लॉर्ड इरविन
1926–1931 — साइमन कमीशन, पूर्ण स्वराज, दांडी यात्रा और गांधी-इरविन समझौता
लॉर्ड इरविन का कार्यकाल
लॉर्ड इरविन 1926 से 1931 तक भारत के वायसराय एवं गवर्नर-जनरल रहे। उनका कार्यकाल भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के अत्यंत महत्वपूर्ण चरण से जुड़ा था। साइमन कमीशन की नियुक्ति एवं उसका विरोध, क्रांतिकारी गतिविधियाँ, शारदा अधिनियम, लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज की घोषणा, दांडी यात्रा, सविनय अवज्ञा आंदोलन, प्रथम गोलमेज सम्मेलन और गांधी-इरविन समझौता इसी काल की प्रमुख घटनाएँ थीं।
साइमन कमीशन की नियुक्ति
1927
1927 में ब्रिटिश सरकार ने साइमन कमीशन की नियुक्ति की। इसका आधिकारिक नाम भारतीय वैधानिक आयोग था और इसके अध्यक्ष ब्रिटिश राजनेता सर जॉन साइमन थे।
भारत सरकार अधिनियम, 1919 के अंतर्गत लागू संवैधानिक व्यवस्था की समीक्षा करने और भविष्य के संवैधानिक सुधारों के संबंध में सुझाव देने के लिए इस आयोग को नियुक्त किया गया था।
साइमन कमीशन में सातों सदस्य ब्रिटिश थे और इसमें एक भी भारतीय सदस्य नहीं था। इसी कारण भारत के अधिकांश राजनीतिक दलों ने इसका विरोध किया।
🎯 अत्यंत महत्वपूर्ण
साइमन कमीशन — नियुक्ति 1927 — अध्यक्ष सर जॉन साइमन — सात सदस्य — एक भी भारतीय नहीं।
साइमन कमीशन की भारत यात्रा और विरोध
1928
साइमन कमीशन 3 फरवरी 1928 को बंबई पहुँचा। भारतीय प्रतिनिधित्व न होने के कारण देश के अनेक हिस्सों में इसका तीव्र विरोध हुआ और प्रदर्शनकारियों ने “साइमन गो बैक” का नारा लगाया।
कांग्रेस सहित अधिकांश प्रमुख भारतीय राजनीतिक संगठनों ने आयोग का बहिष्कार किया। जहाँ-जहाँ आयोग गया, वहाँ काले झंडों और विरोध-प्रदर्शनों से उसका स्वागत किया गया।
30 अक्टूबर 1928 को लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध में निकाले गए जुलूस का नेतृत्व लाला लाजपत राय कर रहे थे। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया, जिसमें लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हुए।
लाला लाजपत राय की 17 नवंबर 1928 को मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु ने क्रांतिकारी युवाओं में तीव्र आक्रोश पैदा किया।
सांडर्स की हत्या
1928
लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के उद्देश्य से क्रांतिकारियों ने पुलिस अधिकारी जेम्स ए. स्कॉट को निशाना बनाने की योजना बनाई, जिसे लाठीचार्ज के लिए जिम्मेदार माना गया था।
17 दिसंबर 1928 को लाहौर में पहचान की भूल के कारण सहायक पुलिस अधीक्षक जॉन पी. सांडर्स की हत्या कर दी गई।
इस कार्रवाई में भगत सिंह, शिवराम राजगुरु और चंद्रशेखर आजाद की प्रमुख भूमिका थी। सुखदेव भी इस क्रांतिकारी योजना और संगठन से महत्वपूर्ण रूप से जुड़े थे।
इस घटना को अक्सर “सांडर्स की हत्या” कहा जाता है। ध्यान रखें कि क्रांतिकारियों का मूल निशाना स्कॉट था, लेकिन गलती से सांडर्स मारा गया।
📗 भ्रम न रखें
लाठीचार्ज से जुड़ा अधिकारी — स्कॉट; मारा गया अधिकारी — सांडर्स।
केंद्रीय विधान सभा बम कांड
1929
8 अप्रैल 1929 को दिल्ली स्थित केंद्रीय विधान सभा में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने बम फेंके। उनका उद्देश्य बड़े पैमाने पर लोगों की हत्या करना नहीं, बल्कि ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध राजनीतिक संदेश देना था।
बम फेंकने के बाद दोनों क्रांतिकारी भागे नहीं, बल्कि वहीं रुककर नारे लगाए और स्वयं को गिरफ्तार होने दिया।
