लॉर्ड एल्गिन द्वितीय
1894–1899 — अकाल, प्लेग, चापेकर बंधु और सीमांत संघर्ष
लॉर्ड एल्गिन द्वितीय का शासनकाल
लॉर्ड एल्गिन द्वितीय 1894 से 1899 तक भारत का वायसराय रहा। उसका कार्यकाल प्राकृतिक आपदाओं और राजनीतिक अशांति के कारण विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा। इसी काल में भारत के अनेक भागों में भीषण अकाल पड़ा, पुणे सहित पश्चिमी भारत में प्लेग फैला तथा प्लेग-नियंत्रण की कठोर नीतियों के विरोध में चापेकर बंधुओं द्वारा दो ब्रिटिश अधिकारियों पर हमला किया गया।
लॉर्ड एल्गिन द्वितीय
भारत का वायसराय — 1894 से 1899
लॉर्ड एल्गिन द्वितीय ने 1894 में भारत के वायसराय का पद ग्रहण किया और 1899 तक इस पद पर रहा। वह लॉर्ड लैंसडाउन के बाद भारत का वायसराय बना तथा उसके बाद लॉर्ड कर्जन ने यह पद संभाला।
एल्गिन द्वितीय का शासनकाल अपेक्षाकृत कठिन परिस्थितियों वाला रहा। उसके समय 1896–97 का भीषण अकाल, ब्यूबोनिक प्लेग, पुणे में जन-असंतोष तथा उत्तर-पश्चिमी सीमांत क्षेत्र में व्यापक जनजातीय संघर्ष जैसी घटनाएँ हुईं।
🎯 परीक्षा के लिए
लॉर्ड लैंसडाउन → लॉर्ड एल्गिन द्वितीय → लॉर्ड कर्जन वायसरायों का महत्वपूर्ण क्रम है।
1896–97 का अकाल
अकाल और राहत व्यवस्था
लॉर्ड एल्गिन द्वितीय के शासनकाल में 1896–97 में भारत के कई भागों में गंभीर अकाल पड़ा। अकाल ने मध्य भारत, बंबई प्रेसीडेंसी, संयुक्त प्रांत तथा अन्य क्षेत्रों की बड़ी आबादी को प्रभावित किया।
अकाल के दौरान खाद्यान्न की कमी, बढ़ती कीमतों और महामारियों के कारण स्थिति और गंभीर हो गई। औपनिवेशिक सरकार की अकाल राहत व्यवस्था और उसके प्रभाव का अध्ययन करने की आवश्यकता महसूस हुई।
लायल अकाल आयोग
1898 का भारतीय अकाल आयोग
1896–97 के अकाल की परिस्थितियों और अकाल-राहत व्यवस्था की जाँच के लिए 1898 में एक अकाल आयोग गठित किया गया। इसकी अध्यक्षता सर जेम्स ब्रॉडवुड लायल ने की। इसी कारण इसे सामान्यतः लायल आयोग कहा जाता है।
आयोग ने अकाल से निपटने के लिए अपनाई जा रही राहत व्यवस्था और पूर्व में निर्धारित अकाल-नीति के क्रियान्वयन का अध्ययन किया तथा भविष्य के लिए प्रशासनिक उपायों पर सुझाव दिए।
📗 याद रखें
लायल आयोग — 1898 — अकाल से संबंधित।
प्लेग का प्रकोप
1896 से पश्चिमी भारत में महामारी
लॉर्ड एल्गिन द्वितीय के शासनकाल में 1896 में बंबई में ब्यूबोनिक प्लेग का गंभीर प्रकोप हुआ। इसके बाद यह बीमारी पुणे सहित पश्चिमी भारत के कई क्षेत्रों में फैल गई।
प्लेग पर नियंत्रण के लिए ब्रिटिश प्रशासन ने संक्रमित लोगों को अलग करने, मकानों की तलाशी लेने, संक्रमित सामान हटाने तथा कई स्थानों पर लोगों को उनके घरों से बाहर निकालने जैसी कठोर कार्रवाइयाँ कीं।
इन कार्रवाइयों को लागू करने के तरीके से विशेष रूप से पुणे में व्यापक असंतोष पैदा हुआ। लोगों को लगा कि प्लेग-नियंत्रण के नाम पर उनके घर, निजी जीवन और धार्मिक-सामाजिक परंपराओं में अत्यधिक हस्तक्षेप किया जा रहा है।
