अनुसार अशोक के पुत्र महेंद्र ने श्रीलंका में बौद्ध धर्म के प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उसकी पुत्री संघमित्रा बोधिवृक्ष की शाखा लेकर श्रीलंका गई।
श्रीलंका के राजा देवानाम्पिय तिस्स के समय वहाँ बौद्ध धर्म को महत्वपूर्ण राजकीय संरक्षण मिला।
तृतीय बौद्ध संगीति
पाटलिपुत्र
थेरवाद बौद्ध परंपरा के अनुसार अशोक के शासनकाल में पाटलिपुत्र में तृतीय बौद्ध संगीति आयोजित हुई।
इस संगीति की अध्यक्षता मोग्गलिपुत्त तिस्स ने की।
इसका उद्देश्य संघ को व्यवस्थित करना और बौद्ध सिद्धांतों को स्पष्ट करना था।
याद रखें
तृतीय बौद्ध संगीति — पाटलिपुत्र — अशोक — मोग्गलिपुत्त तिस्स।
अशोक के अभिलेख
भारतीय इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत
अशोक ने अपने आदेश और धम्म-संदेश शिलाओं और स्तंभों पर खुदवाए।
अशोक के अभिलेख भारतीय इतिहास के सबसे प्राचीन व्यापक और व्यवस्थित राजकीय अभिलेख-समूह हैं।
भारत में अभिलेख अशोक से पहले भी ज्ञात हैं, इसलिए यह कहना कि “भारत में सर्वप्रथम अभिलेख अशोक ने ही शुरू किए” सही नहीं है।
अशोक पहला भारतीय शासक है जिसके इतने व्यापक क्षेत्र में बड़ी संख्या में राजकीय अभिलेख मिले हैं।
अभिलेखों की भाषा और लिपि
ब्राह्मी से यूनानी तक
अशोक के अधिकांश अभिलेख प्राकृत भाषा में हैं।
अधिकांश भारतीय क्षेत्रों में ब्राह्मी लिपि का प्रयोग हुआ।
उत्तर-पश्चिम में कुछ अभिलेख खरोष्ठी लिपि में हैं।
अफगानिस्तान क्षेत्र से यूनानी और अरामाइक भाषा-लिपि में भी अशोक के अभिलेख मिले हैं।
जेम्स प्रिंसेप
ब्राह्मी लिपि का पठन
अशोक के अभिलेखों को आधुनिक काल में पढ़ने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण सफलता जेम्स प्रिंसेप को मिली।
1837 ईस्वी में प्रिंसेप ने ब्राह्मी लिपि को पढ़ने में निर्णायक सफलता प्राप्त की।
अभिलेखों में उस समय शासक का नाम मुख्यतः देवानांप्रिय प्रियदर्शी के रूप में मिलता था।
बाद में श्रीलंकाई बौद्ध ग्रंथों तथा अशोक नाम वाले अभिलेखों के आधार पर प्रियदर्शी की पहचान सम्राट अशोक से स्थापित हुई।
परीक्षा बिंदु
ब्राह्मी लिपि के पठन में सफलता — जेम्स प्रिंसेप — 1837 ईस्वी।
अशोक के प्रमुख अभिलेख
स्थान और महत्व
| अभिलेख / स्थान | मुख्य जानकारी |
|---|---|
| तेरहवाँ प्रमुख शिलालेख | कलिंग युद्ध, पश्चाताप और धम्म-विजय |
| भाब्रू / बैराट अभिलेख | बुद्ध, धम्म और संघ के प्रति अशोक की श्रद्धा |
| मास्की अभिलेख | प्रियदर्शी के साथ अशोक नाम का उल्लेख |
| रुम्मिनदेई स्तंभ लेख | बुद्ध के जन्मस्थान लुम्बिनी की यात्रा |
| निगाली सागर स्तंभ लेख | कनकमुनि बुद्ध के स्तूप से संबंधित |
| सारनाथ लघु स्तंभ लेख | बौद्ध संघ में फूट रोकने का निर्देश |
| कौशांबी लघु स्तंभ लेख | संघ की एकता से संबंधित निर्देश |
| रानी का अभिलेख | अशोक की रानी कारुवाकी और उसके दान का उल्लेख |
अशोक के स्तंभ
मौर्य कला
अशोक ने अनेक स्थानों पर एकाश्म पत्थर के विशाल स्तंभ स्थापित कराए।
इन स्तंभों की सतह पर अत्यंत चिकनी मौर्यकालीन चमक दिखाई देती है।
सारनाथ का प्रसिद्ध सिंह स्तंभशीर्ष चार सिंहों से निर्मित है।
इसी सारनाथ सिंह स्तंभशीर्ष को भारत का राजचिह्न अपनाया गया।
इसके आधार पर बने धर्मचक्र को भारत के राष्ट्रीय ध्वज के मध्य स्थान दिया गया है।
अशोक का साम्राज्य
मौर्य साम्राज्य की विशाल सीमा
अशोक के समय मौर्य साम्राज्य भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे विशाल साम्राज्यों में था।
इसका विस्तार उत्तर-पश्चिम में अफगानिस्तान के कुछ भागों से लेकर पूर्व में बंगाल क्षेत्र तक था।
दक्षिण में साम्राज्य का प्रभाव दक्कन के बड़े भाग तक था।