इस घटना के माध्यम से क्रांतिकारियों ने विशेष रूप से पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल जैसी औपनिवेशिक नीतियों का विरोध किया।
🎯 याद रखें
8 अप्रैल 1929 — केंद्रीय विधान सभा — भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त।
जतिन दास की मृत्यु
1929
लाहौर षड्यंत्र मामले में गिरफ्तार क्रांतिकारियों ने जेलों में भारतीय राजनीतिक कैदियों के साथ होने वाले भेदभाव और खराब परिस्थितियों के विरोध में भूख हड़ताल की।
क्रांतिकारी जतिन दास ने लंबी भूख हड़ताल की और 13 सितंबर 1929 को लाहौर जेल में उनकी मृत्यु हो गई। उनकी भूख हड़ताल लगभग 63 दिनों तक चली थी।
उनकी मृत्यु ने पूरे देश में व्यापक प्रतिक्रिया उत्पन्न की और ब्रिटिश जेल व्यवस्था के विरुद्ध जनाक्रोश बढ़ा।
शारदा अधिनियम
1929–1930
शारदा अधिनियम का आधिकारिक नाम बाल विवाह निरोधक अधिनियम, 1929 था। इसे हरबिलास शारदा के प्रयासों से जोड़ा जाता है और इसी कारण इसे सामान्यतः शारदा अधिनियम कहा जाता है।
यह अधिनियम 1929 में पारित हुआ और 1 अप्रैल 1930 से प्रभावी हुआ। इसलिए इसे केवल “1930 में पारित” लिखना सटीक नहीं है।
मूल अधिनियम में विवाह की न्यूनतम आयु लड़कियों के लिए 14 वर्ष और लड़कों के लिए 18 वर्ष निर्धारित की गई थी। बाद में इन आयु सीमाओं में परिवर्तन किए गए।
🎯 परीक्षा में सबसे सुरक्षित तथ्य
शारदा अधिनियम — 1929 में पारित — 1 अप्रैल 1930 से लागू — बाल विवाह रोकने से संबंधित।
दीपावली घोषणा
1929
31 अक्टूबर 1929 को लॉर्ड इरविन ने भारत की संवैधानिक प्रगति के संबंध में एक महत्वपूर्ण घोषणा की, जिसे सामान्यतः इरविन घोषणा या दीपावली घोषणा कहा जाता है।
इरविन ने स्पष्ट किया कि भारत के संवैधानिक विकास का स्वाभाविक लक्ष्य डोमिनियन स्टेटस अर्थात औपनिवेशिक स्वराज्य की दिशा में प्रगति है।
इसके साथ ही भारत की भावी संवैधानिक व्यवस्था पर चर्चा करने के लिए भारतीय प्रतिनिधियों और ब्रिटिश सरकार के बीच गोलमेज सम्मेलन आयोजित करने का संकेत भी दिया गया।
हालाँकि इस घोषणा में डोमिनियन स्टेटस प्राप्त करने की कोई निश्चित समय-सीमा नहीं दी गई थी, इसलिए भारतीय राष्ट्रवादियों का एक बड़ा वर्ग इससे संतुष्ट नहीं हुआ।
कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन
1929
दिसंबर 1929 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का ऐतिहासिक लाहौर अधिवेशन आयोजित हुआ। इसकी अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की।
इस अधिवेशन में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज को अपना अंतिम राजनीतिक लक्ष्य घोषित किया। इससे पहले भारतीय राजनीति में डोमिनियन स्टेटस की मांग महत्वपूर्ण थी, लेकिन अब कांग्रेस ने पूर्ण स्वतंत्रता को अपना स्पष्ट लक्ष्य बना लिया।
लाहौर अधिवेशन में यह निर्णय लिया गया कि 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाएगा।
इसके अनुसार 26 जनवरी 1930 को देश के विभिन्न भागों में स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा ली गई और पूर्ण स्वराज का संकल्प दोहराया गया।
🎯 तीन तथ्य एक साथ याद रखें
लाहौर अधिवेशन — 1929 — जवाहरलाल नेहरू — पूर्ण स्वराज — 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस।
दांडी यात्रा
1930
सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने की दिशा में महात्मा गांधी ने ब्रिटिश सरकार के नमक कानून को चुनौती देने का निर्णय लिया। नमक जैसी दैनिक आवश्यकता की वस्तु पर सरकारी नियंत्रण और कर को उन्होंने जनसाधारण से सीधे जुड़ा मुद्दा बनाया।