पुणे की प्लेग समिति
डब्ल्यू. सी. रैंड
पुणे में प्लेग को नियंत्रित करने के लिए विशेष प्रशासनिक व्यवस्था की गई। वाल्टर चार्ल्स रैंड को पुणे की विशेष प्लेग समिति का अध्यक्ष बनाया गया।
रैंड के नेतृत्व में प्लेग-नियंत्रण के लिए सैनिकों और अधिकारियों की सहायता ली गई। घरों की तलाशी और लोगों को अलग करने जैसी कार्रवाइयों के दौरान हुए कठोर व्यवहार ने पुणे में ब्रिटिश प्रशासन के प्रति रोष को और बढ़ा दिया।
🔎 महत्वपूर्ण संबंध
पुणे प्लेग → रैंड → कठोर प्लेग-नियंत्रण → जन-असंतोष → चापेकर बंधु।
चापेकर बंधु
प्रारंभिक क्रांतिकारी गतिविधि
दामोदर हरि चापेकर, बालकृष्ण हरि चापेकर और वासुदेव हरि चापेकर तीन भाई थे, जिनका नाम भारत के प्रारंभिक क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़ा हुआ है।
पुणे में प्लेग-नियंत्रण के दौरान ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा किए गए कठोर व्यवहार से चापेकर बंधु अत्यंत आक्रोशित थे। विशेष रूप से प्लेग समिति के अध्यक्ष डब्ल्यू. सी. रैंड को इन कार्रवाइयों के लिए जिम्मेदार माना गया।
इसी पृष्ठभूमि में दामोदर हरि चापेकर और बालकृष्ण हरि चापेकर ने रैंड को निशाना बनाने का निर्णय लिया।
रैंड और एयर्स्ट की हत्या
22 जून 1897 — पुणे
22 जून 1897 को पुणे में महारानी विक्टोरिया के शासन की हीरक जयंती के अवसर पर आयोजित समारोह से लौटते समय डब्ल्यू. सी. रैंड और उसके साथ जा रहे लेफ्टिनेंट चार्ल्स एयर्स्ट पर हमला किया गया।
यह हमला मुख्यतः दामोदर हरि चापेकर और बालकृष्ण हरि चापेकर से संबंधित था। एयर्स्ट की शीघ्र मृत्यु हो गई, जबकि गंभीर रूप से घायल रैंड की भी बाद में मृत्यु हो गई।
इस घटना ने ब्रिटिश सरकार को झकझोर दिया और चापेकर बंधुओं की गतिविधि को भारत के प्रारंभिक सशस्त्र क्रांतिकारी प्रतिरोध की महत्वपूर्ण घटनाओं में स्थान मिला।
🎯 अत्यंत महत्वपूर्ण
22 जून 1897 → पुणे → दामोदर एवं बालकृष्ण चापेकर → रैंड और एयर्स्ट पर हमला।
चापेकर बंधुओं को दंड
क्रांतिकारी संघर्ष का परिणाम
रैंड और एयर्स्ट की हत्या के बाद ब्रिटिश सरकार ने व्यापक जाँच शुरू की। दामोदर हरि चापेकर को गिरफ्तार कर मुकदमा चलाया गया और उसे 18 अप्रैल 1898 को फाँसी दी गई।
बाद में बालकृष्ण चापेकर और वासुदेव चापेकर भी गिरफ्तार हुए। वासुदेव चापेकर और उनके सहयोगी महादेव विनायक रानाडे को मई 1899 में तथा बालकृष्ण चापेकर को भी मई 1899 में फाँसी दी गई।
तीनों चापेकर भाइयों का बलिदान बाद की क्रांतिकारी पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बना।
बाल गंगाधर तिलक पर राजद्रोह
1897 का मुकदमा
पुणे प्लेग और उसके दौरान ब्रिटिश प्रशासन की कठोर कार्रवाइयों की बाल गंगाधर तिलक ने अपने समाचार-पत्र ‘केसरी’ में आलोचना की।