तमिल क्षेत्र के चोल, पांड्य, सत्यपुत्र और केरलपुत्र अशोक के प्रत्यक्ष साम्राज्य के बाहर थे, लेकिन उसके अभिलेखों में उनका उल्लेख पड़ोसी राज्यों के रूप में मिलता है।
अशोक के बाद मौर्य साम्राज्य
साम्राज्य का पतन
अशोक की मृत्यु लगभग 232 ईसा पूर्व में हुई।
उसके बाद मौर्य साम्राज्य में कई उत्तराधिकारी शासक हुए।
विशाल साम्राज्य को नियंत्रित करना कठिन होता गया और प्रांतीय शक्तियाँ मजबूत होने लगीं।
उत्तर-पश्चिम में विदेशी आक्रमणों और आंतरिक राजनीतिक कमजोरी ने भी मौर्य सत्ता को कमजोर किया।
बृहद्रथ
मौर्य वंश का अंतिम शासक
बृहद्रथ मौर्य वंश का अंतिम शासक था।
लगभग 185 ईसा पूर्व में उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने एक सैन्य समारोह के दौरान उसकी हत्या कर दी।
बृहद्रथ की मृत्यु के साथ मौर्य वंश का अंत हुआ और शुंग वंश की स्थापना हुई।
याद रखें
अंतिम मौर्य — बृहद्रथ।
बृहद्रथ की हत्या — पुष्यमित्र शुंग।
लगभग 185 ईसा पूर्व — शुंग वंश की स्थापना।
तीन प्रमुख मौर्य शासक
एक नज़र में
| शासक | काल | मुख्य उपलब्धि |
|---|---|---|
| चंद्रगुप्त मौर्य | लगभग 322/321–298 ईसा पूर्व | मौर्य साम्राज्य की स्थापना; सेल्युकस से संधि |
| बिंदुसार | लगभग 298–273 ईसा पूर्व | साम्राज्य को बनाए रखा और दक्षिण में विस्तार |
| अशोक | लगभग 273–232 ईसा पूर्व | कलिंग विजय, धम्म नीति, अभिलेख और बौद्ध धर्म का संरक्षण |
अंतिम त्वरित पुनरावृत्ति
मौर्य वंश की स्थापना — लगभग 322–321 ईसा पूर्व।
संस्थापक — चंद्रगुप्त मौर्य।
धनानंद को हटाने में चाणक्य की महत्वपूर्ण भूमिका।
चाणक्य = कौटिल्य = विष्णुगुप्त।
अर्थशास्त्र — कौटिल्य से संबंधित।
सैंड्रोकोट्टस / सैंड्राकोट्टस — चंद्रगुप्त मौर्य।
चंद्रगुप्त–सेल्युकस संघर्ष — लगभग 305 ईसा पूर्व।
चंद्रगुप्त ने सेल्युकस को 500 युद्ध-हाथी दिए।
सेल्युकस → मेगास्थनीज → चंद्रगुप्त का दरबार।
मेगास्थनीज की पुस्तक — इंडिका।
कार्नेलिया नाम की पत्नी — प्रमाणित प्राचीन तथ्य नहीं।
चंद्रगुप्त और जैन धर्म — भद्रबाहु और श्रवणबेलगोला की जैन परंपरा।
चंद्रगुप्त की मृत्यु — लगभग 298 ईसा पूर्व।
उत्तराधिकारी — बिंदुसार।
बिंदुसार — अमित्रघात — शत्रु-विनाशक।
आजीवक परंपरा के प्रमुख आचार्य — मक्खलि गोसाल।
बिंदुसार के दरबार में यूनानी राजदूत — डायमेकस।
बिंदुसार के बाद — अशोक।
अशोक का राज्यारोहण — लगभग 273 ईसा पूर्व।
अशोक का राज्याभिषेक — लगभग 269–268 ईसा पूर्व।
अशोक की माता — परंपरा में सुभद्रांगी / धम्मा।
सम्राट बनने से पहले — उज्जयिनी से संबंधित राज्यपाल की परंपरा।
अशोक की प्रमुख उपाधि — देवानांप्रिय प्रियदर्शी।
पुराणिक नाम — अशोकवर्धन।
कलिंग युद्ध — लगभग 261 ईसा पूर्व।
कलिंग युद्ध का वर्णन — तेरहवाँ प्रमुख शिलालेख।
निग्रोध और उपगुप्त — अलग बौद्ध परंपराओं में अशोक से संबंधित।
भाब्रू अभिलेख — बुद्ध, धम्म और संघ के प्रति अशोक की श्रद्धा।
अशोक का धम्म — नैतिक और सामाजिक आचरण की नीति।
धम्म महामात्र — धम्म से संबंधित अधिकारी।
महेंद्र और संघमित्रा — श्रीलंका में बौद्ध धर्म की परंपरा से संबंधित।
तृतीय बौद्ध संगीति — पाटलिपुत्र — मोग्गलिपुत्त तिस्स — अशोक।
अशोक — भारत का पहला व्यापक राजकीय अभिलेख छोड़ने वाला शासक।
अधिकांश अशोक अभिलेख — प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि।
उत्तर-पश्चिम — खरोष्ठी लिपि।
जेम्स प्रिंसेप — 1837 — ब्राह्मी लिपि के पठन में निर्णायक सफलता।
सारनाथ सिंह स्तंभशीर्ष — भारत का राजचिह्न।
अशोक की मृत्यु — लगभग 232 ईसा पूर्व।
मौर्य वंश का अंतिम शासक — बृहद्रथ।
बृहद्रथ की हत्या — पुष्यमित्र शुंग — लगभग 185 ईसा पूर्व।
मौर्य वंश के बाद — शुंग वंश।