गांधीजी ने 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से अपने चुने हुए साथियों के साथ दांडी की ओर यात्रा शुरू की।
लगभग 24 दिनों की यात्रा के बाद गांधीजी 5 अप्रैल 1930 को दांडी पहुँचे और 6 अप्रैल 1930 को नमक बनाकर ब्रिटिश नमक कानून का उल्लंघन किया।
इसी के साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन को व्यापक जनआंदोलन का स्वरूप मिला। देश के विभिन्न हिस्सों में नमक कानून तोड़ने, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और अन्य औपनिवेशिक कानूनों का शांतिपूर्ण उल्लंघन किया गया।
⚡ क्रम से याद करें
सविनय अवज्ञा आंदोलन
1930
1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के एक नए चरण के रूप में प्रारंभ हुआ। इसका अर्थ केवल ब्रिटिश शासन से सहयोग न करना नहीं था, बल्कि अन्यायपूर्ण औपनिवेशिक कानूनों का खुलकर और अहिंसक ढंग से उल्लंघन करना भी था।
दांडी यात्रा और नमक कानून भंग इस आंदोलन की शुरुआत का प्रतीक बने। इसके बाद देश के विभिन्न भागों में नमक बनाना, विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार, शराब की दुकानों के सामने धरना और अनेक औपनिवेशिक नियमों का उल्लंघन किया गया।
ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियाँ कीं। महात्मा गांधी सहित हजारों आंदोलनकारियों को गिरफ्तार किया गया।
📗 असहयोग और सविनय अवज्ञा में अंतर
असहयोग आंदोलन में मुख्य जोर ब्रिटिश संस्थाओं से सहयोग वापस लेने पर था, जबकि सविनय अवज्ञा आंदोलन में अन्यायपूर्ण कानूनों का अहिंसक उल्लंघन भी शामिल था।
प्रथम गोलमेज सम्मेलन
1930–1931
भारत की भावी संवैधानिक व्यवस्था पर विचार करने के लिए प्रथम गोलमेज सम्मेलन नवंबर 1930 से जनवरी 1931 के बीच लंदन में आयोजित हुआ।
इस सम्मेलन में भारतीय रियासतों, मुस्लिम लीग, दलित वर्गों और अन्य समूहों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया, लेकिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भाग नहीं लिया, क्योंकि उस समय सविनय अवज्ञा आंदोलन चल रहा था और कांग्रेस के अनेक नेता जेल में थे।
कांग्रेस की अनुपस्थिति के कारण ब्रिटिश सरकार को यह महसूस हुआ कि भारत की किसी व्यापक संवैधानिक व्यवस्था पर कांग्रेस के बिना सहमति प्राप्त करना कठिन होगा। इसी पृष्ठभूमि में आगे गांधी और इरविन के बीच बातचीत का मार्ग प्रशस्त हुआ।
गांधी-इरविन समझौता
1931
5 मार्च 1931 को महात्मा गांधी और लॉर्ड इरविन के बीच एक समझौता हुआ, जिसे गांधी-इरविन समझौता या दिल्ली समझौता कहा जाता है।
समझौते के अंतर्गत कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित करने और आगामी द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने पर सहमति व्यक्त की।
ब्रिटिश सरकार ने हिंसा से संबंधित अपराधों में दोषी न ठहराए गए अनेक राजनीतिक बंदियों को रिहा करने, जब्त संपत्तियों के संबंध में कुछ रियायतें देने और समुद्र तटीय क्षेत्रों में लोगों को निश्चित शर्तों के अंतर्गत नमक बनाने की अनुमति देने जैसी रियायतें स्वीकार कीं।
गांधीजी ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की मृत्युदंड की सजा के विषय में भी इरविन से बातचीत की, लेकिन गांधी-इरविन समझौते के अंतर्गत उनकी सजा को समाप्त नहीं किया गया।
🎯 अत्यंत महत्वपूर्ण
5 मार्च 1931 — गांधी-इरविन समझौता — सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित — कांग्रेस का द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेना।
भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव
1931