रैंड की हत्या के बाद ब्रिटिश सरकार ने तिलक के कुछ लेखों को सरकार के विरुद्ध असंतोष फैलाने वाला माना। 1897 में तिलक पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया और उन्हें 18 महीने के कठोर कारावास की सजा दी गई।
तिलक के विरुद्ध यह मुकदमा भारतीय राष्ट्रवादी राजनीति में महत्वपूर्ण घटना बना और इससे उनकी लोकप्रियता में वृद्धि हुई।
उत्तर-पश्चिमी सीमांत पर संघर्ष
1897–98 की जनजातीय अशांति
लॉर्ड एल्गिन द्वितीय के समय 1897–98 में उत्तर-पश्चिमी सीमांत क्षेत्र में भी गंभीर अशांति हुई। विभिन्न पश्तून जनजातियों ने ब्रिटिश नियंत्रण के विरुद्ध विद्रोह और सैन्य प्रतिरोध किया।
ब्रिटिश सरकार को इन विद्रोहों को दबाने के लिए बड़े सैन्य अभियान चलाने पड़े। इसी व्यापक सीमांत संघर्ष के दौरान तिराह अभियान भी चलाया गया।
उत्तर-पश्चिमी सीमा की समस्याएँ ब्रिटिश शासन के लिए लगातार चिंता का विषय बनी रहीं और अगले वायसराय लॉर्ड कर्जन के समय सीमांत प्रशासन में और परिवर्तन किए गए।
महत्वपूर्ण घटनाएँ — एक नजर में
त्वरित परीक्षा पुनरावृत्ति
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1894 | लॉर्ड एल्गिन द्वितीय भारत का वायसराय बना। |
| 1896–97 | भारत के अनेक भागों में गंभीर अकाल। |
| 1896 | बंबई में ब्यूबोनिक प्लेग का गंभीर प्रकोप। |
| 22 जून 1897 | पुणे में रैंड और लेफ्टिनेंट एयर्स्ट पर चापेकर बंधुओं का हमला। |
| 1897 | बाल गंगाधर तिलक पर राजद्रोह का मुकदमा। |
| 1897–98 | उत्तर-पश्चिमी सीमांत क्षेत्र में जनजातीय संघर्ष तथा तिराह अभियान। |
| 1898 | सर जेम्स लायल की अध्यक्षता में अकाल आयोग। |
| 1899 | लॉर्ड एल्गिन द्वितीय का कार्यकाल समाप्त; लॉर्ड कर्जन वायसराय बना। |
त्वरित रिविजन
एक क्रम में पूरा अध्याय
⚡ याद रखने का क्रम
⚡ अंतिम पुनरावृत्ति
लॉर्ड एल्गिन द्वितीय 1894 से 1899 तक भारत का वायसराय रहा।
उसके शासनकाल की प्रमुख समस्याओं में 1896–97 का अकाल, ब्यूबोनिक प्लेग और उत्तर-पश्चिमी सीमांत की अशांति शामिल थीं।
अकाल की परिस्थितियों और राहत व्यवस्था की जाँच के लिए 1898 में सर जेम्स ब्रॉडवुड लायल की अध्यक्षता में अकाल आयोग गठित किया गया।
1896 में बंबई में प्लेग का गंभीर प्रकोप हुआ और बाद में पुणे भी इससे बुरी तरह प्रभावित हुआ।
पुणे की विशेष प्लेग समिति का अध्यक्ष डब्ल्यू. सी. रैंड था।
प्लेग-नियंत्रण की कठोर कार्रवाइयों से नाराज दामोदर हरि चापेकर और बालकृष्ण हरि चापेकर ने 22 जून 1897 को रैंड और लेफ्टिनेंट चार्ल्स एयर्स्ट पर हमला किया।
रैंड की हत्या के बाद 1897 में बाल गंगाधर तिलक पर राजद्रोह का मुकदमा भी चलाया गया और उन्हें 18 महीने के कठोर कारावास की सजा मिली।
एल्गिन द्वितीय के समय 1897–98 में उत्तर-पश्चिमी सीमांत क्षेत्र में व्यापक जनजातीय संघर्ष हुए और ब्रिटिश सरकार को तिराह अभियान सहित सैन्य कार्रवाइयाँ करनी पड़ीं।
1899 में लॉर्ड एल्गिन द्वितीय के बाद लॉर्ड कर्जन भारत का वायसराय बना।