भगत सिंह, शिवराम राजगुरु और सुखदेव थापर को लाहौर षड्यंत्र मामले में मृत्युदंड दिया गया।
तीनों क्रांतिकारियों को 23 मार्च 1931 को लाहौर केंद्रीय जेल में फाँसी दी गई। यह घटना लॉर्ड इरविन के वायसराय काल के अंतिम चरण में हुई।
उनकी फाँसी से पूरे देश में तीव्र आक्रोश फैल गया और वे भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के सबसे प्रसिद्ध क्रांतिकारी प्रतीकों में शामिल हो गए।
महत्वपूर्ण घटनाक्रम
1927–1931
| वर्ष | घटना | मुख्य तथ्य |
|---|---|---|
| 1927 | साइमन कमीशन की नियुक्ति | सर जॉन साइमन की अध्यक्षता; कोई भारतीय सदस्य नहीं |
| 1928 | साइमन कमीशन भारत आया | 3 फरवरी; देशव्यापी विरोध |
| 1928 | लाला लाजपत राय पर लाठीचार्ज | लाहौर; बाद में 17 नवंबर को मृत्यु |
| 1928 | सांडर्स की हत्या | 17 दिसंबर; भगत सिंह, राजगुरु आदि |
| 1929 | केंद्रीय विधान सभा बम कांड | भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त |
| 1929 | जतिन दास की मृत्यु | लाहौर जेल में लंबी भूख हड़ताल के बाद |
| 1929 | शारदा अधिनियम | बाल विवाह निरोधक अधिनियम |
| 1929 | दीपावली घोषणा | 31 अक्टूबर; इरविन घोषणा |
| 1929 | लाहौर अधिवेशन | जवाहरलाल नेहरू; पूर्ण स्वराज |
| 26 जनवरी 1930 | स्वतंत्रता दिवस | पूर्ण स्वराज की प्रतिज्ञा |
| 1930 | दांडी यात्रा | 12 मार्च से 6 अप्रैल; नमक कानून भंग |
| 1930 | सविनय अवज्ञा आंदोलन | नमक सत्याग्रह से व्यापक विस्तार |
| 1930–31 | प्रथम गोलमेज सम्मेलन | कांग्रेस ने भाग नहीं लिया |
| 5 मार्च 1931 | गांधी-इरविन समझौता | सविनय अवज्ञा स्थगित |
| 23 मार्च 1931 | भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी | लाहौर केंद्रीय जेल |
त्वरित पुनरावृत्ति
महत्वपूर्ण क्रम
⚡ एक क्रम में याद करें
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति
लॉर्ड इरविन — 1926–1931 — साइमन कमीशन से गांधी-इरविन समझौते तक का महत्वपूर्ण काल।
साइमन कमीशन — 1927 में नियुक्त; अध्यक्ष सर जॉन साइमन; सभी सात सदस्य ब्रिटिश थे।
3 फरवरी 1928 को साइमन कमीशन भारत पहुँचा और उसका व्यापक विरोध हुआ।
लाला लाजपत राय साइमन कमीशन विरोध के दौरान हुए लाठीचार्ज में घायल हुए और 17 नवंबर 1928 को उनकी मृत्यु हुई।
सांडर्स की हत्या — 17 दिसंबर 1928; मूल निशाना पुलिस अधिकारी स्कॉट था।
केंद्रीय विधान सभा बम कांड — 8 अप्रैल 1929 — भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त।
जतिन दास की मृत्यु — 13 सितंबर 1929 — लाहौर जेल में लगभग 63 दिन की भूख हड़ताल के बाद।
शारदा अधिनियम — 1929 में पारित और 1 अप्रैल 1930 से लागू; बाल विवाह रोकने से संबंधित।
इरविन की दीपावली घोषणा — 31 अक्टूबर 1929 — डोमिनियन स्टेटस को भारत के संवैधानिक विकास के लक्ष्य के रूप में स्वीकार करने की दिशा में घोषणा।
लाहौर अधिवेशन — दिसंबर 1929 — अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू; पूर्ण स्वराज कांग्रेस का लक्ष्य बना।
26 जनवरी 1930 को प्रथम स्वतंत्रता दिवस मनाया गया।
दांडी यात्रा — 12 मार्च से 6 अप्रैल 1930 — नमक कानून भंग और सविनय अवज्ञा आंदोलन का व्यापक आरंभ।
प्रथम गोलमेज सम्मेलन — 1930–31 — कांग्रेस ने भाग नहीं लिया।
गांधी-इरविन समझौता — 5 मार्च 1931 — सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित तथा कांग्रेस का द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने का निर्णय।
भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव — 23 मार्च 1931 को फाँसी।